मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से


जानकीवल्लभ शास्त्री और

महान  फिल्मकार पृथ्वीराज कपूर

 

बात 1975 में इमर्जेंसी लगने के ठीक एक माह पहले की है। गुरूदेव प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह की बेटी और मेरे भ्रातृवत मित्र राकेश कुमार सिंह की बहन रम्भा कुमारी की शादी मोतीहारी एसएनएस कॉलेज के प्रोफेसर राजेश्वर प्रसाद सिंह से हो रही थी। बारात 24 मई 1975 को आई थी।

गुरूदेव ने हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री को भी आमंत्रित किया था। शास्त्री जी के विश्राम आदि का प्रबंध मोतीहारी रेलवे स्टेशन के विश्रामालय के एक विशिष्ट कक्ष में किया गया था। गुरूदेव ने मुझसे कहा था – “ तुम स्वयं कवि हो, कवियों की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हो, शास्त्री जी महाकवि हैं, अति संवेदनशील व्यक्ति व रचनाकार हैं और तुम उनसे परिचित भी हो , इसीलिए उनके आतिथ्य का उत्तरदायित्व तुम्हीं सम्भाल सकते हो”,  सो, शास्त्री जी के आने से ले कर दूसरे दिन उनके विदा होने तक मैं हमेशा उनके साथ रहा।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री मुज़फ्फरपुर आरडीएस कॉलेज में प्रोफेसर तो थे ही, हिन्दी और संस्कृत के विश्वप्रसिद्ध महाकवि भी थे , कुछ साल पहले प्रसिद्ध फिल्मकार एवं कलाकार पृथ्वीराज कपूर शास्त्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर आए थे। पिछले साल मैं भी शात्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर चतुर्भुज स्थान स्थित उनके ‘निराला निकेतन’ नामक आवास पर गया था। उनके परिवार में 15 से 20 सदस्य थे, एक तो वे खुद, एक उनकी पत्नी और शेष सदस्यों में कुछ कुत्ते, कुछ बिल्लियां और कुछ नेवले थे, बस, प्रकृति और जीव – जगत का यही अनोखा दृश्य उनके परिवार में था। उस विलक्षण व्यक्तित्व के धनी शास्त्री जी का सान्निध्य पाने का और उनसे चर्चा करने, कविता की बारीकियों को समझने एवं एक महाकवि की दिनचर्या के माध्यम से उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित होने का मेरे लिए वह एक दुर्लभ अवसर था।

मैंने शास्त्री जी से बातचीत के दौरान उनकी कई कविताओं की चर्चा की, साथ ही, 1972 में मोतीहारी टाउनहॉल के मैदान में आयोजित एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मंच संचालक प्रसिद्ध कवि दिनेश भ्रमर द्वारा उन्हें काव्यपाठ के लिए आमंत्रित करते समय ‘ स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री’ कह कर आमंत्रित किए जाने की अंतर्कथा की भी चर्चा की। शास्त्री जी ने हंसते हुए बताया था –“ लोगों को लगा होगा कि दिनेश ने मेरे ऊपर व्यंग्य किया था, लेकिन वास्तव में मेरे प्रति अतिशय सम्मान प्रदर्शित करने के व्यामोह में भूलवश वह वैसा बोल गया था। दिनेश ने मुझसे तुरंत क्षमा भी मांग ली थी”।

शात्री जी ने बडे बेलौस अन्दाज में अपने बचपन और यौवन के कुछ संस्मरण भी सुनाये। उन्होंने कहा – “ जब मैं जवान था और पैसों की सख्त जरूरत थी, तब मेरे पास पैसे नहीं थे। आज, जब मैं बूढा हो रहा हूं और पैसों की कोई खास जरूरत नहीं रह गई है , तो मेरे पास पैसे हैं, इसीलिए इन पैसों की मैं खूब इज्जत करता हूं, इनकी खूब  खातिरदारी करता हूं और इनका सदुपयोग कर इन्हें खूब सम्मान देता हूं, इन पैसों से अपने परिवार का पालन –पोषण करता हूं, मेरे घर तो तुम गए हो ‘अमन’, देखा होगा तुमने ? इन पैसों से मैं अपने कुत्तों, बिल्लियों और नेवलों को खिलाता हूं ” ।

अंतिम वाक्य कहते – कहते शास्त्री जी के होठ व्यंग्य में भिंच गए थे। मैंने तुरंत बात का रूख बदलते हुए कहा कि कुछ साल पहले पृथ्वीराज कपूर साहब आप से मिलने आए थे , कुछ उनके साथ का संस्मरण सुनाएं । शास्त्री जी ने कहा – “पृथ्वीराज कपूर मेरे व्यक्तिगत मित्र रहे थे, वे एक चिंतक कलाकार थे और जितने अच्छे कलाकार थे, उससे बेहतर इंसान थे। वे मेरी एक रचना पर फिल्म बनाना चाहते थे। मैं जब भी बम्बई जाता था, उन्हीं के पास ठहरता था। उनके तीनों बेटों में से शशि ( मशहूर अभिनेता शशि कपूर) से मेरी ज्यादा बनती है, राज ( राज कपूर साहब) की दिनचर्या अलग तरह की है, शम्मी (शम्मी कपूर साहब) भी अपने में व्यस्त रहता है, शशि मुझे ज्यादा समय देता है”।

मैंने कहा कि जिस तरह द्रोणाचार्य एकलव्य के गुरू थे, वैसे ही आप मेरे काव्य गुरू हैं, मेरा निवेदन है कि आप अपने हाथों से मेरी डायरी पर कोई जीवन – मंत्र अंकित कर दें। शास्त्री जी ने लिखा दिया –

                     जीना भी एक कला है।

कितनी साधें हों पूरी ? तुम रोज बढाते जाते ,

कौन तुम्हारी बात बने ? तुम बातें बहुत बनाते !

माना, प्रथम तुम्हीं आए थे, पर इसके क्या मानी ?

उतने तो घट सिर्फ तुम्हारे, जितना नद में पानी !

 और कई प्यासे, उनका भी सूखा हुआ गला है !

                                            जीना भी एक कला है!  

शास्त्री जी द्वारा मेरी डायरी में 24 मई 1975 को अंकित उनकी वह कविता आज भी मेरे पास वैसे ही सुरक्षित है। सचमुच, वह कविता मेरा जीवन – मंत्र बन गई है। इस कविता में जीवन जीने को एक कला बताते हुए समन्व व सामंजस्य साधने का मंत्र है, जिसे मैंने अपना जीवन – दर्शन बना लिया है।

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