ममता और संवेदना ही ईश्वर है ?

तब मैं पांच – छह साल का रहा होगा ।

मेरे गांव सिसवनियासे उत्तर दिशा में   दो कि.मी. पर एक गांव है जहां सप्ताह में दो दिन बाजार लगता है। आस-पास के 15 – 20 गांवों के बीच वह इकलौता बाजार है। उस गांव का नाम है नरकटियाबाजार । अब वह विधान सभा कंस्टीच्युएंसी भी हो गया है तथा वहां सडक और बिजली भी आगई है । वह गांव धनाढ्यों का है और  मेरागांव पढे – लिखों का । उन दिनों एक कहावत प्रचलित थी कि लक्ष्मी का वास नरकटियामें है तो सरस्वती सिसवनिया में निवास करती हैं। उसी गांव में इलाके के सबसे बडेधनी व्यक्ति थे (स्व) बंतीलाल प्रसाद जो मेरे पिता जी के मामा थे । उन्होंने ही उसइलाके का पहला हाई स्कूल स्थापित किया। वहीं से मैं ने मट्रिक पास किया।

मेरे गांव से दक्षिणदिशा में पांच कि.मी. पर नदी के किनारे मात्र 10– 15 घरों का एक गांव है पकडिया।वहां भी एक धनी व्यक्ति थे जिनका नाम था (स्व) शिवशंकर महतो । उनके पास एकविशालकाय हथिनी थी, उसी पर चढ कर मेरे गांव से होते हुए वे कभी – कभार नरकटियाबाजर जाया करते । वे जब भी हमारे गांव से हथिनी पर बैठ कर गुजरते, बच्चे पीछे-पीछेदौड लगाते । कभी – कभी मैं भी उन बच्चों में शामिल हो जाता। वह हथिनी कभी भीआक्रामक नहीं होती , इसीलिए बच्चे बडी ढिठाई से उसके करीब चले जाते और कुछ बच्चेतो उसकी पूंछ पकड कर खींच भी देते , लेकिन हथिनी बच्चों को डराने के किए भी कभीपीछे नहीं मुडी ।

बहुत दिनों बाद महतोजी हथिनी पर बैठ कर मेरे गांव  से गुजर रहेथे। हथिनी के पेछे-पीछे उसका एक बच्चा भी चल रह था जिसे कुछ ही दिनों पहले उसनेजना था। बच्चों का हुजूम वैसे ही चल रहा था । इस बार कौतुहल और आकर्षण का विषयहथिनी का वह बच्चा था । मां के पीछे चलते हुए शिशु हाथी को जिसने देखा हो, वही उसनैसर्गिक दृश्य और नयन सुख की कल्पना कर सकता है। वह दृश्य वैसा ही मनोहारी था जैसा बाद के दिनों में मैं ने धार्मिक फिल्मों में बालक गणेश जी को पैरों मेंपैजनी पहने छोटी-सी सूढ लपलपाते दौड लगाते और माता पार्वती द्वारा प्यार=दुलारलुटाये जाते देखा ।

इस बार बच्चे हथिनीकी पूंछ पकडने के बदले उसके बच्चे की पूंछ पकड रहे थे । बच्चे जब भी ऐसा करते ,हथिनी पीछे मुड कर बच्चों को डराती। हलांकि हथिनी ने कभी भी हम बच्चों को डराने कीकोशिश तक नहीं की थी , उसका वह बदला हुआ व्यवहार देखकर हम बच्चों को सतर्क हो जानाचाहिए था किंतु, चूंकि बहुत दिनों से हथिनी की पूंछ पकडते-पकडते बच्चे ढीठ हो गएथे और वे जानते – समझते थे कि पालतु हथिनी है, कुछ नहीं करेगी, इसीलिए वे निडर थे ।

अचानक मेरा एक साथी, जो हम सब में बडा था और कुछ ज्यादा ही ढीठ और शरारती था , छलांग लगा कर हथिनी केबच्चे की पीठ परजा बैठा । हथिनी का छोटा-सा वह शावक भार नहीं सह सका और रिरियाता (चिग्घाडता)  हुआ बैठ गया । बस क्या था, कोहराममच गया । हथिनी क्रोधित हो गई, पीछे मुडी, पूंछ उठाए, सूंढ लपलपाते , कान फडफडाते ,चिग्घाडते हुए बच्चों  के पीछे दौड पडी ।बच्चे बदहवास हो भागने लगे, महावत भी घबडा गया , हथिनी के मालिक महतो जी भी घबडागए , चारों तरफ चीलपों मच गई। उस भगदड में मैं गिर पडा , सभी देखने वालों को लगाकि हथिनी मुझे अपने पैरों तले कुचल देगी, मगर यह क्या, हथिनी तो दौडते हुए मुझे दरकिनार कर आगे निकल गई। उसने मुझे छुआ तक नहीं।  वह उस लडके को खदेड रही थी जो उसके बच्चे की पीठपर बैठा था और जिसके चलते उसका बच्चा रोया   ( चिग्घाडा ) था। इस बीच महावत हथिनी को वश में करने के लिए अंकुश से वारपे वार करता रहा ।

क्रोधित हथिनी अपनेबच्चे के अपराधी उस शरारती लडके के पास पहुंच ही गई, वह लडका बदहवासी में गिर करबेहोश हो गया । हथिनी रूक गई , सूढ ऊपर कर जोर से चिग्घाडी और उस लडके को कुछ किएबगैर पीछे मुड कर अपने रास्ते चलती बनी। लोग जय गणेश – जय गणेश का गुहार लगाते हुएहथिनी के बच्चे को गणेश का अवतार बताने लगे । लोग चर्चा कर रहे थे कि अंकुश सेघायल   हथिनी के मस्तक से खून रिस रहा थाऔर आंखों में आंसू झलमला रहे थे । लोग कह रहे थे कि  हथिनी का व्यवहार देख कर ऐसा लगा जैसे किसीशरारती बच्चे की हरकत से तंग कोई बुजूर्ग आदमी उसे पकड कर और उसका कान उमेठ कर यहकहते हुए छोड दे कि जा , तुझे माफ किया , फिर ऐसी शरारत मत करना ।

आज उस घटना के लगभग 55वर्ष हो गए। आज भी उसे याद करते हुए मैं सिहर जाता हूं और उस हथिनी की ममता एवंसंवेदनशीलता के प्रति नतमस्तक हो जाता हूं । इन पंक्तियों को लिखते हुए भी मेरीआंखें न जाने कितनी बार नम हुईं। तो क्या सचमुच हथिनी का वह बच्चा गणेश का अवतारथा ? पता नहीं, यह मेरा विषय नहीं है और न ही इस संबंध में मेरी कोई जानकारी यासमझदारी  है। मैं तो यही महसूसता रहा हूंकि मां की ममता और सच्चे मन की संवेदनशीलता ही ईश्वर है और मेरी यह समझ उस घटना सेविकसित हो कर कदम – कदम पर पुख्ता होती रही है।

16 मई को मेरा पौत्र (पोता) अपूर्व अमन पांच माह का हो गया और 18 मई को मेरा दौहित्र (नाती / नवासा ) कुमारश्रेष्ठ सात माह का हो जाएगा । इसी अवसर पर अनायास उभर आई उन यादों के साथदादा-दादी और नाना-नानी की ओर से उन दोनों को अशेष आशीष !

अमन श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम,17 मई 2015

 

2,358 thoughts on “ममता और संवेदना ही ईश्वर है ?

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