जब बाप–बेटे ने कम्पीयरिंग में जुगलबंदी की …

इंदिरापुरम : 12 जुलाई 2015

अपने फेसबुक नोट में 10 मई 2015 को मैं ने “मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे”   शीर्षक से अपनी आत्मकथा का एक अंश पोस्ट किया था , जिसके माध्यम से मैं ने यह सवाल उठाया था । उस पर प्रतिक्रिया देते हुए कुछ साथियों ने कहा था कि उस सवाल का सही जवाब तो आप ही (मैं ही ) दे सकते हैं तो कुछ ने कहा था कि ऐसी सोच बेटी को अच्छा संस्कार देने का  परिणाम है। वस्तुत: जब हम यादों के झरोखे  में बैठ कर घटनाओं की एक-एक सीढी पर सिलसिलेवार नजर  दौडाते हैं तो कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तरअपनेआप मिलने लगते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि उस सवाल का जवाब हर संवेदनशील पिता दे सकता है। तो आईए, उस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए चलें वर्षों, वर्षों और वर्षों पहले मेरे परिवार एवं आस-पडोस में ।

न्यु बैंक ऑफ इंडिया का नया प्रादेशिक कार्यालय पटना में खुला तो अक्टूबर 1990 में मेरा स्थानांतरण कोलकाता से पटना कर दिया गया। पटना के बुध कॉलोनी में जे.एल.पी. दिनकर के मकान में प्रथम तलपर बैंक लीज पर एक फ्लैट ले कर मैं सपरिवार शिफ्ट हो गया । तब मैं स्केल – 1 में राजभाषा अधिकारी था और मेरे परिवार में मैं, मेरी पत्नी पुष्पा प्रसाद, पुत्र कुमार पुष्पक (बाबू / मिंटू ) , पुत्री शिल्पा श्री (बबली) एवं शिप्रा (बाबू) ,  कुल पांच सदस्य थे । मैं मूल रूपसे पूर्वी चम्पारण जिले के एक गांव का निवासी एवं हिंदी से एमए था , मेरी पत्नी मेरे गृह जिला के मुख्यालय मोतीहारी में जन्मीं– पलीं – बढीं और दसवीं तक पढी थीं, वे गृहिणी थीं, बेटा पुष्पक  तीसरी क्लास में (आज वह एक एमएनसी में मैनेजर हैं, उनकी पत्नी आरती पुष्पक एमबीए हैं और एक एमएनसी में एचआर एग्जीक्युटिव की नौकरी छोड कर अपना बच्चा संभाल रही हैं) तथा बेटी शिल्पा श्री पहली कक्षा में ( आज वह एमए गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मीडिया की अच्छी – खासी नौकरी छोड कर अपना बच्चा और परिवार संभाल रही हैं , उनके पति सुमीत कुमार भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर हैं) और सबसे छोटी बेटी शिप्रा युकेजी में ( आज वह एक एमएनसी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैंतथा उनके पति अभिषेक आर्यन भी एक एमएनसी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं) पढ रही थीं।

दिनकर जी यूको बैंक में स्केल – 1 कृषि अधिकारी थे, वे कृषि विज्ञान में एमएससी थे ,  वे मेरे गृह जिला पूर्वी चम्पारण के ही एक कसबा के मूल निवासी थे, उनकी पत्नी रीता गुप्ता सातवीं तक पढी थीं, उनका मायका ससुराल के पास ही था, वे गृहिणी थीं। बडा बेटा संजीव कुमार (पप्पू) देहरादून में दसवीं में पढ रहा था, आज वह लोकप्रिय हड्डी रोग विशेषज्ञ (एमएस) है और उसकी पत्नी डॉ. प्रीति गुप्ता भी स्त्री रोग विशेषज्ञ (एमएस) हैं , दोनों मेरे गृह नगर मोतीहारी में प्रैक्टिस कर रहे हैं। पप्पू से छोटी अर्चना कुमारी (पिंकी) छठी क्लास में पढ रहीथी , आज वह लोकप्रिय स्त्री रोग विशेषज्ञ (एमएस) है और जामिया हमदर्द मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल दिल्ली में कार्यरत है, युपीएससी में भी उसका चयन हो गया है, उसके पति डॉ. पीयूष रंजन (एमडी) प्रसिद्ध फिजिशियन और एम्स दिल्ली में मेडिसिन के प्रोफेसर हैं। पिंकी से छोटा राजीव कुमार (गुड्डू) तीसरी क्लास में था, आज वह एक एमएनसी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तथा सबसे छोटा नवीन कुमार (सोनू) क्लास 2 में था, आज वह सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट है।

मेरे ही कार्यालय में उमेश झा स्केल – 1 अधिकारी थे और दिनकर जी के मकान में उसी फ्लोर पर सपरिवार रह रहे थे, ज़िस फ्लोर पर मैंने फ्लैट लिया । झा जी मुजफ्फरपुर के पास एक कसबे के मूल निवासी थे, अंग्रेजी से एमए थे , उनकी पत्नी साक्षर थीं , वे गृहिणी थीं और उनका मायका ससुराल के पास ही था । उनका सबसे बडा बेटा अभिषेक झा (मुन्ना) इंटर में पढ रहा था, उससे छोटी गुड्डी स्कूल नहीं जाती थी , प्राइवेट से परीक्षाएं दे रही थी, उससे छोटी जुली वाकर गंज गर्ल्स हाई स्कूल में पढ रही थी और सबसे छोटी मिली दूसरी क्लास में थी। झा जी की मिली और दिनकर जी के तीन बच्चे बुद्ध कॉलोनी में ही संत पॉल स्कूल में पढ रहे थे, मैं ने भी अपने तीनों बच्चों का उसी स्कूल में ऐडमिशन टेस्ट दिलवाया , तीनों सफल रहे और उन तीनों का भी नामांकन उसी स्कूल में हो गया, स्कूल हम सब के आवास से 200 मीटर की दूरी पर स्थित था।

दिनकर जी और मेरे परिवार की मातृभाषा भोजपुरी थी, झा जी की मैथिली जो भोजपुरी के काफी निकट है, हम अपने बच्चों से हिंदी में बात करते थे। हम तीनों के परिवार एक ही पृष्ठभूमि से थे ,  हमारा  पारिवारिक, सामाजिक और सांकृतिक परिवेश भी एक ही था, किंतु दिनकर जी की पारिवारिक आर्थिक स्थिति हम दोनों से थोडी बेहतर थी, हम तीनों उच्च शिक्षा प्राप्त थे, एक ही बोर्ड और युनिवर्सिटी में पढे थे, केवल कृषि विज्ञान की पढाई दिनकर जी ने अलग से की थी, तीनों राष्ट्रीयकृत बैंकों में एक ही वेतनमान में एक ही शहर में कार्यरत थे , तीनों गृहिणियों की शिक्षा – दीक्षा लगभग समान थी और तीनों के बच्चे समान स्तर की पढाई कर रहे थे , हालांकि आगे चल कर झा जी के परिवार में पढाई प्राथमिकताओं में नीचे खिसकती चली गई। तीनों परिवारों के बीच अपनापन और सौहार्दपूर्ण संबंध था। सभी एक दूसरे के दु:ख – सुख में शामिल होते , पर्व-त्योहार भी साझा होते, तीनों परिवारों के बच्चे सभ्य , सुशील और अनुशाशित थे , उन सबके बीच परस्पर संबंध भी मधुर थे जो आज भी है।

झा जी और मैं , वर्षों पहले न्यु बैंक ऑफ इंडिया की शाखा मुजफ्फरपुर में क्लर्क थे । वे उम्र और सर्विस में मुझसे सीनियर थे किंतु क्लर्क से अफसर मैं उनसे पहले बन गया था । झा जी अंग्रेजी से एमए तो थे किंतु साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से उनका कोई लगाव नहीं था, उनका व्यक्तित्व अंतर्मुखी था , उनकी पत्नी वोकल थीं, दोनों का व्यक्तित्व मिलनसार था, झा जी दफ्तर और घर तक सीमित थे। दिनकर जी और उनकी पत्नी अच्छे सामाजिक व्यक्ति एवं वोकल थे, प्राय: किसी न किसी को अपने घर दावत पर बुलाते और दोनों खुद भी किसी न किसी के यहां दावत पे जाते रहते।   यूको बैंक का प्रधान कार्यालय कोलकाता में था । मैं सात साल कोलकाता में कार्यरत रहा था, यूको बैंक के अनेक उच्चाधिकारी भी मुझे अच्छी तरह जानते थे , यूको बैंक की गृह पत्रिका यूको टॉवर में उनके सीएमडी और अन्य उच्चाधिकारियों के साथ मेरी तस्बीरें प्रकाशित हुईं थीं । झा जी नवम्बर 2011 में  वेतनमान – 1 में ही और दिनकर जी फरवरी 2013 में वेतनमान – 5 में  रिटायर हो चुके हैं, मैं अक्टूबर 2014 में वेतनमान – 4 में रिटायर हुआ हूं।

न्यु बैंक ऑफ इंडिया का पटना प्रादेशिक कार्यालय बिहार, उडीसा और असम राज्यों में स्थित शाखाओं का क्षेत्रीय मुख्यालय था, पहले ये सभी कोलकाता प्रादेशिक कार्यालय के ही अंग थे, अब कोलकाता केवल बंगाल राज्य की शाखाओं का ही क्षेत्रीय मुख्यालय रह गया था, चूंकि राजभाषा अधिकारी का पद क्षेत्रीय मुख्यालय से नीचे के कार्यालय में नहीं था और कोलकाता में अभी कोई नया राजभाषा अधिकारी पदस्थापित नहीं हुआ था, इसीलिए  चारों राज्यों में स्थित हमारे बैंक के कार्यालयों के राजभाषा संबंधी कार्यों को मैं ही देखता था जिसके चलते प्राय: दौरे पर जाया करता , राजभाषा के अलावा मैं कार्यालय का जन सम्पर्क एवं प्रचार अधिकारी भी था, मेरी अभिरुचि भी साहित्यिक–सांस्कृतिक गतिविधियों में थी, फलस्वरूप मैं  साहित्य जगत, मीडिया एवं ब्युरोक्रेसी के साथ-साथ बैंक के प्रधान कार्यालय दिल्ली में उच्चाधिकारियों के बीच भी लोकप्रिय था। यही वो बिन्दु था जहां से , हम तीनों ( दिनकर जी, झा जी और मेरा) का सब कुछ समान होते हुए भी, भाव-भूमि पर एक अनजानी – सी रेखा खींचती चली गई ।

दिनकर जी और झा जी , दोनों मुख्य धारा बैंकिंग के कार्यों से जुडे थे, इसलिए सामान्य लोगों में उनकी उपयोगिता अधिक थी किंतु , मैं हाई प्रोफाईल कार्यों से जुडा था, इसलिए टॉप लेवेल पर मेरी उपयोगिता अधिक थी, फलस्वरूप मैं लाईम लाईट में अधिक रहता। इन सब बातों की ओर झा जी और दिनकर जी के परिवार वालों का ध्यान पहले गया, मेरी पत्नी और बच्चों को इससे कोई फर्क नहीं पडता था क्योंकि मेरी इससे अधिक लोकप्रियता वे कोलकाता में देख चुके थे।अब झा जी और दिनकर जी की बातों में भी उस तरह की ग्रंथि महसूस होने लगी थी और कभी –कभी खुल कर भी वे लोग मुझे महज एक हिंदी अधिकारी बता कर बैंक में गैर – जरूरी अधिकारी साबित करने की कोशिश करते दिखते। तब तक पप्पू दसवीं कर देहरादून से वापस आ गया था और मुन्ना के साथ ए एन कॉलेज से इंटर कर रहा था । दोनों मेरा बहुत आदर करते, कभी – कभी दोनों अपने – अपने पापा के पक्ष में मेरे ऊपर कटाक्ष कर देते जो हमारे मधुर संबंधों से मेल नहीं खाता, शायद उन्हें ऐसा लगता कि उनके पापा बहसों में मुझसे पीछे रह जाते , संभवत: वे उन्हीं की कमी पूरी करते। एक बार मुन्ना ऑफिस में आया था , घर जा कर सबको बता रहा था कि उसके पापा कई लोगों से घिरे थे किंतु श्रीलाल अंकल के पास कोई नहीं था , वे चुपचाप अकेले काम कर रहे थे । उसका आशय यह था कि उसके पापा बहुत महत्त्वपूर्ण पद पर हैं । बीच – बीच में ऐसी बातों के बावजूद हमारे बीच सौमन्यता बनी रहती। मैं, मेरी पत्नी और हमारे बच्चे दिनकर जी और झा जी का बहुत आदर करते, मैं दोनों भाभियों का भी बहुत आदर करता  , होली – दिवाली जैसे त्योहारों पर मैं झा जी और दिनकर जी से तो हाथ मिलाता किंतु भाभियों के पांव छू कर आशीर्वाद लेता , वह रिश्ता आज भी वैसा ही है।

दोनों भाभियां मेरे तीनों बच्चों को बहुत प्यार करती थीं, शिप्रा यानी बाबू तीनों परिवारों में सबसे छोटी थी, इसीलिए सबकी दुलारी थी किंतु झा भाभी उसे विशेष प्यार करती और उसे चुहिया कहतीं।   झा जी और दिनकर जी अपनी पत्नी को “आप”  कहते और बच्चों को “तुम” कहते थे, मैं अपने बच्चों को “आप” कहता था, किंतु पत्नी को “तुम” कहता था । तीनों परिवारों के बच्चे स्कूल चले जाते, हमलोग बैंक चले जाते और गृहिणियां अपने – अपने काम निपटा आपस में बातें कर समय गुजारती। समय अपनी गति में चलता रहा । झा जी की सबसे छोटी बेटी मिली एक दिन अपने पापा से झगड पडी कि वे भी श्रीलाल अंकल की तरह अपने बच्चों को “आप” कहें , यह सुन कर मेरी पत्नी ने भी मुझसे कहा कि मैं भी उसे “आप”  संबोधित करूं। यह बात हंसी-हंसी में आई गई चली गई लेकिन हंसी – हंसी में उन लोगों में कभी कुछ ऐसी बात हो गई जिसका परिणाम भयंकर हो सकता था, किंतु …!

04 सितम्बर 1993 को न्यु बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नैशनल बैंक में विलय हो गया तो नवम्बर 1993 में मेरा स्थानांतरण क्षेत्रीय कार्यालय दरभंगा कर दिया गया , चूंकि बच्चों के स्कूल के सत्र मध्य मेरा ट्रांसफर हुआ था, इसीलिए, मैं अकेले दरभंगा गया, बीच-बीच में पटना आता रहा , बच्चों की परीक्षाएं हो जाने पर मार्च 1994 के बाद परिवार को दरभंगा ले गया । इस बीच दिनकर जी एवं झा जी के परिवार ने मेरे परिवार का पूरा खयाल रखा। दरभंगा में मेडोना इंग्लिश स्कूल में तीनों बच्चों का नामांकन हो गया । पुष्पक अपनी क्लास और फिर पूरे स्कूल में जल्दी ही पोपुलर हो गए। दरभंगा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र था , वहां बिहार का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन था , वहां से मेरे प्रोग्राम हमेशा प्रसारित होते रहते।दरभंगा में दो सरकारी और एक गैर- सरकारी, तीन विश्वविद्यालय थे, हर जगह कभी मुझे अतिथि वक्ता के रूप में तो कभी विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारों के संचान के लिए आमंत्रित किया जाता।किंतु उसके पहले ही , जब मैं दरभंगा में नया –नया ही था कि अनायास एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना हो गई।

समस्तीपुर रेलवे मंडल की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर दरभंगा रेलवे क्लब हाउस में विराट कवि सम्मेलन का आयोजन था , एक हिंदी अधिकारी होने के नाते मैं भी श्रोता के रूप में आमंत्रित था, उस कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे अविनाश जी, जो उस वक्त मिथिला विश्वविद्यालय में इंटर के छात्र थे, अच्छी कविताएं लिखते थे और अच्छा मंच संचालक माने जाते थे , बाद  में प्रसिद्ध पत्रकार और एनडीटीवी न्युज चैनल के आउटपुट एडिटर भी हुए । कुछ कवियों के काव्यपाठ के बाद अविनाश जी ने स्वयं काव्यपाठ किया और अचानक घोषणा कर दी कि कुछआवश्यक कार्य के चलते वे जा रहे हैं इसीलिए मंच संचालन किसी और से करा लिया जाए। मौजूद कवियों में कवि तो अच्छे थे किंतु उनमें से किसी की भी संचालन – क्षमता पर आयोजक रेलवे के वरिष्ठ हिंदी अधिकारी रामविलास महतो को भरोसा नहीं था और कवि सम्मेलन फ्लॉप होने पर रेलवे के उच्चाधिकारियों की नजर में महतो जी की भद्द पिटती, इसीलिए वे बार-बार अविनाश जी से रूकने का आग्रह कर रहे थे। अविनाश जी में ओवर कंफिडेंस था और शायद वह कहीं न कहीं अहंकार की सीमा तक पहुंच गया था , उन्होंने महतो जी का आग्रह ठुकरा दिया और अनायास संचालन के लिए मेरे नाम का ऐलान कर दिया, शायद उन्हें लगा होगा कि यह हिंदी अधिकारी भी कविता और कवि सम्मेलन के संचालन में फीसडी होगा तथा ना नुकुर करेगा तब उन्हें यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सभी हिंदी अधिकारी ऐसे ही बकलोल होते हैं और उन्हें एकछत्र संचालक होने का तमगा मिल जाएगा, किंतु सबकी सोच के विपरीत मैं श्रोता – दर्शक दीर्घा से उठा और माईक सम्भाल लिया। हकबकाए-से अविनाश कवियों के बीच बैठ गए।

उसके बाद तीन घंटों तक कवि सम्मेलन चला, अविनाश जी कहीं नहीं गए , पूर तीन घंटे बैठे रहे। दीपक जी, जो उस वक्त मिथिला विश्वविद्यालय में एमए (हिंदी) फाईनल इयर के छात्र थे और आज नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली में सम्पादक हैं, तथा अन्य लोगों, कवियों सहित रेलवे के उच्चाधिकारियों ने भी मुझे घेर लिया और सभी मेरी प्रशंसा के पूल बांधने लगे। अविनाश जी भी सकुचाए हुए आए और सॉरी बोलते हुए बडी ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार किया कि मुझे हुट कराने के साथ-साथ स्वयं को एकछत्र संचालक साबित करने के लिए ही उन्होंने वह चाल चली थी, उसके बाद अविनाश मेरे शिष्य बन गए और अपनी कविताएं शुद्ध कराने के लिए मेरे पास आने लगे। मैं ने कुछ दिनों बाद एक बडे कार्यक्रम में घोषणा की थी कि अविनाश अहंकार से बचें तो एक दिन हिंदी पत्रकारिता के राजकिशोर बनेंगे ( राजकिशोर जी 80के दशक में कोलकाता में हिंदी पत्रकारिता करते थे और देश के प्रशिद्ध निर्भीक पत्रकार हुए) , वर्षों बाद मेरी भविष्यवाणी सही साबित हुई और अविनाश  हिंदी दैनिक प्रभात खबर के स्थानीय संपादक तथा एनडीटीवी में आउटपुट एडिटर के महत्त्वपूर्ण पदों तक पहुंचे किंतु फिर उनका अहम आडे आ गया , आज न जाने वे कहां हैं , हो सकता है किसी अच्छी पोजिशन में ही हों लेकिन गुमनामी तो है ही।

उस घटना के बाद क्षेत्र के साहित्य जगत में मेरी लोकप्रियता ऐसी हो गई कि दरभंगा एवं आसपास के शहरों में कवि सम्मेलन या मुशायरा की तिथियां मेरी डेट्स लेने के बाद ही निर्धारित की जाने लगीं । उन्हीं दिनों मेडोना इंग्लिश स्कूल का वार्षिकोत्सव सम्पन्न हुआ , जिसमें कई आईएएसऔर आईपीएस अधिकारियों के साथ-साथ शहर के गणमान्य व्यक्ति , अभिभावक एवं छात्र-छात्राएं , लगभग दो हजार दर्शक थे, मुख्य अतिथि थे दरभंगा के मंडलायुक्त आलोक चन्द्र रंजन आईएएस और चार घंटों के पूरे कार्यक्रम के संचालन ( कम्पीयरिंग) के लिए दो कलाकारों को आमंत्रित किया गया था – एक थे कुमार पुष्पक एवं दूसरे थे उनके पिता श्रीलाल प्रसाद यानी मैं। वह कार्यक्रम हर किसी के लिए कौतुहल भरा था क्योंकि ऐसे किसी भी महत्वपूर्ण कार्यक्रम के संचालन में बाप – बेटे की युगलबंदी न किसी ने सुनी थी और न देखी थी। कार्यक्रम के बाद रंजन साहब ने विशेष तौर पर हम दोनों से मिल कर बधाईयां दी, अपने घर और दफ्तर आने का निमंत्रण  दिया। तब से वे किसी से मेरा परिचय अपना दोस्त कह कर कराते , बाद में वे बिहार और झारखंड, दोनों ही राज्यों में कई मंत्रालयों के प्रधान सचिव बने। उस कार्यक्रम ने हम बाप – बेटे को अतिरिक्त रूप से लोकप्रिय बना दिया।

आठवीं पास करने के बाद एक दिन पुष्पक ने बताया कि उनका सबसे प्रिय मित्र छवि प्रकाश अब पटना डॉनबॉस्को स्कूलमें पढेगा, इसीलिए वह भी वहीं पढना चाहते हैं। डॉनबॉस्को पटना के टॉप स्कूलों में से एक था, उसके प्रिंसिपल मिस्टर रेजेरियो थे जो बिहार( तब तक झारखंड अलग राज्य नहीं बना था) विधान सभा  में ऐंग्लोइंडियन प्रतिनिधि के रूप में मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत थे। मेडोना इंग्लिश स्कूल के प्रिंसिपल सर माईकल की प्रेरणा से पुष्पक का नाम डॉनबॉस्को स्कूल में लिखा दिया गया । वहां उनकी प्रगति अच्छी नहीं रही और बीच–बीच में वे कई बार बीमार भी पडे, अत: दोनों ( छवि और पुष्पक)  दरभंगा वापस बुला लिए गए, यहां रोज पब्लिक स्कूल में उनका नामांकन करा दिया गया। अब वे पूरी तरह किशोरावस्था में पहुंच गए थे । कम बोलना, मधुर बोलना और दूसरों की ज्यादा सुनना बचपन से ही पुष्पक की विशेषताएं रहीथीं , रोज पब्लिक स्कूल में उनके कई नये दोस्त बने जिनमें एक लडकी उनके लिए खास बन गई। अब पुष्पक के दो खास दोस्त थे – छवि प्रकाश और वह लडकी ।

शिल्पा और शिप्रा मेडोना इंगलिश स्कूल में ही पढ रही थीं, दोनों एक ही स्कूल – रिक्शे में जातीं – आतीं । दोनों पढने में ठीक थीं, शिप्रा थोडी बेहतर थी। दोनों की आखों में कुछ समस्याएं थीं । किंतु शिल्पा की आंखों में एक साथ कई घाव (अंखीझनी) निकल आते थे। कुछ दिनों तक तो ऐसा होता रहा कि हर टर्मिनल एग्जाम के समय शिल्पा को अंखीझनी निकल आते थे।ऐसे ही क्षणों में मेरी बेटी एक दिन कलप – कलप कर रोती हुई बोली कि परीक्षाओं के समय ही ये घाव क्यों निकलते हैं? उसका सीधा – सा अर्थ यह था कि उसे यह आशंका सता रही थी कि कोई यह न समझ ले कि परीक्षाओं से बचने के लिए वह बहाना बना रही है। मैंने उसकी आशंका को भांप लिया और उसे प्यार से समझाया कि कोई भी ऐसा नहीं समझेगा, क्योंकि आपकी आंखों में निकले घाव सबको दिख रहे हैं। दरभंगा उत्तर विहार का सबसे बडा मेडिकल सेंटर है, मैं ने अच्छे से अच्छे नेत्र रोग विशेषज्ञ से दोनों बेटियों की आंखों की जांच कराई, दोनों को चश्मे लग गए, शिप्रा को तो कोई समस्या नहीं हुई किंतु शिल्पा उसके बाद भी कई सालों तक अंखीझनी से परेशान रही, पढाई में उसकी प्रगति थोडी धीमी होने का सबसे बडा कारण वही रहा था।

एक दिन पुष्पक और शिल्पा में किसी बात को ले कर अनबन हो गई , मैं ऑफिस से घर आया तो दोनों से पूछताछ की , फिर अकेले में पुष्पक को समझाया कि आप सबसे बडे हैं, इसीलिए आपको ज्यादा समझदारी से काम लेना चाहिए, यह बात पुष्पक को अछी नहीं लगी, उन्होंने धीमी आवाज में किंतु दृढता से कहा कि “वही गलती बबली या बाबू करती है तो आपलोग उन्हें नहीं डांटते किंतु वही गलती यदि मैं कर दूं तो आपलोग डांटते हैं”। उनका सीधा आशय था कि हम उनसे ज्यादा दोनों बेटियों को मानते थे। यह वाकया बेहद चौंकाने वाला था क्योंकि वह बिलकुल अनजानी सोच थी । मैं चिंता में पड गया , बहुत इमोशनल हो गया , मैं ने पूछा कि आपको कब और क्यों ऐसा महसूस हुआ? बेटे ने इसका जवाब टाल दिया। मैं ने बडे इत्मीनान से समझाया कि वैसा बिलकुल नहीं है बेटा, लेकिन एक क्षण के लिए वैसा हो भी तो सोचिए कि हमारी सामाजिक परम्पराओं के अनुसार बेटियां व्याह कर मां-बाप से जुदा हो कर दूसरे के घर चली जाती हैं, बेटे हमेशा मां-बाप के साथ रहते हैं, मां-बाप के उत्तराधिकारी तो होते ही हैं, उनके बुढापे का सहारा भी माने जाते हैं , ऐसे में लोगों पर यह आरोप लगता है कि अपने स्वार्थ के लिए मां-बाप बेटियों से अधिक बेटों का खयाल रखते हैं ताकि बुढापे में बेटे उनका खयाल रखेंगे। किंतु यहां तो उल्टी बात है , इसीलिए बेटा, आप ऐसी बात कह कर अनजाने में हमारा मान बढा रहे हैं और यह साबित कर रहे हैं कि आप के मां-बाप स्वार्थी नहीं हैं।

“ हम चार बहन और तीन भाई थे”  मैं अपने बेटे को बता रहा था, “ मैं हाई स्कूलमें पढ रहा था , एक दिन किसी बात पर मैं ने अपनी छोटी बहन को जोर से डांट दिया, मेरे पिता जी वहीं थे, बिना कुछ पूछे ही उन्होंने मुझे एक जोरदार झापड रसीद कर दिया, तब मैं ने वैसा ही सोचा था बेटा, जैसा कि अभी आप सोच रहे हैं , लेकिन पिताजी के उस झापड का मर्म मुझे तब समझ में आया जब एक-एक कर मेरी बहनें व्याह कर हमसे दूर होती गईं , वैसे ही बेटा , हो सके कि अभी मेरे बहुत समझाने पर भी आप नहीं समझ पाएं परंतु जब आप की बहनें व्याह कर जाने लगेंगी तब आप को इस डांट का मर्म समझ में आएगा ( मेरा वह वाक्य अब सिद्ध भी हो चुका है, मेरी दोनों बेटियां   शादी कर हमसे विदा हो चुकी हैं और मेरा बेटा संसार के सर्वोत्तम भाइयों में से एक साबित हुआ है  जो अपनी बहनों का बहुत खयाल रखता है)। जिन लोगों के जीवन में संवेदना और भावना का कोई स्थान नहीं है, उन्हें हमारा वह वार्तालाप कथा –  कहानी जैसा यानी कपोल कल्पना जैसा  लगेगा, लेकिन मैं बता दूं कि मैं घटनाओं को उसी रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं जिस रूप में वे घटित हुईं, यह भी बताना चाहूंगा कि मेरा बेटा जब एक माह का था , तब से मैं उसे चिट्ठियां लिखता था , जब पत्नी को पत्र लिखता था तो उस लिफाफ में एक पत्र बेटे  के लिए भी होता था, पत्नी मेरी सारी चिट्ठियों को सहेज कर रखती थीं , आज भी मेरे व्यक्तिगत लाईब्रेरी में वे सभी चिट्ठियां हैं । 1983 में मां और 1984 में पिता जी स्वर्ग सिधार गए, फिर एक-एक कर मेरे भाई-बहनों की शादी हो गई , तो मैं , पत्नी और बच्चे हमेशा साथ ही रहने लगे, तब चिट्ठियों का सिलसिला बंद-सा हो गया। हालांकि चिट्ठियों वाली बात मैं ने अपने बेटे को अभी तक नहीं बताई है। मैं अपने बच्चों से वैसे ही बात करता हूं जैसे अपने पिता जी से करता था और मेरे बच्चे मुझसे वैसे ही बात करते हैं जैसे वे अपने दोस्तों से बतियाते हैं।

हम सबको इतिहास और प्रकृति बहुत पसंद है, जंगल, पहाड और झरने तथा ऐतिहासिक पुरातात्त्विक स्थल, हमें बहुत आकर्षित करते हैं। हम सब ने तय किया कि दक्षिणी बिहार ( तब झारखंड नहीं बना था) के जंगलों- पहाडों और ऐतिहासिक स्थलों को देखा जाए। इन्हीं तैयारियों के बीच एक दिन मैं ने महसूस किया कि शिल्पा बहुत उदास है।मैं ने कारण पूछा तो रोने लगी, थोडा और प्यार जता कर पूछा तो बोली कि “ मैं माझिलहूं न” , मैंने कहा,  इसका मतलब? वह बोली “बडा बेटा बाप का और छोटी बेटी मां की, माझिल तो किसी की भी नहीं है न”।   मेरे पांवों के नीचे की जमीन खिसकती महसूस हुई। मैं ने पूछा कि “ बेटा, ऐसा बिचार आया कैसे आप के मन में, आप तीनों हमारे लिए बराबर हैं,  आप ही बताईए कि हाथ में पांच उंगलियां हैं, बारी – बारी से सभी उंगलियों में सूई चुभोई जाए तो क्या किसी में कम और किसी में ज्यादा दर्द होगा?” बेटी ने कहा – “नहीं” , “ तो फिर बड, छोट और माझिल का भेदभाव कहां से और कैसे समझ में आया “ ? अभी वार्तालाप चल ही रहा था कि पत्नी ने हांक लगाई, “गाडी वाले का फोन था, वह सुबह सात बजे गाडी ले कर आ जाएगा, पैकिंग तो कर लीजिए”।  तब तक मोबाईल फोन प्रचलन में नहीं आया था, लैंडलाईन फोन ही था। सुबह भाडे की एकमारुति वैन ली और हम जंगलों- पहाडों  की ओर निकल पडे। … ….. अगली कडी में भी जारी …

श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम

12 जुलाई ,2015

 

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