गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

 

गुजरात विधान सभा के लिए दो चरणों में होने वाले चुनाव (2017) का पहला चरण 09 दिसम्बर को और अंतिम चरण 14 दिसम्बर को सम्पन्न होगा, परिणाम 18 दिसम्बर को आएंगे। राज्य में पिछले 22 वर्षों से सत्तारूढ भाजपा के प्रवक्ता बता रहे हैं कि कॉंग्रेस ने अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं, जबकि उनका तुरूप का पत्ता अभी बाकी है । खबरों के अनुसार भाजपा अपना तुरूप का पत्ता इसी सप्ताह चलेगी यानी प्रधानमंत्री जी का तीन दिवसीय चुनावी दौरा होने वाला है। समाचार यह भी है कि  लम्बे समय से सत्तारूढ भाजपा  ढलान पर है, जबकि वर्षों से हाशिए पर रह रही कॉंग्रेस उत्थान पर है।

माननीय मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं तीन बार गुजरात गया हूं और 1000 किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा सडक मार्ग से की है। मेरी कार के ड्राइवर और यात्रा – मार्ग में आने वाले कस्बों, गांवों एवं शहरों के लोगों से वार्तालाप से जो भीतरी बात उभर कर आई, वह भाजपा के पक्ष में नहीं है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि भाजपा वालों ने मान लिया है कि मुख्यमंत्री रहते जिस मोदी जी ने राज्य में जीत का सिलसिला बनाए रखा, उस मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते तो कुछ और करने की जरूरत ही नहीं है, चुनावी दंगल में तो गुजराती भावनाओं को उभार कर और कॉग्रेस को वंशवादी बता कर ही फतह की जा सकती है। शायद इसीलिए भाजपा के नेता, प्रवक्ता, समर्थक और भक्त आत्मविश्वास की अति तक पहुंच गए हैं और मुग्धा नायिका की भांति व्यवहार कर रहे हैं।

इतिहास की नज़रों में गुजरात – बिहार के अंतर्संबंधों की पडताल करें तो पाएंगे कि दक्षिण अफ्रीका से लौटे मोहन दास करमचन्द गांधी का भारत भूमि पर पहला  सत्याग्रह 1917 में बिहार के चम्पारण जिले में हुआ, उस आन्दोलन का यह शताब्दी वर्ष है। चम्पारण सत्याग्रह अंग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन फैलाने में बीजमंत्र के रूप में काम आया, अंतत: कभी न सूर्यास्त देखने वाली ब्रितानिया हुकूमत चली गई, मोहन महात्मा हो गए और बापू राष्ट्रपिता ।

सन 1973 ई. के अंतिम दिनों में छात्र आन्दोलन की शुरूआत गुजरात में हुई , जिसने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का स्वरूप ले लिया, आन्दोलन सफल हुआ, मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल की सरकार चली गई, विधान सभा भंग हो गई। उस आन्दोलन की चिंगारी बिहार पहुंची , वहां छात्र आन्दोलन शुरू हुआ, नेतृत्व छात्र संघर्ष समिति से जेपी के हाथ में आ गया, केन्द्र की सरकार हिल गई, आपात्काल लगा दिया गया, वह आन्दोलन बिहार विधान सभा भंग कराने में तो सफल नहीं हुआ, किंतु पूरे देश में अपना प्रभाव फैलाने में सफल हुआ, अंतत: केन्द्र की सरकार चली गई।

सन 2015 में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ, प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार किया, डीएनए वाला उनका जुमला उल्टा पड गया और भाजपा की करारी हार हुई, पार्टी की  की वह हार अमित शाह और मोदी जी की व्यक्तिगत हार मानी गई ।

सन 2017 में आगामी एक सप्ताह में गुजरात विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार अभियान चलाया है, फिर से उनका तीन दिवसीय चुनाव प्रचार अभियान होने वाला है। बिहार विधान सभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री जी ने जैसी अनपेक्षित शब्दावली का प्रयोग किया था , उसका परिणाम दुनिया देख चुकी है। प्रधान मंत्री जी ने अब तक के चुनावी भाषणों में अपने ही गृह राज्य गुजरात में बिहार में प्रयोग में लाई गई शब्दावली से भी अधिक अनपेक्षित, तीखी, जन-भावनाओं को आहत करने वाली और प्रधानमंत्री के पद की गरिमा से मेल नहीं खाने वाली शब्दावलियों का प्रयोग किया है। उन शब्दावलियों में प्रधान मंत्री जी की और उनकी पूरी पार्टी की बौखलाहट झलक रही है, आगामी तीन दिनों की चुनावी रैलियों में अगर उन्होंने सावधानी नहीं बरती तो उनकी वह असावधानी गुजरात में भाजपाई सत्ता के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी, जिसका परिणाम 2019 के आम चुनावों में भाजपा के लिए अशुभ संकेत होगा।

बिहार विधान सभा का 2015 वाला चुनाव किसी दल या दलों के बीच नहीं लडा गया था, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह थे तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार थे। उसका परिणाम भी दुनिया देख चुकी है।

गुजरात विधान सभा का यह चुनाव भी भाजपा और कॉग्रेस के बीच नहीं है, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री और अमित शाह हैं तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और हार्दिक पटेल हैं। मोदी जी और अमित जी का चुनाव प्रचार पुराने ढर्रे पर और पुरानी शब्दावलियों व जुमलों के सहारे है, वे और उनकी टीम के लोग राहुल गांधी को पप्पू कह चुके हैं ।

राहुल जी और हार्दिक जी का चुनाव प्रचार ताज़ा तरीन तरीकों के सहारे है, राहुल जी और उनकी टीम के लोग मोदी जी को गप्पू और फेंकू कह चुके हैं। सीधे तौर पर कहें तो दो धाकडों के सामने दो नौसीखिए हैं, जिन्हें जनता की सहानुभूति मिलती दिख रही है।

इसीलिए एक टेलीविजन चैनल द्वारा प्रसारित ओपीनियन पोल में भाजपा की सरकार बनते दिखाए जाने के बावजूद मेरा मानना है कि सरकार कॉंग्रेस की बनेगी और पूरे बहुमत से बनेगी। अमित शाह और मोदी जी, दोनों के लिए यह बहुत बडा सेटबैक होने वाला लगता है।

यही कारण है कि मुझे गुजरात-बिहार के अंतर्संबंधों के बीच आसन्न चुनावी समर में इतिहास की पुनरावृत्ति की ध्वनि सुनाई पड रही है।

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