मेरे पुत्र कुमार पुष्पक को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभाशीर्वाद

मेरे पुत्र कुमार पुष्पक को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभाशीर्वाद!
बेटा,आप सदा सर्वदा स्वस्थ प्रसन्न रहें,
आपका जीवन सुदीर्घ स्नेहिल सुयश एवं ऐश्वर्यपूर्ण हो,
आप दूसरों के प्रति स्नेह व सम्मान तथा अपने स्वाभिमान की श्रीवृद्धि करते रहें,
आपका करियर एवं जीवन सक्रिय व प्रगतिशील रहे तथा देश व मानव-प्रेम के प्रति समर्पित रहे,
मां और पापा , समस्त स्वजन-परिजन व शुभैषियों की शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद आपके साथ हैं।

(मेरा पुत्र कुमार पुष्पक और पुत्रबधू आरती पुष्पक अपने पुत्र (मेरे पौत्र ) अपूर्व अमन के साथ हैं। मेरे पौत्र यानी पोता अपूर्व अमन का जन्मदिन भी ठीक सात दिन बाद आज ही के दिन 16 दिसम्बर को है।)

गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

 

गुजरात विधान सभा के लिए दो चरणों में होने वाले चुनाव (2017) का पहला चरण 09 दिसम्बर को और अंतिम चरण 14 दिसम्बर को सम्पन्न होगा, परिणाम 18 दिसम्बर को आएंगे। राज्य में पिछले 22 वर्षों से सत्तारूढ भाजपा के प्रवक्ता बता रहे हैं कि कॉंग्रेस ने अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं, जबकि उनका तुरूप का पत्ता अभी बाकी है । खबरों के अनुसार भाजपा अपना तुरूप का पत्ता इसी सप्ताह चलेगी यानी प्रधानमंत्री जी का तीन दिवसीय चुनावी दौरा होने वाला है। समाचार यह भी है कि  लम्बे समय से सत्तारूढ भाजपा  ढलान पर है, जबकि वर्षों से हाशिए पर रह रही कॉंग्रेस उत्थान पर है।

माननीय मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं तीन बार गुजरात गया हूं और 1000 किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा सडक मार्ग से की है। मेरी कार के ड्राइवर और यात्रा – मार्ग में आने वाले कस्बों, गांवों एवं शहरों के लोगों से वार्तालाप से जो भीतरी बात उभर कर आई, वह भाजपा के पक्ष में नहीं है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि भाजपा वालों ने मान लिया है कि मुख्यमंत्री रहते जिस मोदी जी ने राज्य में जीत का सिलसिला बनाए रखा, उस मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते तो कुछ और करने की जरूरत ही नहीं है, चुनावी दंगल में तो गुजराती भावनाओं को उभार कर और कॉग्रेस को वंशवादी बता कर ही फतह की जा सकती है। शायद इसीलिए भाजपा के नेता, प्रवक्ता, समर्थक और भक्त आत्मविश्वास की अति तक पहुंच गए हैं और मुग्धा नायिका की भांति व्यवहार कर रहे हैं।

इतिहास की नज़रों में गुजरात – बिहार के अंतर्संबंधों की पडताल करें तो पाएंगे कि दक्षिण अफ्रीका से लौटे मोहन दास करमचन्द गांधी का भारत भूमि पर पहला  सत्याग्रह 1917 में बिहार के चम्पारण जिले में हुआ, उस आन्दोलन का यह शताब्दी वर्ष है। चम्पारण सत्याग्रह अंग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन फैलाने में बीजमंत्र के रूप में काम आया, अंतत: कभी न सूर्यास्त देखने वाली ब्रितानिया हुकूमत चली गई, मोहन महात्मा हो गए और बापू राष्ट्रपिता ।

सन 1973 ई. के अंतिम दिनों में छात्र आन्दोलन की शुरूआत गुजरात में हुई , जिसने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का स्वरूप ले लिया, आन्दोलन सफल हुआ, मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल की सरकार चली गई, विधान सभा भंग हो गई। उस आन्दोलन की चिंगारी बिहार पहुंची , वहां छात्र आन्दोलन शुरू हुआ, नेतृत्व छात्र संघर्ष समिति से जेपी के हाथ में आ गया, केन्द्र की सरकार हिल गई, आपात्काल लगा दिया गया, वह आन्दोलन बिहार विधान सभा भंग कराने में तो सफल नहीं हुआ, किंतु पूरे देश में अपना प्रभाव फैलाने में सफल हुआ, अंतत: केन्द्र की सरकार चली गई।

सन 2015 में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ, प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार किया, डीएनए वाला उनका जुमला उल्टा पड गया और भाजपा की करारी हार हुई, पार्टी की  की वह हार अमित शाह और मोदी जी की व्यक्तिगत हार मानी गई ।

सन 2017 में आगामी एक सप्ताह में गुजरात विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार अभियान चलाया है, फिर से उनका तीन दिवसीय चुनाव प्रचार अभियान होने वाला है। बिहार विधान सभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री जी ने जैसी अनपेक्षित शब्दावली का प्रयोग किया था , उसका परिणाम दुनिया देख चुकी है। प्रधान मंत्री जी ने अब तक के चुनावी भाषणों में अपने ही गृह राज्य गुजरात में बिहार में प्रयोग में लाई गई शब्दावली से भी अधिक अनपेक्षित, तीखी, जन-भावनाओं को आहत करने वाली और प्रधानमंत्री के पद की गरिमा से मेल नहीं खाने वाली शब्दावलियों का प्रयोग किया है। उन शब्दावलियों में प्रधान मंत्री जी की और उनकी पूरी पार्टी की बौखलाहट झलक रही है, आगामी तीन दिनों की चुनावी रैलियों में अगर उन्होंने सावधानी नहीं बरती तो उनकी वह असावधानी गुजरात में भाजपाई सत्ता के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी, जिसका परिणाम 2019 के आम चुनावों में भाजपा के लिए अशुभ संकेत होगा।

बिहार विधान सभा का 2015 वाला चुनाव किसी दल या दलों के बीच नहीं लडा गया था, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह थे तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार थे। उसका परिणाम भी दुनिया देख चुकी है।

गुजरात विधान सभा का यह चुनाव भी भाजपा और कॉग्रेस के बीच नहीं है, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री और अमित शाह हैं तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और हार्दिक पटेल हैं। मोदी जी और अमित जी का चुनाव प्रचार पुराने ढर्रे पर और पुरानी शब्दावलियों व जुमलों के सहारे है, वे और उनकी टीम के लोग राहुल गांधी को पप्पू कह चुके हैं ।

राहुल जी और हार्दिक जी का चुनाव प्रचार ताज़ा तरीन तरीकों के सहारे है, राहुल जी और उनकी टीम के लोग मोदी जी को गप्पू और फेंकू कह चुके हैं। सीधे तौर पर कहें तो दो धाकडों के सामने दो नौसीखिए हैं, जिन्हें जनता की सहानुभूति मिलती दिख रही है।

इसीलिए एक टेलीविजन चैनल द्वारा प्रसारित ओपीनियन पोल में भाजपा की सरकार बनते दिखाए जाने के बावजूद मेरा मानना है कि सरकार कॉंग्रेस की बनेगी और पूरे बहुमत से बनेगी। अमित शाह और मोदी जी, दोनों के लिए यह बहुत बडा सेटबैक होने वाला लगता है।

यही कारण है कि मुझे गुजरात-बिहार के अंतर्संबंधों के बीच आसन्न चुनावी समर में इतिहास की पुनरावृत्ति की ध्वनि सुनाई पड रही है।

फिल्म पद्मावती के बहाने साहित्य और इतिहास की यात्रा  

फिल्म पद्मावती के बहाने साहित्य और इतिहास की यात्रा  

 

संजय लीला भंसाली की फिल्म में रानी पद्मावती को किस रूप में प्रस्तुत किया गया है, मैं नहीं जानता, क्योंकि मैंने फिल्म देखी नहीं है।

यह पोस्ट उन लोगों के लिए है जो इतिहास और साहित्य को पढते –   समझते हैं, कला व संस्कृति को जानते हैं तथा विरासत और सियासत के बीच की विभाजक रेखा को भी मानते हैं। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो अपने कान को न टटोल कर कौवे के पीछे दौडते हैं, जो किसी को अपशब्द कहने में ही अपना शौर्य समझते हैं और मुद्दे को जाने –  समझे – देखे वगैर मरने – मारने पर उतारू हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणियों के माध्यम से वैसे लोगों को तो नसीहत दी ही है, कुछ माननीयों को भी आईना दिखाया है।

मैं भारतीय सेना पर गर्व करता हूं, उसके अलावा कोई जातीय सेना भी भारत वर्ष में है, मैं न तो उसे जानता हूं और न ही जानने की आवश्यकता समझता हूं। महारानी पद्मावती और महाराजा रतन सेन किसी जाति या समाज विशेष की ही नहीं, पूरे भारत वर्ष की आन-बान-शान के प्रतीक हैं ।

देशगौरव, लोक संस्कृति और पारम्परिक आस्था का संरक्षण प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है, हमारी गौरवशाली परम्पराएं अपने संरक्षण के लिए किसी भी जातीय सेना की मुहताज़ नहीं हैं, भारत का संविधान उन सबका संरक्षण करने में सक्षम है।

रानी पद्मावती की कथा को मैंने इतिहास और साहित्य, दोनों ही माध्यमों से जानने तथा उन माध्यमों की मर्यादाओं को भी समझने की कोशिश की है। मैंने बीए ऑनर्स तो हिन्दी में किया, किंतु साथ में इतिहास विषय भी रखा और एमए भी हिन्दी से ही किया। एमए के आठ पेपर्स में से एक पेपर में जायसी कृत “पद्मावत” महाकाव्य भी था।

पद्मावत नामक महाकाव्य मलिक मुहाम्मद जायसी ने नस्तालिक (पर्शियन) लिपि और अवधि भाषा में 1540 ई. में लिखा । पूरा महाकाव्य  मुख्य रूप से चौपाई छन्द में लिखा गया । सन 1477 ई. में जन्मे जायसी की उम्र उस समय 63 वर्ष थी। सूर दास जायसी से एक वर्ष छोटे थे । तुलसी दास ने रामचरित मानस नामक महाकाव्य सन 1574 ई. में देवनागरी लिपि और अवधि भाषा में लिखना शुरू किया, पूरा महाकाव्य मुख्य रूप से चौपाई छन्द में लिखा गया। सन 1511 ई. में जन्मे तुलसी दास की उम्र उस समय 63 वर्ष थी यानी वे जायसी से 34 वर्ष छोटे थे और ‘मानस’ तथा ‘पद्मावत’ की रचना में भी 34 वर्षों का ही अंतर है।

जायसी रचित पद्मावत अवधि भाषा में लिखा गया पहला महाकाव्य है और तुलसी रचित रामचरित मानस दूसरा। तुलसी ने जायसी के छन्द विधान का ही अनुकरण किया और पद्मावत की रचना-शैली में ही रामचरित मानस की रचना की। पद्मावत महाकाव्य अपने कथानक राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती तथा दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के काल से तीन सदी बाद की रचना है जबकि रामचरित मानस की रचना और उसके मूल कथानक राम के काल के बीच का अंतर कथनातीत है, हालांकि कुछ विद्वान राम का काल कुछ हजार वर्ष तो कुछ विद्वान कई लाख वर्ष पहले का बताते हैं।

पद्मावत की कथावस्तु में चितौड के महाराजा रतनसेन और उनकी परम रूपवती महारानी पद्मावती के प्रेम, सौन्दर्य व शौर्य की कथा है, रानी के अप्रतिम सौन्दर्य पर मोहित आततायी अलाउद्दीन खिलजी द्वारा धोखे से राजा रतन सेन को कैद करने तथा वीर सेनानी गोरा और बादल के बलिदान से राजा को खिलजी की कैद से मुक्त कराने की कथा है,  चितौड गढ पर खिलजी द्वारा आक्रमण करने और महाराजा की हत्या के बाद रानी को वश में करने के कुचक्र रचने की कथा भी है और है महारानी द्वारा खिलजी के समक्ष समर्पण करने के वजाय हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लेने की कथा । सचमुच, शौर्य, सौन्दर्य, ऐश्वर्य और रणकौशल की बेमिसाल प्रतिमूर्ति महारानी पद्मावती के अदम्य साहस की कथा है पद्मावत महाकाव्य।

जायसी ने पिंजडे में बंद सुआ यानी सुग्गा अर्थात तोता के बहाने खिलजी की कैद में पडे महाराजा रतन सिंह और उनकी विरह-वेदना से विदग्ध महारानी पद्मावती की प्रेम कथा को आत्मा और परमात्मा से जोडते हुए कथा को आध्यात्मिक स्वरूप देने का भी प्रयास किया है। इतिहास और साहित्य में जो स्वाभाविक फर्क होता है, वह इस कथा में ऐसे ही प्रसंगों के चलते है, विरासत और सियासत का द्वन्द्व ऐसे ही क्षणों में पैदा होता है।

तुलसी के रामचरित मानस में राम और उनकी पत्नी सीता के पूरे जीवन की कथा है, जिसमें एक-दूसरे के प्रति दोनों के प्रेम एवं समर्पण की तथा रावण द्वारा सीता का हरण करने और राम द्वारा युद्ध कर सीता को मुक्त कराने आदि की कथा प्रमुख है। तुलसी ने मानस में राम को जिस तरह साक्षात भगवान के रूप में प्रतिपादित किया है, वह रामकथा के आदि महाकाव्य वाल्मीकि कृत रामायण से भिन्न है। दोनों महाकाव्यों में यदि परस्पर तुलना की जाए तो वाल्मीकि की रामायण को इतिहास माना जाना चाहिए और तुलसी के रामचरित मानस को साहित्य। यह अलग बात है कि इन दोनों महाकाव्यों के मूल कथानक को इतिहासवेत्ता और भाषाविद किसी और रूप में ही देखते – समझते हैं । फिर भी, इन दोनों महाकाव्यों के बीच का स्वाभाविक अंतर ही इतिहास और साहित्य के बीच का अंतर्द्वन्द्व है तथा विरासत एवं सियासत के बीच की विभाजक रेखा भी।

‘पद्मावती’ के फिल्मकार का दावा है कि उन्होंने इतिहास और साहित्य , दोनों ही की मर्यादाओं के बीच सामंजस्य बनाते हुए फिल्म बनाई है तथा  महारानी पद्मावती और महाराजा रतन सेन के शौर्य, स्वाभिमान व सम्मान को सर्वोपरि स्थान दिया है।

कमाल तो यह है कि आठ सौ वर्ष पहले के कथानक पर पांच सौ वर्ष पहले महाकाव्य रचा गया, उसके बाद मातृभूमि की रक्षा के लिए भारत की गौरव-गरिमा की प्रतिमूर्ति महारानी झांसी के बलिदान का युग भी गुजर गया  और स्वतंत्र भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में उच्चतर डिग्री के आधिकारिक पाठ्यक्रमों में भी वह महाकाव्य पढाया जाता रहा, फिर भी कोई विवाद नहीं हुआ, किसी तरह का रोष-असंतोष सामने नहीं आया , किसी वाइस चांसलर या प्रोफेसर को मौत के घाट उतारने की धमकी देने की बात किसी को नहीं सूझी ; जबकि पद्मावती फिल्म के निदेशक और उसकी नायिका दीपिका पादुकोणे का सर कलम करने वाले के लिए कोई करोडों रूपये का ईनाम रख रहा है तो कोई निदेशक भंसाली की मां लीला भंसाली को लैला के रूप में चित्रित करते हुए फिल्म बना कर उनका चरित्र हनन करने की धमकी दे रहा है। आखिर इस फिल्म में है क्या ? यह कैसी आस्था और कैसा विश्वास है कि कोई अपनी भावनाओं के आहत होने के बहाने दूसरे की भावनाओं की हत्या करने की खुली धमकी दे रहा है और पूरा शासन – प्रशासन मौन है? यह देश, समाज और संविधान के लिए गंभीर चुनौती है।

जहां तक आस्था और आदर्श का प्रश्न है, तत्कालीन परिस्थितियों में रानी पद्मावती द्वारा हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर का रास्ता अपनाना आदर्श था, किंतु परवर्ती काल में राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड बेंटिक द्वारा सन 1822 में सती-प्रथा-उन्मूलन बिल पास कराए जाने के बाद 1857 की क्रांति में महारानी झांसी ने सैकडों दुश्मनों को मार कर मरने का आदर्श प्रस्तुत किया और 21वीं सदी की भारतीय नारी पूरे स्वाभिमान व सम्मान के साथ हर मोर्चे पर पुरुषों से दो – दो हाथ करने तथा चार कदम आगे रहने का आदर्श प्रस्तुत कर रही है, उसी नारी के लिए कुछ लोग खुलेआम अपमानजनक ऐलानों के जरीए कौन-से ऐतिहासिक संस्कार का परिचय दे रहे हैं?

कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बिना फिल्म देखे ही फिल्म पर पाबंदी लगाने की अतिउत्साही घोषणा करने और किन्हीं जातीय सेनाओं और दबंगों द्वारा उस फिल्म को दिखाने वाले सिनेमा घरों को क्षति पहुंचाने की धमकियां देने तथा वैसे लोगों द्वारा किसी खास राजनीतिक दल या दलों से जुडे होने जैसे क्रिया-कलापों को देख – सुन कर मन में यह सवाल तो उठता ही है कि जब देश के प्रधान सेवक के गृह राज्य जैसे एक संवेदनशील राज्य में चुनाव दरवाजा खटखटा रहा हो तथा देश के सबसे बडे राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव हो रहे हों तो ऐन मौके पर ऐसी गतिविधियां को सरपट दौडाने का क्या मतलब है? कहीं ये धमकियां और घोषणाएं भी 2015 में बिहार चुनाव के दौरान डीएनए की तलाश तथा 2017 में यूपी चुनाव के दौरान कब्रिस्तान बनाम श्मशान जैसे जुमलों की तरह जुमलेबाजी तो नहीं ? आखिर अपने प्रतिद्वंद्वियों की जाति व धर्म नीहारने के साथ-साथ उनके दादा-परदादा, नाना-परनाना आदि की जाति व धर्मों का शव-परीक्षण तो किया ही जा रहा है और यूपी में स्थानीय निकायों के लिए हुए चुनावों के आज आए परिणामों ने तो साफ कर दिया है कि हमेशा की तरह जुमलेबाजी से चुनाव की फसल बडी सफाई से काटी जा सकती है ।

हालांकि उच्चस्तरों पर कवायद अब शुरू हो गई है, भारत सरकार सूचना प्रसारण मंत्रालय की स्टैण्डिंग कमेटी द्वारा पद्मावती फिल्म के पक्षकारों और सेंसर बोर्ड को तलब किए जाने की खबर है, ऊंट किस करवट बैठेगा, जनता नहीं जानती, ऐसे माहौल में हम भी कोई टिप्पणी करना नहीं चाहते। फिर भी, इतना तो कहा ही जा सकता है कि बेहतर यह होता कि फिल्म को रीलीज होने दिया जाता, सच्चाई को जनता के सामने आने दिया जाता, जन-भावनाओं के खिलाफ अगर कुछ होता तो फिल्म को परदे से उतरवाने में कितना समय लगता । तब वह सही मायने में जनभावनाओं के उभार का परिणाम होता , वरना वर्तमान गतिविधियों से तो उसके पीछे कुछ और ही होने का अन्देशा हो रहा है।

मुद्दों की अदलाबदली

 

पता नहीं क्यों, आज टीवी पर समाचार देखते-सुनते समय मुझे सत्तर के दशक के दमदार कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता “भाषा की रात” कैसे याद आ गई ? पहले उस कविता की कुछ पंक्तियां ले लेते हैं, फिर आगे की बातें करते हैं :-

 

चन्द चालाक लोगों ने

जिनकी नरभक्षी जीभ ने

पसीने का स्वाद चख लिया है

बहस के लिए

भूख की जगह भाषा को रख दिया है ।

उन्हें मालूम है कि भूख से भागा हुआ आदमी

भाषा की ओर जाएगा

उन्होंने समझ लिया है कि

एक भुक्खड जब गुस्सा करेगा

अपनी ही अंगुलियां चबाएगा।

 

मुद्दे पर आने के पहले आज का वह समाचार भी जान लें । राहुल गांधी ने आज सोमनाथ मंदिर में पूजा अर्चना की। भाजपा की ओर से बताया गया कि राहुल जी ने मंदिर के रजिस्टर में स्वयं को गैर – हिन्दू लिखा है, कॉंग्रेस उस पर अपनी तरह का जवाब दे रही है।

अब, बहुत पुरानी बातों को याद करें। कश्मीरी ब्रह्मण पं. जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा जी ने एक पारसी युवक फीरोज़ से शादी की थी। उसी के आधार पर इंदिरा गांधी को एक पारसी यानी गैरहिन्दू बताते हुए पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था क्योंकि उस मंदिर को केवल हिन्दुओं के प्रवेश के लिए आरक्षित बताया जाता है। बाद में शुद्धीकरण के माध्यम से इंदिरा जी द्वारा हिन्दू धर्म स्वीकार करने की खबरें आम हुई थीं। फीरोज़ गांधी की मृत्यु 1960 में ही हो गई थी। उन्हीं फीरोज़ गांधी और इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी थे, जिन्होंने एक ईसाई सोनिया जी से शादी की और राहुल गांधी उसी दम्पती के पुत्र हैं, ये बातें दुनिया जानती है।

आज प्रधान सेवक जी को किसी के परनाना, नाना, बाबा का उल्लेख कर किसी का मज़ाक उडाते भी टीवी पर देखा सुना । कमाल है ! यह तो बिहार में डीएनए की खोज के माफिक है!! इस झल्लाहट की वजह क्या हो सकती है? क्या हालात वहां तक पहुंच गए हैं ? परिणाम बिहार की तरह ही होने वाले हैं क्या ???

अब फिर से राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर जाने संबंधी आज के समाचार पर आते हैं।

भाजपा ने राहुल गांधी को गैर – हिन्दू बता कर सियासी बहस का मुद्दा बना दिया है। भाजपा द्वारा उस मुद्दे को तूल दिए जाने की कॉग्रेस भर्त्सना कर रही है। अन्दर की बात तो वे दोनों और मंदिर प्रशासन ही जानें , हमारे लिए उन बातों का कोई महत्त्व नहीं है। फिर भी, टीवी के विभिन्न चैनलों पर चिल्ल पों सुन कर कुछ सवाल जेहन में उठने लगे हैं।

धर्म-परिवर्तन समाज में एक पुराना हथकण्डा रहा है। लव ज़िहाद की अगलगी में अखिला हिन्दू का मुस्लिम युवक से शादी कर हदिया बन जाना आग में घी का काम कर रहा है। उस मुद्दे ने सुप्रीम कोर्ट तक का मुंह देख लिया है। हिन्दुत्व के झण्डावरदार हिन्दुओं द्वारा ईसाई, बौद्ध या इस्लाम धर्म कबूल करने की घटनाओं को हिन्दुत्व पर शाजिसी प्रहार बता रहे है, हालांकि हिन्दुओं को हिन्दू बनाए रखने के लिए अन्य धर्मों का विरोध करने के अलावा उनके स्तरों पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं, पता नहीं चलता।

अब, इस मामले को आज के सामाचार से जोडें।

राहुल गांधी के पूर्वज किस धर्म के अनुयायी थे और खुद राहुल गांधी आज किस धर्म को मानते हैं, यह अन्दरूनी मामला न हमारे किसी काम का है और न उसमें हमारी कोई दिलचस्पी है। हमारा सवाल तो यह है कि राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर प्रवेश पर हल्ला बोलने वाले लोग आखिर कहना क्या चाहते हैं ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि राहुल जी गैर – हिन्दू हैं ? क्या वे यह पूछना चाहते हैं कि एक गैर – हिन्दू ने सोमनाथ मंदिर में प्रवेश क्यों किया ?  क्या उन्हें इस बात पर ऐतराज़ है कि एक गैर – हिन्दू खुद को हिन्दू बताने की जुर्रत क्यों कर रहा है? क्या वे यह सवाल उठाना चाहते हैं कि एक गैर – हिन्दू व्यक्ति हिन्दू क्यों बन रहा है ?

कमाल है, उन्हें एक अखिला के हदिया बन जाने पर भी ऐतराज़ है और उसके उलट एक राहुल फीरोज़ राजीव से विशुद्ध राहुल गांधी बनने पर भी ऐतराज है! आखिर किसी को किसी ऐतराज किससे है – जवाहर से, इंदिरा से, फीरोज़ से, राजीव से अथवा राहुल गांधी यानी राहुल और गांधी से ? उन्हें तो खुश होना चाहिए कि (उनके अनुसार) एक गैर – हिन्दू आदमी हिन्दू बन रहा है ! लेकिन नहीं, शायद उन्हें यह भय सता रहा है कि राहुल भी खुद को हिन्दू सिद्ध करने में सफल हो गया तो हिन्दुत्व पर उनके एकाधिकार का बंटवारा हो जाएगा और सोमनाथ, द्वारिका आदि जैसे मंदिरों वाले राज्य के आगामी विधान सभा चुनाव में हिन्दू मतदाताओं का रूझान भी अपनी ओर मोडने में वह सफल हो जाएगा। और तब, तब 22 वर्षों का तमगा छिन जाएगा, और वे ऐसा कदापि नहीं चाहते । क्या यही कारण है कि राहुल को गैर – हिन्दू रहने देने में ही उन्हें अपना कल्याण दिख रहा है?

शायद इसीलिए बेरोजगारी मिटाने के लिए रोजगार सृजन , भूख मिटाने के लिए अन्न के उत्पादन , प्यास मिटाने के लिए पेय जल को सुलभ और सुगम बनाने के उद्यम तथा राज्य के सर्वांगीन विकास को मुद्दा बनाने के बदले जाति और धर्म को मुद्दा बनाया जा रहा है !

आज का समाचार देखते – सुनते समय धूमिल की कविता ऐसे ही प्रसंगों में मुझे अनायास याद आ गई।

सचमुच भेंड ही क्यों नहीं बन जाते

 

  • सुना है कि पृथ्वी लोक में भेंड नामक एक सीधा-सादा , निर्दोष और मासूम जानवर है।

 

  • यह भी सुना है कि भेड के पिछले हिस्से का मांस काट – काट कर यदि कोई मांसाहारी जानवर खाता भी रहे , तब भी वह नहीं मिमियाती , परंतु सामने से कोई उस पर वार करे तो अपने सिर से ढाही मार – मार कर बडे बडों को धराशायी कर देती है।

 

  • और यह देख भी लिया कि पिछवाडे पर मार से बिलबिलाते लोग तिलमिलाने के बदले कहते रहे “ तकलीफ तो है परंतु काला धन की वापसी के लिए , भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए, कैशलेश लेनदारी-देनदारी के लिए और आतंकवाद के खात्मे के लिए ऐसी तकलीफें हंसते – हंसते सह लेंगे ”। और सह भी लिया ।

 

  • सबने अब तक यह भी देख लिया कि “आ गया, चला गया, समाप्त हो गया” वाले जुमले भी चले गए।

 

  • तो क्या अब चौतरफा और सामने की मार से भी नहीं तिलमिलाएंगे ?

 

  • और क्या केवल मासूम भेंड समझने वालों को इस बार भी ढाही मार कर नहीं समझा पाएंगे ? मर्जी आपकी !

कमाल है –

 

 

कमाल है –

 

  • 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में डीएनए पर शोध करने वाले 2017 के गुजरात चुनाव में विरोधियों के बयानों का शव-परीक्षण कर रहे हैं !

 

  • लोग भूले नहीं हैं कि जिन्दा डीएनए की चीडफाड करने वालों ने न तो माफी मांगी थी और न ही खेद व्यक्त किया था, बल्कि सारी ताकत डीएनए शल्य-क्रिया का औचित्य सिद्ध करने में लगा दी थी ।

 

  • हालांकि बिहार के मतदाताओं ने अश्वमेधी घोडे की लगाम थाम कर औचित्य अनौचित्य का अंतर समझा दिया था।

 

  • उसके बाद ही यूपी में कब्रिस्तान और श्मशान जैसे शब्दों का इज़ाद हुआ था, आज फिर वैसे ही शब्द आकार लेने लगे हैं।

 

  • इसीलिए विपक्ष होशियार रहे और बयानवीरों पर लगाम लगावे ताकि उनका ‘संभवामि’ अश्वमेधी घोडा बेलगाम दौड लगा सके।

 

  • अभी भी कई सौ घंटे शेष हैं, अतीत की शौर्य-गाथाओं के वीयावान जंगलों में भटक रही चेतना की घर वापसी कराओ !
  • अतीत की भूलों को भूल से भी मत दुहराओ !!

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत
 
कॉग्रेस के पास दो – तीन प्रवक्ताओं को छोड कर टु दि प्वाइंट बहस करने वाले प्रवक्ताओं का टोटा है, वरना भाजपा की खतरनाक कमियों को उजागर करने में वह पिछड नहीं जाती ।
जिन मुद्दों को ले कर विपक्ष सत्तापक्ष की धज्जियां उडा सकता था, विपक्ष के बेतरतीब बयानों के कारण उन्हीं मुद्दों से सत्तापक्ष अपनी चतुराई से रिसते हुए घावों पर मल्हम का काम ले रही है।
 
जो और जैसी गलती माननीय प्रधानमंत्री जी ने बिहार चुनाव के दौरान की थी, वही और वैसी ही गलती गुजरात चुनाव के दौरान कॉंग्रेस कर रहा है; कम से कम परिणामों को ही याद क्यों नहीं रखते लोग ?

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत

कॉग्रेस के पास दो – तीन प्रवक्ताओं को छोड कर टु दि प्वाइंट बहस करने वाले प्रवक्ताओं का टोटा है, वरना भाजपा की खतरनाक कमियों को उजागर करने में वह पिछड नहीं जाती ।
जिन मुद्दों को ले कर विपक्ष सत्तापक्ष की धज्जियां उडा सकता था, विपक्ष के बेतरतीब बयानों के कारण उन्हीं मुद्दों से सत्तापक्ष अपनी चतुराई से रिसते हुए घावों पर मल्हम का काम ले रहा है।

जो और जैसी गलती माननीय प्रधानमंत्री जी ने बिहार चुनाव के दौरान की थी, वही और वैसी ही गलती गुजरात चुनाव के दौरान कॉंग्रेस कर रही है; कम से कम परिणामों को ही याद क्यों नहीं रखते लोग ?

हंसी नहीं आती

हंसी नहीं आती

(एक)

मुझे हंसी नहीं आती

मैं हंस नहीं पाता

बचपन में हर बात पे हंसी आती थी

मैं खूब हंसता था –

 

जब कोई साथी फिसल जाता

गिर जाता, रोने लगता

चोट से बिलबिलाने लगता

खेल में हार जाता

परीक्षा में फेल हो जाता

मास्टर जी की मार से

उसका पाजामा गिला हो जाता

मैं आंखें फाड – फाड कर देखता

हंसी रोके नहीं रूकती

बेतहासा हंस देता !

 

(दो)

 

अब, जब भी सामने आती है

बचपन जैसी कोई घटना

यानी कोई आदमी

बोझ से दब कर फिसल जाए

बीमार कमजोर बदन सम्भाल नहीं पाए

लडखडा कर गिर जाए

गरीबी की मार से कलपने लगे

भूख से बिलबिलाने लगे

थक हार कर घुटने टेकने लगे

बहुमंजिली इमारतों के लिए

ईंट कंकड बालू सीमेंट

माथे पे ले जाती कोई औरत

टोकरी सम्भाले तो आंचल फिसल जाए

मटमैले फटे पुराने कपडों में

अंग अंग विद्रोही हो जाए

मैं आंखें उठा नहीं पाता

कभी नम हो जाती हैं आंखें

कभी आंखों में खून उतर आता है

मुझे हंसी नहीं आती

मैं हंस नहीं पाता !!

 

(तीन)

 

मैं समझ नहीं पाता

क्यों किसी के दुख में दुखी हो जाता हूं

किसी की खुशी में खुश हो लेता हूं

पर क्यों किसी पे हंस नहीं पाता

और कैसे कोई वक्ता प्रवक्ता

बना लेता है

राष्ट्रीय मान को बहुराष्ट्रीय मजाक ?

घर में, बाहर में, देश में, विदेश में

कैसे लगा लेता है अंतरराष्ट्रीय ठहाका

अपने ही भूखे नंगे लोगों की लाचारी पर

अपनी ही बदहाली  पर

घडी – घडी कैसे कर लेता है वैश्विक तमाशा ?

 

मैं समझ नहीं पाता

बचपन में गलत था

या आज गलत हूं?

क्यों मुझे हंसी नहीं आती

क्यों मैं हंस नहीं पाता !!!

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

संभव है कि आप भ्रष्ट नहीं हों

क्योंकि कोई भी नाजायज राशि

आप को लालायित या लोभित नहीं करती।

 

संभव है कि आप व्यभिचारी नहीं हों

क्योंकि कोई भी रूपसी

आपको आकर्षित या मोहित नहीं करती।

 

संभव है कि आप दुराचारी भी नहीं हों

क्योंकि पाप-पुण्य की नैतिकता

आपको भटकने नहीं देती ।

 

संभव है कि आप अनाचारी भी नहीं हों

क्योंकि आपके मन की न्यायप्रियता

आपको डिगने नहीं देती ।

 

यह भी संभव है कि आप

निर्दयता और प्रतिहिंसा से नफरत करते हों

क्योंकि दया और संवेदनशीलता आपको नियंत्रित रखती है।

 

परंतु क्या

प्रशंसा के प्रहार से आप खुद को बचा पाते हैं?

भेद कर पाते हैं आप

सदाचार का शिकार करने वाली प्रशंसा और

गुणवत्ता को उभारने वाली  प्रशंसा में ?

क्या विश्वामित्र को तप – च्युत करने वाली अप्सरा

मेनका से भी अधिक मनमोहक

विषकन्या से भी अधिक मारक

प्रमादी प्रशंसा से निर्लिप्त हैं आप ?

नहीं ?

तो आप आपादमस्तक

भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं।

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