आस्था और अन्धविश्वास की सीमा-रेखा

 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

 – ‘आस्था को ठेस पहुंचने वाला’ क्लौज कानून से समाप्त हो   –

        क्योंकि आस्था और अन्धविश्वास के बीच सीमा – रेखा खींचना असंभव है।

– सरकारी भवनों, कार्यालयों,कार्यक्रमों में पूजा-पाठ और किसी भी तरह के धार्निक अनुष्ठान की प्रथा समाप्त हो –

        क्योंकि संविधान हर व्यक्ति को स्वेच्छा से कोई भी धर्म या मतवाद मानने और उसका का अनुसरण करने की स्वतंत्रता तो देता

        है, किंतु वैसा वह अपने व्यक्तिगत स्तर पर घर – परिवार में करे , सरकारी स्तर पर सरकार में नहीं, सरकार सेकुलर है।

– धर्म-स्थलों में ही नहीं, सामाजिक कार्यक्रमों और सरकारी भवनों में भी ऊंचे बुर्ज पर लाउडस्पीकर लगा कर तेज आवाज में बजाना

       समाप्त हो –

       क्योंकि वैसा करने की आज़ादी तो है, किंतु अपनी चारदीवारी के भीतर, किसी और को असुविधा पहुंचाए वगैर, उसके लिए

        कानून में कुछ प्रावधान भी है, उन प्रावधानों का सख्ती से अनुपालन हो ।

–  सरकारी या सरकार से अनुदानप्राप्त शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा समाप्त हो-  

        क्योंकि सेकुलर सरकार का काम धर्म का प्रचार – प्रसार नहीं है।

–  शासन, प्रशासन के लोग और किसी भी प्रकार के संवैधानिक जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में

         शामिल न हों और न ही शुभकामना संदेश भेजें,  यदि वे वैसा करते हुए पाए जाते हों तो उनका पद, सदस्यता आदि निरस्त

         कर दिया जाए –

        क्योंकि जन-प्रतिनिधि चुन लिए जाने के बाद सबके लिए समान हैं और सभी उनके लिए भी समान हैं, इसलिए समाज के

        विभाजन का कारण बनने वाले धार्मिक आयोजनों में सार्वजनिक रूप से उनकी सहभागिता विभाजन की दरार को बढा सकती

         है।

–  हज-यात्रा और मानसरोवर-यात्रा जैसे अभियानों के लिए यदि सरकारी सबसिडी दी जाती हो तो तत्काल प्रभाव से उसे समाप्त

    किया जाए,

         क्योंकि जो उनमें से किसी को भी नहीं मानते, उनके हिस्से के टैक्स के पैसों को उन अभियानों में क्यों लगाया जाए?

–  सरकार द्वारा और सरकारी अनुदान से हज भवन, मानसरोवर भवन या उस तरह का कोई भी धार्मिक भवन बनाया जाना समाप्त

     हो-

          क्योंकि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक का तुष्टीकरण सरकारी निधि से किया जाना उन लोगों के प्रति अन्याय होगा, जो उनमें से

          किसी को भी नहीं मानते।

–  पर्यटन को बढावा देने के नाम पर धर्मिक स्थलों के निर्माण, विकास, विस्तार या रख-रखाव पर सरकारी खर्च न हो ।

–  धार्मिक स्थलों पर यदि सरकार कोई भी खर्च करती है तो सबसे पहले उन धर्मों और उनके धर्मस्थलों में जमा धन सरकारी खजाने

          में जमा हो और पूरा प्रबंध सरकार अपने हाथ में ले।

          क्योंकि विकास पर खर्च सरकार करे और उससे हुई आमदनी को धर्म के ठेकेदार रखें, ऐसा नहीं चलेगा।

–  धर्म और ईश्वर आदि व्यक्तिगत विषय हैं, उसे सार्वजनिक प्रदर्शन का तमाशा बनाने पर पाबन्दी हो-

            क्योंकि वही प्रदर्शन वर्चस्व दिखाने का हथकण्डा बन जाता है और प्रेम – मोहब्बत से रहने वाला समाज भी बंटने लगता है। –  किसी भी सार्वजनिक मंच पर किसी भी व्यक्ति को धर्मगुरू, आध्यात्मिक गुरू,  योगीराज, बाबा जी आदि जैसे संबोधन न दिए

            जाएं। यदि वह किसी संस्था का पदधारी या सदस्य हो, तो उसे उसके पदनाम से बुलाया जा सकता है-

            क्योंकि आध्यात्मिक गुरू या धर्म गुरू जैसे पद मिठाई की दूकान की रेवडी नहीं है कि जिसे चाहो, जब चाहो, जहां चाहो ,

            बांट दो।

  • भाषा और शब्दावली पर न जा कर, इसे सभी धर्मों के लिए समान समझा जाए।

 

और भी बहुत कुछ… लेकिन धीरे – धीरे …!

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