संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

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