क्या खास है हम में और क्यों है

12 जुलाई के पोस्ट से आगे..

वह मारुति वैन प्राईवेट गाडी थी और भाडे पर भी चलती थी, उसका ड्राईवर 19 – 20 साल का शंकर मेरे गृह नगर मोतीहारी का ही निवासी था और बहुत दिनों से दरभंगा लहेरियासराय में रहता था ।परिचय होने पर वह मुझे जीजा जी कहने लगा क्योंकि उसका मूल निवास मेरी ससुराल वाले मुहल्ले की तरफ ही था। गाडी चलाते हुए वह बातें बहुत ज्यादा करता था, लम्बी ड्राईव पर कहीं उसे नींद न आ जाए, इसीलिए मैं भी बातों में उसका पूरा साथ देता , हालांकि पत्नी और बच्चों को वह बातचीत नागवार गुजरती क्योंकि हम दोनों के लगातार बोलते रहने से उन्हें आपस में बातें करने में असुविधा महसूस होती या सोना चाहते तो नींद में खलल पडती । हम घर से ही पराठे, सब्जी और अचार ले कर चले थे, पांच लीटर वाला थर्मस भी खरीद लिया था जिसमें पानी ठंढा रहता था। वह थर्मस आज भी हमारे पास है और सही सलामत है , बस, उपयोग नहीं रह गया है अब उसका क्योंकि अब तो हर जगह बोतलबंद ठंढा पानी मिल जाता है। ढाई – तीन घंटे चलने के बाद रास्ते में रुक कर हम सबने खाना खाया और फिर चल पडे ।

कहना न होगा कि ड्राईवर शंकर भी अब हमारे परिवार का हिस्सा जैसा हो गया था , थोडी देर बाद वह हमारा फोटोग्राफर भी बन गया। वसंत ऋतु थी, जिधर नजर जाती, सरसों के पीले – पीले फूलों से अटे-पटे खेत नजर आते मानो धरती ने धानी चुनर ओढ ली हो और उस पर सितारे टांक दिए गए हों।  बडा रोचक और मोहक दृश्य था, हम गाडी रोकते और सरसों के खेतों में घुस कर फोटो खींचते (उनमें से कुछ फोटो आज भी हमारे ड्राईंग रूम की दीवार पर लगे हैं) , तब मोबाईल तो था नहीं और न डिजिटल फोटोग्राफी ही थी, रील वाला कैमरा था, फोटोग्राफी महंगी थी, फिर भी कहीं-कहीं कुछ फोटो हम शंकर के भी खींच देते। ऐसे ही हर क्षण में पिकनिक का माहौल समेटे हम जैन तीर्थस्थल पावापुरी होते हुए शाम को बौद्ध विहार नालंदा पहुंचे ।

नालंदा के पास में राजगीर है जहां बैंक का होली डे होम था, एस एल पाण्डेय बिहार शरीफ ( नालंदा और राजगीर से 20 किलोमीटर की दूरी पर जिला मुख्यालय) में बैंक के डीसीओ थे, वे उसके पहले दरभंगा क्षेत्रीय कार्यालय में वरिष्ठ प्रबंधक थे,  मैं ने पहले ही उनके माध्यम से होली डे होम में दो कमरे दो दिनों के लिए बुक करा लिए थे । हमने वहीं रात्रि विश्राम किया । सुबह राजगीर के गर्म जल कुंड में स्नान किया, जंगल में पहाड पर बने बौद्ध शांति स्तूप देखने इलेक्ट्रिक ट्रॉली से गए, बुद्ध की तपस्थली देखी और नालंदा विश्वविद्यालय का अवशेष देखा । वह अवशेष भव्य है , कहा जाता कि है देश – विदेश के राज कुमार और अन्य छात्र विद्याध्ययन के लिए वहां आते थे । अब नालन्दा केन्द्रीय विश्वविद्यालय भी हो गया है , नालंदा ओपेन युनिवर्सिटी तो पटना में पहले से ही कार्यरत है।

नालन्दा के अवशेष के निकट मुख्य सडक पर हमारी गाडी खडी थी, हम अवशेष देख कर बातें करते हुए वापस गाडी की तरफ जा रहे थे, सडक के दोनों ओर रंग-विरंगे फूलों से लदे हरेभरे पेड थे , वसंत ऋतु थी, चारों तरफ सुहाना नजारा था। अचानक लगा कि हम में से कोई एक कम है, मुड कर देखा तो मेरी सबसे छोटी बेटी शिप्रा ( जिसे हम सब बाबू कहते हैं और उसमें मासूमियत इतनी कि आज एक एमएनसी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो जाने और शादी हो जाने के बाद भी वह वैसी ही लगती है और उसके बचपन के खिलौने और पेंटिंग बॉक्स हमने अब भी सम्भाल कर रखे हुए हैं ) बहुत पीछे रह गई है और एक पेड के पास खडे हो कर हम सब को जाते हुए एकटक देख रही है। उस वक्त उसकी उम्र 8 – 9 साल की थी, हम सब ने उस बात को स्वाभाविक रूप से सामान्य समझा और सोचा कि या तो कोई चीज देखने में वह मशगुल हो गई होगी या थक कर खडी हो गई होगी, मैं पीछे मुड कर उस तक पहुंचा और उसका हाथ पकड कर बोला- “ चलिए बेटा, आप यहां क्यों रूक गईं, थक गई हैं क्या ” ? बेटी मेरी रो रही थी, उसने अपना हाथ छुडाते हुए कहा – “ आप जाईए पापा, भैया और बबली (बडा बेटा पुष्पक और मझली बेटी शिल्पा) तो आपलोगों के पास हैं ही,   एक मेरे न होने से क्या बिगड जाएगा ” ? बेटी की मुख – मुद्रा देख कर और उसके वे शब्द सुनकर मैं कांप गया , सुन्न – सा हो गया, ऐसा लगा कि किसी ने नालंदा के सबसे ऊंचे अवशेष से गहरी खाई में मुझे ढकेल दिया हो और मैं बिना सहारा लुढकता चलाजा रहा हूं, मैं धम्म-से बेटी के पास पेड के नीचे निढाल हो कर बैठ गया और उसे सीने में भींच कर बच्चे की तरह फुट-फुट कर रो पडा।

यकीन मानिए, इन पंक्तियों को लिखते समय भी मेरी मनोदशा वैसी ही हो गई है, चश्मा के दोनों शीशे भींग गए हैं, लैपटॉपके स्क्रीन पर सब कुछ धुंधला नजर आ रहा है और मैं ने टाईप करना बंद कर दिया है। ऐसा पिछले कई दिनों से हो रहा है और इस प्रसंग की इन पांच – सात पंक्तियों को लिखने में पांच –सात दिन लग गए हैं। मेरी ऐसी स्थिति केवल अभी ही नहीं, बल्कि वह दृश्य जब भी मेरे मानस-पटल पर उभर आता है और बेटी  के वे शब्द याद आ जाते हैं, मैं अपने आंसू नहीं रोक पाता हूं।

हम दोनों को बैठे हुए देख कर मेरी पत्नी पुष्पा, बेटा पुष्पक और बेटी शिल्पा श्री भी वापस हमारी तरफ आने लगे, तब तक मैं ने बाबू को समझा दिया  कि अभी उन लोगों को हम लोग कुछ भी नहीं बतलाएंगे, बाद में इस विषय पर बात करेंगे और जब तक वे लोग हम तक पहुंचते, हम दोनों भी सामान्य होने की भरपूर कोशिश करते हुए आगे उन लोगों की तरफ बढ गए। पत्नी ने पूछा , क्या हुआ, मैं ने कह दिया ,कुछ नहीं, बस ऐसे ही , बाबू थक गई है, पत्नी ने उसे गोद में उठा लिया। लेकिन ऐसा नहीं कि मेरी बातों पर सब ने पूरा यकीन कर लिया हो, क्योंकि हम सब संवेदना के स्तर पर इस कदर एक- दूसरे से जुडे हुए हैं कि बिना कहे हम एक –दूसरे की बहुत-सी बातें समझ जाते हैं लेकिन उसे एक-दूसरे पर जाहिर नहीं होने देते हैं।

इसी सिलसिले में एक और बात मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं जो हम पांचों में थोडा कम या ज्यादा, कॉमन है। हम बहुत जल्दी रो देते हैं। उन दिनों, जब केवल दूरदर्शन चैनल ही था , हर रविवार को शाम को चार बजे कोई न कोई हिंदी फिल्म जरूर आती थी, उस वक्त तक हम में से हर कोई अपना काम निपटा कर 14 ईंच के ब्लैक ऐंड ह्वाईट टेलीविजन के सामने बैठ जाता था। फिल्म की कहानी में हम साथ – साथ चलते, फिल्म के नायक- नायिका से हमारा साधारणीकरण यानी तादात्म्य शीघ्र ही स्थापित हो जाता था और उनका सुख-दुख हमारा सुख-दुख लगने लगता था, जब वे किसी मुश्किल में पडते तो हम बेचैन हो जाते , वो रोते तो हम भी रोने लगते, ऐसे में हम में से हर कोई अपने आंसू एक – दूसरे से छुपाने की कोशिश करता, और यदि किसी के रोने की आवाज मुंह से बाहर आने को हो आती तो वह किसी न किसी बहाने बाथरूम चला जाता और मुंह – हाथ धो कर आता, इसमें मेरी पत्नी थोडी अलग थी, वह अन्य बातों में तो मिनटों में रो देती है किंतु सिनेमा देखने में हम लोग जैसे हर भावुक दृश्य पर नहीं रोती। हमारी स्थिति आज भी वैसी ही है,  लेकिन अब एक साथ वैसे बैठ कर फिल्म देखने का मौका नहीं मिलता।

आज भी , जब मेरे तीनों बच्चे बालिग हो चुके हैं, शादीशुदा हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त और अच्छी जॉब पोजीशन में हैं, तथा बेटा बाप बन गया है और एक बेटी मां बन गई है, तब भी हम जब उन्हें एअरपोर्ट या रेलवे स्टेशन पर छोड के आते हैं तो पत्नी बहुत देर तक रोती रहती है, मेरी भी स्थिति कुछ भिन्न नहीं होती, फिर भी हम दोनों में से कोई किसी को सम्भालता नहीं बल्कि दोनों खुद सम्भल जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि बच्चे भी बिछडने के बाद हमारी ही स्थिति में रहे होंगे और अब सम्भल गए होंगे। ऐसा भी नहीं कि हम में डांट – डपट नहीं होती, किंतु किसी एक इश्यु को लेकर की गई डां-डपट किसी दूसरे मामले में शिफ्ट नहीं होती, उसका समापन भी ऐसी ही संवेदनशीलता से होता। हमलोग होलीडे होम आए, खाना खाए, छोटी बेटी बाबू को अपने बीच में सुला कर पति-पत्नी दोनों तरफ से बेटी को गोद में समेट कर सो गए।

हम पति-पत्नी, दोनों अन्दर से बेचैन थे।  जब लगा कि बेटी को नींद आ गई तो पत्नी उठ कर बैठ गई, धीरे से पूछा, क्या हुआ था ? मैं भी उठ कर बैठ गया और पूरी बात बता दी।  मैं चिंतित हो कर बोला कि जिस तरह का व्यवहार या बातचीत हम अपने बच्चों के बारे में कल्पना में भी नहीं सोचते, वे बातें उनके दिमाग में आई कैसे और कहां से? कुछ दिनों पहले बेटे पुष्पक ने जो कुछ कहा था , उसका आशय था कि हम उससे ज्यादा दोनों बेटियों को मानते हैं, इस यात्रा पर निकलने के एक दिन पहले बेटी शिल्पाश्री ने जो कुछ कहा था उसका आशय था कि बडे बेटे को बाप ज्यादा प्यार करते हैं  और छोटी बेटी को मां ज्यादा प्यार करती है तो फिर मझली बेटी के हिस्से तो किसी का भी प्यार नहीं और आज सबसे  छोटी बेटी शिप्रा ने जो कुछ कहा , उसका आशय है कि दो के बाद वह तीसरी अनपेक्षित है। एक-एक कर तीनों बच्चों ने लगभग एक ही तरह की बात की है, कहीं उन्हें स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने, अपनी सोच विकसित करने और विचार व्यक्त करने की आज़ादी हमने समय से पहले तो नहीं दे दी, कहीं जाने-अनजाने हम से ही ऐसी कोई बात तो नहीं निकल गई, कहीं तुमने तो ऐसी बात कभी नहीं बोल दी या बच्चों को पालने का हमारा पूरा तरीका ही तो कहीं गलत नहीं ? आखिर हमसे चूक कहां हुई? पत्नी से ये बातें करते हुए मेरा गला भर आया।

पुष्पा ने कहा- “ नहीं ,ऐसा बिलकुल नहीं है, इस तरह की बात तो हम मजाक में भी नहीं करते, मुझे कुछ-कुछ समझमें आ रहा है” , पुष्पा  कुछ बोलतीं, उसके पहले ही बाबू भी उठ कर बैठ गई और रोने लगी –  “ नहीं पापा , आपलोगों ने कुछ नहीं कहा है , आप बिलकुल गलत नहीं , आपलोग दुनिया के सबसे अच्छे मां – बाप हैं ” । मेरी बेटी सो नहीं रही थी, उसकी आंखों से भी नींद वैसे ही गायब थी , जैसे हमारी आंखों से,  वह इतना तो समझ ही गई थी कि उसकी बातों से मां और पापा बहुत दुखी हैं। “ तो फिर आप ने वैसा क्यों कहा बेटा, उस तरह का बिचार आपके मन में कहां से आया “ ? मैं ने पूछा तो बेटी ने कहा –   “ जब हमलोग पटना में थे तो झा आंटी ऐसा बोल रही थीं कि हम दो, हमारे दो, यह तीसरी क्यों आ गई ”। मैं ने कहा कि बेटा, दो साल पहले झा आंटी ने जो कुछ कहा, उसे आपने याद रखा!  फिर भी, दो साल पहले की बात आप को आज अचानक क्यों और कैसे याद आ गई  ? “पता नहीं”। बडी मासूमियत से बेटी ने कहा । दरअसल, आज भी वह कई बातों में बडी मासूमियत से कह देती है- पता नहीं , उसमें कोई बनावटीपना नहीं होता।

पुष्पा ने कहा कि उसका अंदेशा सही निकला, शिल्पा और पुष्पक से भी पूछा जाए। हमारे कमरे से लगा हुआ एक दूसरा कमरा था जिसमें शिल्पा और पुष्पक सो रहे थे, हम उन्हें भी अपने पास ले आए । शिल्पा ने भी यही कहा कि झा आंटी बोल रही थीं, पुष्पक ने भी कुछ वैसी ही बात कही, हालांकि पुष्पक से वही बात दस साल बाद भी किसी ने कही ( इस पर फिर कभी किसी अगली कडी में बात होगी ) । मैं ने कहा कि बेटे, किसी और के कहने पर ही सही, आप तीनों के मन में तो एक ही तरह की बात आई, इससे एक बात तो साफ हो गई कि आप के मां – बाप आप तीनों को समान रूप से प्यार करते हैं, वरना किसी को हमसे शिकायत होती तो कोई हमें अपनी ओर तो समझता। तीनों बच्चे बहुत सेंटीमेंटल हो गए, उन्होंने एक साथ कहा- सॉरी पापा , सॉरी मां, प्लीज इस बात को वैसे ही भूल जाईए ,जैसे हम और बातों को भूल कर आगे बढ जाते हैं, ऐसा समझिए कि इस तरह की कोई बात हुई ही नहीं थी। दरअसल, हम करते भी थे वैसे ही, किसी बात पर किसी को डांट पडी तो थोडी ही देर में उसे दरकिनार कर सामान्य रूप से बात करने लगते थे, क्योंकि हमारा मानना था और आज भी मानना है कि कोई भी व्यक्ति न पूरी तरह गलत होता है और न पूरी तरह सही होता है , उसका कार्य विशेष गलत या सही होता है, इसीलिए बात व्यवहार भी वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। मेरा बेटा मुझे मेरे उसी शास्वत सिद्धांत की याद दिला रहा था। आज कल राजनीति में इस्तेमाल किए जा रहे ” मुद्दा आधारित समर्थन या विरोध ” की नीति के आधार पर इसे समझा जा सकता है ।

सुबह हम सभी तैयार हो कर आगे की यात्रा पर निकल गए, रामगढ से आगे रजरप्पा मंदिर में देवी छिन्नमस्तका के दर्शन किए, हुंड्रू फॉल, जोन्हा फॉल, सीता फॉल, दशम फॉल आदि देखे, रांची शहर के  दर्शनीय स्थलों को देखा, हुंड्रू फॉल जाने में जंगलों में हाथियों के झुंड देखे, वापसी में हजारीबाग अभयारण्य देखा, तीन दिनों तक जंगलों, पहाडों, झरनों और जंगली जानवरों के बीच से गुजरते हुए शेरघाटी के जंगल से हो कर हम बोध गया पहुंचे, बोधिवृक्ष के पास बैठ कर ध्यान किया किंतु शांति नहीं मिली , मैं जल्द से जल्द पटना पहुंच कर झा भाभी से बात करना चाहता था।  वह पूरी  यात्रा बहुत ही विविधताओं से  भरी  और एडवेंचरस रही थी, जंगलों में बहुत-से मानवीय पहलुओं को  प्रत्यक्ष देखने-समझने का अवसर मिला था, उन सब अनुभवों पर  कभी इत्मीनान से अलग से बात होगी, अभी तो पटना पहुंच कर झा भाभी से बात करने की जल्दी है।

रात के दस बजे हम पटना दिनकर जी के उसी मकान में पहुंचे जहां तीन साल तक मैं किराएदार के रूप में रहा था, झा जी का परिवार अभी भी वहीं रह रहा था, दिनकर जी, झा जी और मेरे , तीनों परिवार के सभी लोग एक साथ बहुत दिनों के बाद मिले थे, भोजन के बाद हम सभी देर रात तक बातें करते रहे, उसी बीच बात-बात- में मैं ने अपने तीनों बच्चों से हुई बातें रख दीं, झा भाभी याद करते हुए बोली – “ हां, एक दिन हमलोग गप्प कर रहे थे , तो मजाक-मजाक में मैं ने वे बातें कही थी , जिस पर सभी हंस पडे थे, उस दिन स्कूल बंद था, इसीलिए बच्चे भी घर पर ही थे,  लेकिन वो तो मजाक की बातें थीं, उसे इतना सीरियसली क्यों लेते हैं। मैंने उन बातों के असर के बारे में जब उन्हें बताया तो वे बहुत दुखी हुईं, लेकिन वे मूल रूप से बहुत हंसमुख और खुशमिजाज स्वभाव की महिला हैं इसीलिए उस वक्त भी उन बातों को हंसी में उडाते हुए उन्होंने बडे प्यार से तीनों को झिडकी दी –   “ बाबू, बबली और मिंटू , तुम  लोग इतने बडे हो गए हो कि मेरी बात को गांठ में बांध लिया  और मां-बाप को रुला दिया, तुम्हारे मां-बाप इस धरती के सबसे अच्छे मां-बाप हैं ” , इतना कहते-कहते वे खुद रुआंसी हो गईं। पिछले एपीसोड में मैं बता चुका हूं कि दिनकर जी के तीन बेटे और एक बेटी यानी चार बच्चे थे, झा जी के भी एक बेटा और तीन बेटियां यानी चार बच्चे थे,   इस तरह चार की संख्या में कोई एक माझिल नहीं कहला सकता और चूंकि  मेरे एक बेटा और दो बेटियां यानी तीन बच्चे थे जिसके अनुसार बड, छोट और माझिल का कंसेप्ट मेरे ही बच्चों पर लागू होता था , किंतु चार बच्चों में तीसरा और चौथा तो हम दो, हमारे दो के बाद के ही हुए, फिर भी दिनकर जी और झा जी के चार – चार बच्चों में से  किसी  बच्चे पर झा भाभी की बातों का  कोई असर नहीं हुआ  , चूंकि  मेरे बच्चे ज्यादा  सेंटीमेंटल हैं और  उन लोगों से उस तरह की बातें हम मजाक में भी  नहीं करते थे , इसीलिए झा भाभी का मजाक मेरे बच्चों को ही ज्यादा लगा वरना इस तरह का मजाक तो आम बात  थी । सुबह नाश्ते-पानी के बाद हम दरभंगा के लिए विदा हो गए।

रास्ते भर मैं सोचता रहा और अपने सिद्धांतों , अपनी नीतियों, बच्चों से किए जा रहे अपने मित्रवत  व्यवहारों की समीक्षा करता रहा, मन ही मन तर्कवितर्क करता रहा , अंत में मेरे मन ने संतोष व्यक्त किया कि अच्छा हुआ कि बच्चों को खुलकर अपनी बात रखने की मैं ने छूट दे रखी थी, वरना वे अपनी बात  किसी और से शेयर करते और संभव था कि उनका दुरूपयोग होता , ऐसा तो और घरों के बच्चे भी सोचते होंगे, लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता होगा या वे उसके लिए साहस नहीं जुटा पाते होंगे और अन्दर ही अन्दर घुट कर रह जाते होंगे।

दरअसल कई बार ऐसा होताहै कि कोई बात हमारे अवचेतन मन में बैठ जाती है और जब भी उससे मिलता-जुलता प्रसंग सामने आता है या याद आ जाता है तो हम अचानक उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर जाते हैं, किसी एक को ऐसे प्रसंग की हवा कहीं से  लगी तो पुरानी बातें याद आ गईं  , फिर दूसरे और फिर तीसरे तक उस याद ने अपने पंख फैला दिए। यही बात मेरे बच्चों के साथ हुई थी । इसे स्वप्न सिद्धांत के आधार पर भी समझा जा सकता है।  इसीलिए बच्चों के सामने बडों को कुछ बोलने के पहले तोलना चाहिए, क्योंकि बच्चों का हृदय कच्ची मिट्टी की तरह होता है, उन्हें गढने के पहले अपने हाथों को भी तरल करना होता है। आज भी हम एक-दूसरे के बिचारों को खुल कर व्यक्त होने देते हैं, एक-दूसरे को पूरी भावुकता और संवेदना के साथ कहते-सुनते हैं और अंत में सामूहिक रूप में वस्तुनिष्ठ निर्णय लेने का प्रयास करते हैं। इसीलिए हम एक-दूसरे के ऊपर दोषारोपण नहीं करते, सभी अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारियों को अपने ही कंधे पर ढोते हैं।

दर असल, हमारी इस भावुकता और संवेदनशीलता को समझ पाना हर आदमी के लिए आसान नहीं है । अब आप ही बताएं, क्या खास है हम में और क्यों है? यहां भी, “ मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे ” सवाल का जवाब नहीं मिल  पाया , तो फिर अगली कडी में…..

ईद मुबारक और रथ यात्रा की हार्दिक शुभकामनाएं ।

अमन श्रीलाल प्रसाद
मो.9310249821
18 जुलाई 2015

 

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