असहमति का अधिकार (एक) RIGHT TO DISAGREE

  •  इंदिरापुरम , 11 जून 2015

02 मई, 2015 को बंगलोर स्थित ब्रिगेड गार्डेनिया के अगस्ता क्लब में मेरे साढे चार माह के पौत्र अपूर्व अमन के रिसेप्शन के बाद जब सभी मेहमान चले गए, तब फ्लैट की ओर जाते समय मेरे बेटे कुमार पुष्पक ने हंसते हुए कहा कि पापा , जीवन में आपने बहुत कुछ देखा – परखा और समझा  है, अपने अनुभव के आधार पर “How To Manage Disagreement” यानी “असहमति प्रबंधन” विषयपर कोई आर्टिकल लिखिए । यह बात देखने-सुनने में साधारण थी किंतु थी बडी गंभीर ,मैं ने बेटे के अंदाज में ही हंसते हुए कहा कि लिखूंगा । पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार 05 मई , 2015 को मैं पत्नी के साथ इंदिरापुरम आ गया । इस बीच अपनी आत्मकथा के कुछ अंश को मैं ने फेसबुक नोट पर पोस्ट किया जिसका अन्य लोगों के साथ-साथ मेरे बेटे कुमार पुष्पक, बेटी शिल्पा श्री और शिप्रा ने भी जोरदार स्वागत करते हुए पूरी जीवनी  शेयर करने का अनुरोध किया ।बेटे की आर्टिकल लिखने की मांग मैं भूला नहीं था, किंतु चूंकि बेटे ने एकेडेमिक आर्टिकल की नहीं, अनुभव जनित आर्टिकल की मांग की थी , इसीलिए डेल कार्नेगी या एरिक  बर्न जैसे मैनेजमेंट गुरुओं अथवा How to Win Friends and Influence People या  I am OK, You are OK जैसी पुस्तकों से उद्धरणों की निरर्थकता को समझते हुए  मैं अपनी आत्मकथा के किसी अंश को ही उस आर्टिकल के रूप में पोस्ट करना चाह रहा था , सो मैं ने डायरी के पन्ने उलटने शुरू किए।

मैं ने हाई स्कूल का छात्र रहते हुए अपने सहपाठियों से बहस के दौरान “असहमति का अधिकार” शब्दावली का प्रयोग करना कब शुरू किया , याद नहीं , किंतु इतना याद है कि जब किसी बात पर हमलोग गरमागरम बहस करते और मैं अपने सहपाठियों से सहमत नहीं होता और फिर भी वे अपनी बात मनवाने के लिए जोर देते तो मैं भी जोर दे कर कह देता कि भारत का संविधान मुझे असहमति का अधिकार देता है , इसीलिए आप चिल्लाते रहिए, मैं आप के विचार से सहमत नहीं हूं। । मेरे वे चार – पांच सहपाठी आर्थिक रूपसे बेहतर थे और हर बात पर वे सभी एकमत हो जाते थे जिसके चलते उनका एक गैंग – सा बन गया था जिनके दबाव क्षेत्र में अधिकांश बच्चे रहते थे, इसीलिए फौरी तौर पर संविधानका हवाला देकर मैं उनसे अलग हो जाता था ।
वस्तुत: दसवीं में हमारा एक विषय था “समाज अध्ययन”,  जिसमें भारत के संविधान की मूलभूत जानकारियां दी गईं थी और भारतीय लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण स्तंभों – विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका आदि पर विशेष फोकस किया गया था। वह मेरा प्रिय विषय था । उसमें नागरिक के मौलिक अधिकारों और कर्त्तव्यों की भी चर्चा की गई थी , किंतु कहीं भी “असहमति का अधिकार” शब्दावली थी , ऐसा मुझे न तब मालूम था और न अब । फिर भी मैं इस शब्दावली का प्रयोग धडले से करता था । और चूंकि मेरे उन सहपाठियों को पढाई से कोई खास लगाव नहीं था , इसीलिए मेरी बात की कोई पक्की काट भी उनके पास नहीं होती थी । उन लोगों ने मुझे“थुथुन पर लाठी ओडने वाला” यानी “थेथरई करने वाला” आदि नाम दे दिया था। हालांकि बाद में 95 प्रतिशत मामलों में मेरा मत सही साबित होता था । यह एक ज्ञात तथ्य है कि पूरी तरह साधन संपन्न होते हुए भी मेरे उन सहपाठियों में से कोई ग्रेजुएट भी  नहीं हो सका।

किसी का अंध समर्थन न कर तर्कसंगत रूप में पूरी मजबूती के साथ अपना पक्ष रख देने की उन दिनों की मेरी आदतें मेरा स्वभाव बनती गईं और मेरा यह मत दृढ होता गया कि केवल दबाव या किसी को खुश करने के लिए किसी की हां में हां नहीं मिलाना है। मैं उस पर खुद अमल करता रहा तथा अपने बच्चों के साथ-साथ सहकर्मियों को भी उस अधिकार का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता रहा । मेरे इसी स्वभाव ने परिवार और समाज तथा लगभग 40 वर्षों की नौकरी के दौरान सहयोगियों एवं बडे अधिकारियों के बीच भी, भले ही मुझे नापसन्द करने वालों की एक अच्छी – खासी जमात पैदा कर दी, लोकप्रिय पहचान और सम्मान दिलाने में भी बडी भूमिका निभाई।

आगे चल कर “सूचना का अधिकार”, “रोजगार का अधिकार”, “शिक्षा क अधिकार”आदि जैसे मुदे बनें और उन पर कानून भी बने, उस तरह की लडाई लडने वाले व्यक्तियों एवं एनजीओ आदि को   “असहमति का अधिकार” जैसा मुद्दा मैं दे रहा हूं, इसकी भी लडाई लड कर वो देखें, लेकिन हां,  बाद में मेरे लिए रॉयल्टी का प्रावधान कराना न भूलें, क्योंकि  मुद्दे का यह मौलिक नामकरण मेरे द्वारा ही किया गया है।

“सत्यम ब्रुयात प्रियम ब्रुयात न ब्रुयात सत्यमप्रियम” यानी “सत्य बोलो प्रिय बोलो अप्रिय सत्य न बोलो”   जैसे नीति वाक्य का भी मैं बचपन से ही आलोचक रहा हूं। क्योंकि यदि अप्रिय सत्य न बोलने की नीति का अनुपालन किया जाए तो क्या कोई जज किसी अपराधी को सजा दे  पाएगा ? क्या सबको प्रिय लगने वाली बात सच की श्रेणी में आ पाएगी ? ऐसे में “ सच कड्वा होता है” जैसे यथार्थ वाक्य का क्या होगा? इसीलिए व्यक्ति और समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रिय सत्य / अप्रिय सत्य  की चिंता छोड कर केवल सच बोला जाए। हां, यह भी जरूरी है कि वाणी और शब्दावली में संयम बरता जाए। वास्तव में संवाद कौशल यानी कम्युनिकेशन स्किल की कसौटी यहीं से शुरू होती है।

नौकरी के दौरान ऐसे कई अवसरआते हैं जब हम एक ही विषय पर एक ही साथ अपने समकक्षों, मातहतों और उच्चाधिकारियों से चर्चा कर रहे होते हैं। ऐसी स्थिति में विषय एक होते हुए भी उक्त तीनों प्रकार के सहकर्मियों से वार्तालाप में एक ही प्रकार की शब्दावली और एटीच्युड नहीं अपनाईजा सकती। आदमी के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में भी कभी-कभी वैसी ही स्थिति आ जाती है।  आप एक ही विषय पर अपनी मां ,बहन, पत्नी और बेटी से एक ही साथ बात कर रहे होते हैं, वहां भी वाणी, शब्दावली और एटीच्युड का देश – काल –पात्र के अनुसार उपयोग करने, उन्हें संयमित एवं नियंत्रित करने और साथ ही आवश्यकतानुसार असहमति के अधिकार का उपयोग भी सावधानी से करने की जरूरत होती है।

असहमति के अधिकार का खुद उपयोग करना और दूसरों को भी उस अधिकार का उपयोग करने देना,  दोनों एक ही सिक्के केदो पहलू हैं अर्थात अपने विचारों पर दूसरों की ‘ना’ सुनने का धैर्य और दूसरों के विचारों पर ‘ना’ कहने का साहस होना चाहिए। हां, उक्त दोनों ही मामलों में ‘ना’ तथ्यपरक हो यानी केवल ‘ना’ कहने के लिए‘ना’ न हो, उसके पीछे तथ्य और तर्क हो, वरना नकारात्मक छवि बन जाएगी ।

मेरे बेटे कुमार पुष्पक का जन्म मुज़फ्फरपुर कार्यकाल के दौरान तथा दोनों बेटियों –  शिल्पा श्री और शिप्रा का जन्म कलकत्ता (अब कोलकाता) कार्यकाल के दौरान हुआ। तब मैं न्यु बैंक ऑफ इंडिया के प्रादेशिक कार्यालय कोलकाता में राजभाषा अधिकारी के पद पर कार्यरत था और कोलकाता के उपनगर रिसडा में रहता था। वहां मैं सात वर्षों तक रहा , मेरे तीनों बच्चों की स्कूलिंग वहीं शुरू हुई। सबसे पहले पुष्पक का नाम विद्या भारती स्कूल में लिखाया जिसका संचालन जयश्री टेक्स्टाइल मिल्स के द्वारा होता था और जो शहर का सबसे नामी स्कूल था । वह स्कूल मुख्य शहर की उल्टी दिशा में मिल्स की तरफ स्थित था जहां जाने के लिए रेलवे फाटक पार करना पडता था। ट्रेनों के आने-जाने की रफ्तार और आवृत्ति अधिक थी। स्कूल का रिक्शॉ आता था फिर भी चिंता हमेशा लगी रहती थी ।  कुछ ही दिनों में महसूस हो गया कि बच्चे को उधर भेजना ठीक नहीं है। इसीलिए वहां से हटा कर सन साईन नामक स्कूल में नामांकन करा दिया। उस स्कूल का भी रिक्शॉ आता था। वह स्कूल भी एक कारखाने के निकट था किंतु रेलवे फाटक जैसा कोई चिंतनीय विषय नहीं था। मैं सुबह 8.30 में ऑफिस के लिए घर से निकलता था और ट्रेन, फिर बस / मिनी बस/ टैक्सी से यात्रा करते हुए 10.00 बजे तक ऑफिस पहुंचता था, वापस घर पहुंचने में रात के 8.30 बज जाते थे। समय बीतने के साथ बेटी शिल्पा और फिर शिप्रा भी स्कूल जाने लगीं। तीनों एक ही रिक्शे में जाते थे। घर पर पढाने के लिए एक प्राइवेट ट्युटर आती थीं ।

कलकत्ता को देश की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। वहां साहित्य, रंगमंच और सिनेमा की बडी हस्तियोंसे मिलने और उनका सान्निध्य पाने का भरपूर अवसर मिला। मैं पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक/ सांस्कृतिक गतिविधियों की रिपोर्टिंग भी करता था जिसके चलते उन लोगों के बीच मैं लोकप्रिय हो गया था। उधर मेरी व्यस्तता कुछ ज्यादा बढने लगी, पत्नी बच्चों को अच्छी तरह संभाल रही थीं। इन सबके बीच बच्चों के स्कूल में पैरेंट्स मीट में नियमित रूप से जाना, बच्चों के साथ कलकत्ता के दर्शनीय स्थलों पर जाना, कलकत्ता के बाहर भी घूमने जाना और गृह नगर मोतीहारी भी तीन-चार महीनों के अंतराल पर हमेशा जाते रहना आदि निरंतर होता रहा, ऐसे में छुट्टियों एवं पैसों की  बचत तो नहीं हुई किंतु पारिवारिक जीवन का भरपूर आनन्द अवश्य उठाया । इसे मैं उपलब्धि के रूप में देखता हूं।

बात तब की है जब शिप्रा अभी स्कूल नहीं जा रही थी और शिल्पा ने कुछ ही दिनों से स्कूल जाना शुरू किया था। एक रविवार को बच्चों के साथ लूडो खेलते हुए मैं ने महसूस किया कि पुष्पक कुछ ज्यादा ही शांत और उदास है। कारण पूछने पर पहले तो ‘कुछ नहीं’ कह कर उसने टाल देना चाहा लेकिन जब मैंने कुछ विशेष प्यार जताते हुए पूछा तो बतलाया कि उसकी कक्षा में दो लडके हैं जो जुडवा भाई हैं और वे दोनों मिलकर किसी न किसी बहाने हमेशा उसे मारते हैं, टीचर लोग भी उन दोनों भाइयों को कुछ नहीं बोलते हैं। वह वाकया बहुत अजीब-सा लगा मुझे, मैं ऑफिस से अवकाश लेकर स्कूल की प्रिंसिपल से मिला । सीधी बात न कह कर अपने बेटे के प्रोग्रेस और बिहैवियर के बारे में पूछा। प्रिंसिपल बडे प्रशंसात्मक लहजे में बोलीं कि “पुष्पक तो अपनी क्लास ही नहीं, मेरे स्कूल का भी सबसे अच्छा बच्चा है” । मैं ने पूछा कि ऐसा क्या है उसमें,तो उन्होंने बताया कि पुष्पक रोज अपनी क्लास से सभी बच्चों के निकल जाने के बाद निकलता है और पूरे क्लास रूम में घूमताहै , किसी बच्चे की पेंसिल, रबर, कटर या कोई और चीज छूट गई हो तो सबको सहेज कर लाकर ऑफिस में जमा कर देता है। वह अपनी क्लास का मोनीटर भी नहीं है, फिर भी डेली रूटीन की तरह बना लिया है उसने इस काम को। अपने बेटे के बारे में ऐसी प्रशंसा भरी बात स्कूल की प्रिंसिपल से सुन कर मुझे बेहद खुशी हुई । संभवत: मेरे बेटे का व्यवहार ही था, जिसके चलते स्कूल के अगले वार्षिकोत्सव में मुझे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया ।

मैं गया था शिकायत करने किंतु प्रशंसा सुन कर प्रसन्नता मिश्रित आश्चर्य में पड गया। फिर भी, प्रिंसिपल कोव्असलियत बता देना आवश्यक समझा क्योंकि समस्या का निदान भी तो निकालना था। जैसे ही मैं ने उन दोनों जुडवा भाइयों का जिक्र किया, प्रिंसिपल का मुंह कसैला – सा हो गया, दोनों हाथ जोड कर एक सांस में वे कह गईं, सर, वे दोनों किसी की नहीं सुनते, टीचर्स , प्रिंसिपल, डायरेक्टर सभी तंग आ चुके हैं, उनके गार्जियन ने भी हाथ खडे कर दिए हैं और कह दिया है कि जो कुछ करना है , स्कूल ही करे। प्रिंसिपल ने यह भी कहा कि सर, अपनी शिकायत आप लिख कर दीजिए तो उसी आधार पर उन लडकों को स्कूल से ही बाहार का रास्ता दिखा देते हैं। मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और उन बच्चों के गार्जियन का पता ले कर घर आ गया। अगले रविवार को उनके माता-पिता से मैं मिला । वे बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे , मेरे बेटे और मेरी उन्होंने खुल कर प्रशंसा की किंतुअपने बच्चों के बारे में लाचारी का रोना रोते हुए बताया कि उनके वे ही दो बच्चे थे जो ढलती उम्र में बहुत इलाज और मन्नतों के बाद पैद हुए थे। मैं ने मसूस किया कि माता-पिता के अतिशय लाड-प्यार ने ही उन बच्चों को बिगाडने में बडी भूमिका निभाई होगी। उनके प्रति मेरे मन में आक्रोश के साथ सहानुभूति भी हो रही थी|

मेरे सामने अब विकट स्थितियह थी कि समस्या का निदान कहां ढूंढा जाए । सभी संबंधित लोग हार मान चुके थे , इसलिए उन दोनों बच्चों से मिल कर समझाना व्यर्थ लग रहा था और साथ ही  एक गार्जियन के रूप में बच्चों के झगडे में मेरा सीधा हस्तक्षेप उचित भी नहीं होता और यदि मैं सारी स्थिति जानने के बाद भी चुप रह जाता तो मेरे बेटे के मनोबल पर प्रतिकूल असर पडता तथा वह दब्बूपन का शिकार हो जाता, इसके अलावा उन दोनों बच्चों के भी और अधिक बिगडते जाने का रास्ता साफ हो जाता । उन तमाम बिन्दुओं पर मैं ने अपनी पत्नी से चर्चा की । वहां मेरे तीनों बच्चे भी थे। उस विषय पर मैं क्या करूं, सोच नहीं पा रहा था । अचानक मेरे मन में एक ख्याल आया ।मैं ने बेटे को कहा कि जब भलमनसाहत कमजोरी मानी जाने लगे तो रूख में परिवर्तन लाना जरूरी हो जाता है। साथ ही , किसी के गलत आचरण को चुपचाप बर्दाश्त कर लेने से गलती करने वाले को लगता है कि वह सही रास्ते पर चल रहा है और कुछ भी हो , उसका विरोध करने का  कोई साहस नहीं कर सकता और कोई उसका कुछ बिगाड भी नहीं सकता। इसीलिए जरूरी है कि गलत को गलत कह कर उसका विरोध किया जाए । इससे दो बातें होंगी , पहली तो यह कि उसे एहसास हो जाएगा कि वह गलती कर रहा है और दूसरी यह कि वह महसूस कर लेगा कि उसका भी विरोध किया जा सकता है। मैं ने शब्दों पर जोर देते हुए दृढता के साथ यह भी कहा कि यदि वह व्यक्ति  फिर भी न माने तो उसे उसी की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए।
रोज की तरह पुष्पक क्लास रूम में बिखरी चीजों को सहेज कर प्रिंसिपल के ऑफिस में जमा करा कर अपना बस्ता उठाने के लिए क्लास रूम में वापस आया तो फिर उन दोनों जुडवा भाइयों ने उसे घेर लिया। इसी बीच देर होने पर शिल्पा अपने क्लास रूम से भाई के क्लास रूम में गई तो देखा कि वे दोनों भाई उसके बडे भाई को मार रहे हैं और उसका भाई बचने की कोशिश कर रहा है ।कुछ क्षण तक वह देखती रही और फिर न जाने उसे क्या सूझा कि उसंने अचानक  दोनों जुडवा भाइयों को दनादन चार-पांच थप्पड जड दिए। अचानक हमले की आशंका तक नहीं रही होगी उन दोनों भाइयों को , वे हकबका गए और पुष्पक को मारना छोड कर बस्ता उठा कर चलते बने। उस घटना के बाद से उन दोनों भाइयों ने पुष्पक से उलझने की फिर कभी कोशिश नहीं की। यह कहानी बेटे पुष्पक और बेटी शिल्पा ने अगले रविवार को लूडो खेलते हुए मुझे बताई। इस पूरी घटना को आजकल टेलीविजन पर आने वाले एक विज्ञापन से भी समझा जा सकता है जिसमें एक लडकी को कुछ बदमाश लडके  परेशान करते हैं तो वह लडकी जोर से चिल्लाती है –“ ओए ! अब इग्नोर नहीं करेंगे” । लडकी का यह रूप देखते ही शोहदे खिसक लेते हैं। (चूंकि वर्षों पहले  का यह मेरा मौलिकआईडिया है , इसीलिए उस ऐड की निर्माता कम्पनी , उसे बनवाने वाले संस्थान , उसे दिखाने वाले चैनल  और उस विज्ञापन का लाभ उठाने वालों से अपनी रॉयल्टी की मांग  करने की मैं सोच रहा हूं।) तो बात यह है कि गलती किसी की भी हो, उसे इग्नोर करने का मतलब है उसे बढावा देना। हां, देश , काल , पात्र यानी स्थान, समय और व्यक्ति केअनुसार वाणी, शब्दावली एवं एटीच्युड के प्रयोग में सावधानी अवश्य बरतनी चाहिए, कम्युनिकेशन स्किल भी तो यही है।

वर्षों बाद पुष्पक बैचलर ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की पढाई कर रहे थे। एक दिन उसने मुझसे कहा कि ‘ मेरे इंस्टीच्युट ने 15 मिनट की एक फिल्म बनाई है , उसकी स्क्रीनिंग होनी है , आप उस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आएं तो मेरे साथी प्रेरित होंगे’ ,  मैं खुश हो गया। सोचने लगा कि बहुत पहले बेटे के चलते ही स्कूल के एनुअल फंक्शन में मुख्य अतिथि बना था, अब उसी के चलते फिल्म की स्क्रीनिंग के अवसर पर मुख्य अतिथि बन रहा हूं। मैं सूट-बूट पहन कर पहुंचा। साथ में पत्नी भी थीं। अतिथियों में गिनेचुने लोग थे। सभी अनजान चेहरे थे। कास्टिंग शुरू हुई, Written by, Produced by, Directed by Kumar Pushpak; Play back, Screen play   सब कुछ by Pushpak . वह माजरा समझ में नहीं आया , लेकिन जैसे ही कस्टिंग खत्म हुई और फिल्म शुरू हुई, धीरे-धीरे सब कुछ समझ में आने लगा । पहले दृश्य में लम्बी-सी सिगरेट का कश लेते पुष्पक अवतरित हुआ , कहानी आगे बढती रही, सिगरेट का धुआं निकलता रहा , खांसी बढती गई, हीरो बीमार – सा दिखने लगा और अंतिम दृश्य में बीमार हीरो बिछावन पर निस्तेज पडा हुआ था , तभी पर्दे से दृश्य गायब हो गया ,बत्तियां  जल गईं और तालियां बजने लगीं ।सब लोग अपनी सीट से उठ चुके थे , मैं और मेरी पत्नी गुमसुम अपनी  सीट पर बैठे रह गए थे, मेरी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे।

वस्तुत: उन दिनों मैं चेन स्मोकर था और लम्बी सिगरेट , गोल्ड फ्लेक किंग साईज, पीता था। यह सही था कि मैं ने घर में या बच्चों के सामने कभी सिगरेट नहीं पी , किंतुयह सबको पता था कि मैं सिगरेट बहुत पीता था, यह भी पता था कि मेरे पीता जी भी चेन स्मोकर थे और बहुत इलाज के बावजूद 60वर्ष की आयु में ही चल बसे थे। मेरे बेटे ने वह सारा तामझाम मेरी स्मोकिंग छुडाने के लिए खडा किया था। आज वर्षों हो गए , मैं ने सिगरेट को मुंह से लगाया तक नहीं।अपने बाप का विरोध करने का बेटे का वह तरीका उसकी रचनात्मक सोच का मुझे कायल बना गया।

……….. अगली कडी में भी जारी

अमन श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम,11जून.2015

मो.9310249821

 

5,107 thoughts on “असहमति का अधिकार (एक) RIGHT TO DISAGREE

  • 18/09/2017 at 8:38 am
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  • 13/09/2017 at 11:08 am
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