अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

(क्योंकि आयोजन सरकारी था, किंतु अन्दाज़ पेशेवराना था, क्योंकि कार्यक्रम भाषा व अनुवाद पर था, परंतु स्वरूप साहित्यिक व सांस्कृतिक था और क्योंकि प्रस्तुति तकनीकी थी, लेकिन अभिव्यक्ति कलात्मक व लयात्मक थी; बस, भाषा, साहित्य और तकनीक की त्रिवेणी में अनुवाद की नाव चल पडी , क्योंकि उसकी पतवार तो वैश्विक बाजार की जरूरतें हैं!)     

 केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो ने 07 जुलाई को नई दिल्ली संसद मार्ग स्थित एनडीएमसी कंवेंशन सेंटर के सभागार में “अनुवाद प्रशिक्षण का ई- लर्निंग प्लेटफॉर्म” का लोकार्पण किया। भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य-योजना के अंतर्गत दो सत्रों में आयोजित लोकार्पण समारोह के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राजभाषा सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस ने की , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रो. गिरीश मिश्र मुख्य अतिथि थे, मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध भाषाविद और टेक्नोक्रेट डॉ. ओम विकास का था, जबकि अनुवाद विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. विमलेश कांति वर्मा विशिष्ट वक्ता थे। संगोष्ठी सत्र की अध्यक्षता प्रो. गिरीश मिश्र ने की और मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने दिया । अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह ने ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ की संकल्पना, कार्य-योजना और उपयोगिता पर प्रकाश डाला , जबकि राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा ने उद्घाटन सत्र में और अनुवाद ब्यूरो के संयुक्त निदेशक डॉ. विनोद कुमार संदलेश ने संगोष्ठी सत्र में धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम की शुरूआत अनुवाद पर ऑडियो विजुअल प्रस्तुति से हुई, 15 मिनट की वही प्रस्तुति अगले 4 घंटों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रही।

केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो (सीटीबी) भारत सरकार राजभाषा विभाग का ही एक अभिन्न अंग है,जिसके निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह है। श्री सिंह के नेतृत्व में सरकारी कार्यालयों, संस्थानों और बैंकों आदि में कुशल व व्यावहारिक अनुवादकों की एक बडी और बहुआयामी फौज़ तैयार होती रही है। दरअसल, वही फौज़ राजभाषा कार्यान्वयन का कारगर उपकरण है। राजभाषा विभाग के वैसे ही अभिन्न अंग नीति, कार्यान्वयन, तकनीकी और केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान भी हैं। इन सभी अंगों के अलग-अलग निदेशक हैं जो संयुक्त सचिव के मार्गदर्शन और सचिव के संरक्षण में कार्य करते हैं। वरिष्ठ तकनीकी निदेशक डॉ. केवल कृष्ण एक अनुभवी व सर्वसुलभ अधिकारी हैं, सरकारी कार्यालयों , बैंकों आदि में कम्प्यूटरीकरण और उससे जुडी समस्याओं के समाधान में उनका अमूल्य योगदान रहा है। डॉ. जयप्रकाश कर्दम  हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के हेड हैं, उनके नेतृत्व में हिन्दीतर भाषा-भाषी सरकारी कर्मियों को हिन्दी का प्रशिक्षण दिला कर हिन्दी कार्यान्वयन के लिए एक सक्षम व कुशल मशीनरी तैयार  की जाती रही है।

राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस , संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा और निदेशक (कार्यान्वयन) डॉ. संदीप कुमार आर्य से पहली बार मैं इसी समारोह में मिला। झा जी अपने पद और कद के अनुरूप विषय में गहरी रुचि और पैठ रखने वाले वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं; सरल इतने कि उद्घाटन सत्र के बाद मंच से उतर कर संगोष्ठी सत्र में श्रोता-दर्शक – दीर्घा की पहली पंक्ति में मेरे पास ही आ कर बैठ गए और अगले दो घंटों के दौरान बीच – बीच में आयोजन के बारे में चर्चा भी करते रहे। संयुक्त सचिव का व्यक्तित्व भी सहज है , डॉ. संदीप आर्य सुव्यवस्थित व्यक्तित्व – सम्पन्न हैं। कुल मिला कर राजभाषा विभाग को कुशल व प्रभावी नेतृत्व मिला है तो उस नेतृत्व को भी योग्य व समर्पित टीम मिली है। इस आयोजन ने ढेर सारे नये – पुराने मित्रों – शुभचिंतकों से मिलने का अवसर भी उपलब्ध करा दिया। उदय कुमार सिंह मुम्बई में  ‘गेल’ में वरिष्ठ अफसर हैं, 1993 के बाद उनसे कल उस आयोजन में ही भेंट हुई, उन्होंने मुझे पहचान लिया , किंतु मैं पहली नज़र में नहीं पहचान पाया। अब मैं इसके लिए उनकी नज़रों की तारीफ करूं या  खुद को 25 साल पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए अपनी पीठ थपथपाऊं ! राजभाष के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों में निदेशक रमेश बाबू अनियरी और संयुक्त निदेशक राकेश कुमार से मिलना सुखकर रहा। और भी कई प्रिय और आदरणीय मित्र मिले , उन सबको मेरी शुभकामनाएं।

मैंने उक्त आयोजन को ‘अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय’ कहा है। मैं अपने इस कथन के मूल में निहित भावभूमि एवं दर्शन-दृष्टि को आप से साझा करूंगा और कार्यक्रम का विवेचन, विश्लेषण व गुण-दोष-निरूपण भी करूंगा, परंतु उसके पहले पूरी विनम्रता के साथ मैं सूचित करना चाहूंगा कि ऐसे कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने की सामर्थ्य मुझमें है तथा उसका औचित्य भी मुझसे जुडा हुआ है , क्योंकि भारतवर्ष  में राजभाषा संबंधी अब तक का विशालतम भव्यतम और सर्वाधिक प्रभावी समारोह – सम्मेलन कराने का श्रेय मुझे और मेरी टीम को ही है । हमारा ही राजभाषा सम्मेलन था जिसमें भारत के माननीय गृहमंत्री और वित्तमंत्री सहित अनेक केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सांसद, सचिव , भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर तथा सभी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के सीएमडी आदि अपने राजभाषा प्रभारियों के साथ उपस्थित हुए।

भाषिक वर्गीकरण के अनुसार ‘ग’ क्षेत्र में स्थित कोलकाता में पहला सम्मेलन 1988 में, दूसरा सम्मेलन ‘ख’ क्षेत्र में स्थित मुम्बई में 1990 में तथा तीसरा सम्मेलन 1991 में ‘क’ क्षेत्र स्थित जयपुर में हुआ। तीनों ही सम्मेलनों का आयोजन पांच सितारा होटलों में किया  गया और वैसा इस दृढ भावना के साथ किया गया कि चूंकि सरकारी संस्थानों के मुख्य धारा संबंधी बडे कार्यक्रम बडे होटलों में होते थे तो फिर हिन्दी का सम्मेलन क्यों नहीं । उस सोच के पीछे दर्शन यह था कि उन संस्थानों के प्रमुख हिन्दी को भी राष्ट्र और संस्थान की अस्मिता जुडा विषय मानें तथा उससे जुडे अधिकारियों को भी समान रूप से (इन तमाम विषयों पर विस्तार से चर्चा मेरी आत्मकथा में की गई है जिसका लोकार्पण महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह के 100 वर्ष और भारत की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले महीने होगा ) महत्वपूर्ण समझें।

अब मैं सीधे आयोजन के व्यक्ति, व्यक्तित्व और वक्तव्य की चर्चा करना चाहूंगा। चारों अतिथि वक्ता अपने – अपने क्षेत्र के मूर्धन्य विद्वान हैं और देश में ही नहीं, विदेशों में भी समादृत हैं, वे विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर चुके हैं, व्याख्यान दे चुके हैं तथा भाषिक, साहित्यिक , सांस्कृतिक यात्राओं का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।  पांचवे वक्ता , राजभाषा विभाग के सचिव उस शीर्ष संस्था के प्रमुख हैं, जिसे भारत सरकार ने अपने कार्यालयों, उपक्रमों तथा बैंकों आदि में संविधान की भावनाओं के अनुरूप राजभाषा हिन्दी को लागू कराने का दायित्व सौंपा है; इसलिए उन सबके द्वारा कुछ कहे जाने का गंभीर मायने है।

सचिव ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारतीय लोकमानस में निर्मल जल-धारा की तरह सहज स्वाभाविक रूप में बहने वाली हिन्दी ही हिन्दी है और वही हिन्दी, राजभाषा हिन्दी है, उस हिन्दी के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य नहीं है क्योंकि हिन्दी की प्रकृति स्वाधीन है। उन्होंने कहा कि हमारे शरीर का हर अंग तन्दुरूस्त है , किंतु शायद सोचने वाला, चिंतन करने वाला हमारा जो मन – मस्तिष्क है, वही कमजोर है, तभी तो हिन्दी बोलने अथवा हिन्दी वाला कहे जाने में हमें हीन भावना घेर लेती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावना व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई उन्हें हिन्दी वाला कहता है तो उनका छह फुट का कद दस फुट का हो जाता है। सचिव ने केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. एसएन सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे अपनी टीम के साथ प्रशासनिक हिन्दी के सरलीकरण पर कार्य कर रहे हैं, एक ऐसी शब्दावली बनने जा रही है , जिसमें केवल प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि हिन्दी के ढाई – तीन लाख शब्द होंगे जो हिन्दी के समावेशी स्वरूप को प्रतिध्वनित करेंगे।

मुख्य अतिथि प्रो. गिरीश मिश्र ने उस कार्यक्रम को हिन्दी को सशक्त, समर्थ व सार्थक बनाने के लिए भाषा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और अनुवाद को ब्रह्म की ‘एकोअहम बहुस्यामि’ की अभिव्यक्ति की भांति सर्वव्यापि होना बताया । डॉ. ओम विकास ने अनुवाद के तकनीकी और भाषा के विकास में तकनीक के उपयोग की चर्चा की तो डॉ. विमलेश कांति वर्मा ने अनुवाद को वैश्विक बाजार, साहित्य, संस्कृति और इतिहास से परिचित होने का एकमात्र जरिया बताया। डॉ. नरेन्द्र कोहली ने भाषा को मूल जातीय संस्कृति व उसके स्वरूप से दूर ले जाने के उपक्रम को भाषा को विकृत करने का कार्य कहा , स्पष्ट शब्दों में कहूं तो उन्होंने संस्कृत – निष्ठ हिन्दी की आवश्यकता बताते हुए घर, बाजार, दफ्तर और विश्वविद्यालय के लिए एक ही भाषा – स्वरूप की वकालत की यानी कि हिन्दी का तत्सम रूप ही उनकी नज़र में असल हिन्दी है, वे कुछ हद तक तद्भव और देशज रूप भी स्वीकार करने को सहमत हैं , परंतु विदेशज शब्दों से एक तरह की चिढ-सी महसूस हुई उनकी सोच में।

समूचे कार्यक्रम को विविध अयामी बनाने के लिए डॉ. नरेन्द्र कोहली के वक्तव्य का संदर्भ तो बनता है किंतु भारत के जनमानस में हिन्दी का जो रूख व रूतबा है, वह दूर भागता हुआ-सा लगता है जो, मेरी समझ में, भारत की ऐतिहासिक विरासत के भी प्रतिकूल है। इस कार्यक्रम के बाद मेरे मन में कोहली जी को ले कर जो बात उठी, वह बहुत निराशाजनक थी। मैं सोचने लगा कि अच्छा होता कि मैं सिर्फ लेखक कोहली को ही जनता होता, काश ! वक्ता कोहली का व्याख्यान नहीं सुना होता । पढ कर जिस लेखक कोहली की छवि मन में थी,सुन कर वह दरक गई। दरअसल, अधिकांश विश्वविद्यालयीन अध्यापकों के साथ यह परेशानी है, वे सामने वाले हर श्रोता को अपना छात्र ही मान लेते हैं और बौद्धिक व्याख्यानों में इतने रच-बस गए होते हैं तथा इस हद तक थक गए होते हैं कि वे देख ही नहीं पाते की गांव की गलियों में, बाज़ार की दौरी-दूकानों पर, दफ्तरों के टेबुलों पर क्या कुछ जीवंत घट रहा है और वे कैसे रो – गा रहे हैं (हिन्दी के इन्हीं आयामों पर मेरा 21 पृष्ठों का शोध आलेख सरकार की आधिकारिक वेबसाइट rajbhasha.nic.in पर है, उसे देखा जा सकता है) । इस आयोजन का सबसे कमजोर और अनुपयोगी भाषण रहा था उनका वह वक्तव्य।

आयोजन की अन्य कमियों में माननीया महिला उद्घोषक की उद्घोषणाएं भी रही, केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो को उन्हें फिर किसी मंच का संचालन देने के पहले वॉयस मॉडुलेशन का प्रशिक्षण दिला देना चाहिए।

सत्येन्द्र दहिया का संचालन मधुर व मनोहारी लगा , जैसे बहुत ऊंचाई से गिरता हुआ कोई झरना जब घाटी में उतरता जाता है तो तो उसकी ध्वनि धीमी होती जाती है और हवाओं में घुलमिल गई वह ध्वनि राहगीर के कानों में फुसफुसाहट – सी लगती है, , कमाल का वॉयस मॉडुलेशन है उनकी प्रस्तुति में ! उन्हें अपनी सह – उद्घोषिका को भी कुछ टिप्स दे देनी चाहिए थी।

आयोजन का सबलतम पक्ष दृश्य – श्रव्य प्रस्तुति की पटकथा और उसका सम्पादन रहा। विनोद कुमार संदलेश द्वारा लिखित आलेख बहुत ही मौलिक चिंतन व शोध का परिणाम था, हर कथन को साकार कर देने वाले विजुअल प्रोपर्टिज और औडियो प्रस्तुति ने विषय-वस्तु को सदेह उतार देने जैसा बना दिया। भाषा , साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति आदि से संबंधित वे विजुअल प्रोपर्टिज भी अद्भुत थीं।  डॉ. श्रीनारयण सिंह का सम्पादन पूरी पटकथा को चुस्त – दुरूस्त तथा श्रोता-दर्शक के मनमिज़ाज़ को बांधे रखने के लायक बनाने में सफल रहा , वॉयस ओवर देने वाले कलाकार की भी सराहना करनी होगी कि स्वरों के आरोह – अवरोह को संयमित करते हुए उन्होंने प्रस्तुति को समग्र रूप से यादगार बना देने में अपना मूल्यवान योगदान दिया। इसीलिए सचिव झा जी ने उस प्रस्तुति को अकल्पनीय कहा तो मुख्य अतिथि प्रो. मिश्र ने भाष के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और मैं कहता हूं –

‘ अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय  !!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

 

1,737 thoughts on “अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

45 visitors online now
30 guests, 15 bots, 0 members