चाय – विमर्श

चाय – विमर्श

 

मेरी शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा से …. !

 

(आजकल मीडिया में एक राष्ट्रीय चाय दूकान की चर्चा चाय से भी ज्यादा गर्म है।  हो भी क्यों नहीं, आखिर उसी दूकान के मालिक आज के राष्ट्रीय प्रधान सेवक पूरी दुनिया में विमर्श का विषय जो बने हुए हैं। सुना है कि भक्तजन उस दूकान को राष्ट्रीय स्मारक अथवा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल घोषित – विकसित कराने का अभियान छेडने वाले हैं। यह खबर सुनते ही मेरी बांछें खिल गईं ! मैंने भी अपनी यादों के तहखानों का उत्खनन करना शुरू कर दिया , उस खुदाई में मेरे चाय – विमर्श के भी कुछ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व के अवशेष प्राप्त हुए हैं, यहां मैं उन अवशेषों की प्रदर्शनी लगा रहा हूं।)

कॉलेज में आए कुछ महीने हो गए थे,  किंतु तब तक किसी छात्र की कोई बडी पहचान नहीं बनी थी। एमआईएल हिन्दी की क्लास थी। प्रोफेसर रमाशंकर पाण्डेय हाजिरी ले रहे थे। उनका स्वभाव बहुत ही विनम्र और मिलनसार था, देर से आने वाले छात्रों की भी हाजिरी बना देते थे, अंत में वे पूछ भी लेते थे कि हाजिरी में कोई छूटा तो नहीं ? उस दिन भी उन्होंने वैसा पूछा । रमेश कुमार नाम का मेरा एक सहपाठी  था, उसकी नई – नई शादी हुई थी, कोट, पैंट और टाई में मोटरसायकिल पर कॉलेज आता था। बाकी लडकों में खुद को ज्यादा ही स्मार्ट जताने की कोशिश में रहता था। उसी ठसक में उसने प्रो. रमाशंकर पाण्डेय को टोक दिया – “सर, बहुत हो गई हाजिरी, अब पढाई शुरू की जाए”। उसकी वह बात और बॉडी लैंग्वेज पाण्डेय जी को खल गई, फिर भी, उन्होंने सीधे उसे कुछ नहीं कहा और पढाना शुरू कर दिया।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘साकेत’ का एक अंश ‘पंचवटी में लक्ष्मण’ नाम से कोर्स में था, उसमें सीताहरण के संदर्भ में शूर्पणखा का प्रसंग भी था। पाण्डेय जी ने रमेश से पूछ दिया कि पिछले दिन जिस प्रसंग की पढाई हुई थी, उसका सारांश बताए। रमेश फिसड्डी साबित हुआ, पाण्डेय जी ने दूसरे छात्रों से भी पूछा, किसी ने भी कुछ नहीं बताया। पाण्डेय जी ने कहा –  “ छुटे हुए विद्यार्थी की हाजिरी लेने में दो मिनट लग गए तो वह समय बहुत खल रहा था आप लोगों को , तो फिर पढते क्यों नहीं, इस तरह अपने मां – बाप के पैसे और कॉलेज का समय क्यों जाया कर रहे हैं ? पूरी क्लास चुप क्यों है ”? मैं तो धोती – कुर्ता पहनने वाला घोषित गंवार था, इसलिए मेरा नोटिस कोई नहीं लेता था। मैंने स्वयं कहा –“ श्रीमान ! मैं बताना चाहता हूं ”। सबने मुझे चकित हो कर देखा, प्रोफेसर साहब ने अनुमति दे दी।

मोतीहारी एमएस कॉलेज में मैं प्राक कला यानी प्री यूनिवर्सिटी आर्ट्स का छात्र था।  मेरी क्लास में 10 –11  लडकियां थीं, किंतु एमआईएल वाली क्लास में तो 25 से भी अधिक लडकियां थीं, कई लडके अधिकांश समय उन लडकियों को ही घूरते रहते थे , शायद अपनी क्लास की एक लडकी को मैं भी कभी – कभी  देख लेता था, लेकिन मैं पढाई से मन कभी नहीं हटाता था । ‘पंचवटी’ में पिछले दिन जो पढाया गया था, वह राम एवं लक्ष्मण के बीच शूर्पणखा का प्रसंग था।  शूर्पणखा अप्सरा – सी सुन्दर स्त्री के वेश में आती है, अपने हाव – भाव और कामुक अदाओं से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को लुभानाती है, परंतु दोनों में से कोई भी भाई उसे महत्व नहीं देता, फलस्वरूप शूर्पणखा राम और लक्ष्मण के बीच पेंडुलम की तरह हिंडोले खाती रहती है।

मैंने वह प्रसंग मैथिलीशरण गुप्त की कुछ पंक्तियों को उद्धृत करते हुए सुनाया और उसे आज की परिस्थितियों से जोड कर एक व्यंग्य कर दिया –  “ राम और लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता ने शूर्पणखा जैसी कामाक्षी और रूपवंती युवती को कभी इधर तो कभी उधर भटकने को विवश कर दिया, वह ललचाई नज़रों से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को देखती हुई प्रेम की भीख मांगती रही , गिडगिडाती रही, मिन्नतें करती रही, किंतु दोनों में से किसी ने भी उसकी ओर आंख उठा कर देखा तक नहीं। आजकल के मेरे मित्रों की तरह नहीं कि पढाई छोड कर अपनी सहपाठी कन्याओं को देखने में ही पूरा समय लगाते रहें और कोई इनकी तरफ एक नज़र देखे तक नहीं ”।

वह मेरा कोई भाषण नहीं था, बल्कि हमारे पाठ्यक्रम का एक अंश था, जिसका भावार्थ मैं बता रहा था, फिर भी, सबने जोरदार तरीके से तालियां बजाईं और उनमें सबसे आगे लडकियां रहीं। रमेश सहित मेरे कई सहपाठियों का बुरा हाल हो गया और मैं हीरो बन गया। मेरी जोरदार पहचान बनी और मैं चर्चा का विषय बन गया। उसके बाद मेरे कई दोस्त बन गए। प्रो. रमाशंकर पाण्डेय मुझे ‘जिज्ञासु जी’ कहने लगे और सबके सामने मुझे ज्यादा महत्व देने लगे।

वह चूंकि एमआईएल (हिन्दी) की क्लास थी, इसलिए क्लास में लगभग 200 छात्र –  छात्राएं थीं। हॉल से निकलने के बाद मैंने महसूस किया कि अधिकांश निगाहें मुझे ही घूर रही थीं। इसीलिए मैं भी पूरी गंभीरता का लबादा ओढ कर राम – लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता का उदाहरण प्रस्तुत करने की कोशिश में लग गया। उसके बाद एक पिरियड लिजर थी, और फिर, इतिहास की क्लास थी। मैं लायब्रेरी की तरफ जा रहा था कि मेरा एक सहपाठी मेरे पास आ कर बोला – “ भाई जी, चलिए स्टेशन से चाय पी कर आते हैं ”। तब तक मैंने चाय पीना सीखा नहीं था, किंतु उस सहपाठी के आमंत्रण में एक कशिश थी जो अपनापन से लबरेज थी, इसीलिए मैंने कहा – “ भाई जी, मैं चाय तो नहीं पीता, फिर भी चलिए, चलते हैं ”। उसने गांधी होटल में दो स्पेशल चाय मंगाई , मैंने प्लेट में ढाल कर फूंक – फूंक कर चाय पी, चाय पीना मेरी आदतों में न तब शुमार था , न आज। उस दिन हमलोगों के बीच ज्यादा कुछ बातचीत नहीं हुई, केवल पढाई की ही बातें होती रहीं, तब तक उसने घडी देख कर कहा – “ चलिए, अगली क्लास का टाइम हो गया”। मेरी तरह उसके मूल विषय भी हिन्दी, इतिहास और राजनीति शास्त्र थे, अतिरिक्त विषय भी तर्कशास्त्र था, अंग्रेजी और    एमआईएल हिन्दी अनिवार्य विषय तो समान थे ही, इस प्रकार हम हर क्लास में साथ ही थे।

क्लास में वह मुझसे अलग बैठता था, किंतु उस दिन इतिहास की क्लास से ही वह मेरे पास बैठने लगा। मैंने देखा कि कई लडके उससे दोस्ती गांठने की फिराक में रहते थे। अगले दिन से ही मेरा वह सहपाठी मित्र “भाई जी” कहने के बदले मुझे मेरे फर्स्ट नेम “श्रीलाल” कह कर पुकारने लगा और “तुम ताम” पर उतर आया । इतनी जल्दी उसका उस तरह घनिष्ठता दिखलाना मेरे गंवार मन को थोडा विचित्र – सा लगा, किंतु उसके संबोधन में इतना गहरा अपनापन-बोध था कि मन उसकी ओर अनायास खिंचता चला गया , मैं भी उसे “तुम” कहने लगा और उसका फर्स्ट नेम “राकेश”  कह कर पुकारने लगा। ( इस धरती पर मेरा सबसे प्रिय मित्र था वह , अब इस दुनिया में नहीं रहा, उससे 12 साल छोटा भाई सुबोध कुमार सिंह आजकल दिल्ली में नाबार्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी है, उसकी शादी हिन्दी के ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त यशस्वी कवि डॉ. केदारनाथ सिंह की बेटी से हुई है)  

अब चाय पीने वालों में हम पांच – छह छात्र हो गए, चाय के पैसे देने के लिए अब हर व्यक्ति “पहले मैं – पहले मैं” करने लगा, राकेश से दोस्ती जता कर सभी खुद को बडभागी समझने लगे ,  मेरा साथ होना भी उन सबके लिए एक तरह से शराफत का सर्टिफिकेट मिलने जैसा था,  अब पैसे राकेश भी नहीं देता था, और मुझे, मुझे तो वैसे भी पैसे देने ही नहीं थे , क्योंकि चाय पीने तो मैं उन लोगों के विशेष आग्रह पर जाता था और वैसे भी चाय पीना मेरा शगल था भी नहीं (आज भी मैं किसी का मन रखने या समय काटने के लिए ही चाय पीता हूं) , उसके कई कारण थे ।

पहला कारण तो यह था कि हमारे गांव देहात में बच्चों और युवकों में चाय पीने की आदत को बीडी, सिगरेट, खैनी, तम्बाकू, पान आदि खाने जैसी बुरी आदतों में शुमार किया जाता था , इसलिए यदि कोई चाय पीता भी था तो अपने बडों से छुपा कर ही पीता था। दूसरा कारण यह था कि गांवों में किसान सुबह से ही अपने काम में लग जाते थे, एक बार ही भरपेट भोजन कर खेतों में निकलते थे, घर वापस आ कर फिर खाना खा लेते थे, चाय पीने का कोई समय ही नहीं होता था उनके पास। तीसरा कारण यह था कि गांवों में ऐसा चुल्हा तो किसी के पास होता नहीं था कि जब चाहें, जलालें और जब चाहें, बुझा दें, क्योंकि तब गैस या स्टोव किसी के पास होता नहीं था, जलावन के रूप में लकडी और उपले आदि का उपयोग होता था, जिसे चाय बनाने जैसे महज कुछ मिनटों के काम के लिए जलाना-बुझाना सुविधाजनक नहीं होता था, और रही बात गांव में चाय की दूकान की तो गरीब से गरीब आदमी भी चाय की दूकान चलाना पसन्द नहीं करता था, इसलिए लोगों में चाय की आदत ही नहीं पनपती थी । एक अन्य कारण भी था, चूंकि चाय से न तो भूख मिटती थी और न ही प्यास जाती थी; इसलिए शहर में आसानी से उपलब्ध होने पर भी केवल ‘जीभ दागने’ के लिए मेरे जैसे युवक चाय पीने जैसे ‘असामाजिक’ व ‘अनावश्यक’ शगल पर कुछ भी खर्च करना फिजुलखर्ची मानते थे। मेरे चाय नहीं पीने के पीछे वे सभी कारण थे।

एक दिन शाम को अंतिम क्लास खत्म हुई। हम सभी दोस्त गांधी होटल चाय पीने गए, मगर इस दफे तो मामला कुछ और ही था। कागज में लपेट कर शक्ति रस की तीन बोतलें वेटर ले आया , पता चला कि कॉलेज के लडकों में हल्के नशा के लिए शक्ति रस (आयुर्वेदिक या कोई अन्य प्रोडक्ट सिरप)  का सेवन आम था। रस ग्लास में ढाला गया, राकेश ने मेरे लिए ग्लास लगाने से मना कर दिया और एक कप चाय का ऑर्डर कर दिया। उसी बीच सुधीन्द्र पीने के लिए मुझ पर जोर डालने लगा और मेरे ‘ना’ करने पर अपना ग्लास मेरे मुंह में लगाने लगा। “चटाक” , सुधीन्द्र के गाल पर एक जोरदार झन्नाटेदार तमाचा लगा। देखा तो राकेश आग बबूला हुआ जा रहा था – “ श्रीलाल मेरा दोस्त है, तुम लोगों के साथ तो यह उठे – बैठे भी नहीं,  मेरे चलते आता है, जब मैं इस पर जोर नहीं दे रहा तो फिर तुमने जबरदस्ती क्यों की? आइन्दा, जिसने भी ऐसा किया, वह खुद को मेरी दोस्ती से खारिज समझे ”। उस घटना के बाद कॉलेज में मेरी छवि में बेहिसाब निखार आ गया। पढाकू और वक्ता तो माना ही जाने लगा था, अब संयम व संस्कार की भी चर्चा होने लगी, एक – दो ईर्ष्यालू किस्म के लडकों ने मुझे देख कर फबती भी कसी – “वो देखो , स्साला .. विवेकानन्द की औलाद जा रहा है” ।

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

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124 thoughts on “चाय – विमर्श

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