गांधी की जिद्द को समझने की जिद्द

गांधी की जिद्द को समझने की जिद्द

पूरे तीन सप्ताह तक ‘नेट’ की दुनिया से दूर ‘नेह’ की दुनिया में रमा रहा, फलस्वरूप फेसबुक या ब्लॉग पर कुछ लिखने की न सुधि रही, न समय मिला। दरअसल, गांव – घर की मिट्टी की खुश्बू में बात ही कुछ और होती है; तभी तो दुनिया मेरे गांव में सिमट आई है और मेरा गांव भी दुनिया में फैल गया है । तीन सप्ताह तक गांव – घर में रहने के दौरान एक बार फिर से महात्मा गांधी मेरे मन मस्तिष्क में अवतरित हो गए, आखिर मेरा गांव चम्पारण ही तो वह जगह है, जिसने मोहन को महात्मा और बापू को राष्ट्रपिता होने का मार्ग प्रशस्त किया।

दरअसल, महात्मा गांधी के बारे में मेरी समझ लौकिक – अलौकिक उद्भावनाओं से परे बिल्कुल मानवीय धरातल पर है। मेरा मानना है कि गांधी न हिन्दू थे, न मुसलमान, न सिक्ख , न ईसाई, न जैन, न बौद्ध, न यहूदी, न पारसी ; वह तो केवल एक व्यक्ति थे, जिन्होंने उस पूरे हिन्दुस्तान को;  उसके हर एक क्षेत्र , व्यक्ति, समाज व संस्कृति को, दुख – सुख को, उत्सव व उल्लास को, पीडा और प्रार्थना को अलग – अलग भी एवं समग्रता के साथ भी;  देखा – समझा – परखा और जीया था,  जहां के लोग हिन्दू थे, मुसलमान थे, सिक्ख थे, ईसाई थे, जैन थे, बौद्ध थे, यहूदी और पारसी भी थे। गांधी को उन्हीं लोगों के लिए, उन्हीं लोगों को साथ ले कर और उन्हीं लोगों के बीच रह कर देश को न केवल अंग्रेजों से आज़ाद कराना था, बल्कि अमीरों को अहंकार से, गरीबों को गुरबत से, पिछडेपन से, अशिक्षा से , अन्धविश्वास से, साम्प्रदायिकता से, कुपोषण व कुस्वास्थ्य से, ऊंच-नीच व छूत-अछूत की कुभावना से भी आज़ाद कराना था।

गांधी जी यह जान – समझ गए थे कि उन सबसे अलग रह कर उनके लिए कुछ कर पाना संभव नहीं था, इसीलिए वे उद्योगपतियों के साथ भी रहे और गरीबों के बीच भी, अछूतों के संग भी रहे तो उन अछूतों को अछूत समझने वालों के पास भी। उन्होंने यह भी समझ लिया था कि निंद्रा में खोये और तंद्रा में भटके धर्मपरायण देशवासियों को उनके धर्म में प्रवेश कर ही जगाया जा सकता था। उनकी प्रार्थना — “रघुपति राघव राजाराम” या “ईश्वर अल्ला तेरो नाम” अथवा “वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे” और “हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख ईसाई; आपस में सब भाई – भाई” वाली सोच आदि उसी परकाया – प्रवेश की प्रक्रिया थी, अध्यात्म, गीता, प्रार्थना, उपवास आदि उसी के प्रवेश द्वार थे, उनका अपना तो कोई धर्म ही नहीं था, भले ही वे खुद भी कुछ भी कहें ; इसीलिए सामान्य सोच वाले व्यक्ति को कई बार गांधी की सोच व क्रिया बहुमत के खिलाफ लगती थी, परंतु वह लोकमत के विरुद्ध नहीं होती थी, क्योंकि लोकमत में तो अल्पमत वाले भी शामिल होते हैं। उनकी वैसी ही सोच कई बार जिद्द समझ ली जाती थी, अनेक बार उनका एकल निर्णय जिद्द की श्रेणी में आ भी जाता था , फिर भी, उनकी वह जिद्द हर तरह से और हर रूप में देश-हित में ही होती थी। 30 जनवरी 1948 को हत्या होने के पहले भी उन पर जानलेवा हमले हो चुके थे, फिर भी, वे पाकिस्तान को बंटवारे के एवज में दिए जाने वाले रूपये दिलाने की जिद्द पर अडे रहे और उनकी वही जिद्द आखिरी जिद्द साबित हुई। अब प्रश्न है कि जब गांधी हत्या की आशंका के बावजूद अपनी उस सोच पर कायम रह सकते थे तो फिर मात्र विरोध व कठिनाइयों की आशंका से ही मैं उस नीति से विरत कैसे हो सकता था ?

अपने सास – ससुर के अनुरोध पर मैंने नवम्बर 2015 में अपने तीनों सालों के बीच  जमीन – जायदाद का बंटवारा कर दिया था, न कोई पंच, न कोई गवाह , सब कुछ मैंने अकेले ही कर दिया, सबने उसे स्वीकार कर लिया। इस बीच उन सबके बहुत – से अपने लोगों को लगा कि उन्हें महत्व दिए वगैर किसी एक ने ही कैसे सब कुछ सलटा दिया और इन सब लोगों ने मान भी लिया ! तीनों के हिस्से में कुछ न कुछ कमियां बताने वाले लोग आ धमके, अब तीनों को लगने लगा कि उसको छोड कर शेष दोनों को कुछ अधिक मिल गया। एक तरह से यह ठीक भी था कि कोई एक तो असंतुष्ट नहीं था, सभी थे, उसका मतलब कि सबको समान हिस्सा मिला था। मेरे जाने पर बातों ही बातों में दो संतुष्ट हो गए, केवल एक ही असंतुष्ट रह गया, यह अच्छा न हुआ, क्योंकि दो का एक समान होना और तीसरे का दूसरी तरह का होना विसंगति होने की गुंजाइश छोड जाता है, मुझे दुख इसी बात का था। फिर भी, मैं गांधी की तरह अपनी जिद्द पर अडा रहा कि बंटवारा सही व सटीक हुआ है, वाकई , ऐसा ही है भी। अब तीनों ने पहले की तरह संतुष्टि जता दी , परंतु मन में कहीं कोई कसक न रही हो, ऐसा माना भी नहीं जा सकता। गांधी जी को उसी कसक का खामियाजा अपनी जान दे कर भुगतना पडा , बातों ही बातों में मैंने यह जिक्र कर भी दिया।

यह सब जानते हैं कि हिन्दुस्तान – पाकिस्तान के बंटवारे में एक बडी राशि भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जानी थी, उसका एक बडा हिस्सा दे दिया गया, उसके बाद दोनों देशों में झगडे शुरू हो गए, हिन्दूवादी हिन्दुस्तानियों को गंवारा न था कि बाकाया पैसे पाकिस्तान को दिए जाएं, गांधी अडे हुए थे कि पंचायत तो झगडे के पहले हुई थी, इसलिए उसके चलते बकाया राशि रोक देना ठीक नहीं था, बस, उन्हें अपनी जान गंवानी पडी। मेरे सामने भी ठीक वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर दी गई, मैंने भी वही किया जो गांधी ने किया था। मैं तो सही सलामत हूं, परंतु, शायद मेरी निर्विवाद छवि तो घायल – सी हो गई महसूस कर ही रही है। जब गांधी नहीं समझा सके तो मैं किस खेत की मूली हूं? लेकिन यकीन से बोलता हूं, मैं गांधी को समझता हूं, उनकी जिद्द को जानता हूं , उस जिद्द को मानने के लिए जनूनी जिद्द की हद तक जाने को तैयार बैठा हूं। क्योंकि मैं न हिन्दू हूं, न मुस्लिम, न सिक्ख , न ईसाई, न यहूदी, न पारसी, न जैन, न बौद्ध ; मैं तो केवल एक साधारण – सा आदमी हूं जो सबका कुछ न कुछ है और यह तो तय है कि जो सबका होता है , वह किसी का नहीं होता!

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

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1,482 thoughts on “गांधी की जिद्द को समझने की जिद्द

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