मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नज़र आती है मुझे

इंदिरापुरम , 10 मई 2015

यह सच है कि कोई आदमी अपने प्रति अपने मां – बाप के प्यार और  दुलार को पूरी तरह तब समझ पाता है जब वह स्वयं बाप बनता है और जब उसका बेटा बाप बनता है तब उसे अपने दादा की अहमियत समझ में आती है किंतु पत्नी की महत्ता उसे तब समझ में आती है जब उसकी बेटी मां बनती है।

मैं इस अनुभूत यथार्थ को अपने पुत्र कुमार पुष्पक और पौत्र अपूर्व अमन को केन्द्रबिंदु में रख कर मेरे फेसबुक वाल पर 02 मई , 2015 को किए गए अपने पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों का संदर्भ देते हुए पुख्ता करना चाहूंगा ।

वस्तुत: मेरी लेख्ननी और वक्तृता के सबसे बडे प्रशंसक मेरा बेटा तथा मेरी दोनों बेटियां – शिल्पा श्री एवं शिप्रा हैं और सबसे बडी आलोचक – समीक्षक मेरी पत्नी पुष्पा हैं । शायद इसीलिए बेटी शिल्पा श्री ने प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए सुझाव दिया कि मैं अपनी पत्नी पर भी कुछ लिखूं । उसने यह नहीं कहा कि उसकी मां पर लिखूं क्योंकि यदि वह ऐसा करती तो भाव यह होता कि वह मां के बहाने अपने लिए भी कुछ मांग रही है और मेरे बचों ने कभी भी मुझसे कुछ मांगा नहीं है , केवल अपनी जरूरतें बताई हैं। इसीलिए उसने अपनी मां पर मदर्स डे के उपलक्ष्य में खुद एक पोस्ट भेजी है । बेटी का सुझाव पढ कर मुझे लगा कि मेरी स्वर्गीया मां कुछ कह रही है। ऐसा क्यों महसूस होता है मुझे। क्या केवल मुझे ही अपनी बेटी में अपनी मां नज़र आती हैया सभी बाप अपनी बेटी में ऐसा ही अक्स देखते हैं। शायद .. !

भावुकता और संवेदनशीलता मेरी पारिवारिक विरासत हैं । यही हमारी ताकत भी है और कमजोरी भी । ताकत इसलिए कि इनसे हमारी सोच सकारात्मक बनी रहती है तथा अपने लिए प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न हो जाने पर भी हम दूसरों का भला करने की प्रकृति को छोड नहीं पाते हैं और कमजोरी इसलिए कि प्राय: लोग हमारी इसी विरासत को हथियार बना कर हमारे ही खिलाफ उसका इस्तेमाल करते हैं और हमें उसका पता ही नहीं चलता । जब तक एहसास हो तब तक वे अपना काम कर – करा चुके होते हैं। फिर भी मैं , मेरी पत्नी , मेरा बेटा, मेरी बेटियां ; हम सभी अपनी विरासत को अपना सौभाग्य मानते हैं और दुआ करते हैं कि हममें ये भावनाएं मरते दम तकबनीं रहें ।

मुझे स्वाभाविक संस्कार के रूप में यह विरासत अपनी मां , अपने पिता जी और दादा जी से मिली । मेरे दादा जी का 31 अक्टूबर,1971 को प्रात: 8.30 बजे, मां का 26 अप्रैल       ( 25 अप्रैल की रात में ) 1983 को पूर्वाह्न 2.00 बजे और पिता जी का 11 मार्च ( 10 मार्च की रात में ) 1984 को पूर्वाह्न 2.00 बजे स्वर्गवास हो चुका था । मेरी शादी 06 मार्च 1979 को हुई थी । इसप्रकार मेरी पत्नी और बेटे ने मेरे दादा जी को नहीं देखा और मेरी दोनों बेटियां मेरे मां – बाप को भी नहीं देख पाईं। दादा जी, मां और पिता जी की यादें अगली कडी में , फिलहाल पत्नी पुष्पा और पुत्री शिल्पा श्री से बातचीत करना चाहूंगा क्योंकि मेरी मां के बाद इन दो माओं ने मुझे मां का सही मायने समझाने में बडी भूमिका निभाई है।

हमारी शादी 90 प्रतिशत अरेंज्ड थी । 10 प्रतिशत कम इसलिए कि मैं अपने होने वाले श्वसुर श्री वासुदेव प्रसाद के मोतीहारी स्थित घर अपने एक निकट संबंधी के साथ 1972 से ही जाया करता था । उन दिनों मैं उसी शहर में स्थित एम एस कॉलेज से बीए ऑनर्स कर रहा था । 06 दिसम्बर 1973 को बी ए ऑनर्स कर लेने के बाद 19 दिसम्बर 1973 से 24 जून 1974 तक हाई स्कूल में शिक्षक, फिर 21 मार्च 1977 से ग्रामीण बैंक में क्लर्की , बीच की अवधि जय प्रकाश आन्दोलन के नाम और उस पूरे काल-खंड में बिना किसी पूर्वग्रह के ससुर बाडी आना – जाना बदस्तूर जारी ।

1978 में जब हमारी शादी की बात श्वसुर जी ने मेरे पिता जी से चलाई और मेरे पिता जी ने उस बाबत मेरी राय पूछी तो मैं ने सकारात्मक रूख अपनाते हुए अंतिम निर्णय उन पर छोड दिया , उसके पहले मैंने पुष्पा से भी उस विषय पर उसकी सहमति जान ली थी ; इसीलिए 90% अरेंज्ड मैरिज थी हमारी; हालांकि लोगों ने उस सीधी – सादी बात को उलट दिया और 10% ही अरेंज्ड तथा 90% प्रेम विवाह के रूप में प्रचारित किया। चूंकि उससे हमें कोई फर्क नहीं पडता था इसीलिए उस प्रचार का हमने कोई प्रतिवाद भी नहीं किया। तब पुष्पा दसवीं क्लास में पढ रही थीं और उसकी उम्र बहुत ही कम थी ।

वस्तुत: ग्रामीण बैंक में मुझे मिल रहे वेतन से दुगने वेतन पर न्यु बैंक ऑफ इंडिया में मेरे चयन की सूचना आस-पास के लोगों को मिल गई थी। उसके बाद दो धनाढ्य व्यक्तियों ने अपनी –अपनी बेटी की शादी मुझसे कराने के लिए मेरे करीबी लोगों के माध्यम से बात चलाई किंतु चूंकि वे दोनों सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति में हमारे परिवार के समकक्ष होने के बावजूदआर्थिक स्थिति में आगे थे और मैं अपनी पारिवारिक स्थिति में किसी प्रकार का असंतुलन नहीं आने देना चाहता था , इसीलिए मैं ने उन दोनों को ना कहलवा दी थी । बस , 90% से घटा कर 10% अरेंज्ड मैरिज और 10% से बढा कर 90% लव मैरिज कर देने के पीछे यही कारण बताया जाने लगा। क्योंकि उस दरम्यान भी पहले की तरह ही ससुर जी के घर मेरा आना – जाना जारी रहा था । बहरहाल , 06 मार्च 1979 को हमारी शादी हो गई ।

मेरा गांव कथा – कहानियों के गांव की तरह कोई रूमानी गांव नहीं था, बल्कि खांटी गांव था जहां न बिजली थी, न रोड और न ही रेल्वे लाईन । यातायात का कोई भी सार्वजनिक साधन 20 – 25 किलोमीटर पैदल या बैलगाडी अथवा सायकल से चलने के बाद ही उपलब्ध होता । शादी – व्याह जैसे खास मौकों के लिए दूर – दराज के एक – दो गांवों में भाडे पर जीप मिल जाती थी । गांव में तीन ही घरों में ग्रेजुएट थे जिनमें एक घर मेरा था और जिला मुख्यालय जैसे शहर से मेरे गांव व्याह कर आने वाली दसवीं तक पढी गांव की पहली बहू मेरी पत्नी पुष्पा ही थी। बारात 06 मार्च दिन मंगलवार को गई थी, शादी भी उसी दिन हुई , बाराती लोग 07 मार्च को शाम में विदा हो गए किंतु दिन बुधवार होने तथा मोतीहारी से उत्तर दिशा में मेरा गांव होने के कारण उस दिन दुल्हन की विदाई नहीं हुई, 08 मार्च की सुबह विदाई हुई।

08 मार्च को मेरी सुहाग रात थी । तब मेरेगांव में माता – पिता , भाई – बहनों , सगे – संबंधियों कीमौजूदगी में पत्नी के कमरे में प्रवेश करना हिम्मत के साथ – साथ कला एवंविज्ञान का विषय था। हालांकि ये तीनों तत्व मुझमें मौजूद थे और अपनी कोई भाभी नहोते हुए भी मेरी बहनों ने अपने तईं पूरा इंतजाम कर रखा था फिर भी रात गहराने काइंतजार करने के लिए मैं घर से 100 मीटर दूर बैठके में जा कर आराम कर नेलगा । पूजा – मटकोड से बारात – शादी तक चारदिनों की थकान के कारण मुझे नींद आ गई , जब नींद खुली तो रात के ग्यारह बज गए थे। मार्च के महीने में गांव में रात के ग्यारह बजने का मतलब पूरी नि:शब्द निशा। घरपहुंचा तो कुछ लोग सो गए थे , कुछ सोने का उपक्रम कर रहे थे तो कुछसोने का बहाना कर रहे थे ताकि मुझे संकोच न हो और पुष्पा चौकी पर लगाए गए बिस्तरपर सिकुडी – सी बैठी मेरा इंतजार कर रही थी ।

हमारी सुहागरात रोमांटिक बातों और खयाली पकवानों की सुगंध में सराबोर होने के बदले पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं खुरदुरी हकीकतों की चर्चा करते हुए गुजरी ।पारिवारिक परिवेश में बरती जाने वाली कुछ सावधानियों की चर्चा करते हुए हम एक – दूसरे की बाहों का तकिया लगा कर सो गए। सुबह जब नींद खुली तो बगल में पुष्पा नहीं थी, खिडकी से झांककर देखा तो वह मेरी मां, बुआ और बडी बहन आदि के पांव छू कर प्रात: नमस्कार कर रही थी। मैं ने बैंक से लम्बी छूटी स्वीकृत करा ली थी , बडे आनन्द और प्यार भरे माहौल में दिन गुजर रहे थे । एक दिन पुष्पा ने बडे सहज अंदाज में गांव देखने की इच्छा जताई । मैं ने मां और बाबू जी से पूछा तो उन्होंने बडे सरल और स्वाभाविक तरीके से अनुमति दे दी । हालांकि वह प्रस्ताव गांव के परम्परागत रीतिरिवाज के खिलाफ था ।

आधी रात में पुष्पा को ले कर मैं घर से निकला और गांव की हर गली , हर घर के बारे में बताते चला । सुबह मां बता रही थी कि कुछ महिलाओं ने मां से और कुछ पुरूषों नेबाबूजी से बताया था कि उन्हों ने बबुआ ( घर और गांव के मेरे बडे – बुजूर्ग मुझे बबुआ कहते थे , मेरा नाम लेकर नहीं बुलाते थे) और दुलहिन को रात में गांव में घूमते हुए देखा था। शायद वे लोग रात में लघुशंका आदि क्रिया के लिए घर से सडक पर निकले होंगे तभी हमें देखा होगा । उनमें से एक – दो लोगों ने शिकायती लहजे में , बाकी सभी लोगों ने प्रशंसा के लहजे मेंयह बात मेरे माता – पिता तक पहुंचाई क्योंकि कॉलेज और नौकरी के दिनों में भी , जब भी छुटियों में मैं घर जाता तो लूंगीऔर हवाई चप्पल पहन कर पूरा गांव घूमता तथा अपने से बडों को प्रणाम करता एवं छोटों का समाचार पूछता । इस पूरे क्रम में मेरा छोटा भाई नवल किशोर या रामाशीष मेरे साथ होता । मेरे भाई मुझे फीड बैक देते कि गांव के लोग मेरे उस व्यवहार से बहुत खुश होते हैं और दादा जी तथा माई – बाबू जी से मिले संस्कार की प्रशंसा करते हैं।

पुष्पा अपने साथ रीबन के गोले , हेअर क्लिप्स , बिंदिया ,विभिन्न साईज की कांच की चूडियां , जनानी कंघी , आंवला तेल की शीशियां आदि लेती आई थी । शायद उसकी मां ने गांव की तहजीब और दुल्हन की रवायतेंअच्छी तरह समझा – बुझा कर वे सारी सामग्री उसके बक्से मेंरखवा दी थी। घर –परिवार , आस – पडोस की जो भीमहिलाएं मेरे घर आतीं, पुष्पा उन सबको आदर के साथ बैठाती , उनके बालों में कंघी कर आंवला का खुश्बुदार तेल लगाती, क्लिप या रीबन लगा देती तथा उनकी कलाइयों में चूडियां पहना कर माथे पर बिंदी लगा देती । उन सारी सामग्रियों की कोई ज्यादा कीमत नहीं थी किंतु मेरी पत्नी के व्यवहार और उन सामग्रियों के माध्यम से उसके द्वारा दिखाए गए अपनापन से सभी महिलाएं अभिभूत हो जातीं। कुछ ही दिनों में आंवला के तेल की खुश्बु से ज्यादा पुष्पा के व्यवहार की खुश्बु पूरे गांव के साथ – साथ आस – पास के गांवों एवं सगे – संबंधियों में भी फैल गई ।

यह घटना गांव के लिए अभूतपूर्व, आश्चर्यजनक और आह्लादकारी थी । हर तरफ चर्चा होने लगी कि पन्नलाल जी ( मेरे पिता जी ) की बहू शहर में पली – बढी है और बहुत पढी – लिखी ( तब मेरे गांव में लडकियों का दसवीं तक पढना बहुत पढा – लिखा होना माना जाता था ) है फिर भी सबका कितना लिहाज और आदर करती है ! सचमुच बबुआ ( मैं ) अपने पूर्वजों के संस्कार के अनुकूल दुल्हन लाए हैं । यहां भी 90% अरेंज्ड मैरिज को 10% ही माना गया किंतु सबके मन में प्रशंसाऔर आदर के भाव थे । मेरे माता – पिता और सभी सगे – संबंधी गदगद थे। पुष्पा तीन महीनों तक गांव में रही । इस दरम्यान उसने गांव – घर की कमियोंऔर खूबियों को भली भांति समझ लिया जो आगे चल कर हमारे लिए बहुत ही कारगर और सहायक सिद्ध हुईं ।

जीवन में कई ऐसे पडाव आते हैं जहां आदमी छोटी – छोटी बातों की उपेक्षा कर हर एक मोर्चे पर अपने लिए बडी – बडी चुनौतियां पैदा कर लेता है किंतु आदमी यदि सहज और सकारात्मक सोच वाला हो तो अपने सरल और स्वाभाविक व्यवहार से उन चुनौतियों को अवसर में बदल देता है । हमें लगता है कि हम पति – पत्नी ने आपसी सूझ –बूझ और अपनीसंस्कारगत अच्छाइयों से अपने जीवन में आई अनेक चुनौतियों को अवसर में बदला है। इसपर विस्तार से हम फिर कभी अगली कडियों में चर्चा करेंगे। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस पर देश – दुनिया की तमाम माओं को नमन और हार्दिकबधाइयां।

अमन श्रीलाल प्रसाद
इंदिरापुरम ; 10 मई, 2015
मो. 9310249821

email : shreelal_prasad@rediffmail.com

 

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