मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से


जानकीवल्लभ शास्त्री और

महान  फिल्मकार पृथ्वीराज कपूर

 

बात 1975 में इमर्जेंसी लगने के ठीक एक माह पहले की है। गुरूदेव प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह की बेटी और मेरे भ्रातृवत मित्र राकेश कुमार सिंह की बहन रम्भा कुमारी की शादी मोतीहारी एसएनएस कॉलेज के प्रोफेसर राजेश्वर प्रसाद सिंह से हो रही थी। बारात 24 मई 1975 को आई थी।

गुरूदेव ने हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री को भी आमंत्रित किया था। शास्त्री जी के विश्राम आदि का प्रबंध मोतीहारी रेलवे स्टेशन के विश्रामालय के एक विशिष्ट कक्ष में किया गया था। गुरूदेव ने मुझसे कहा था – “ तुम स्वयं कवि हो, कवियों की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हो, शास्त्री जी महाकवि हैं, अति संवेदनशील व्यक्ति व रचनाकार हैं और तुम उनसे परिचित भी हो , इसीलिए उनके आतिथ्य का उत्तरदायित्व तुम्हीं सम्भाल सकते हो”,  सो, शास्त्री जी के आने से ले कर दूसरे दिन उनके विदा होने तक मैं हमेशा उनके साथ रहा।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री मुज़फ्फरपुर आरडीएस कॉलेज में प्रोफेसर तो थे ही, हिन्दी और संस्कृत के विश्वप्रसिद्ध महाकवि भी थे , कुछ साल पहले प्रसिद्ध फिल्मकार एवं कलाकार पृथ्वीराज कपूर शास्त्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर आए थे। पिछले साल मैं भी शात्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर चतुर्भुज स्थान स्थित उनके ‘निराला निकेतन’ नामक आवास पर गया था। उनके परिवार में 15 से 20 सदस्य थे, एक तो वे खुद, एक उनकी पत्नी और शेष सदस्यों में कुछ कुत्ते, कुछ बिल्लियां और कुछ नेवले थे, बस, प्रकृति और जीव – जगत का यही अनोखा दृश्य उनके परिवार में था। उस विलक्षण व्यक्तित्व के धनी शास्त्री जी का सान्निध्य पाने का और उनसे चर्चा करने, कविता की बारीकियों को समझने एवं एक महाकवि की दिनचर्या के माध्यम से उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित होने का मेरे लिए वह एक दुर्लभ अवसर था।

मैंने शास्त्री जी से बातचीत के दौरान उनकी कई कविताओं की चर्चा की, साथ ही, 1972 में मोतीहारी टाउनहॉल के मैदान में आयोजित एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मंच संचालक प्रसिद्ध कवि दिनेश भ्रमर द्वारा उन्हें काव्यपाठ के लिए आमंत्रित करते समय ‘ स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री’ कह कर आमंत्रित किए जाने की अंतर्कथा की भी चर्चा की। शास्त्री जी ने हंसते हुए बताया था –“ लोगों को लगा होगा कि दिनेश ने मेरे ऊपर व्यंग्य किया था, लेकिन वास्तव में मेरे प्रति अतिशय सम्मान प्रदर्शित करने के व्यामोह में भूलवश वह वैसा बोल गया था। दिनेश ने मुझसे तुरंत क्षमा भी मांग ली थी”।

शात्री जी ने बडे बेलौस अन्दाज में अपने बचपन और यौवन के कुछ संस्मरण भी सुनाये। उन्होंने कहा – “ जब मैं जवान था और पैसों की सख्त जरूरत थी, तब मेरे पास पैसे नहीं थे। आज, जब मैं बूढा हो रहा हूं और पैसों की कोई खास जरूरत नहीं रह गई है , तो मेरे पास पैसे हैं, इसीलिए इन पैसों की मैं खूब इज्जत करता हूं, इनकी खूब  खातिरदारी करता हूं और इनका सदुपयोग कर इन्हें खूब सम्मान देता हूं, इन पैसों से अपने परिवार का पालन –पोषण करता हूं, मेरे घर तो तुम गए हो ‘अमन’, देखा होगा तुमने ? इन पैसों से मैं अपने कुत्तों, बिल्लियों और नेवलों को खिलाता हूं ” ।

अंतिम वाक्य कहते – कहते शास्त्री जी के होठ व्यंग्य में भिंच गए थे। मैंने तुरंत बात का रूख बदलते हुए कहा कि कुछ साल पहले पृथ्वीराज कपूर साहब आप से मिलने आए थे , कुछ उनके साथ का संस्मरण सुनाएं । शास्त्री जी ने कहा – “पृथ्वीराज कपूर मेरे व्यक्तिगत मित्र रहे थे, वे एक चिंतक कलाकार थे और जितने अच्छे कलाकार थे, उससे बेहतर इंसान थे। वे मेरी एक रचना पर फिल्म बनाना चाहते थे। मैं जब भी बम्बई जाता था, उन्हीं के पास ठहरता था। उनके तीनों बेटों में से शशि ( मशहूर अभिनेता शशि कपूर) से मेरी ज्यादा बनती है, राज ( राज कपूर साहब) की दिनचर्या अलग तरह की है, शम्मी (शम्मी कपूर साहब) भी अपने में व्यस्त रहता है, शशि मुझे ज्यादा समय देता है”।

मैंने कहा कि जिस तरह द्रोणाचार्य एकलव्य के गुरू थे, वैसे ही आप मेरे काव्य गुरू हैं, मेरा निवेदन है कि आप अपने हाथों से मेरी डायरी पर कोई जीवन – मंत्र अंकित कर दें। शास्त्री जी ने लिखा दिया –

                     जीना भी एक कला है।

कितनी साधें हों पूरी ? तुम रोज बढाते जाते ,

कौन तुम्हारी बात बने ? तुम बातें बहुत बनाते !

माना, प्रथम तुम्हीं आए थे, पर इसके क्या मानी ?

उतने तो घट सिर्फ तुम्हारे, जितना नद में पानी !

 और कई प्यासे, उनका भी सूखा हुआ गला है !

                                            जीना भी एक कला है!  

शास्त्री जी द्वारा मेरी डायरी में 24 मई 1975 को अंकित उनकी वह कविता आज भी मेरे पास वैसे ही सुरक्षित है। सचमुच, वह कविता मेरा जीवन – मंत्र बन गई है। इस कविता में जीवन जीने को एक कला बताते हुए समन्व व सामंजस्य साधने का मंत्र है, जिसे मैंने अपना जीवन – दर्शन बना लिया है।

***

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

Read more

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

(क्योंकि आयोजन सरकारी था, किंतु अन्दाज़ पेशेवराना था, क्योंकि कार्यक्रम भाषा व अनुवाद पर था, परंतु स्वरूप साहित्यिक व सांस्कृतिक था और क्योंकि प्रस्तुति तकनीकी थी, लेकिन अभिव्यक्ति कलात्मक व लयात्मक थी; बस, भाषा, साहित्य और तकनीक की त्रिवेणी में अनुवाद की नाव चल पडी , क्योंकि उसकी पतवार तो वैश्विक बाजार की जरूरतें हैं!)     

 केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो ने 07 जुलाई को नई दिल्ली संसद मार्ग स्थित एनडीएमसी कंवेंशन सेंटर के सभागार में “अनुवाद प्रशिक्षण का ई- लर्निंग प्लेटफॉर्म” का लोकार्पण किया। भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य-योजना के अंतर्गत दो सत्रों में आयोजित लोकार्पण समारोह के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राजभाषा सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस ने की , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रो. गिरीश मिश्र मुख्य अतिथि थे, मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध भाषाविद और टेक्नोक्रेट डॉ. ओम विकास का था, जबकि अनुवाद विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. विमलेश कांति वर्मा विशिष्ट वक्ता थे। संगोष्ठी सत्र की अध्यक्षता प्रो. गिरीश मिश्र ने की और मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने दिया । अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह ने ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ की संकल्पना, कार्य-योजना और उपयोगिता पर प्रकाश डाला , जबकि राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा ने उद्घाटन सत्र में और अनुवाद ब्यूरो के संयुक्त निदेशक डॉ. विनोद कुमार संदलेश ने संगोष्ठी सत्र में धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम की शुरूआत अनुवाद पर ऑडियो विजुअल प्रस्तुति से हुई, 15 मिनट की वही प्रस्तुति अगले 4 घंटों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रही।

केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो (सीटीबी) भारत सरकार राजभाषा विभाग का ही एक अभिन्न अंग है,जिसके निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह है। श्री सिंह के नेतृत्व में सरकारी कार्यालयों, संस्थानों और बैंकों आदि में कुशल व व्यावहारिक अनुवादकों की एक बडी और बहुआयामी फौज़ तैयार होती रही है। दरअसल, वही फौज़ राजभाषा कार्यान्वयन का कारगर उपकरण है। राजभाषा विभाग के वैसे ही अभिन्न अंग नीति, कार्यान्वयन, तकनीकी और केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान भी हैं। इन सभी अंगों के अलग-अलग निदेशक हैं जो संयुक्त सचिव के मार्गदर्शन और सचिव के संरक्षण में कार्य करते हैं। वरिष्ठ तकनीकी निदेशक डॉ. केवल कृष्ण एक अनुभवी व सर्वसुलभ अधिकारी हैं, सरकारी कार्यालयों , बैंकों आदि में कम्प्यूटरीकरण और उससे जुडी समस्याओं के समाधान में उनका अमूल्य योगदान रहा है। डॉ. जयप्रकाश कर्दम  हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के हेड हैं, उनके नेतृत्व में हिन्दीतर भाषा-भाषी सरकारी कर्मियों को हिन्दी का प्रशिक्षण दिला कर हिन्दी कार्यान्वयन के लिए एक सक्षम व कुशल मशीनरी तैयार  की जाती रही है।

राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस , संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा और निदेशक (कार्यान्वयन) डॉ. संदीप कुमार आर्य से पहली बार मैं इसी समारोह में मिला। झा जी अपने पद और कद के अनुरूप विषय में गहरी रुचि और पैठ रखने वाले वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं; सरल इतने कि उद्घाटन सत्र के बाद मंच से उतर कर संगोष्ठी सत्र में श्रोता-दर्शक – दीर्घा की पहली पंक्ति में मेरे पास ही आ कर बैठ गए और अगले दो घंटों के दौरान बीच – बीच में आयोजन के बारे में चर्चा भी करते रहे। संयुक्त सचिव का व्यक्तित्व भी सहज है , डॉ. संदीप आर्य सुव्यवस्थित व्यक्तित्व – सम्पन्न हैं। कुल मिला कर राजभाषा विभाग को कुशल व प्रभावी नेतृत्व मिला है तो उस नेतृत्व को भी योग्य व समर्पित टीम मिली है। इस आयोजन ने ढेर सारे नये – पुराने मित्रों – शुभचिंतकों से मिलने का अवसर भी उपलब्ध करा दिया। उदय कुमार सिंह मुम्बई में  ‘गेल’ में वरिष्ठ अफसर हैं, 1993 के बाद उनसे कल उस आयोजन में ही भेंट हुई, उन्होंने मुझे पहचान लिया , किंतु मैं पहली नज़र में नहीं पहचान पाया। अब मैं इसके लिए उनकी नज़रों की तारीफ करूं या  खुद को 25 साल पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए अपनी पीठ थपथपाऊं ! राजभाष के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों में निदेशक रमेश बाबू अनियरी और संयुक्त निदेशक राकेश कुमार से मिलना सुखकर रहा। और भी कई प्रिय और आदरणीय मित्र मिले , उन सबको मेरी शुभकामनाएं।

मैंने उक्त आयोजन को ‘अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय’ कहा है। मैं अपने इस कथन के मूल में निहित भावभूमि एवं दर्शन-दृष्टि को आप से साझा करूंगा और कार्यक्रम का विवेचन, विश्लेषण व गुण-दोष-निरूपण भी करूंगा, परंतु उसके पहले पूरी विनम्रता के साथ मैं सूचित करना चाहूंगा कि ऐसे कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने की सामर्थ्य मुझमें है तथा उसका औचित्य भी मुझसे जुडा हुआ है , क्योंकि भारतवर्ष  में राजभाषा संबंधी अब तक का विशालतम भव्यतम और सर्वाधिक प्रभावी समारोह – सम्मेलन कराने का श्रेय मुझे और मेरी टीम को ही है । हमारा ही राजभाषा सम्मेलन था जिसमें भारत के माननीय गृहमंत्री और वित्तमंत्री सहित अनेक केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सांसद, सचिव , भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर तथा सभी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के सीएमडी आदि अपने राजभाषा प्रभारियों के साथ उपस्थित हुए।

भाषिक वर्गीकरण के अनुसार ‘ग’ क्षेत्र में स्थित कोलकाता में पहला सम्मेलन 1988 में, दूसरा सम्मेलन ‘ख’ क्षेत्र में स्थित मुम्बई में 1990 में तथा तीसरा सम्मेलन 1991 में ‘क’ क्षेत्र स्थित जयपुर में हुआ। तीनों ही सम्मेलनों का आयोजन पांच सितारा होटलों में किया  गया और वैसा इस दृढ भावना के साथ किया गया कि चूंकि सरकारी संस्थानों के मुख्य धारा संबंधी बडे कार्यक्रम बडे होटलों में होते थे तो फिर हिन्दी का सम्मेलन क्यों नहीं । उस सोच के पीछे दर्शन यह था कि उन संस्थानों के प्रमुख हिन्दी को भी राष्ट्र और संस्थान की अस्मिता जुडा विषय मानें तथा उससे जुडे अधिकारियों को भी समान रूप से (इन तमाम विषयों पर विस्तार से चर्चा मेरी आत्मकथा में की गई है जिसका लोकार्पण महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह के 100 वर्ष और भारत की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले महीने होगा ) महत्वपूर्ण समझें।

अब मैं सीधे आयोजन के व्यक्ति, व्यक्तित्व और वक्तव्य की चर्चा करना चाहूंगा। चारों अतिथि वक्ता अपने – अपने क्षेत्र के मूर्धन्य विद्वान हैं और देश में ही नहीं, विदेशों में भी समादृत हैं, वे विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर चुके हैं, व्याख्यान दे चुके हैं तथा भाषिक, साहित्यिक , सांस्कृतिक यात्राओं का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।  पांचवे वक्ता , राजभाषा विभाग के सचिव उस शीर्ष संस्था के प्रमुख हैं, जिसे भारत सरकार ने अपने कार्यालयों, उपक्रमों तथा बैंकों आदि में संविधान की भावनाओं के अनुरूप राजभाषा हिन्दी को लागू कराने का दायित्व सौंपा है; इसलिए उन सबके द्वारा कुछ कहे जाने का गंभीर मायने है।

सचिव ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारतीय लोकमानस में निर्मल जल-धारा की तरह सहज स्वाभाविक रूप में बहने वाली हिन्दी ही हिन्दी है और वही हिन्दी, राजभाषा हिन्दी है, उस हिन्दी के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य नहीं है क्योंकि हिन्दी की प्रकृति स्वाधीन है। उन्होंने कहा कि हमारे शरीर का हर अंग तन्दुरूस्त है , किंतु शायद सोचने वाला, चिंतन करने वाला हमारा जो मन – मस्तिष्क है, वही कमजोर है, तभी तो हिन्दी बोलने अथवा हिन्दी वाला कहे जाने में हमें हीन भावना घेर लेती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावना व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई उन्हें हिन्दी वाला कहता है तो उनका छह फुट का कद दस फुट का हो जाता है। सचिव ने केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. एसएन सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे अपनी टीम के साथ प्रशासनिक हिन्दी के सरलीकरण पर कार्य कर रहे हैं, एक ऐसी शब्दावली बनने जा रही है , जिसमें केवल प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि हिन्दी के ढाई – तीन लाख शब्द होंगे जो हिन्दी के समावेशी स्वरूप को प्रतिध्वनित करेंगे।

मुख्य अतिथि प्रो. गिरीश मिश्र ने उस कार्यक्रम को हिन्दी को सशक्त, समर्थ व सार्थक बनाने के लिए भाषा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और अनुवाद को ब्रह्म की ‘एकोअहम बहुस्यामि’ की अभिव्यक्ति की भांति सर्वव्यापि होना बताया । डॉ. ओम विकास ने अनुवाद के तकनीकी और भाषा के विकास में तकनीक के उपयोग की चर्चा की तो डॉ. विमलेश कांति वर्मा ने अनुवाद को वैश्विक बाजार, साहित्य, संस्कृति और इतिहास से परिचित होने का एकमात्र जरिया बताया। डॉ. नरेन्द्र कोहली ने भाषा को मूल जातीय संस्कृति व उसके स्वरूप से दूर ले जाने के उपक्रम को भाषा को विकृत करने का कार्य कहा , स्पष्ट शब्दों में कहूं तो उन्होंने संस्कृत – निष्ठ हिन्दी की आवश्यकता बताते हुए घर, बाजार, दफ्तर और विश्वविद्यालय के लिए एक ही भाषा – स्वरूप की वकालत की यानी कि हिन्दी का तत्सम रूप ही उनकी नज़र में असल हिन्दी है, वे कुछ हद तक तद्भव और देशज रूप भी स्वीकार करने को सहमत हैं , परंतु विदेशज शब्दों से एक तरह की चिढ-सी महसूस हुई उनकी सोच में।

समूचे कार्यक्रम को विविध अयामी बनाने के लिए डॉ. नरेन्द्र कोहली के वक्तव्य का संदर्भ तो बनता है किंतु भारत के जनमानस में हिन्दी का जो रूख व रूतबा है, वह दूर भागता हुआ-सा लगता है जो, मेरी समझ में, भारत की ऐतिहासिक विरासत के भी प्रतिकूल है। इस कार्यक्रम के बाद मेरे मन में कोहली जी को ले कर जो बात उठी, वह बहुत निराशाजनक थी। मैं सोचने लगा कि अच्छा होता कि मैं सिर्फ लेखक कोहली को ही जनता होता, काश ! वक्ता कोहली का व्याख्यान नहीं सुना होता । पढ कर जिस लेखक कोहली की छवि मन में थी,सुन कर वह दरक गई। दरअसल, अधिकांश विश्वविद्यालयीन अध्यापकों के साथ यह परेशानी है, वे सामने वाले हर श्रोता को अपना छात्र ही मान लेते हैं और बौद्धिक व्याख्यानों में इतने रच-बस गए होते हैं तथा इस हद तक थक गए होते हैं कि वे देख ही नहीं पाते की गांव की गलियों में, बाज़ार की दौरी-दूकानों पर, दफ्तरों के टेबुलों पर क्या कुछ जीवंत घट रहा है और वे कैसे रो – गा रहे हैं (हिन्दी के इन्हीं आयामों पर मेरा 21 पृष्ठों का शोध आलेख सरकार की आधिकारिक वेबसाइट rajbhasha.nic.in पर है, उसे देखा जा सकता है) । इस आयोजन का सबसे कमजोर और अनुपयोगी भाषण रहा था उनका वह वक्तव्य।

आयोजन की अन्य कमियों में माननीया महिला उद्घोषक की उद्घोषणाएं भी रही, केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो को उन्हें फिर किसी मंच का संचालन देने के पहले वॉयस मॉडुलेशन का प्रशिक्षण दिला देना चाहिए।

सत्येन्द्र दहिया का संचालन मधुर व मनोहारी लगा , जैसे बहुत ऊंचाई से गिरता हुआ कोई झरना जब घाटी में उतरता जाता है तो तो उसकी ध्वनि धीमी होती जाती है और हवाओं में घुलमिल गई वह ध्वनि राहगीर के कानों में फुसफुसाहट – सी लगती है, , कमाल का वॉयस मॉडुलेशन है उनकी प्रस्तुति में ! उन्हें अपनी सह – उद्घोषिका को भी कुछ टिप्स दे देनी चाहिए थी।

आयोजन का सबलतम पक्ष दृश्य – श्रव्य प्रस्तुति की पटकथा और उसका सम्पादन रहा। विनोद कुमार संदलेश द्वारा लिखित आलेख बहुत ही मौलिक चिंतन व शोध का परिणाम था, हर कथन को साकार कर देने वाले विजुअल प्रोपर्टिज और औडियो प्रस्तुति ने विषय-वस्तु को सदेह उतार देने जैसा बना दिया। भाषा , साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति आदि से संबंधित वे विजुअल प्रोपर्टिज भी अद्भुत थीं।  डॉ. श्रीनारयण सिंह का सम्पादन पूरी पटकथा को चुस्त – दुरूस्त तथा श्रोता-दर्शक के मनमिज़ाज़ को बांधे रखने के लायक बनाने में सफल रहा , वॉयस ओवर देने वाले कलाकार की भी सराहना करनी होगी कि स्वरों के आरोह – अवरोह को संयमित करते हुए उन्होंने प्रस्तुति को समग्र रूप से यादगार बना देने में अपना मूल्यवान योगदान दिया। इसीलिए सचिव झा जी ने उस प्रस्तुति को अकल्पनीय कहा तो मुख्य अतिथि प्रो. मिश्र ने भाष के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और मैं कहता हूं –

‘ अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय  !!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

 

चाय – विमर्श

चाय – विमर्श

 

मेरी शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा से …. !

 

(आजकल मीडिया में एक राष्ट्रीय चाय दूकान की चर्चा चाय से भी ज्यादा गर्म है।  हो भी क्यों नहीं, आखिर उसी दूकान के मालिक आज के राष्ट्रीय प्रधान सेवक पूरी दुनिया में विमर्श का विषय जो बने हुए हैं। सुना है कि भक्तजन उस दूकान को राष्ट्रीय स्मारक अथवा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल घोषित – विकसित कराने का अभियान छेडने वाले हैं। यह खबर सुनते ही मेरी बांछें खिल गईं ! मैंने भी अपनी यादों के तहखानों का उत्खनन करना शुरू कर दिया , उस खुदाई में मेरे चाय – विमर्श के भी कुछ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व के अवशेष प्राप्त हुए हैं, यहां मैं उन अवशेषों की प्रदर्शनी लगा रहा हूं।)

कॉलेज में आए कुछ महीने हो गए थे,  किंतु तब तक किसी छात्र की कोई बडी पहचान नहीं बनी थी। एमआईएल हिन्दी की क्लास थी। प्रोफेसर रमाशंकर पाण्डेय हाजिरी ले रहे थे। उनका स्वभाव बहुत ही विनम्र और मिलनसार था, देर से आने वाले छात्रों की भी हाजिरी बना देते थे, अंत में वे पूछ भी लेते थे कि हाजिरी में कोई छूटा तो नहीं ? उस दिन भी उन्होंने वैसा पूछा । रमेश कुमार नाम का मेरा एक सहपाठी  था, उसकी नई – नई शादी हुई थी, कोट, पैंट और टाई में मोटरसायकिल पर कॉलेज आता था। बाकी लडकों में खुद को ज्यादा ही स्मार्ट जताने की कोशिश में रहता था। उसी ठसक में उसने प्रो. रमाशंकर पाण्डेय को टोक दिया – “सर, बहुत हो गई हाजिरी, अब पढाई शुरू की जाए”। उसकी वह बात और बॉडी लैंग्वेज पाण्डेय जी को खल गई, फिर भी, उन्होंने सीधे उसे कुछ नहीं कहा और पढाना शुरू कर दिया।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘साकेत’ का एक अंश ‘पंचवटी में लक्ष्मण’ नाम से कोर्स में था, उसमें सीताहरण के संदर्भ में शूर्पणखा का प्रसंग भी था। पाण्डेय जी ने रमेश से पूछ दिया कि पिछले दिन जिस प्रसंग की पढाई हुई थी, उसका सारांश बताए। रमेश फिसड्डी साबित हुआ, पाण्डेय जी ने दूसरे छात्रों से भी पूछा, किसी ने भी कुछ नहीं बताया। पाण्डेय जी ने कहा –  “ छुटे हुए विद्यार्थी की हाजिरी लेने में दो मिनट लग गए तो वह समय बहुत खल रहा था आप लोगों को , तो फिर पढते क्यों नहीं, इस तरह अपने मां – बाप के पैसे और कॉलेज का समय क्यों जाया कर रहे हैं ? पूरी क्लास चुप क्यों है ”? मैं तो धोती – कुर्ता पहनने वाला घोषित गंवार था, इसलिए मेरा नोटिस कोई नहीं लेता था। मैंने स्वयं कहा –“ श्रीमान ! मैं बताना चाहता हूं ”। सबने मुझे चकित हो कर देखा, प्रोफेसर साहब ने अनुमति दे दी।

मोतीहारी एमएस कॉलेज में मैं प्राक कला यानी प्री यूनिवर्सिटी आर्ट्स का छात्र था।  मेरी क्लास में 10 –11  लडकियां थीं, किंतु एमआईएल वाली क्लास में तो 25 से भी अधिक लडकियां थीं, कई लडके अधिकांश समय उन लडकियों को ही घूरते रहते थे , शायद अपनी क्लास की एक लडकी को मैं भी कभी – कभी  देख लेता था, लेकिन मैं पढाई से मन कभी नहीं हटाता था । ‘पंचवटी’ में पिछले दिन जो पढाया गया था, वह राम एवं लक्ष्मण के बीच शूर्पणखा का प्रसंग था।  शूर्पणखा अप्सरा – सी सुन्दर स्त्री के वेश में आती है, अपने हाव – भाव और कामुक अदाओं से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को लुभानाती है, परंतु दोनों में से कोई भी भाई उसे महत्व नहीं देता, फलस्वरूप शूर्पणखा राम और लक्ष्मण के बीच पेंडुलम की तरह हिंडोले खाती रहती है।

मैंने वह प्रसंग मैथिलीशरण गुप्त की कुछ पंक्तियों को उद्धृत करते हुए सुनाया और उसे आज की परिस्थितियों से जोड कर एक व्यंग्य कर दिया –  “ राम और लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता ने शूर्पणखा जैसी कामाक्षी और रूपवंती युवती को कभी इधर तो कभी उधर भटकने को विवश कर दिया, वह ललचाई नज़रों से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को देखती हुई प्रेम की भीख मांगती रही , गिडगिडाती रही, मिन्नतें करती रही, किंतु दोनों में से किसी ने भी उसकी ओर आंख उठा कर देखा तक नहीं। आजकल के मेरे मित्रों की तरह नहीं कि पढाई छोड कर अपनी सहपाठी कन्याओं को देखने में ही पूरा समय लगाते रहें और कोई इनकी तरफ एक नज़र देखे तक नहीं ”।

वह मेरा कोई भाषण नहीं था, बल्कि हमारे पाठ्यक्रम का एक अंश था, जिसका भावार्थ मैं बता रहा था, फिर भी, सबने जोरदार तरीके से तालियां बजाईं और उनमें सबसे आगे लडकियां रहीं। रमेश सहित मेरे कई सहपाठियों का बुरा हाल हो गया और मैं हीरो बन गया। मेरी जोरदार पहचान बनी और मैं चर्चा का विषय बन गया। उसके बाद मेरे कई दोस्त बन गए। प्रो. रमाशंकर पाण्डेय मुझे ‘जिज्ञासु जी’ कहने लगे और सबके सामने मुझे ज्यादा महत्व देने लगे।

वह चूंकि एमआईएल (हिन्दी) की क्लास थी, इसलिए क्लास में लगभग 200 छात्र –  छात्राएं थीं। हॉल से निकलने के बाद मैंने महसूस किया कि अधिकांश निगाहें मुझे ही घूर रही थीं। इसीलिए मैं भी पूरी गंभीरता का लबादा ओढ कर राम – लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता का उदाहरण प्रस्तुत करने की कोशिश में लग गया। उसके बाद एक पिरियड लिजर थी, और फिर, इतिहास की क्लास थी। मैं लायब्रेरी की तरफ जा रहा था कि मेरा एक सहपाठी मेरे पास आ कर बोला – “ भाई जी, चलिए स्टेशन से चाय पी कर आते हैं ”। तब तक मैंने चाय पीना सीखा नहीं था, किंतु उस सहपाठी के आमंत्रण में एक कशिश थी जो अपनापन से लबरेज थी, इसीलिए मैंने कहा – “ भाई जी, मैं चाय तो नहीं पीता, फिर भी चलिए, चलते हैं ”। उसने गांधी होटल में दो स्पेशल चाय मंगाई , मैंने प्लेट में ढाल कर फूंक – फूंक कर चाय पी, चाय पीना मेरी आदतों में न तब शुमार था , न आज। उस दिन हमलोगों के बीच ज्यादा कुछ बातचीत नहीं हुई, केवल पढाई की ही बातें होती रहीं, तब तक उसने घडी देख कर कहा – “ चलिए, अगली क्लास का टाइम हो गया”। मेरी तरह उसके मूल विषय भी हिन्दी, इतिहास और राजनीति शास्त्र थे, अतिरिक्त विषय भी तर्कशास्त्र था, अंग्रेजी और    एमआईएल हिन्दी अनिवार्य विषय तो समान थे ही, इस प्रकार हम हर क्लास में साथ ही थे।

क्लास में वह मुझसे अलग बैठता था, किंतु उस दिन इतिहास की क्लास से ही वह मेरे पास बैठने लगा। मैंने देखा कि कई लडके उससे दोस्ती गांठने की फिराक में रहते थे। अगले दिन से ही मेरा वह सहपाठी मित्र “भाई जी” कहने के बदले मुझे मेरे फर्स्ट नेम “श्रीलाल” कह कर पुकारने लगा और “तुम ताम” पर उतर आया । इतनी जल्दी उसका उस तरह घनिष्ठता दिखलाना मेरे गंवार मन को थोडा विचित्र – सा लगा, किंतु उसके संबोधन में इतना गहरा अपनापन-बोध था कि मन उसकी ओर अनायास खिंचता चला गया , मैं भी उसे “तुम” कहने लगा और उसका फर्स्ट नेम “राकेश”  कह कर पुकारने लगा। ( इस धरती पर मेरा सबसे प्रिय मित्र था वह , अब इस दुनिया में नहीं रहा, उससे 12 साल छोटा भाई सुबोध कुमार सिंह आजकल दिल्ली में नाबार्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी है, उसकी शादी हिन्दी के ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त यशस्वी कवि डॉ. केदारनाथ सिंह की बेटी से हुई है)  

अब चाय पीने वालों में हम पांच – छह छात्र हो गए, चाय के पैसे देने के लिए अब हर व्यक्ति “पहले मैं – पहले मैं” करने लगा, राकेश से दोस्ती जता कर सभी खुद को बडभागी समझने लगे ,  मेरा साथ होना भी उन सबके लिए एक तरह से शराफत का सर्टिफिकेट मिलने जैसा था,  अब पैसे राकेश भी नहीं देता था, और मुझे, मुझे तो वैसे भी पैसे देने ही नहीं थे , क्योंकि चाय पीने तो मैं उन लोगों के विशेष आग्रह पर जाता था और वैसे भी चाय पीना मेरा शगल था भी नहीं (आज भी मैं किसी का मन रखने या समय काटने के लिए ही चाय पीता हूं) , उसके कई कारण थे ।

पहला कारण तो यह था कि हमारे गांव देहात में बच्चों और युवकों में चाय पीने की आदत को बीडी, सिगरेट, खैनी, तम्बाकू, पान आदि खाने जैसी बुरी आदतों में शुमार किया जाता था , इसलिए यदि कोई चाय पीता भी था तो अपने बडों से छुपा कर ही पीता था। दूसरा कारण यह था कि गांवों में किसान सुबह से ही अपने काम में लग जाते थे, एक बार ही भरपेट भोजन कर खेतों में निकलते थे, घर वापस आ कर फिर खाना खा लेते थे, चाय पीने का कोई समय ही नहीं होता था उनके पास। तीसरा कारण यह था कि गांवों में ऐसा चुल्हा तो किसी के पास होता नहीं था कि जब चाहें, जलालें और जब चाहें, बुझा दें, क्योंकि तब गैस या स्टोव किसी के पास होता नहीं था, जलावन के रूप में लकडी और उपले आदि का उपयोग होता था, जिसे चाय बनाने जैसे महज कुछ मिनटों के काम के लिए जलाना-बुझाना सुविधाजनक नहीं होता था, और रही बात गांव में चाय की दूकान की तो गरीब से गरीब आदमी भी चाय की दूकान चलाना पसन्द नहीं करता था, इसलिए लोगों में चाय की आदत ही नहीं पनपती थी । एक अन्य कारण भी था, चूंकि चाय से न तो भूख मिटती थी और न ही प्यास जाती थी; इसलिए शहर में आसानी से उपलब्ध होने पर भी केवल ‘जीभ दागने’ के लिए मेरे जैसे युवक चाय पीने जैसे ‘असामाजिक’ व ‘अनावश्यक’ शगल पर कुछ भी खर्च करना फिजुलखर्ची मानते थे। मेरे चाय नहीं पीने के पीछे वे सभी कारण थे।

एक दिन शाम को अंतिम क्लास खत्म हुई। हम सभी दोस्त गांधी होटल चाय पीने गए, मगर इस दफे तो मामला कुछ और ही था। कागज में लपेट कर शक्ति रस की तीन बोतलें वेटर ले आया , पता चला कि कॉलेज के लडकों में हल्के नशा के लिए शक्ति रस (आयुर्वेदिक या कोई अन्य प्रोडक्ट सिरप)  का सेवन आम था। रस ग्लास में ढाला गया, राकेश ने मेरे लिए ग्लास लगाने से मना कर दिया और एक कप चाय का ऑर्डर कर दिया। उसी बीच सुधीन्द्र पीने के लिए मुझ पर जोर डालने लगा और मेरे ‘ना’ करने पर अपना ग्लास मेरे मुंह में लगाने लगा। “चटाक” , सुधीन्द्र के गाल पर एक जोरदार झन्नाटेदार तमाचा लगा। देखा तो राकेश आग बबूला हुआ जा रहा था – “ श्रीलाल मेरा दोस्त है, तुम लोगों के साथ तो यह उठे – बैठे भी नहीं,  मेरे चलते आता है, जब मैं इस पर जोर नहीं दे रहा तो फिर तुमने जबरदस्ती क्यों की? आइन्दा, जिसने भी ऐसा किया, वह खुद को मेरी दोस्ती से खारिज समझे ”। उस घटना के बाद कॉलेज में मेरी छवि में बेहिसाब निखार आ गया। पढाकू और वक्ता तो माना ही जाने लगा था, अब संयम व संस्कार की भी चर्चा होने लगी, एक – दो ईर्ष्यालू किस्म के लडकों ने मुझे देख कर फबती भी कसी – “वो देखो , स्साला .. विवेकानन्द की औलाद जा रहा है” ।

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

100 / 70 सौ बटा सत्तर साल : थोडी प्रतीक्षा और !

100 / 70

सौ बटा सत्तर साल : थोडी प्रतीक्षा और !

 

ईस्वी सन 2017 महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह की 100वीं और भारत की स्वाधीनता की 70वीं वर्षगांठ का वर्ष है।

गांधी जी की जीवन-यात्रा सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की यात्रा है जो सत्य – अहिंसा का संबल ले कर सही के साथ सहयोग व ग़लत के साथ असहयोग करते हुए मतिभ्रम के शिकार एक व्यक्ति की तीन गोलियों से समाप्त हो जाती है; परंतु वह समाप्ति तो जीवन – यात्रा की थी, विचार – यात्रा तो न जाने कितनी पीढियों और सदियों तक, मैं कहूं तो .. अनंत काल तक चलने वाली है क्योंकि वह यात्रा भारत की आज़ादी के पुष्पन – पल्लवन व फलन की यात्रा है, जिसका बीजारोपण और अंकुरन एक सदी पहले हो चुका था। उन्हीं यात्राओं को समर्पित मेरी बहुप्रतीक्षित डायनैमिक डाइनामाइट अकथ कथा – आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो”  सुधी पाठकों के हाथों में आने ही वाली है। बस, थोडी  प्रतीक्षा और…!

दो साल पहले 25 जून 2015 को मैंने फेसबुक पर घोषणा की थी कि मेरी आत्मकथा फेसबुक और ब्लॉग पर उसी वर्ष स्वाधीनता दिवस से शुरू होगी, तब से उसकी कई कडियां आईं , अब पुस्तक !!

शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक की भावी रूपरेखा मैं अपने सुधी पाठकों से सहर्ष साझा कर रहा हूं।

ईद और रथयात्रा की हार्दिक बधाइयां एवं शुभकामनाएं ।

 

शुभाकांक्षी

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

  बाबू और बाबा से ट्यूशन

इंदिरापुरम, 18 जून 2017           

                           बाबू और बाबा से ट्यूशन

पितृ दिवस यानी फादर्स डे के बहाने

शीघ्र प्रकाश्य मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवज़ दो” से …    

विद्या की देवी सरस्वती और विवेक के देवता गणेश का पूजन मेरे कुल पुरोहित पं. परमानन्द तिवारी ने सम्पन्न कराया, विद्यारम्भ कराया बाबू (पिताजी) ने। इस तरह मेरे अक्षर ज्ञान का विधिवत शुभारम्भ पूजन और अनुष्ठान के साथ बाबूजी द्वारा पेंसिल पकडवाने से हुआ । बाबूजी ने ही मुझे देवनागरी और रोमन वर्णमाला सिखाई तथा हिन्दी, कैथी , संस्कृत एवं अंग्रेजी आदि भाषाओं से मेरा प्रथम परिचय भी कराया। वे फारसी भाषा भी जानते थे, क्योंकि जमीन के दस्तावेजी काम – काज तो उसी भाषा में थे।

तब मेरे गांव में स्कूल नहीं था, गांव के उत्तरी छोर पर एक कमरे की झोपडी में मदरसा चलता था , मैं उसमें जाने लगा । सो, घर से बाहर पाठशाला में मेरा पहला अक्षर – ज्ञान उर्दू वर्णमाला से हुआ । हालांकि छात्रों की कमी से वह मदरसा चल नहीं पाया और उसी के साथ मेरा उर्दू वर्णमाला का ज्ञान भी रह गया ।

बाबूजी तो पढे – लिखे व्यक्ति थे, परंतु जिस मां की आंखों से, बातों से, विचार और व्यवहार से ममता के हजारों ग्रंथ लिखे जा सकते थे, मेरी उसी मां को अक्षर–ज्ञान तक नहीं था, वह अपना नाम लिखना भी नहीं जानती थी, यहां तक कि कॉपी और किताब में अंतर भी उसे मालूम नहीं था, मैं कभी बक्से पर रखी किताब मांगता तो वह कॉपी उठा कर ला देती, फिर भी, अंतर्मन को समझ लेने वाली उस मां में मैंने हमेशा नैसर्गिक और अलौकिक ममता का पारावार देखा।

बाबू विचारों में प्रगतिशील थे , जाति या धर्म के प्रति कट्टरता नहीं थी उनमें, मुझे भी उन्होंने वैसी ही सीख दी थी, इसीलिए जब मेरे बच्चे हुए तो उनके नाम के साथ मैंने जाति सूचक कोई उपनाम नहीं लगाया । मैं 8 साल के होते- होते 1962 में पांचवीं क्लास पास कर गया,  हालांकि तब तक मैं बहुत कम ही दिन स्कूल गया था। मैं चौथी क्लास तक कभी-कभी ही स्कूल जाता था और साल में दो क्लासेस पार कर लेता था, मुझे पढाने का काम मुख्य रूप से बाबूजी करते थे।

घर बडा था, दो आंगन थे, एक में हम सभी रहते थे, दूसरे आंगन में खेती के काम आने वाले बैल और दूध देने वाली गाय व भैंसें रहती थीं, घर में बारह महीने दूध–दही उपलब्ध रहने का इंतजाम था।  मोहल्ले में केवल मेरे ही घर में लालटेनें थीं, दो में से एक लालटेन बरामदे में टंगी रहती और दूसरी लालटेन ले कर हम भाई लोग पढने बैठते, बाकी काम मिट्टी या टीन की डिबिया से होता।

बाबूजी कभी-कभी दुपहरिया में फुलवारी में या फसल की दंवरी के दिनों में खलिहान में भी मुझे ले जाते,  दंवरी के बाद धान की ढेर की रखवाली के लिए वहां एक अस्थायी झोंपडीनुमा घर बनाया गया होता,  उसी में मुझे पढाते। इस तरह बाबूजी मुझे कभी घर पर तो कभी घर के व्यस्त महौल से दूर उस झोंपडी और फुलवारी में पढाते।  काली मिट्टी की स्लेट होती , उस पर उजली मिट्टी की पेंसिल (चॉक) से लिखता । स्लेट पर की गई लिखावट को मिटा – मिटा कर जितनी बार चाहें, लिखते जाएं।

बाबूजी अंग्रेजी (रोमन) वर्णमाला चार तरह की बताते , मैं चॉक से स्लेट पर लिखता, अगर मेरी ऊंगलियां लिखावट के लिए गलत दिशा में मुड रही होतीं, तो बाबू डांटभरी हुंकार करते – हूं..हूं..हूं ..और मैं हुंकार सुनते ही समझ जाता कि कुछ न कुछ गलती हो रही है, इसीलिए लिखे हुए को तुरंत दूसरी ऊंगली से मिटा देता, बस, बाबूजी कनपट्टी पर एक हाथ धर देते। दरअसल, उनकी हुंकार हमेशा पूरी तरह गलत दिशा में ही चॉक घुमाने के कारण  नहीं होती थी, बल्कि किसी अक्षर का शुरूआती भाग सही लिखने पर बाद वाले भाग में ऊंगलियां गलत दिशा में जा रही होतीं, तब भी वे हूं..हूं करते , परंतु मैं समझता कि पूरी लिखावट गलत हो रही है, इसीलिए हूं .. हूं सुनते ही उसे मिटा देता ।

हालांकि बाबूजी पहले मुझे समझाते जरूर थे कि जहां तक लिख चुका होऊं, हुंकार सुन कर बिना मिटाए वहीं रूक जाऊं, किंतु अवचेतन मन में कनपट्टी पर तमाचा खाने का भय इतना था कि हुंकार सुनते ही उनकी सीख भूल जाता और लिखे हुए को तुरंत मिटा देता। जिस दिन ज्यादा मार पड जाती, उस दिन बाबू लेमनचूस खाने के लिए मुझे घोडा छाप या छेद वाले एक – दो पैसे देते और कुछ देर अपनी गोद में सुला कर मेरा सिर सहलाते। मेरे बडे चचेरे भाई धनीलाल प्रसाद तब तक इकलौते थे और उस तरह की मार चाचा-चाची को पसन्द नहीं थी। बाद में घर-परिवार में बच्चों की संख्या बढती गई,  इसलिए उतना एक्सक्लूसिव केयर किसी को नहीं मिल सका, तब तक मैं कुछ बडा भी हो गया और मदरसा, फिर स्कूल जाने लगा था। बाबूजी की उस मार की याद से मुझे आज यह समझ में आ रहा है कि वे कितनी एकाग्रता से मेरी ऊंगलियों पर नज़र रखते थे !  पल भर के लिए भी वे इधर-उधर नहीं देखते, तभी तो मेरी ऊंगलियों की हर हरकत पर उनकी पैनी नज़र होती।

मेरे छुटपन में बाबू के अलावा बाबा (दादा जी) भी मुझे पढाते। हालांकि बाबा कोई खास पढे-लिखे नहीं थे, किंतु अनुभव के धनी थे और पंचायतों में फैसले के लिए किसी न किसी कहावत या कहानी का सहारा लेते,  उसी से अपनेआप फैसला साफ हो जाता। बाबा का मानना था कि संस्कृत बोलने के लिए या ऐसे भी बोलने में स्पष्टता लाने के लिए जीभ का टूटना जरूरी था, क्योंकि वैसा नहीं होने पर ही बच्चे तुतलाने लगते हैं और सयाने होने पर भी तोतलाते रहते हैं। उसके लिए उन्होंने एक अलग तरह की पढाई का तरीका खोज निकाला था, जिसे बाबू पसन्द नहीं करते थे और कभी-कभी उन दोनों बाप-बेटे में बहस भी हो जाती थी, हालांकि बहस में अंतिम जीत हमेशा बाबा की ही होती थी । उस पढाई की विधि थी वर्णमाला के हर एक अक्षर से एक कवितानूमा वाक्य बनाने की। बडा मनोरंजक था वह तरीका, एक उदाहरण दे कर मैं अपने पाठकों को दादाजी की शिक्षण-कला का परिदर्शन कराना चाहूंगा, जीवन में ऐसी शिक्षण-कला मैंने कहीं भी कभी भी नहीं सुनी-देखी। जैसे –

 

से = काका कमकोल कौआ कामे क्रियार  काका किरिरकिरिर ।

से = चाचा  चमचोल चौआ चामे चिरियार चाचा चिरिरचिरिर ॥

से = दादा   दमदोल दौआ  दामे दिरियार दादा  दिरिर दिरिर।

 

ऐसे ही प्रत्येक अक्षर से वे मुझे एक वाक्य बनाना सिखाते और रटाते । ऐसी पढाई धनीलाल भैया को पसन्द नहीं थी, इसीलिए बाबा जैसे ही उस पढाई के लिए अपना ट्यूशन शुरू करते, भैया किसी न किसी बहाने भाग खडे होते। मगर मैं आज्ञाकारी पोता के साथ-साथ आज्ञाकारी छात्र भी था, बाबा जो भी पढाते,  उसे मन लगा कर पढता था। इतनाही नहीं, बाबा कभी-कभी पेट के बल लेट जाते और पीठ पर चढ कर पांव से बदन दबाने के लिए कहते, मैं तो खूब उनका बदन उनकी पीठ पर घूम-घूम कर दबाता और यदि बैलेंस नहीं बनता तो एक लाठी जमीन पर टिका कर खुद को गिरने से बचाता, परंतु धनीलाल भैया बुद्धिमान थे, वे जब भी बाबा की पीठ पर चढते, पांव की एंडी (पिण्डली) उनकी पीठ में गडा देते, बाबा खिसिया कर उन्हें भगा देते और मुझे बुला लेते, तब मैं देखता कि भैया मंद-मंद मुस्करा रहे होते। वे शायद अपनी बुद्धिमानी और मेरी कमअकली पर मुस्कुरा रहे होते ; लेकिन मैं समझता कि बाबा (दादा जी) पीठ दबवाने के बहाने अपने पोतों का सान्निध्य पाना चाहते होंगे, और, शायद मेरा समझना ही सही था।

 

दादा , बाबू या मेरे जमाने में भी ‘पितृ दिवस’ भी कोई दिन होता है, उसका ज्ञान नहीं था। आज भी, बच्चों की शुभकामनाओं से जान सका । मैंने भी अपने बच्चों की हर एक गतिविधि पर बारीकी से ध्यान दिया , उनकी हर हरकत का एकाग्रचित्त हो कर अध्ययन किया , मुझे उनके हंसने – रोने, रूठने – गाने, उठने – गिरने की एक –एक भंगिमा याद है, फिर भी, बाबू और दादा की तुलना में हम कहां?

 बहुत याद आ रहे हैं बाबू और बाबा !

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

 

गांधी की जिद्द को समझने की जिद्द

गांधी की जिद्द को समझने की जिद्द

पूरे तीन सप्ताह तक ‘नेट’ की दुनिया से दूर ‘नेह’ की दुनिया में रमा रहा, फलस्वरूप फेसबुक या ब्लॉग पर कुछ लिखने की न सुधि रही, न समय मिला। दरअसल, गांव – घर की मिट्टी की खुश्बू में बात ही कुछ और होती है; तभी तो दुनिया मेरे गांव में सिमट आई है और मेरा गांव भी दुनिया में फैल गया है । तीन सप्ताह तक गांव – घर में रहने के दौरान एक बार फिर से महात्मा गांधी मेरे मन मस्तिष्क में अवतरित हो गए, आखिर मेरा गांव चम्पारण ही तो वह जगह है, जिसने मोहन को महात्मा और बापू को राष्ट्रपिता होने का मार्ग प्रशस्त किया।

दरअसल, महात्मा गांधी के बारे में मेरी समझ लौकिक – अलौकिक उद्भावनाओं से परे बिल्कुल मानवीय धरातल पर है। मेरा मानना है कि गांधी न हिन्दू थे, न मुसलमान, न सिक्ख , न ईसाई, न जैन, न बौद्ध, न यहूदी, न पारसी ; वह तो केवल एक व्यक्ति थे, जिन्होंने उस पूरे हिन्दुस्तान को;  उसके हर एक क्षेत्र , व्यक्ति, समाज व संस्कृति को, दुख – सुख को, उत्सव व उल्लास को, पीडा और प्रार्थना को अलग – अलग भी एवं समग्रता के साथ भी;  देखा – समझा – परखा और जीया था,  जहां के लोग हिन्दू थे, मुसलमान थे, सिक्ख थे, ईसाई थे, जैन थे, बौद्ध थे, यहूदी और पारसी भी थे। गांधी को उन्हीं लोगों के लिए, उन्हीं लोगों को साथ ले कर और उन्हीं लोगों के बीच रह कर देश को न केवल अंग्रेजों से आज़ाद कराना था, बल्कि अमीरों को अहंकार से, गरीबों को गुरबत से, पिछडेपन से, अशिक्षा से , अन्धविश्वास से, साम्प्रदायिकता से, कुपोषण व कुस्वास्थ्य से, ऊंच-नीच व छूत-अछूत की कुभावना से भी आज़ाद कराना था।

गांधी जी यह जान – समझ गए थे कि उन सबसे अलग रह कर उनके लिए कुछ कर पाना संभव नहीं था, इसीलिए वे उद्योगपतियों के साथ भी रहे और गरीबों के बीच भी, अछूतों के संग भी रहे तो उन अछूतों को अछूत समझने वालों के पास भी। उन्होंने यह भी समझ लिया था कि निंद्रा में खोये और तंद्रा में भटके धर्मपरायण देशवासियों को उनके धर्म में प्रवेश कर ही जगाया जा सकता था। उनकी प्रार्थना — “रघुपति राघव राजाराम” या “ईश्वर अल्ला तेरो नाम” अथवा “वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे” और “हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख ईसाई; आपस में सब भाई – भाई” वाली सोच आदि उसी परकाया – प्रवेश की प्रक्रिया थी, अध्यात्म, गीता, प्रार्थना, उपवास आदि उसी के प्रवेश द्वार थे, उनका अपना तो कोई धर्म ही नहीं था, भले ही वे खुद भी कुछ भी कहें ; इसीलिए सामान्य सोच वाले व्यक्ति को कई बार गांधी की सोच व क्रिया बहुमत के खिलाफ लगती थी, परंतु वह लोकमत के विरुद्ध नहीं होती थी, क्योंकि लोकमत में तो अल्पमत वाले भी शामिल होते हैं। उनकी वैसी ही सोच कई बार जिद्द समझ ली जाती थी, अनेक बार उनका एकल निर्णय जिद्द की श्रेणी में आ भी जाता था , फिर भी, उनकी वह जिद्द हर तरह से और हर रूप में देश-हित में ही होती थी। 30 जनवरी 1948 को हत्या होने के पहले भी उन पर जानलेवा हमले हो चुके थे, फिर भी, वे पाकिस्तान को बंटवारे के एवज में दिए जाने वाले रूपये दिलाने की जिद्द पर अडे रहे और उनकी वही जिद्द आखिरी जिद्द साबित हुई। अब प्रश्न है कि जब गांधी हत्या की आशंका के बावजूद अपनी उस सोच पर कायम रह सकते थे तो फिर मात्र विरोध व कठिनाइयों की आशंका से ही मैं उस नीति से विरत कैसे हो सकता था ?

अपने सास – ससुर के अनुरोध पर मैंने नवम्बर 2015 में अपने तीनों सालों के बीच  जमीन – जायदाद का बंटवारा कर दिया था, न कोई पंच, न कोई गवाह , सब कुछ मैंने अकेले ही कर दिया, सबने उसे स्वीकार कर लिया। इस बीच उन सबके बहुत – से अपने लोगों को लगा कि उन्हें महत्व दिए वगैर किसी एक ने ही कैसे सब कुछ सलटा दिया और इन सब लोगों ने मान भी लिया ! तीनों के हिस्से में कुछ न कुछ कमियां बताने वाले लोग आ धमके, अब तीनों को लगने लगा कि उसको छोड कर शेष दोनों को कुछ अधिक मिल गया। एक तरह से यह ठीक भी था कि कोई एक तो असंतुष्ट नहीं था, सभी थे, उसका मतलब कि सबको समान हिस्सा मिला था। मेरे जाने पर बातों ही बातों में दो संतुष्ट हो गए, केवल एक ही असंतुष्ट रह गया, यह अच्छा न हुआ, क्योंकि दो का एक समान होना और तीसरे का दूसरी तरह का होना विसंगति होने की गुंजाइश छोड जाता है, मुझे दुख इसी बात का था। फिर भी, मैं गांधी की तरह अपनी जिद्द पर अडा रहा कि बंटवारा सही व सटीक हुआ है, वाकई , ऐसा ही है भी। अब तीनों ने पहले की तरह संतुष्टि जता दी , परंतु मन में कहीं कोई कसक न रही हो, ऐसा माना भी नहीं जा सकता। गांधी जी को उसी कसक का खामियाजा अपनी जान दे कर भुगतना पडा , बातों ही बातों में मैंने यह जिक्र कर भी दिया।

यह सब जानते हैं कि हिन्दुस्तान – पाकिस्तान के बंटवारे में एक बडी राशि भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जानी थी, उसका एक बडा हिस्सा दे दिया गया, उसके बाद दोनों देशों में झगडे शुरू हो गए, हिन्दूवादी हिन्दुस्तानियों को गंवारा न था कि बाकाया पैसे पाकिस्तान को दिए जाएं, गांधी अडे हुए थे कि पंचायत तो झगडे के पहले हुई थी, इसलिए उसके चलते बकाया राशि रोक देना ठीक नहीं था, बस, उन्हें अपनी जान गंवानी पडी। मेरे सामने भी ठीक वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर दी गई, मैंने भी वही किया जो गांधी ने किया था। मैं तो सही सलामत हूं, परंतु, शायद मेरी निर्विवाद छवि तो घायल – सी हो गई महसूस कर ही रही है। जब गांधी नहीं समझा सके तो मैं किस खेत की मूली हूं? लेकिन यकीन से बोलता हूं, मैं गांधी को समझता हूं, उनकी जिद्द को जानता हूं , उस जिद्द को मानने के लिए जनूनी जिद्द की हद तक जाने को तैयार बैठा हूं। क्योंकि मैं न हिन्दू हूं, न मुस्लिम, न सिक्ख , न ईसाई, न यहूदी, न पारसी, न जैन, न बौद्ध ; मैं तो केवल एक साधारण – सा आदमी हूं जो सबका कुछ न कुछ है और यह तो तय है कि जो सबका होता है , वह किसी का नहीं होता!

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

केजरी कुमार और अरविन्द विश्वास के नाम खुला पत्र

                                                                         जीत – हार के बाद

प्रिय बन्धुवर द्वय

आप अच्छे लोग हैं, इससे भी ज्यादा अच्छे हो सकते थे। आप की टीम भी अच्छे लोगों की है, और भी अच्छे लोग उस टीम में हो सकते थे।

मैं आपको कुछ सलाह देना चाहता हूं। चूंकि हवा – पानी के बाद सलाह ही सर्वाधिक और  प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है, हालांकि हवा-पानी कम पड सकता है किंतु सलाह की कोई कमी न है, न होगी और मेरे पास फिलहाल वही उपलब्ध भी है, इसीलिए मैं वही दे रहा हूं; हां, मौका आने पर अपना वोट भी (नीतीश जी न हों तो) आप ही को दूंगा।

ऐसा न समझें कि बिन मांगे सलाह देने की इस अनजान-से व्यक्ति ने हिमाकत कैसे कर दी? आपको सलाह देने की औकात मुझमें है, मैं ऐसी सलाह 20 वर्षों पहले नीतीश कुमार जी को भी दे चुका हूं, हालांकि वर्षों बाद उन्होंने मेरी सलाह पर अमल किया। प्रसंगवश, आपको सलाह देने के पहले नीतीश जी वाला मामला क्लीयर कर दूं, वरना वे भी कहीं  यह न कहने लगें कि ये कौन आ गया मेरा बिन बुलाया सलाहकार।

तो, बात 1997 की (संभवत) जनवरी की है। मैं किसी काम से कटिहार गया था और सीताराम चमडिया के होटल में ठहरा था । मैं कुर्ता – पाजामा पहने , शॉल ओढे सुबह की सैर से लौट कर अपने कमरे के दरवाजे पर खडा था। सामने देखा तो नीतीश कुमार जी अपने मित्र और अपनी समता पार्टी के सांसद (स्वर्गीय) दिग्विजय सिंह के साथ मेरे जैसे ही कुर्ता – पाजामा पहने और शॉल ओढे चले आ रहे थे। संयोग से उन दोनों के ठहरने के लिए ठीक मेरे सामने वाला एक कमरा आरक्षित था । उस दिन लालू जी को छोड कर उनके विधायक दल के मुख्य सचेतक रहे रामप्रकाश महतो समता पार्टी में शामिल होने वाले थे, उसी कार्यक्रम में वे दोनों आए थे और होटल के मालिक चमडिया जी ने खुद उनके रहने का इंतजाम किया था।

नीतीश जी करीब आए तो मैंने उन्हें नमस्कार किया, पता नहीं क्यों? उन्होंने मुझे अपने कमरे में आमंत्रित कर लिया। बहुत देर तक जेपी आन्दोलन से ले कर बिहार व केन्द्र की राजनीति पर बातें होती रहीं। अब मुझे अपने काम पर निकलना था, उन्हें तो कोई जल्दी नहीं थी , क्योंकि उनकी सभा में अभी बहुत समय बाकी था। चलते-चलते मैंने नीतीश जी से कहा कि उन्हें लालू जी को नहीं छोडना चाहिए था। दोनों साथ रहते तो लालू जी के जनाधार का फायदा उन्हें मिलता और उससे भी बडा फायदा देश और प्रदेश की जनता को यह मिलता कि वे लालूजी की अतिवादी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा सकते थे और अब जिन मामलों में लालू जी फंसने जा रहे थे, वे मामले होते ही नहीं , क्योंकि लालू जी को रोकने और टोकने की औकात केवल नीतीश जी में ही थी। दोनों के साथ रहने से प्रदेश को ठोस और अच्छा शासन मिल सकता था। अंत में मैंने कहा –“ एनी वे, आप से अगली मुलाकात बिहार के मुख्यमंत्री आवास पर होगी, तब मैं अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री से बात कर रहा होऊंगा ”  और अपने कमरे में चला गया। तब से नीतीश जी केन्द्र में कई बार मंत्री बने और चार बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन मैं उनसे मिलने का मुहुर्त्त नहीं निकाल सका, आगे भी उसकी आवश्यकता और संभावना कम ही लगती है।

तो, भाई केजरी कुमार और अरविन्द विश्वास जी, मोदी जी ने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जो गलती की थी, वह गलती आपने गोवा और पंजाब हारने के बाद की। बिहार में भाजपा ने शत्रुघ्न सिन्हा जैसे स्टार नेताओं को अनुपयोगी मानने की गलती की और दिग्विजयी होने के गरूर में हाथ आए एक बडे राज्य को गंवा दिया। यदि वह गलती नहीं थी तो बिहार के जुडवा जैसे सहोदर भाई देश के सबसे बडे प्रदेश उत्तर प्रदेश के विधान-सभा चुनाव तथा राष्ट्रीय राधानी राज्य दिल्ली के नगर निगम चुनावों में पूर्वांचलिए लोगों के बीच उसी मिट्टी के स्टार नेताओं – मनोज तिवारी और रविकिशन जी – का सहारा क्यों लेती। बिहार के कुछ भाजपा नेताओं के मन में बैठे शत्रुघ्न सिन्हा के व्यक्तित्व के खौफ ने भाजपा के हाथ से बिहार को फिसल जाने का अवसर पैदा किया।

पंजाब में वह खौफ ‘आप’ के आला कमान के मन में नवजोत सिंह सिद्धू  और भगवंत मान को ले कर था, साथ ही, विश्वास के वगैर भी पंजाब व गोवा जीत लेने का दम्भ था। ठीक है, विश्वास हुक्म के इक्का नहीं हैं, लेकिन तुके के तीर तो हैं ही। वैसे भी, राजनीति में कोई भी हुक्म का इक्का नहीं होता, सभी तुके के तीर ही होते हैं, चाहे मोदी जी हों या शाह जी, क्योंकि हुक्म का इक्का होते तो बिहार में भी चलते।

सो, ‘आप’ ने जो गलतियां  कीं उनमें योगेन्द्र जी जैसे परिपक्व चिंतक और प्रशांत जी जैसे उपयोगी नेताओं का निष्कासन भी शामिल है। विरोधियों और आलोचकों को साथ ले कर चलने का गुर इन्दिरा गांधी से न सीख कर जवाहर लाल नेहरू से सीखना चाहिए था।

महाभारत जीतने के बाद पाण्डवों में गरूर आया था, जिसे यक्षप्रश्न ने तोडा, आप ने तो केवल हस्तीनापुर को ही आर्यावर्त समझ लिया और एक-एक कर सबको उनकी औकात बताने लगे। दरअसल, आपके सामने युद्धिष्ठिर का प्रतिनिधि कोई यक्ष रहा ही नहीं, कोई यक्ष तो होना ही चाहिए जो प्रश्न कर सके।

आगे क्या व कैसे ?

मन की ग्रंथि को निकाल बाहर फेंकिए, कैसे टीम (कुनबे को नहीं) को एक रखना है, उस पर सोचिए, जो जिस लायक है, उसका उपयोग उस काम के लिए कीजिए, क्रेडिट के बंटवारे पर जीत के बाद विचार कीजिए, बडा हिस्सा तो आला कमान को मिलेगा ही, दूसरों की अहमियत को भी सम्मान दीजिए, जैसे भाजपा ने साढे सात साल तक नीतीश जी को दे रखा था और उसके बाद लालू जी नीतीश जी को दे रहे हैं , हर हालत में खबरदार नीतीश जी को ही रहना था और है, ठीक वैसे ही अरविन्द जी, खुद को खबरदार बनाइए व जवाबदेह ।

सिसोदिया जी आपके विश्वस्त ही नहीं, परिपक्व साथी हैं, उनका महत्व बनाए रखिए, विश्वास का विश्वास भी बनाए रखिए, संजय सिंह को थोडा समावेशी बनने में मदद कीजिए , नये लडके ज्यादा ऊर्जावान हैं, उनकी ऊर्जा का दिशा-बोध सही बनाए रखिए, नीतीश जी से शब्द-संयम सीखिए, शब्द को शस्त्र कैसे बनाया जा सकता है, यह जेपी आन्दोलन वाले ज्यादा जानते हैं, तभी तो नीतीश जी डीएनए के समन्दर में बडे-बडों को डुबो देने में सफल हो सके। आप वैसे श्ब्द-शस्त्र किसी के हाथ न थमाइए।

आपने बहुत कुछ खो दिया है, फिर भी, बहुत कुछ बाकी है, यह कोई कम बात है कि लोग आपसे उम्मीद करें! उम्मीद पे दुनिया कायम है, हतोत्साह मत होइए, उठिए, जागिए और अपने चुनावी वायदों को पूरा करने में जुट जाइए।

एक बहुत ही अहम बात और, पंजाब मोदी जी हारे नहीं थे, वे उसे जीतना ही नहीं चाहते होंगे , क्योंकि उसे जीत कर भी उन्हें क्या हासिल होता, मोहतरमा मुफ्ती सईद जैसा एक और साथी मिल जाता जो उनका सिरदर्द हमेशा बढाता ही रहता। सीधी-सी बात लगती है कि  पंजाब सहित गोवा और मणिपुर को आम मतदाताओं पर ही छोड दिया गया होगा और सारा ध्यान , ईवीएम की रणनीति सहित, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर, और फिलहाल दिल्ली नगर निगम चुनावों पर केन्द्रित किया गया होगा , क्योंकि 2019 के लिए भी तो वही सबसे बडा पत्ता है। इसलिए ईवीएम मुद्दे को शीत गृह में मत जाने दीजिए । मैं यह नहीं कहता कि ईवीएम में कोई गडबडी हुई, लेकिन मैं इतना जरूर कहता हूं कि भाजपा के इंजीनियरों और प्रवक्ताओं ने जो दलीलें दीं, वो नाकाबिल-ए-इकरार थी, उनके तर्कों में स्वीकार्य तार्किकता का दूर-दूर तक समावेश नहीं था, उन्हें वाह-वाही केवल इसलिए मिल गई कि वे सत्ता पक्ष के थे, मीडिया के कानफाडू ऐंकर भी उनसे बेहतर नहीं थे।

समय मिले तो मेरा ब्लॉग – shreelal.in   जरूर पढिए, 2016 के जून और उसके बाद आप के ऊपर मेरे बडे आलेख हैं । मेरी हिम्मत को सराहिए, जिसे सब डूबती हुई नाव समझ रहे हैं, मैं उसी के लिए पतवार थमा रहा हूं!

शुभकामनाओं के साथ

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

79 visitors online now
54 guests, 25 bots, 0 members