शादी , तलाक और संतान

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (पांच)

  

  1. तीन तलाक समाप्त हो,

           – क्योंकि वह प्रथा महिला विरोधी है;

           – क्योंकि वैसे तलाक से प्रभावित बच्चों को उनके बचपना का स्वाभाविक हक

              नहीं मिल पाता; इसलिए वह प्रथा सन्तान विरोधी भी है।

           – क्योंकि वैसी तलाकसुदा औरत को उसका स्वाभाविक सम्मान समाज में नहीं

              मिल पाता , इसलिए वह प्रथा समाज विरोधी भी है;

  •   किसी भी धर्म का कोई भी प्रामाणिक ग्रंथ उसे मान्यता प्रदान नहीं करता,  

            इसलिए वह धर्मविरोधी भी है;

  •  क्योंकि वह प्रथा महिला को आदमी के बराबर होने का हक नहीं देती ,

           इसलिए वह अमानवीय भी है।

  1.    एक पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरी शादी को अपराध घोषित किया जाए;   क्योंकि निसंत्तान को संतानोत्पत्ति के लिए,      केवल बेटी वाले को बेटा भी पैदा

             करने के लिए अथवा दैहिक सुख मात्र के लिए बहु विवाह,  दूसरी शादी

            अनैतिक और अमानवीय है;

  •  क्योंकि वैसे मामलों में जीवित पहली पत्नी की सहमति भी विवशता में दी

           गई सहमति होती है, इसलिए वैसा करना जबरदस्ती भी है;  

       3.  जिस तरह तलाक अदालत से हो,उसी तरह दूसरी शादी भी अदालत की मंजूरी से

      हो।  

        4. निर्धारित संख्या से अधिक संतानोत्पत्ति को अपराध घोषित किया जाए;

             क्योंकि सही परवरिश के अभाव में बच्चे कुपोषण व अशिक्षा के शिकार हो   

            जाते हैं; इसके लिए अतीत का उदाहरण देखने से अधिक धरती का भविष्य

            देखना जरूरी है;

        5. सरकारी सेवाओं, शासन – प्रशासन और जन प्रतिनिधित्व के लिए अधिकतम संतान

              संख्या निर्धारित हो और उसका उल्लंघन करने वालों को उसके लिए आवेदन

              का भी हक न दिया जाए और चयन के बाद भी उसका उल्लंघन करने

              वालों को तत्काल उनके पद , सेवा , प्रतिनिधित्व से हटा दिया जाए और

              आगे के लिए भी अपात्र घोषित कर दिया जाए।  और यदि किसी की

              संतानों की संख्या कानून बनने के पहले ही निर्धारित अधिकतम संख्या –

             सीमा को पार कर गई हो, उनके लिए सरकारी सेवाओं या जन-प्रतिनिधित्व

             में जाने के लिए अधिकतम उम्र सीमा निर्धारित हो।                      

       6.  जन्म, शादी, तलाक, मरण आदि सब कुछ पंजीकृत हो और उसके लिए ग्राम

              पंचायत स्तर तक मेकैनिज्म तैयार और अधिकृत हो; यानी बहु विवाह, बाल विवाह, जबरन विवाह दहेज प्रथा आदि                          अपराध घोषित किए  जाएं, तलाक कानून सम्मत हो और संतानोत्पत्ति निर्धारित संख्या में हो।    

  1.     शादी या श्राद्ध अथवा सामाजिक – धार्मिक आयोजनों में अधिकतम व्यय की

           राशि चुनाव – व्यय की भांति निर्धारित हो और वह राशि आयोजक के

           खाते में मानी जाए , उसका हिसाब उसी से लिया जाए। 

  1.      अर्थात आय के साथ – साथ व्यय पर भी कर निर्धारण हो।
  2.      भारत भूमि में रहने वाले और भारत के नागरिकों पर वे सारी बातें सभी धर्मों

           पर समान रूप से लागू हों।

  1.  ये सभी विचार कोई नये विचार नहीं हैं, हजारों सालों से इस तरह के विचार आते रहे हैं,  लेकिन अब हम अपेक्षाकृत अधिक विकसित और सभ्य सुसंस्कृत समाज में रहते हैं तथा हमने एक सुविचारित संविधान के अंतर्गत सेकुलर लोकतंत्रीय गणतंत्र अपनाया है , इसीलिए इन बिन्दुओं पर निर्णय लेने का समय आ गया है।

 

अभी और भी बहुत कुछ, किंतु शेष कल…..!

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