असहमति का अधिकार : भाग – 2 RIGHT TO DISAGREE : PART – 2

इंदिरापुरम, 23 जून 2015

मैं ने 11 जून 2015 को अपने फेसबुक नोट में अपनी आत्मकथा का एक अंश पोस्ट किया था जो अपनेआप में असहमति –प्रबंधन यानी  DISAGREEMEN – MANAGEMET  पर एक आर्टिकल बन गया  था । उस पर बहुत विचारोत्तेजक और प्रेरणादायी टिप्पणियां प्राप्त हुईं। उस पोस्ट में मैं ने ढाई दशक पहले की सच्ची घटनाओं का जिक्र किया था। इस कडी में पिछले वर्ष की घटनाओं के माध्यम से मैं असह्मति प्रबंधनकी चर्चा को आगे बढाना चाहूंगा।

मई 2014 में केंद्र में माननीय नरेन्द्र मोदी जी की सरकार बनी । कुछ दिनों बाद सरकार ने संविधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत केन्द्रीय कर्यालयों में भारत संघ की राजभाषा नीति के अनुपालन के क्रम में  हिन्दी में कार्य करने का निर्देश जारी किया जिसका एक राज्य  के दो दिग्गज नेताओं ने जोरदार विरोध किया। संविधानिक प्रावधानों को कार्यान्वित  कराने के लिए भारत की संसद ने जब 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया था तब भी वहां  के कुछ बडे नेताओं ने उससे असहमति जताई थी और उसका विरोध किया था, कुछ हिंसक घटनाएं भी हुईं थीं जो एक ऐतिहासिक तथ्य है। चूंकि यह बहुत ही संवेदनशील विषय था और सरकार के समक्ष विगत घटनाएं नज़ीर के रूप में थीं, इसलिए इस बार सरकार संविधानिक प्रावधानों को लागू कराने के लिए कटिबद्ध तो दिखती थी , किंतु साथ ही , इस बात के लिए भी सतर्क दिखती थी कि भाषिक सद्भाव और समरसता भी बनी रहे । भारत जैसे बहुभाषी और सामासिक संस्कृति से संपन्न विविधता में एकता के प्रतीक देश में वह कटिबद्धता और सतर्कता परमावश्यक तत्त्व है क्योंकि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्तिको अपना विचार रखने और दूसरों के विचार से असहमत होने का अधिकार है, शर्त्त केवल इतनी है कि विचार तथ्यपरक, वस्तुनिष्ठ एवं पूर्वग्रहरहित हो । देश – दुनिया ने देखा कि सरकार ने समावेशी दृष्टिकोण और दूरंदेशी सूझ-बूझ के साथ उस मामले का हल निकाला।

उसी सिलसिले में एक दिन भारत सरकार , गृह मंत्रालय , राजभाषा विभाग की सचिव वरिष्ठ आईएएस अफसर सुश्री नीता चौधरी जी ने मुझे बुलाया । कुछ ही माह पहले उन्होंने उस पद पर  योगदान किया था और पूरे देश में स्थित केन्द्रीय कार्यालयों में हिंदी को लागू कराने के लिए नई जागृति एवं चेतना का संचार किया था।वे बहुत सख्त आईएएस अफसर थीं, उनके सामने जाने के पहले उनके विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी पूरी तथ्यात्मक जानकारी से लैश हो कर जाते थे। चूंकि मैं पंजाब नैशनल बैंक के प्रधान कार्यालय में राजभाषा का प्रभारी मुख्य प्रबंधक होने के अलावा सभी बैंकों के लिए भारत सरकार द्वारा गठित दिल्ली नगर  राजभाषा कार्यान्वयन समिति का सचिव तथा कई अन्य समितियों एवं उप समितियों में सदस्य भी था और इतने कम समय में ही कई बार उनसे चर्चा करने का सुयोग मुझे मिल चुका था , इसीलिए इस बार मैं कुछ विशेष सजग व सतर्क हो गया। मैंने तुरन्त अपने महाप्रबंधक श्री जी एस चौहान को वस्तुस्थिति की जानकारी देते हुए उनसे अनुमति ली तथा निर्धारित समय पर खान मार्केट , लोकनायक भवन  स्थित गृह मंत्रालय , राजभाषा विभाग में सचिव महोदया के समक्ष उपस्थित हो गया। वे अनुशासनप्रिय  और कार्यों में सख्त तो थीं, साथ ही ,  उनकी सोच सकारात्मक और प्रेरणादायी थी जिसका स्पष्ट एहसास पहले भी होता रहा था और उस दिन भी वार्तालाप शुरू होते ही हो गया था ।
सचिव महोदया ने कहा – “ मैं चाहती हूं कि राजभाषा हिंदी के संबंध में आप एक ऐसा आलेख लिखें जो पूरी तरह तथ्यपरक एवं इतिहास सम्मत हो तथा देश की सामासिक संस्कृति और भाषिक समरसता को बनाए रखने में सहायक भी हो ताकि उस विषय में अनुकूल वातावरण बन सके और परस्पर समन्वय व सामंजस्य स्थापित किया जा सके ” । उन्होंने यह भी कहा कि “ मैं ने आपकी स्पीच एक कार्यक्रम में सुनी थी , वरिष्ठ अधिकारियों के बीच 40 मिनट तक आप राजभाषा हिंदी के ऐतिहासिक पक्षों पर धारा प्रवाह बोलते रहे थे और सभी मंत्रमुग्ध हो कर सुनते रहे थे , मैंने स्वयं उस विषय पर उतना तथ्यपरक, ज्ञानवर्द्धक और प्रभावशाली वकतव्य नहीं सुना था कभी।  आप हृदय की गहराई से जिस तन्मयता और भावनात्मक लगाव के साथ बोल रहे थे, सभी भावविभोर हो गए थे और सबकी आंखों में आंसू थे, मेरी आंखों में भी । मैं ने कई मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों से उस घटना की चर्चा भी की है और उन्हें सलाह भी दी है कि वे इस विषय पर कम से कम दो घंटे की आपकी स्पीच का आयोजन कराएं और अपने अधिकारियों को सुनवाएं। इसलिए मुझे यकीन है कि इस विषय पर ऐतिहसिक तथ्यों के साथ प्रभावशाली आलेख आप ही लिख पाएंगे।”   जाहिरहै,  वह चर्चा असहमति प्रबंधन पर केन्द्रित थी । उस महत्त्वपूर्ण एवं संवेदनशील राष्ट्रीय विषय पर शीर्ष आईएएस अफसर द्वारा मुझे योग्य एवं उपयोगी समझा जाना और मेरे ऊपर अटूट विश्वास व्यक्त किया जाना मेरे लिए अत्यंत आह्लादकारी एवं अभिभूत करने वाला था । उस अतिशय प्रशंसा से मैं संकोच में पड गया और नि:शब्द हो गया । कुछ देर बाद मैं इतना ही बोल पाया ‘ ठीक है मैम ’  और चलने की अनुमति मांगी।

विगत 30 वर्षों से वह मेरा प्रिय विषय रहा था, मैं ने उस पर काफी शोध भी किया था, समय-समय पर विभिन्न पत्र-त्रिकाओं में लिखता भी रहा था, संगोष्ठियों में व्याख्यान भी देता रहा था , वे सभी सामग्री मेरे पास थीं, मैं ने उन सबको सहेज कर 21 पृष्ठों का एक आलेख तैयार किया और सचिव महोदया को ईमेल से भेज दिया जिसे भारत सरकार की ऑफिशियल साईट पर प्रमुखता के साथ पोस्ट किया गया । कहना न होगा कि मैं बेहद खुश हुआ क्योंकि सरकार से बाहर के किसी भी अन्य व्यक्ति का भारत सरकार की उस ऑफिशियल साईट पर प्रकाशित होने वाला वह पहला आलेख था जो मेरा था , जबकि बडे से बडे विद्वानों को भी वह अवसर कभी प्राप्त नहीं हुआ था। आज भी वह आलेख भारत सरकार की साईट www.rajbhasha.nic.in पर अथवा  सीधे Government of India Ministry of Home Affairs Department of Official Language को क्लिक कर “मह्त्त्वपूर्ण सूचनाएं – सभी देखें” लिंक पर  “राजभाषा हिंदी – विद्वानों के विचार” के अंतर्गत देखा जा सकता है।

अपने प्रिय विषय पर शोध के दौरान ऐसे कई ऐतिहासिक साक्ष्यों से मैं गुजरा था जिनसे यह प्रमाण मिलता था कि विदेशी लेखकों ने भारत की छवि खराब करने के लिए किस तरह उसे भूखे – नंगे और अंधविश्वास से ग्रस्त लोगों तथा सांप – सपेरों का देश साबित करने का कुप्रयास किया था और साथ ही, भारत की प्राचीन सभ्यता – संस्कृति, भाषा एवं आचार –विचार को नष्ट करने के लिए कैसा सोचा – समझा कुचक्र रचा था , जिसमें पूरा भारतवर्ष उलझ कर रह गया । प्राय: लोग लॉर्ड मेकॉले की शिक्षा पद्धति भारत में लागू करने संबंधी प्रक्रिया को एक सामान्य घटना की तरह देखते हैं लेकिन पूरे भारतवर्ष का भ्रमण करने के बाद इंगलैंड वापस जा कर उसने ब्रिटिश संसद में 02 फरवरी 1835 को जो वक्तव्य दिया था , वह भारतवासियों की आंखें खोलनेवाला है । उसे भारत सरकार की उपर्युक्त साईट और लिंक पर प्रकाशित मेरे लेख के पृष्ठ 5 पर देखा जा सकता है, सुविधा के लिए अंग्रेजी में दिए गए उस मूल वक्तव्य के साथ-साथ मेरे द्वारा किया गया उसका हिंदी अनुवाद भी मैं यहां उद्धृत कर रहा हूं :-

“ I have traveled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is thief. Such a wealth I have seen in this country , such high moral values, people of such calibre that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their    self- esteem , their native self – culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.”

“ पूरे भारतवर्ष के भ्रमण के दौरान मैं ने एक आदमी भी ऐसा नहीं देखा जो चोर हो। मैं ने उस देश में ऐसी समृद्धि और प्रतिभाएं देखी हैं, ऐसे श्रेष्ठ नैतिक मूल्य और लोग देखे हैं कि मुझे नहीं लगता कि उसके सांस्कृतिक एवं नैतिक मेरुदंड को तोडे वगैर हम उसे पराजित कर सकेंगे। इसीलिए मेरा प्रस्ताव है कि भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति और संस्कृति के स्थान पर अंग्रेजियत भर दी जाए ताकि भारतवासियों के दिलोदिमाग में यह सोच घर कर जाए कि जो कुछ विदेशी और अंग्रेजी है ,वही बेहतर और श्रेयस्कर है। ऐसा होने पर वे अपना स्वाभिमान एवं संस्कृति भूल जाएंगे और जैसा कि हम चाहते हैं , वे एक पराधीन कौम बन जाएंगे।“

और उसी सोच एवं कूटनीति के तहत ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में लॉर्ड मेकॉले की शिक्षा पद्धति लागू की जो भारतवासियों को सोच और मानसिकता के स्तर पर अंग्रेजों एवं अंग्रेजियत का गुलाम बनाने की फैक्टरी के रूप में स्थापित हो गई, वहीं से बांटो और राज करो की नीति ने पांव पसारना शुरू किया क्योंकि लोगों को अपनी सोच का कायल बनाने के लिए अंग्रेजोंने पहले साम और दाम का ही सहारा लिया, नतीजतन उनके चाटुकारों की जमातें तैयार हो गई। देशी रियासतों और राजे-रजवाडों की आपसी राजनीति एवं एक-दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित करने के जुनून में भारतवासी उस कूटनीति को समझ नहीं पाए, फलस्वरूप संगठित रूप में न तो अपनी असहमति जता पाए और न ही विरोध कर पाए, जब तक कुछ समझ पाते , अंग्रेजियत का भूत सिर चढ कर बोलने लगा था, इसीलिए 1857 में संगठित क्रांति करने के बावजूद नतीजा सिफर रहा था। वरना बादशाह सलामत से तिजारत की परमिशन के लिए गिडगिडाने वाले अंग्रेज तिजारत से सियासत, सियासत से शासन और फिर कभी न सूर्यास्त देखने वाले साम्राज्य तक कैसे पहुंच पाते।काश ! उस बादशाह ने सही समय पर ‘ना’ कहने की सूझ-बूझ दिखाई होती तो हिंदुस्तान का इतिहास कुछ और होता।

सन 1857 की क्रांति ने अंग्रेजों को सतर्क बना दिया । हिंदुस्तानी हिंसक क्रांति के माध्यम से अपनी असहमति न व्यक्त कर संगठित रूप में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखें, इसके लिए अंग्रेजों ने  ए ओ ह्युम की देखरेख में इंडियन नैशनल कॉंग्रेस की स्थापना की । किंतु 20वीं शताब्दी शुरू होते – होते कॉंग्रेस अंग्रेजों के हाथ से छिटकनी शुरू हो गई और धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकूमत रूपी पूतना के लिए कॉंग्रेस कृष्ण  होने की राह पर चल पडी। कॉंग्रेसियों के बीच आपसी असहमति ने नरम दल और गरम दल को जन्म दिया जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दो मजबूत स्तंभ बने।

भारतीय राजनीति में असहमति की नैतिकता परवान चढी महात्मा गांधी के पदार्पण के साथ। गांधी जी ने दक्षिणी अफ्रीका से लौटने के बाद भारत में अपने जीवन का प्रथम सत्याग्रह यानी  सत्य, अहिंसा और असहयोग का प्रथम प्रयोग चम्पारण में किया । नील की खेती की तीनकठिया प्रथा से त्रस्त किसानों की समस्या के समाधान के लिए गांधी जी ने 1917 में चम्पारण के जिला मुख्यालय मोतीहारी में जब सत्याग्रह शुरू किया तो उन पर सीआरपीसी की धारा 144 के अंतर्गत निषेधाज्ञा लगाते हुए उन्हें चम्पारण छोडने का आदेश दिया गया , गांधी जी ने उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया । सरकारी आदेशों का उल्लंघन करने के आरोप के साथ गांधी जी पर मुकद्दमा चलाने के लिए जब उन्हें मोतीहारी कोर्ट में प्रस्तुत किया गया तो मजिस्ट्रेट और सरकारी वकील, दोनों किंकर्त्तव्यविमूढ की स्थिति में आ गए और मुकद्दमे पर सुनवाई को स्थगित करने का विचार करने लगे। गांधी जी ने उसका भी विरोध किया और अपना बयान दर्ज कराने की अनुमति मांगी। उन्होंनेअपना पक्ष रखते हुए कहा –

प्रशासन कहता है कि मैं चम्पारण छोड दूं , यदि मैं उस आदेश को मान कर चम्पारण छोड दूंगा तो यहां के किसानों की समस्याओं को कैसे समझूंगा और यदि मैं उनकी समस्याओं को नहीं समझूंगा तो उन्हें दूर कराने के समुचित उपाय कैसे ढूंढ पाऊंगा , मैं अपनी आत्मा की आवाज पर यहां देश और मानवता की सेवा करने के लिए आया हूं, उसे पूरा करना मेरा कर्त्तव्य है। मेरे मन में कोर्ट के प्रति पूरा सम्मान है,  परंतु यदि मैं सरकारी आदेश मान कर अपने कर्त्तव्य को पूरा किए वगैर यहां से चला जाऊं तो मेरे कर्त्तव्य की हत्या हो जाएगी और मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता, इसीलिए यह कानून के उल्लंघन का नहीं , स्थानीय प्रशासन और मेरे विचारों में असहमति एवं अपने कर्त्तव्य निर्वाह के प्रति मेरी प्रतिबद्धता का प्रश्न है –

गांधी जी के बयान  के बाद मजिस्ट्रेट  ने निर्णय को स्थगित रखा । इस बीच गांधी जी ने मामले की पूरी जानकारी तार से लेफ्टीनेंट गवर्नर, वाईसरॉय और मदनमोहन मालवीय एवं अपने अन्य साथियों को भेज दी। उन दिनों मोतीहारी के कलक्टर थे मिस्टर हेकॉक, मजिस्ट्रेट ने कलक्टर का हवाला देते हुए लिखित रूप में सूचित किया कि गांधी जी के खिलाफ दायर मुकद्दमा वाईसरॉय के आदेश से वापस ले लिया गया है ।असहमति की वह तब तक की सबसे बडी नैतिक और कानूनी जीत थी। गांधी जी ने भारत में अपने पहले आन्दोलन – चम्पारण सत्याग्रह में ही यदि उस असहमति का उपयोग नहीं किया होता तो क्या भारत की आजादी के संघर्ष के लिए हमें वैसा नैतिक बल मिल पाया होता और हमारी आजादी  संभव हो पायी होती ?  वही चम्पारण मेरी जन्मस्थली है , गांधी दर्शन का अध्ययन – चिंतन – मनन मैं ने वहीं किया और उनके उस आन्दोलन से  जुडे तथ्यों का प्रत्यक्ष दरस – परस भी वहीं किया , मेरे दादा जी गांधी जी के अनुयायी थे , पिता जी भी गांधी जी को मानवता का सबसे बडा सेवक मानते थे, घर – परिवार में मुझे भी  वैसा ही संस्कार मिला, इसीलिए गांधी जी के उस नैतिक बल को मैं स्वाभाविक रूप में महसूस करता हूं।

गांधी जी के नेतृत्व में 1921 में शुरू किया गया असहयोग आन्दोलन जोरो पर था, ऐसा लगने लगा था कि अंग्रेजों की शिकस्त हो जाएगी, इसी बीच चौरीचौरा कांड हो गया जिसमें अनेक अंग्रेज बच्चों, बूढों और महिलाओं का कत्ल हिंदुस्तानी आन्दोलनकारियोंने कर दिया। गांधी जी उस घटना से बहुत आहत हुए और उन्होंने तत्काल आन्दोलन वापस लेने की अचानक घोषणा कर दी जिसकी बडे पैमाने पर आलोचना हुई किंतु वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। अंग्रेजों की जिन नीतियों के खिलाफ वे लड रहे थे , वैसी ही नीतियां उनके आन्दोलनकारी भी अपनाएं, गांधी जी को वह कत्तई स्वीकार्य नहीं था, इसीलिए आन्दोलन वापस ले कर वे उपवास पर चले गए, परिणाम , हिंसा रूक गई । वह घटना असहमति की नैतिक विजय की पराकाष्ठा थी।

काश ! किसी एक ने भी युर्योधन की बेलगाम महत्त्वाकांक्षा पर उंगली उठाई होती , धृतराष्ट्र – द्रोण –भीष्म , किसी ने भी असहमति जताई होती , तो महाभारत का विध्वंसक युद्ध न होता , न कुल बधू का अपमान होता और न वंश का विनाश। अभी भारत ही नहीं पूरा विश्व समय पर असहमति न जताने के विकृत एवं विकराल परिणामों से सहमा हुआ-सा है। यह स्वरूप केवल इसलिए सामने आया है क्योंकि किसी के गलत आचरण के खिलाफ किसी शक्तिशाली व्यक्ति अथवा सत्ता ने निजी हित-साधन या वैसे ही किन्हीं अन्य कारणों से सही समयपर सही तरीके से असरदार असहमति नहीं जाहिर की थी अथवा उस गलत आचरण के मूल में निहित असहमति की मूल भावनाओं को समझने और असहमति प्रबंधन का सार्थक प्रयास नहीं किया था  ।

स्वभाविक असहमति दुश्मनी नहीं कहलाती और न ही स्वभाविक रूप से असहमत व्यक्ति दुश्मन। असहमति को व्यक्त करने के स्वीकृत एवं वैध तरीके अपनाने वालों को राजनीति की भाषा में विपक्ष अर्थात ऑपोनेंट कहा जाता है , आक्रामकता के साथ अतिवादी गतिविधियां अपनाने वालों को उग्रवादी अर्थात एक्स्ट्रीमिस्ट कहा जाता है , वैध – अवैध तरीकों अथवा जान – माल के नुक्सान की चिंता किए वगैर समाज में दहशत फैलानेवालों को आतंकवादी कहा जाता है, वे सबसे खतरनाक किस्म के लोग हैं जो देश – दुनियाके लिए नासूर बने हुए हैं। किंतु एक चौथी किस्म भी है जिसके लोग  वैध तरीके अपनाने का भ्रम पैदा कर अन्दर ही अन्दर तमाम तरह के हथकंडे अपनाने को तत्पर रहते हैं और समाज की जड खोदने तथा सामाजिक तान-बाना को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश में लगे रहते हैं , उन्हें अलगाववादी कहते हैं । दूसरे और तीसरे किस्म के तरीके तो समाज को नजर आते हैं किंतु इस चौथी किस्म के लोग मीठे जहर के समान होते हैं , इसीलिए ये कम घातक नहीं हैं क्योंकि जबतक इनकी चाल समझ में आए , तब तक पूरा असर हो चुका होता है। समाज और देश-दुनिया में इस तरह का वैचारिक कैंसर फैले , उसके पहले ही वैसी नकारात्मकता की बारीकी से पहचानकर उन्हें प्रारंभ में ही सकारात्मक असहमति से रोक देना चाहिए , क्योंकि कैंसर के मामले  में प्रीवेंसन ही बेहतर उपाय है , उसके इलाज की प्रक्रिया के बारे में तो सभी जानते हैं।

निश्चिय ही, सही समय पर सही तरीके से तर्कसंगत रूप में व्यक्त की गई पूर्वग्रह रहित और वस्तुनिष्ठ असहमति  समाज और देश – दुनिया को समरस बनाए रखने के लिए एक अचूक नुस्खा है।

अमन श्रीलाल प्रसाद

मो. 9310249821

इंदिरापुरम, 23 जून 2015

 

3,116 thoughts on “असहमति का अधिकार : भाग – 2 RIGHT TO DISAGREE : PART – 2

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