जब पंख लगे परिन्दे को ..

इंदिरापुरम, 22 मई 2015
तब मेरे गांव में स्कूल नहीं था।

  गांव के उत्तरी छोर पर एक कमरे की झोपडी में मदरसा चलता था जिसमें शेख हिफाज़त पढाया करते, मैं उसमें जाने लगा । सो घरसे बाहर पाठशाला में मेरा पहला अक्षर – ज्ञान उर्दू वर्णमाला  से हुआ । हालांकि छात्रों की कमी से वह मदरसा नहींचल पाया और मेरे पिता जी ने ही  मुझेहिंदी, उर्दू, कैथी  और अंग्रेजी की वर्णमाला सिखाई , इतनाही नहीं, संस्कृत, नेपाली और बांग्ला भाषा से भी उन्होंने हीमेरा प्रथम परिचय कराया । उसके बादव गांव से दो कि.मी. दूर नरकटिया गांव में स्थितसरकारी लोअर स्कूल में पढने जाने लगा । यह दिलचस्प है कि मेरे पिता जी भी नरकटियामें अपने मामा के घर रह कर उसी लोअर और अपर स्कूल में पढे थे, पिता जी के समय में वहां मिडल स्कूल नहीं था, इसीलिए पांचवीं पास करने के बाद आगे की पढाई उन्होंने जिला मुख्यालय मोतीहारी से की थी। मेरे समय में मिडल स्कूल खुल गया था और सातवीं पासकरने के वक्त तक आठवीं से ग्यारहवीं तक का हाई स्कूल भी उसी नरकटिया गांव में खुलगया, वह स्कूल मेरे पिता जी के मामा (स्व) बंतीलाल प्रसाद  ने खोला, आगे चल कर उसी हाई स्कूल में मैं शिक्षक भी हुआ था ।

दूसरी और तीसरी की कक्षाएं एक हीकमरे में लगतीं थीं और एक ही शिक्षक पढाया करते थे-रामायोध्या प्रसाद सिंह । उसीतरह चौथी और पांचवीं की कक्षाएं भी एक ही कमरे में लगती थीं किंतु शिक्षक दोनों कक्षाओं के लिए अलग – अलग थे, चौथीके लिए (स्व) वशिष्ठ नारायण सिंह जो सेकंड मास्टर कहलाते थे और  पांचवीं के लिए (स्व) पारसनाथ मिश्र जो हेडमास्टर कहलाते थे। (स्व) पारसनाथ मिश्र ने मेरे पिता जी को भी पढाया था । सभीछात्र-छात्राएं बैठने के लिए अपने-अपने घर से बोरा/चट्टी ले कर जाते, जो नहीं लेकरआते , वे किसी और की मर्जी से उसके बोरा में शेयर करते , और यदि कोई अपना बोराशेयर करने देने को तैयार न होता तो जमीन पर ही बैठते। यद्यपि दूसरी और तीसरी कक्षाओं के छात्रों के बैठने के लिए एक ही कमरे में सीमा रेखा निर्धारित कर दी गईथी किंतु बैठने की सुविधा के नुसार दोनों कक्षाओं के छात्र-छात्राएं मिलजुल करबैठते । अपर स्कूल में ईंटों को मिट्टी के गिलावे से जोड कर चबूतरे बना दिए गए थे, उन्हीं चबूतरों पर काठ की पटरियां रखी होतीं , बच्चे उन्हीं पटरियों पर बैठते।जब तक मैं उन कक्षाओं में पहुंचा , चबूतरे ढह गए थे, पटरियां जमीन पर रखी जातीं, बच्चे उन्हीं पर बैठते।

 

तो बात लोअर स्कूल में मेरे प्रवेशकी हो रही थी।  मेरे घर के ठीक सामने जगन्नाथकाका (चाचा) का घर था। उनका इकलौता बेटा था ध्रुव प्रसाद।  हम दोनों के परिवार में बहुत ही अपनापनभरा संबंधथा । ध्रुव भाई की फुआ (पिता जी की बहन यानी बुआ ) नरकटिया गांव में बसती थीं , वेवहीं रहकर दूसरी कक्षा में पढने जाते । वे बैठने के लिए अपने साथ बोरा लेकर आते थे। वे उम्र में मुझसे तीन-चार साल बडे थे किंतु पढाई में बिलकुल साधारण थे, हमदोनों एक ही कक्षा में एक ही बोरा पर बैठते । कक्षा में सभी बच्चे उम्र में मुझसेबडे ही थे। ध्रुव भाई का अपना कोई भाई नहीं था, वे मुझे बहुत ही प्यार करते, मुझसेयदि कोई झगडा करता तो वे उसे मार बैठते । स्कूल का माहौल मुझे अच्छा नहीं लगता था, बीच-बीच में मैं स्कूल जाना बन्द कर देता । कुछ दिनों बाद ध्रुव भाई अपनी बुआ काघर छोड कर अपने घर आ गए और वहीं से मेरे  साथ – साथ स्कूल जाने लगे । दो पहर टिफिन के लिएमां आनन्दी चावल का भूंजा और मिर्चा का आंचार देती। आनन्दी धान का चावल भुनने पर दानेछोटे-छोटे फूल की तरह वैसे ही फुल जाते हैं जैसे मक्का
( पॉपकॉर्न) के दाने फुलेहोते हैं ।

मेरे गांव और स्कूल के बीच में एकछोटी-सी नदी थी , नदी क्या थी , सरेही सोता था जिसे सरोह कहा जाता था , शायद सरोवरका देसी शब्द ही सरोह था । उस नदी की कुल लम्बाई मात्र पांच कि.मी. थी जो नरकटियाके उत्तर वाले गांव बैकुंठवा के सरेह से उत्पन्न हो कर नरकटिया के दक्षिण मेरेगांव सिसवनिया के सरेह में समाप्त हो जाती। नरकटिया के आस-पास वह नदी काफी चौडी औरगहरी थी किंतु मेरे गांव की ओर आते-आते उथली और संकरी होती चली गई थी । मेरे गांवसे स्कूल जाने के लिए तीन रास्ते थे जिनमें से जो दो करीब के रास्ते थे, उनसे होकर जाने के लिए हम बच्चे अपनी पैंट खोल कर बस्ते के साथ माथे पर रख लेते और नंगेही नदी पार कर जाते । दूसरा रास्ता अधिक लम्बा था ।  मेरे गांव की लडकियां पढ नहीं सकीं, उसका एकबडा कारण वह रास्ता भी था ।

ध्रुव भाई और मैं साथ-साथ स्कूल जाते- आते। कभी – कभार स्कूल जाने के लिए हम घर से निकलते और स्कूल न जा कर नदी किनारेफुलवारी में ही खेल कर पूरा दिन गुजार देते और घर उसी समय लौटते जब गांव के अन्यबच्चे स्कूल से लौट रहे होते । ऐसा प्राय: तब होता जब मास्टर साहब होमवर्क के रूपमें  कोई लम्बा पाठ रटने के लिए दे देते। कक्षाओंमें पढाई नाम मात्र की होती, ज्यादातर होमवर्क ही मिलते। इसीलिए बच्चे या तो स्कूलके पीछे कनईल के पेड पर धमाचौकडी करते रहते या गोली-गोली अथवा गुली-डंडा खेलनेनिकल जाते। कक्षा में भी हम कोई न कोई खेल, खेल ही लेते थे। लेकिन पाठ याद नहींहोने पर कनईठी-चमेटा और छडी की मार भी लगती ।

एक दिन मैं और महादेव ठाकुर चुर्की–चुर्कीखेले जिसमें महादेव ठाकुर ने घपला कर मुझे हरा दिया । उस खेल में हारने वाला जमीनपर अपनी हथेली रखता है और जीतने वाला अपनी चुर्की (माथे का बाल) छू कर हारने  वाले की ह्थेली पर मुक्का मारता है और हारनेवाला जब तक उसके वार से अपनी हथेली को बचा नहीं लेता , तब तक उसे मार झेलनी पडती है। दरअसल उस खेल में मारना भी एक खेल ही है जिसमें नाम मात्र की चोट लगती है किंतुमहादेव ठाकुर जानबूझ कर जोर – जोर से मार रहा था , जिसे देख कर सभी बच्चे दंग थे।दरअसल  उसने टिफिन के समय मुझसे मिर्चा काआंचार मांगा था और मैं ने उसे नहीं दिया था।वह उसी का बदला इस खेल के बहाने ले रहाथा।  हकीकत यह थी कि मैं ने आंचार दांत सेकाट कर खा लिया था इसीलिए जूठा आंचार उसे नहीं दिया था, हालांकि यह बात मैं उसेबता नहीं सका था। ध्रुव भाई से यह देखा नहीं गया , उन्होंने मेरी हथेली हटा कर अपनीहथेली आगे कर दी और मेरे हिस्से की मार खुद सहते हुए किसी तरह महादेव ठाकुर का एकवार बचा लेने में  वह सफल हो गए, बस खेलखत्म , दोनों भाई बस्ता उठाए और घर की ओर चल दिए। उस खेल में हम  दोनों भाई बारी-बारीसे चुपचाप वैसे ही मार खाते रहे जैसे अनैतिकता से हराए गए पाण्डव नैतिकता के आधारपर खामोशी के साथ सब कुछ झेलते रहे ।

ध्रुव भाई इकलौते बेटे थे, उनके पिताजी भी पढे-लिखे नहीं थे , पढने में ध्रुव भाई की रुचि भी नहीं थी, इसीलिए वे पढजहीं पाए । मैं सातवीं में चला गया, तब तक वे चौथी कक्षा में ही पहुंच पाए थेकिंतु साथ आना-जाना वैसे ही बना रहा। हम दोनों फुटबॉल अच्छा खेलते थे , दोनोंहमेशा एक ही टीम में होते , वे रफटफ थे, सेण्टर फॉर्वार्ड खेलते, मैं दोनों पांवोंका इस्तेमाल समान रूप में करता था किंतु दौडता कम था , इसीलिए कॉर्नर खेलता। मुझे कभी किसी बात के लिएअफसोस नहीं हुआ लेकिन टेलीविजन के आगमन के बाद राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाडियोंको खेलते देखता तो सोचता कि मैं ने फुटबॉल को अपना करियर क्यों नहीं बनाया,यदिबनाया होता तो उन नामी खिलाडियों से बेहतर खेला होता।

फिल्में देखना तो मैंने हाई स्कूलपास करने के बाद शुरू किया , लेकिन अपर , मिडल स्कूल में पढते हुए ही अपने गांवमें कुछ ऐसी घटनाएं घटते हुए देखीं , जैसी बाद में फिल्मों में देखने को मिलीं।गांव में मोतिहारी के बाबूजान खां की जमीन थी, पहले वे साल में एक- दो बार आते औरहुंडा-बटाई में  दिए गए खेतों की फसल लदवाकर ले जाते , कुछ दिनों बाद वे मेरे गांव में स्थायी रूप से रह कर अपने खेतों कीदेख-भाल करने लगे और गांव के लोगों को कानूनी दांव-पेच सिखाने लगे । नतीज़ा हुआ कि  अब गांव के लोग छोटी-छोटी बातों पर आपस में तकरार करने लगे, कोर्ट-कचहरी दौडनेलगे यहां तक कि जमीन के छोटे-से टुकडे के लिए दखल- दहानी ( तारीख और जगह निर्धारितकर मारपीट) करने लगे । बडा अजीब दृश्य होता था , मारपीट करने वाले दोनों पक्षसाथ-साथ जाते और गांव के बाहर निर्धारित स्थल पर पहुंच कर अलग हो कर लाठी, भाले,गंडासे, बर्छी से जोरदार मारपीट करते और बुरी तरह लहूलुहान हो कर भी साथ-साथ गांवलौटते, जाने-आने के दौरान कोई भी पक्ष एक-दूसरे को कुछ भी हानि नहीं पहुंचाता ।कोर्ट-कचहरी भी साथ-साथ  जाते-आते,एक-दूसरे को खैनी खिलाते-खाते । उनके साथ एक तीसरा पक्ष भी होता जो किसी प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष लालच से या कोई बदला अथवा एहसान चुकाने के लिए कभी इस पक्ष तो कभी उसपक्ष के साथ हो जाता। गांवों के धार्मिक, साम्प्रदायिक और सांस्कृतिक सद्भाव एवंमेलजोल के बीच उस माहौल को भी देखते हुए हम बडे हो रहे थे। हर बात हमारे लिएरोमांच पैदा करती थी।
कुछ दिनों बाद दो पक्षों में भयंकरमारपीट हुई, कुछ लोगों के सिर फुटे, कुछ के पांव टूटे, कुछ के हाथ कटे और फिरकेस-मुकदमे भी शुरू हो गए। हमारी मित्र-मंडली में छह-सात बच्चे थे। हमलोग   साथखेलते और यदि कभी कोई विवाद भी होता तो उसे खुद ही तुरंत सुलझा लेते। हमलोग अपने-अपनेघरों के आज्ञाकारी पुत्र थे। हम बडों की बातें मानते भी और उनका अनुसरण भी करते थे। ऊपर्युक्त भयंकर मारपीट के बाद हमारी मित्र-मंडली ने गांव के बाहर एक आपात बैठककी और इस विषय पर गर्मागहम बहस हुई कि हम सभी निकम्मे हैं, कुछ नहीं करते। उसनिकम्मेपन का दाग धोने के लिए तय किया गया कि हमलोग भी भयंकर मारपीट करेंगे। उसकेलिए गांव से बाहर एक निर्जन स्थान को चुना गया और  एक दिन मुकरर कर दिया  गया ।

हम मारपीट की तैयारियां जोरशोर सेकरने लगे जैसे कोई त्योहार आने वाला हो। इस बीच हमने अपने – अपने साईज के हिसाब सेबांस की टहनियों से लाठियां बनाईं और निश्चित दिन को निश्चित जगह पर पहुंच गए। अबहमारे लिए गंभीर चिंतन का विषय यह था कि मारपीट का विषय क्या हो। हमने जमीन परचौकोर रेखाएं खींच कर उसे दो हिस्सों में बांट दिया, फिर सिर पर गमछा की पगडी बांधकर अपने –अपने हिस्से को आगे बढाने के लिए झगडने लगे। देखते ही देखते लाठियां बरसनेलगीं। चूंकि लाठियां बांस की नहीं, बांस की पतली टहनियों की थीं, इसलिए किसी कोगंभीर घाव तो नहीं लगे किंतु सबको चोटें काफी आईं। ध्रुव भाई , हरिहर भाई , भीखमभाई, सहदेव भाई के सिर से तो खून टपक रहा था। लेकिन उस वक्त हमारी चिंता का विषयमाथे से बहता हुआ खून नहीं था बल्कि यह भय था कि घरवालों से उसे छुपाया कैसे जाए। मैंनेमारपीट  के दौरान यह अच्छी तरह महसूस कियाथा कि मेरे ऊपर कोई भी जोरदार लाठी नहीं चला रहा था , शायद उम्र में सबसे छोटेहोने और पढाई-लिखाई में सबसे तेज होने के चलते मैं सबका दुलारा था, इसीलिए मुझेनाममात्र की चोट लगी थी जिसका कोई भी सबूत मेरे बदन पर नहीं था ।

घर पहुंचा तो पिता जी ने सामान्यतरीके से पूछा कि इतनी धूप में कहां गए थे ? मैंने भी बेहद सामान्य तरीके से कहाकि कुछ नहीं, मैं अपने साथियों के साथ चांती ( गांव के बाहर का वह सरेह  जहां हमारा मारपीट कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था)में चला गया था मारपीट करने के लिए । एक रणनीति के तहत मैंने “मारपीट” शब्द धीरेसे कहा था, रणनीति यह थी कि मैं झूठ भी न बोलूं और भेद भी न खुले,  किंतु पिता जी ने उसे सुन लिया था। वे व्यग्रतासे मेरे पूरे बदन का निरीक्षण करने लगे, कोई घाव न देख कर कुछ निश्चिंत-से हुए फिर पूछने लगे, क्या हुआ था, कैसेहुआ और    कौन – कौन थे । मैंने पूरी कहानीशुरू से अंत तक बता दी। पिता जी गंभीर चिंता में पड गए। उन्होंने सामने के घर सेध्रुव भाई और उनके पिता जी को बुलवाया , ध्रुव भाई के माथे में चोट और खून बहने केनिशान थे ,  ध्रुव भाई ने अपने घर वालों कोबताया था कि नहर के पुल पर गिर जाने के कारण वह चोट आई थी। ध्रुव भाई भेद खुलताहुआ देख कर दुखी हो गए , लेकिन मुझसे नाराज नहीं, शायद वे यह जानते – समझते थे किमेरे पिता जी जब मुझसे पूछेंगे तो मैं सच बता ही दूंगा। पिताजी ने गांव के चौकीदारको बुलवा कर पंचायत बैठाने के लिए हांक लगाने को कहा ।

उन दिनों किसी महत्वपूर्ण विषय परगांव की सहमति बनाने के लिए पंचायत बुलाई जाती थी और उसके लिए चौकीदार शाम को गांवके चौक-चौराहों पर खडे हो कर जोरदार आवाज में हांक लगाते थे। पंचायत बैठाई गई,उसमें सभी लडकों और उनके गार्जियनों के साथ-साथ भयंकर मारपीट करने वाले पक्षों कोभी बुलाया गया और लडकों की चोट को दिखाया गया । पंचों ने कहा  कि गांव के बच्चे बडों की देखा-देखी बिगड  रहे हैं , इसीलिए अब से कोई मारपीट नहीं होनीचाहिए  , केस मुकदमे भी नहीं होने चाहिए ,साथ ही,  बाबूजान खां को भी सलाह दी गई किवे गांव में सद्भाव बनाए रखने में सह्योग करें।

खां सहब ने बच्चों को नि:शुल्क ट्युशन पढाना शुरू किया, उन्हें गांव में एक मैंही अध्ययनशील लडका नजर आया जो आगे पढ  सकताथा , इसीलिए उन्होंने केवल मुझे ही पढाया, आगे चलकर उनकी बात सही साबित हुईक्योंकि अपने सहपाठियों में से केवल मैं ही बी ए , एम ए कर पाया। खां साहब के दोबेटे हुए अमजद खां और लाल बाबू खां , दो बेटियां भी  हुईं बेबी खां और लाल बेबी खां। उनके चारोंबच्चे बडे सुन्दर और सुशील हुए, आज भी हैं। कुछ दिनों के बाद बाबूजान  खां मेरे गांव में स्थित अपनी सारी जमीन-जायदादबेंच कर वापस मोतीहारी चले गए। मेरे गांव, जहां आयदिन मारपीट होने लगी थी,  वहां अब वैसे झगडे नहीं होते और जहां पचासोंकीते  मुकदमे चल रहे होते थे, वहां पीछले 50वर्षों में शायद ही कोई नया मुकदमा हुआ हो।

उस घटना के बाद मैं और ध्रुव भाई अपनीसमझ के अनुसार रचनात्मक कार्य में लग गए। लौकाहा मेला से लकडी के पिंजडा सहित एक तोताखरीदा और उसे पालने लगे। उसके लिए आम,अमरूद आदि लाते, खिलाते किंतु तोता कुछ हीदिनों बाद मर गया । हम बहुत दुखी हुए । कुछ दिनों बाद चंवर में चिडिया का शिकार कररहे चिडीमार से बगुला का एक बच्चा खरीदा , पिंजडा था ही , उसे उसी में पालने लगे,उसके लिए घोंघा और छोटी मछली हम दोनों खुद पकड कर लाते । धीरे-धीरे बगुला बडा होनेलगा । हमारे इस नेक काम में हम दोनों के घर वालों ने कोई अडंगा नहीं लगाया । बगुलाकभी मेरे घर में रखा जाता तो कभी ध्रुव भाई के घर । एक दिन बगुले को सूंघते हुए एकसांप पिंजडे तक पहुंच गया । हमने बिना किसी को कुछ बताए बगुले को उडा दिया ।

हमारे घरों से थोडी दूरी पर नीम काएक बडा पेड था । बगल में आम के भी दो पेड थे । आम के पेड पर कौवों के घोसले थे।ध्रुव भाई पेड पर चढने में माहिर थे , मैं भी कुछ कम न था , लेकिन ध्रुव भाई मुझेपेड पर नहीं चढने देते थे । एक दिन ध्रुव भाई ने पेड पर चढ कर घोसले का मुआयनाकिया तो देखा कि कौवे ने अण्डे दिए हैं। हम अण्डों से बच्चे निकलने का इंतजार करनेलगे । कुछ दिनों बाद बच्चे निकले। अब हम उस पेड के इर्द – गिर्द ज्यादा समयगुजारने लगे । तब हम पहचान तो नहीं पाए थे कि वह मादा कौवा थी या नर कौवा था ,किंतु आज अनुभव से समझ पाए हैं कि वह मादा कौवा ही थी जो रोज सुबह-शाम अपनी चोंचमें भर-भर कर दाने लाती और अपने बच्चों को खिलाती । एक दिन ध्रुव भाई कौवे काबच्चा उतारने के लिए पेड पर चढे तो कौवे ने अपनी चोंच से उनका सिर लहूलुहान करदिया ।

दूसरे दिन ध्रुव भाई ने माथे में गमछालपेट कर उसमें तीन-चार लकडियां खोंस ली। इस बार कौवा उन पर वार नहीं कर पाई, उनके चारोंतरफ मंडराती रही। ध्रुव भाई बच्चा ले कर नीचे उतरने , मैं नीचे खडा था , ध्रुव भाईपर वार करने में असफल कौवे ने मेरे सिर पर जोरदार पंजा मारा , मेरे सिर से खूननिकलने लगा, ध्रुव भाई जल्दी-जल्दी नीचे उतरे और बच्चा जमीन पर रख कर मेरा घावदेखने लगे । इसी बीच कौवे ने झपटा मारा और बच्चे को पंजे में उठा कर घोसले में लेगई । हमने देखा कि कौवा अपने सभी बच्चों को अपने पंखों से ढके हुए है और दर्जनोंकौवे कांव – कांव करते हुए हम पर वार करने को आमादा हैं। उस मादा कौवे की आंखोंमें आंसू थे या नहीं , यह तो हम नहीं देख पाए किंतु सिर पर मडराते हुए कौवों केगुस्से का एहसास मुझे जरूर हुआ था । शायद उस कौवे ने अपराध करने वाले और अपराध मेंसहयोग करने वाले को बराबर का अपराधी मान कर मुझे सजा दी थी और यह भी हो सकता कि बच्चापाने के लिए वह उसकी रणनीति रही हो ।  जोभी हो , मेरा जख्म देख कर ध्रुव भाई क्रोधित हो गए और बांस की लम्बी – सी लग्गी लेआए तथा घोंसले को उजाड देने के लिए उद्धत हुए ,  मैं ने उन्हें वैसा करने से रोक दिया।

अब मैं रोज दूर से ही उस घोंसले कोनिहारते हुए कुछ सोचता रहता। बहुत बाद में यह समझ सका कि महात्मा बुद्ध बनने केपहले राजकुमार सिद्धार्थ ने शायद ऐसी ही किसी आहत चिडिया को बचाया होगा और मिथुनरतक्रौंच पक्षी के जोडे में से नर क्रौंच को बहेलिए द्वारा मार दिए जाने पर विलापकरती मादा क्रौंच की शायद ऐसी ही वेदना को वाल्मीकि ने महसूस किया होगा।

धीरे-धीरे बच्चों के पंखआने लगे। शुरू – शुरू में बच्चे दो-चार कौवों के झुण्ड के बीच उडते , फिरअकेले-अकेले निकलने लगे, कुछ दिनों बाद देखा कि एक भी बच्चा घोसले में वापस नहींलौटा , शायद उनके पंख अब पूरे आ गए थे और अब उन्होंने अपना खुद का ठिकाना ढूंढलिया था। अब वह मादा कौवा अपने घोसले में अकेली रह गई थी। शायद कौवों में अपना दुखया अपनी खुशी जाहिर करने की कला नहीं होती , इसीलिए मुझे उस मादा कौवे की उदासी याखुशी का स्पष्ट ज्ञान नहीं हो सका, किंतु मुझे आज भी सिर पर मडराते कौवों का क्रोध,उस मादा कौवे का अपने बच्चे के प्रति प्यार, समर्पण व  जुझारूपन, चोंच में भर – भर कर बच्चों को दानेचुगाना , फिर पंख फडफडाते बच्चों को खुले आकाश में अनंत उडान भरने के लिए आज़ाद करदेना ,  ज्यों का  त्यों याद है।
अमन श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम, 22 मई 2015

 

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