हद – ए – परवाज़ से ऊंचा

                “ कहां रूकता हूं मैं अर्श वो फर्श की आवाज से
                मुझको जाना है बहुत ऊंचा हद – ए – परवाज़ से ”

28 जुलाई के पोस्ट से आगे ….

जुलाई 2001 में मेरा स्थानांतरण पीएनबी क्षेत्रीय कार्यालय मुज़फ्फरपुर से अंचल कार्यालय पटना में हो गया , वहां बुद्ध कॉलोनी में सन्नी टॉवर अपार्टमेंट में अनिल कुमार का फ्लैट बैंक लीज पर मिल गया, अनिल जी पीएनबी में ही मुज़फ्फरपुर क्षेत्र में स्केल 1 अधिकारी थे और मेरे अच्छे मित्र भी थे,  तब तक मेरी बेटी शिल्पा श्री की सीबीएसई  बोर्ड की दसवीं की परीक्षाओं की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, इसीलिए उसका स्कूल टीसी नहीं लिया गया , शिप्रा का टीसी ले कर उसका नाम बाल्डविन एकेडेमी ईस्ट बोरिंग कैनाल रोड पटना में 9वीं क्लास में लिखा दिया गया, समय पर शिल्पा ने बोर्ड की परीक्षाएं मुज़फ्फरपुर से ही दी और अच्छे मार्क्स एवं ग्रेड से पास हुईं , उसका नाम भी बाल्डविन एकेडेमी में ही प्लस 2 में लिखा दिया गया। पुष्पक  ने सीबीएसई बोर्ड से प्लस 2 कर लिया , आईआईटी में उनका चयन नहीं हो सका, बीआईटी की प्रवेश परीक्षा में वे सफल हो गए, तदनुसार बैचलर ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में उनका एडमिशन करा दिया गया।

कुछ दिनों बाद मेरे फ्लैट मालिक अनिल कुमार का ट्रांस्फर मुज़फ्फरपुर से पटना हो गया, अब उन्हें उनका फ्लैट खुद के लिए चाहिए था, इसीलिए उसे खाली कर आनन्दपुरी, वेस्ट बोरिंग कैनाल रोड पटना में बैंक लीज पर तीन कमरों का एक फ्लैट मैं ने ले लिया। इसी बीच 2003 में मेरा प्रमोशन स्केल 3 में हो गया और मेरा स्थानांतरण न हो कर मेरी पोस्टिंग अंचल कार्यालय पटना में ही कन्फर्म हो गई । यह एक संयोग ही था कि स्केल 3 का रिजल्ट 06 मार्च 2003 को आया था और उस दिन मेरी शादी की 24वीं वर्षगांठ थी । इधर पुष्पक की बीआईटी की क्लासेज जारी रहीं, उसी दरम्यान उन्होंने मेरी सिगरेट स्मोकिंग छुडाने के उद्देश्य से 15 मिनट की वह फीचर फिल्म बनाई थी जिसकी चर्चा मैंने “असहमति का अधिकार” वाली कडी में की है। पुष्पक के बीआईटी के फाईनल रिजल्ट 2004 के अंतिम दिनों में आ गए , अच्छे मार्क्स और अच्छे ग्रेड से उन्होंने बैचलर ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कर लिया , इंफोसिस में टेक्निकल सपोर्ट  में उनका चयन हो गया , इंफोसिस ज्वाईन कराने के लिए मैं उनके साथ बंगलोर गया ।

01 जनवरी 2005 को प्रात: 10 बजे हमारी ट्रेन संघमित्रा एक्सप्रेस पटना से चेन्नई स्टेशन पर पहुंची थी, वहां मैं ने “दि हिंदु” अंग्रेजी अखबार खरीदा था, उसके पेज वन पर समुद्र के गर्भ से निकलते हुए सूर्य की बहुत ही मनोहारी और ऊर्जस्वी तस्बीर छपी थी , स्मरण होगा कि दिसम्बर 2004 के अंतिम सप्ताह में भयंकर विनाशकारी सूनामी तूफान आया था जिससे आंध्र, उडीसा और तमिलनाडु में भारी तबाही हुई थी और अब स्थिति सामान्य होने लगी थी, संभवत: “दि हिंदु” के सम्पादक ने विनाश की हताशा, निराशा और ध्वंस के अंधियारे के बाद आशा, उत्साह और सृजन के उजास के प्रतीक के रूप में उस उगते हुए सूर्य को दिखाना चाहा होगा, रास्ते में सूनामी से क्षत विक्षत क्षेत्रों को बडे उदास और खिन्न मन से नीहारते हुए हम वहां तक पहुंचे थे, दि हिंदु में छपी वह तस्बीर और स्टेशन यार्ड में खडे विभिन्न राज्यों से भेजी गई राहत सामग्री से लदे रेलवे रैक्स देख कर हमारा मन मुदित – प्रफुल्लित हो गया और नव वर्ष व नव निर्माण का वह सूर्य हमेशा के लिए मानस – पटल पर अंकित हो गया। उन दिनों मैं बैंक की त्रैमासिक हिंदी पत्रिका “अर्पण” का सम्पादक था, शरद चंद्र सिन्हा और मुक्ति सहाय के माध्यम से उस पत्रिका का मुद्रण होता था , पटना वापस पहुंचने पर उन्हें बुला कर मैं ने दि हिंदु वाली उस तस्बीर को दिखाया और उसी तरह की तस्बीर “अर्पण” के अक्टूबर – दिसम्बर 2004 अंक यानी 2005 के नव वर्ष अंक के मुख पृष्ठ पर छापने का निर्देश दिया था और उसी पर केन्द्रित सम्पादकीय भी मैं ने लिखा था। उस अंक की चतुर्दिक सराहना हुई थी।

संघमित्रा एक्सप्रेस में बैठे हुए मैं ने प्रार्थना की कि बेटे की पहली नौकरी के दौरान आया वह सूर्य निरंतर उन्नति और उत्साह का सूर्य साबित हो। उसी दिन शाम को हम बंगलोर पहुंचे, 03 जनवरी को बेटे ने इंफोसिस ज्वाईन किया,  इंफोसिस परिसर को अन्दर से देखना एक अद्भुत अनुभव था । 09 जनवरी 2005  को एक्सएलआरआई जमशेदपुर में एमबीए में एडमिशन के लिए बेटे की काउंसेलिंग थी , इंफोसिस ने उन्हें छुट्टी नहीं दी, उन्होंने एक्सएलआरआई में एडमिशन से ज्यादा अहमियत इंफोसिस में नौकरी को दी, हालांकि वह एक चूक थी क्योंकि एक्सएलआरआई से एमबीए का अपना अलग महत्त्व है, फिर भी बेटे ने निरंतर मेहनत और उन्नति करते हुए उस चूक को सुधार लिया है।
शिप्रा ने बहुत अच्छे मार्क्स और ग्रेड में दसवीं सीबीएसई बोर्ड परीक्षाएं पास कर लीं , उसका नामांकन पटना साईंस कॉलेज में आई एस-सी में हो गया, पटना साईंस कॉलेज में एडमिशन होना विद्यार्थियों और उनके गार्जियन के लिए बडे गर्व की बात होती है, किंतु मेरी बेटी को उस कॉलेज का वातावरण पसन्द नहीं आया, इसीलिए , वहां से हटा कर उसका नामांकन खगौल डीएवी पब्लिक स्कूलमें प्लस 2 में करा दिया गया। शिप्रा ने वहीं से बहुत अच्छे मार्क्स और ग्रेड के साथ सीबीएसई बोर्ड से प्लस 2 पास कर लिया। वह आईआईटी और इंजीनियरिंग की कई अन्य प्रवेश परीक्षाओं में शामिल हुई थी, आईआईटी में तो उसका चयन नहीं हो सका किंतु अन्य अनेक इंजीनियरिंग कॉलेजों और युनिवर्सिटी में उसका चयन हो गया, चूंकि बेटा बंगलोर में एच पी ( साल भर के अन्दर ही पुष्पक इंफोसिस छोड कर हैवलेट पैकड में चले गए थे) में नौकरी कर रहा था, इसीलिए शिप्रा और परिवार के अन्य सभी सदस्यों ने भी बंगलोर को प्राथमिकता दी और शिप्रा का एडमिशन साम्भ्रम इंस्टीच्युट ऑफ टेक्नोलॉजी में बीटेक में हो गया। इसी बीच मेरा ट्रांस्फर अंचल कार्यालय पटना से अंचल कार्यालय रांची हो गया था। रांची के डोरंडा साउथ ऑफिस पाडा में भवानी अपार्टमेंट में बैंक लीज पर एक फ्लैट मिल गया, मैं सपरिवार वहां शिफ्टहो गया ।

शिल्पा ने पटना रहते ही सीबीएसई बोर्ड से प्लस 2 अच्छे मार्क्स और ग्रेड से पास कर लिया था और उसने रांची के सबसे प्रतिष्ठित सेंटजेवियर कॉलेज सहित अन्य कॉलेजों में हिंदी, अंग्रेजी तथा मासकम्युनिकेशन में बी ए ऑनर्स की प्रवेश परीक्षाएं दीं थीं , सभी कॉलेजों के सभी इच्छित विषयों में प्रवेश के लिए उसका चयन हो गया , किंतु उसकी इच्छा के अनुसार संतजेवियर कॉलेज में बी ए ऑनर्स मासकम्युनिकेशन में उसका एडमिशन कराया गया, संतजेवियर कॉलेज डीम्ड युनिवर्सिटी भी है। स्वरुचि का विषय और कॉलेज मिल जाने से शिल्पा कॉलेज में बहुत अच्छा करने लगी , बंगलोर में छोटी बेटी शिप्रा भी इंजीनियरिंग में बहुत अच्छा कर रही थी और बेटा पुष्पक भी एच पी छोड  कर मेकैफी में अच्छी पोजीशन और अच्छे पैकेज पर चले गए थे । अब केवल मैं, पत्नी पुष्पा और पुत्री शिल्पा, ये तीन ही रांची में साथ रह रहे थे।

मैं ने अपने बच्चों को मेरी पसन्द का  कोई सब्जेक्ट लेने लिए कभी दबाव नहीं डाला, तीनों ने अपनी पसन्द से अपना लक्ष्य आईआईटी रखा था, तीनों में से किसी का भी आईआईटी के लिए चयन नहीं हो सका, तीनों ने स्वेच्छा से अपने वैकल्पिक विषय का भी चयन कर रखा था, तीनों अपने– अपने वैकल्पिक विषय में सफल रहे और अपने – अपने क्षेत्र में ऐक्सेल किया। बेटा पुष्पक एक एमएनसी में अच्छे पद और पैकेज पर कार्यरत हैं तथा फिलहाल आईआईएम कोलकाता से ग्लोबल बिजनेस मैनेजमेंट में एग्जीक्युटिव एमबीए भी कर रहे हैं।
छोटी बेटी शिप्रा बचपन से ही अच्छी पेंटिंग करती थी, उसकी पेंटिंग दैनिक हिन्दुस्तान जैसे अखबार में भी तब छपी थी जब वह पांचवीं – छठी में पढती थी, बेटा पुष्पक भी कहानियां लिखता था ,   कम्पीयरिंग में रुचि रखता था, स्कूल के कई कार्यक्रमों की कम्पीयरिंग भी की थी, एक बडे कार्यक्रम की कम्पीयरिंग में मैं ने और बेटे ने जुगलबंदी भी की थी, पुष्पक ईटीवी बिहार- झारखण्ड से भी एसोशिएटेड रहा ; बेटी शिल्पा कविताएं , कहानियां, लेख और रिपोर्ताज लिखती थी, उसकी भी रुचि कम्पीयरिंग में थी, उसकी स्वाभाविक रुचि साहित्य और कला विषयों में थी, इसीलिए उसने साईंस छोड कर आर्ट्स अपना लिया था । उसे बीए ऑनर्स में मन पसन्द विषय मिल गया था जिससे उसका मन पूरी तरह पढाई में रम गया, वह पढाई में अच्छा तो कर ही रही थी, अब विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर नियमित रूप से लिखने भी लगी थी और रांची से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में उसकी आर्टिकल छपने लगी  थी  , दैंनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि जैसे बडे समाचारपत्रों में कई कॉलमों में और कभी – कभी तो पूरे पेज में शिल्पा की रपटें और रचनाएं छपने लगीं , इसी बीच उसकी लिखी स्क्रीप्ट पर 15 मिनट की एक फीचर फिल्म भी बनी जिसे पुणे फिल्म फेस्टीवल में दिखाया भी गया। वह मीडिया जगत में झारखंड की जानी – पहचानी हस्ती बन गई और कॉलेज तथा युनिवर्सिटी में बडे सम्मान की नजर से देखी जाने लगी। उसकी प्रकाशित रचनाओं एवं रपटों से संबंधित अखबारों की प्रतियां मैं ने अपने पास भी सहेज कर रखी हैं। वही शिल्पा जब संतजेवियर कॉलेज में पढने गई थी तो शुरू – शुरू में उसे लडके ही नहीं, लडकियां भी “बहन जी” कह कर चिढाती थीं क्योंकि वह सलवार कुर्ती पहनती थी और दुपट्टा रखती थी, वही उसका मुख्य पहनावा हमेशा रहा और कुछ दिनों बाद संतजेवियर जैसे आधुनिकतम फैशन के लिए प्रसिद्ध कॉलेज में उसका वही पहनावा एक ट्रेंड बन गया और सिर्फ उसके बैच की ही नहीं, बल्कि दूसरी क्लासेस की लडकियां भी वही पहनने लगीं।
इसी बीच जनवरी 2009 में मेरा स्थानांतरण मंडल कार्यालय ( पीएनबी में अंचल कार्यालय अब मंडल कार्यालय कहलाने लगे थे ) रांची से मंडल कार्यालय पटना हो गया , चूंकि शिल्पा के फाईनल एग्जाम होने वाले थे, इसीलिए फिलहाल मैं अकेले पटना गया, उसका एग्जाम हो जाने के बाद जून 2009 में पूरा परिवार पटना शिफ्ट हुआ । पटना में शिल्पा पीटीआई में काम करने लगी और अखबारों तथा पत्रिकाओं के लिए भी लिखती रही। इस दरम्यान स्केल 3 से 4 में प्रोन्नति के लिए मैं लिखित परीक्षा दे चुका था, कुछ दिनों के बाद रिजल्ट निकला तो मुझे 100 में से 74 अंक मिले थे और लिखित परीक्षा में 1400 उतीर्ण लोगों में मेरा 21वां स्थान था, कोलकाता में साक्षात्कार हुआ, साक्षात्कार बोर्ड के चेयरमैन कार्यपालक निदेशक एमवी टांकसाले जी थे, अंतिम रूप से 300 सफल लोगों में मुझे बहुत अच्छा स्थान प्राप्त हुआ था, 23 अगस्त 2009 को फाईनल रिजल्ट निकला था, 16 अक्टूबर 2009 को मेरा स्थानांतरण  दिल्ली हो गया।

चूंकि मैं शुरू से ही स्पेशलिस्ट ऑफिसर ( राजभाषा अधिकारी ) रहा था और बैंक नियमानुसार स्केल 4 में आने पर सभी अधिकारी अनिवार्य रूप से मुख्य धारा में आ जाते थे      ( भले ही उनकी पोस्टिंग स्पेशलिस्ट कैडर वाली जगह पर ही हो ) और उन्हें फाईनल पोस्टिंग देने के पहले 12सप्ताह मुख्य धारा बैंकिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है , इसीलिए  मुझे पंजाबी बाग ब्रांच में ट्रेनिंग पर भेज दिया गया , 12 सप्ताह मुख्य धारा बैंकिंग का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद बैंक ने मेरी स्थायी पदस्थापना प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग में मुख्य प्रबंधक के रूप में कर दी । राजभाषा विभाग के ही कई वर्षों पूर्व सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक पीडी लखनपाल के सौजन्य से पश्चिम विहार नई दिल्ली में दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर लोगों की सोसाईटी साक्षर अपार्टमेंट में तीन बेडरूम का एक फ्लैट बैंक लीज पर मुझे मिल गया था , वह फ्लैट उनके साले का था जो यूके में रहते थे, लखनपाल जी उनके पॉवर ऑफ एटॉर्नी होल्डर थे और तदनुसार उस फ्लैट को हर तरह से डील करने का उन्हें अधिकार प्राप्त था, वह फ्लैट विगत दस साल से बंद था और रहने के लायक नहीं था, मेरे जैसे विश्वासी व्यक्ति मिलने पर ही लखनपाल जी ने उसे किराए पर उठाने का निर्णय लिया था, मरम्मत व रंग-रोगन कर उसे एक महीने में रहने के लायक बनाया जा सका तब तक मैं अकेले किसी तरह उसमें रहा, फ्लैट ठीक हो जाने पर दिसम्बर 2009 में मेरा परिवार भी नई दिल्ली शिफ्ट हो गया।

शिल्पा का बीए ऑनर्स  मासकम्युनिकेशन का रिजल्ट आ गया, मेरी बेटी फर्स्टक्लास फर्स्ट यानी गोल्ड मेडलिस्ट हुई। रांची में दीक्षांत समारोह था , बेटी को प्रमाणपत्र और गोल्ड मेडल ग्रहण करने के लिए रांची जाना था, उन्हीं दिनों बैंक की आवश्यक मीटिंग थी, मैं नहीं जा सका, बेटी के साथ पत्नी पुष्पा गई थी। सभी प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उसे व्यापक कवरेज दिया था। 2010 के अंतिम दिनों में छोटी बेटी शिप्रा का इंजीनियरिंग का रिजल्ट आ गया , उसने प्रथम श्रेणी में बीटेक की डिग्री प्राप्त की , एक नामी मल्टीनेशनल कम्पनी कॉग्नीज़ेंट में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में उसका चयन हो गया , पोस्टिंग चेन्नई में हुई, ज्वाईन कराने के लिए मैं और बेटा पुष्पक , दोनों गए थे । कुछ दिनों के बाद उसका ट्रांस्फर चेन्नई से कोयम्बटूर हो गया ।

फरवरी 2011 में पुष्पक की अरेंज्ड मैरेज आरती आर्या से हो गई । मेरी पत्नी और दोनों बेटियां बंगलोर बेटे के पास गईं हुईं थीं, वहीं वे लोग आरती से मिली थीं, आरती दो भाई और एक बहन में सबसे छोटी थी तथा बंगलोर में एचपी में एचआर एग्जीक्युटिव थी, उसके सबसे बडे भाई रविशंकर आर्य एचपी में बंगलोर में ही वाईस प्रेसिडेंट हैं और कम्पनी के कार्यों से अक्सर विदेश दौरे पर होते हैं, इस महीने 08 तारीख से अगले तीन साल के लिए कम्पनी उन्हें सिंगापुर भेज रही है, उनसे छोटे भाई शशि शंकर आर्य विप्रो में बंगलोर में ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और इधर कई वर्षों से कम्पनी के प्रोजेक्ट पर यूके में हैं। आरती बंगलोर में बडे भाइयों और भाभी के साथ रह कर नौकरी कर रही थी, आरती के पिता अशोक कुमार आर्य जी प्राईवेट फर्म में एकाउंटेंट हैं एवं मां सुधा आर्या जी बिहार सरकार में शिक्षिका हैं, वे लोग मेरे गृह नगर मोतीहारी के ही रहने वाले हैं और फिलहाल मुज़फ्फरपुर में रहते हैं,   वे मेरे ससुराल पक्ष के रिश्तेदार के रिश्तेदार भी हैं, आरती के माता – पिता भी बंगलोर आ गए थे, मुझे भी फोन कर बंगलोर बुलाया गया , शादी फाईनल कर दी गई। दोनों पक्षों की सहमति से बारात मेरे गृह नगर मोतीहारी से मुज़फ्फरपुर गई थी। सब कुच्छ अच्छी तरह और सद्भावनापूर्वक सम्पन्न हुआ ।

बेटी शिल्पा ने अपनी पढाई का अभियान यथावत जारी रखा, नालन्दा ओपेन युनिवर्सिटी पटना में एमए मासकम्युनिकेशन में उसका नामांकन हो गया था , हम दिल्ली शिफ्ट हो गए, चूंकि ओपेन युनिवर्सिटी में रेगुलर क्लास नहीं करनी होती थी, इसीलिए वह हमारे साथ दिल्ली आ गई थी,   जब क्लासेस चलती थीं तो वह गर्ल्स पीजी में रह कर क्लासेस करती थी। इसी बीच उसने भारत सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग से मान्यताप्राप्त नई दिल्ली संध्या कालीन हिंदी संस्थान , जो भारती विद्यापीठ कॉलेज में संचालित होता था, से अनुवाद में डिप्लोमा भी कर लिया, एमए की परीक्षा के बाद फरवरी 2012 में मधुबनी , बिहार निवासी सुमीत कुमार जी से उसकी अरेंज्ड मैरेज मेरे गृह नगर मोतीहारी में हुई , सुमीत जी एक सुशील और संस्कारवान युवक हैं तथा भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर हैं और गुजरात में पोस्टेड हैं। सुमीत जी भाई में अकेले हैं और उनसे बडी तीन बहनें हैं जिनकी शादी हो चुकी है, उनके पिता जी का स्वर्गवास हो गया है , उनकी मां एक सुलझी हुई और व्यवहार – कुशल महिला हैं, शादी तय कराने में उनके चाचा रामायोध्या प्रसाद जी मुख्य गार्जियन थे, उनके सबसे छोटे बहनोई अशोक कुमार रक्सौल के हैं और मेरे छोटे साढू आनन्द प्रकाश के छोटे भाई अजय कुमार के साले हैं, शादी तय कराने में अशोक जी और अजय जी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। शादी के बाद बेटी शिल्पा पति के साथ गुजरात चली गई।

उसी वर्ष शिल्पा का एमए मासकम्युनिकेशन का रिजल्ट आया , एमए में बेटी युनिवर्सिटी टॉपर हुई, बीए ऑनर्स की तरह इस बार भी गोल्ड मेडलिस्ट हुई और युनिवर्सिटी ने उसे तनिष्क के 22 कैरेट शुद्ध सोने का मेडल और प्रमाणपत्र प्रदान कर सम्मानित किया । कन्वोकेशन में जमाई बाबू सुमीत कुमार जी को भी जाना था किंतु मार्च महीने में बैंक की वार्षिक लेखाबंदी होने के कारण उन्हें छुट्टी नहीं मिली , मैं भी नहीं जा सका, इस बार भी पत्नी ही बेटी के साथ गईं। बेटी की इस सफलता से मायका और ससुराल , दोनों परिवारों में जश्न का माहौल रहा।

2013 में शिल्पा गर्भवती थी और दिसम्बर में प्रसव का डेट था, इसीलिए उसे हमने अपने पास दिल्ली बुला लिया , डॉ.अर्चना कुमारी की देख रेख में लेडी हॉर्डिंग हॉस्पिटल ऐण्ड कॉलेज में उसका इलाज चल रहा था, अर्चना पटना के मेरे मित्र जेएलपी दिनकर की बेटी है, दिनकर जी के मकान में मैं 1990 से 93 तक किरायादार था , अर्चना और मेरे बच्चे पटना संतपॉल स्कूल में साथ पढते थे। शिल्पा कई दिनों तक लेडी हॉर्डिंग में भर्ती रही, जमाई बाबू सुमित जी भी अपनी मां के साथ आ गए थे, दिसम्बर की कंपकपाती ठंढ थी, लगातार बारिश भी हो रही थी, मेरी पत्नी हॉस्पिटल में बेटी के पास थी, मैं और सुमीत जी हॉस्पिटल के बाहर गाडी में ही रात गुजारते थे क्योंकि प्राईवेट रूम मिले होने के बावजूद उसमें एक से ज्यादा तीमारदार के रहने की अनुमति नहीं थी , हम सब का दुर्भाग्य था, बेटी को मरा हुआ बेटा पैदा हुआ था । बेटी और दामाद के दुख का पारावार नहीं था, हम मां -बाप थे, उन दोनों के सामने अपना दुख खुल कर व्यक्त नहीं कर सकते थे क्योंकि यदि हम भी उसी तरह रोते – कलपते तो बेटी – दामाद को ढाढस कौन बंधाता , मैं ने अकेले अपने नाती का अंतिम संस्कार किया। कुछ दिनों तक शिल्पा हमारे साथ रही, फिर ससुराल चली गई। कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया , बेटी की रुचि पठन – पाठन में रही है, वह गुजरात में एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में टीचर हो गई , बाद में उसकी योग्यता से प्रभावित हो कर स्कूल बोर्ड ने उसे प्रिंसिपल बना दिया। उसी बीच पति की प्रेरणा से शिल्पा ने बीएड भी कर लिया , उसमें भी उसे प्रथम श्रेणी मिली और युनिवर्सिटी में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ ।

बेटा पुष्पक बंगलोर में और बेटी शिप्रा कोयम्बटूर में नौकरी कर रही थी, बेटी का ट्रांस्फर बंगलोर होने की संभावना थी , 31 अक्टूबर 2014 को मेरा रिटायरमेंट था, हम रिटायरमेंट के बाद बंगलोर या दिल्ली एनसीआर में ही सेट्ल होने की योजना बना रहे थे , हम चाहते थे कि रिटायरमेंट के पहले छोटी बेटी शिप्रा की भी शादी हो जाए, उसके लिए कई अच्छे लडके हमने देखे थे, इस विषय में शिप्रा और पुष्पक से विचार – विमर्श किया तो शिप्रा ने कहा कि एक लडका उसके ऑफिस कोयम्बटूर में भी है जो पटना का रहने वाला है, कहीं फाईनल करने के पहले एक बार उसे भी देख लें। गार्जियन होने के नाते यह इंडिकेशन हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण था। हमने बेटी से खुल कर बात की, उस लडके का पूरा पता लिया , उससे बात की, वह थे अभिषेक आर्यन , कॉग्नीज़ेंट में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। अभिषेक आर्यन भाई में अकेले हैं, केवल एक बडी बहन है जिसकी शादी हो गई है, वह पटना के एक हाईस्कूल में शिक्षिका हैं तथा उनके पति पटना में ही एक इंस्योरेंस कम्पनी में अधिकारी हैं। अभिषेक जी के माता  – पिता से हमलोग मिले । उनके पिता सत्येन्द्र कुमार जी अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे और अब नौकरी छोड कर खेती और बिजनेस करते हैं, उनकी मां वीणा कुमारी जी कॉलेज में हिंदी की प्रोफेसर हैं , वे लोग पटना और मुज़फ्फरपुर के बीच एक गांव के रहने वाले हैं। सभी बहुत ही संस्कारशील और सभ्य व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि कुछ कारणों से शादी साल भर बाद करना बेहतर होगा, हम उनकी इच्छा के अनुसार सहमत हो गए।

इस बीच शिप्रा का कोयम्बटूर से सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर में प्रोन्नति के साथ 2014 में बंगलोर ट्रांस्फर हो गया , बंगलोर में वह बडे भाई पुष्पक और भाभी आरती के साथ रह कर नौकरी करने लगी, अभिषेक जी बाद में आईटीसी में चले गए  फिर सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो कर आईबीएम में बंगलोर आ गए । फरवरी 2015 में मेरे गृह नगर मोतीहारी में शिप्रा और अभिषेक जी की शादी हुई। सब कुछ बहुत बढिया और सद्भावनापूर्वक सम्पन्न हुआ। बेटी शिप्रा और दामाद अभिषेक आर्यन बंगलोर में साथ रहते हैं, साथ ही ऑफिस जाते हैं। अब बंगलोर में बेटी – दामाद, बेटा – बहू और बेटा के साले के परिवार का एक फंटास्टिक फेमेली बन गया है , सभी एक साथ वीकेंड मनाते हैं।

2014 हमारे लिए अनेक संभावनाओं का वर्ष साबित होने वाला था , अक्टूबर में बेटी शिल्पा तथा दिसम्बर में बहू आरती मां बनने वाली थी , अक्टूबर में ही मैं रिटायर होने वाला था, मोतीहारी का मकान हमारे लिए अनुपयोगी हो रहा था , इसीलिए उसे बेच कर बंगलोर या दिल्ली – एनसीआर में फ्लैट लेना था, छोटी बेटी शिप्रा की शादी करानी थी, एक – एक कर ये सारी संभावनाएं साकार हुईं ।

मेरे साढू हरेन्द्र प्रसादजी के बेटे चन्द्रगुप्त कुमार के पांच वर्षीय बेटे के कैंसरग्रस्त होने की दुखद खबर मिली, चन्द्रगुप्त, उसकी पत्नी , दस – बारह माह की उसकी बेटी और वह बेटा जांच कराने के लिए दिल्ली आए, दो महीने तक हमारे पास ही रह कर पूरी जांच कराई , उसके बाद हर पन्द्रह दिन पर और अब तीन महीने पर चेक कराने के लिए आते हैं और मेरे ही पास रहते हैं , अब उसकी बीमारी पूरी तरह ठीक होने की राह पर है। जब वे लोग पहली बार आए थे और दो महीने तक रूके थे तो गप्प – शप्प के दौरान चन्द्रगुप्त की पत्नी ने अपनी सास की शिकायत करते हुए मेरी पत्नी से कहा था कि जब उसे बच्ची हुई थी  तो उसी समय उसकी ननद राधा को भी बच्ची हुई थी किंतु सासु जी ने बहु से ज्यादा ध्यान अपनी बेटी का रखा, इस वाक्य से मेरी पत्नी सतर्क हो गई क्योंकि कुछ ही महीनों में मेरी बेटी और मेरी बहु , दोनों मां बनने वाली थी और उस दौरान हम दोनों को अपने पास ही रखने वाले थे। पत्नी ने चन्दगुप्त की पत्नी से उन सारी बातों को जानने का प्रयास किया जिन कारणों से उसे वैसा महसूस हुआ था।

शायद भारतीय परिवेश में सास बहू का यह शाश्वत मनोविज्ञान है कि हर बहु को ऐसा लगता है कि सास अपनी बहू से ज्यादा बेटी का ख्याल रखती है, हालांकि हर सास कभी बहू भी रही होती है और हर बहू भी कभी सास होने वाली होती है। हम उस मनोविज्ञान को गलत सिद्ध करना चाहते थे, इसीलिए हमने योजना बनाई कि जब दोनों हमारे पास होंगी तो हम समान साधन और व्यवहार से दोनों की देख रेख करेंगे। अगस्त में बेटी और बहू को हमने अपने पास बुला लिया, 3 बेडरूम के फ्लैट में दो कमरे में एसी लगे थे, दोनों को एक – एक  कमरा दे दिया, पत्नी रात में आधा – आधा समय बेटी और बहू के साथ रहती, मैं तीसरे कमरे में आ गया। डॉ. अर्चना कुमारी ( मेरे मित्र दिनकर जी की बेटी) लेडी हार्डिंग छोड कर जामिया हमदर्द हॉस्पिटल ऐंड कॉलेज में आ गई थी, बेटी और बहू का इलाज शुरू से उसी से हो रहा था , इसीलिए दोनों का प्रसव उसी की देखरेख में जामिया हमदर्द में ही हुआ। 18 अक्टूबर को बेटी को नॉर्मल डिलीवरी से बेटा हुआ, 16 दिसम्बर को बहू को सर्जरी से बेटा हुआ , दोनों प्रसव अच्छी तरह सम्पन्न हुए, दोनों जच्चा – बच्चा स्वस्थ प्रसन्न हैं । उस दौरान मेरे दामाद और उनकी मां भी आ गईं थीं , मेरा बेटा और उसकी सास भी आ गईं, पत्नी को सहयोग के लिए मेरी सास भी आ गई , चन्द्रगुप्त भी अपने परिवार के साथ आ गया, कुच्छ दिनों तक स्थिति ऐसी रही कि मैं और मेरा बेटा जमीन पर बिछावन कर सोए । जनवरी 2015 के पहले सप्ताह तक सभी चले गए, बहू और पोता तथा बेटी और नाती की देखरेख के लिए मैं और मेरी पत्नी रह गई ।

31 जनवरी तक उस फ्लैट का बैंक लीज था , मैंने फ्लैट मालिक के पॉवर ऑफ एटॉर्नी होल्डर लखनपाल जी से दो महीने और रहने देने का आग्रह किया, उसके एवज में मेरी पूरी ग्रेचुइटी राशि रोक रखी गई थी तथा उसके अलावा मैं दो महीने का अग्रिम किराया भी जमा करा देने को तैयार था, उनकी सहमति से उस फ्लैट का बैंक लीज आसानी से दो माह के लिए बढाया जा सकता था,    किंतु मेरे राजभाषा विभाग के ही एक – दो साथी के साथ मिल कर मुझसे बैंक लीज का वह फ्लैट खाली करवाने के लिए नोटीस पर नोटीस भिजवाया जा रहा था , वह फ्लैट मेरी पात्रतानुसार रू. 15,000/- मासिक किराये पर बैंक लीज पर था, लखनपाल जी ने लिख कर दिया कि 01 फरवरी 2015  से उनका फ्लैट रू.30.000/- मासिक किराये पर लग चुका है, इसीलिए उन्हें 31 जनवरी को उनका फ्लैट खाली चाहिए, हालांकि वह फ्लैट आठ महीने बाद अभी भी किराये पर नहीं उठा है। दरअसल  लखनपाल जी रिटायरमेंट के बाद एक निजी बीमा कम्पनी की जीवन बीमा पॉलिसी बेचते हैं, उन्होंने कई बार मुझे अपने नाम या अपने बच्चों के नाम पॉलिसी खरीदने का मुझसे आग्रह किया था, किंतु मुझे पॉलिसी चाहिए नहीं थी और मैं अपने बच्चों पर कभी अपनी पसन्द का दबाव डालता नहीं, इसीलिए मैं उनसे न कोई पॉलिसी खरीद सका और न ही खरीदवा सका, मुझसे फ्लैट खाली करवाने का एक कारण यह भी रहा हो सकता है।

पीएनबी के नई पीढी के राजभाषा अधिकारियों को शायद पता न हो, लखनपाल जी पीएनबी , प्रधान कार्यालय, राजभाषा विभाग में मुख्य प्रबंधक के उसी पद पर लम्बे समय तक कार्यरत रहे थे, जिस पद पर मैं रिटायरमेंट तक रहा था , उनके सेवाकाल में स्केल 1, 2 और 3 में भी मुझे उनका बहुत स्नेह और विश्वास प्राप्त हुआ था, उन्होंने बहुत मेहनत कर राजभाषा विभाग के कार्यों को सुविचारित स्वरूप प्रदान किया था, इसीलिए मैं उनके समर्थन में था, हालांकि बैंक के अधिकांश राजभाषा अधिकारी, विशेष कर दिल्ली में तैनात राजभाषा अधिकारी उनके खिलाफ थे और उच्चाधिकारियों के समक्ष उनकी छवि खराब करने में लगे रहते थे । उन्हीं दिनों के संबंधों के चलते उन्होंने अपना फ्लैट मुझे दिया था और मैं ने भी उसी के चलते उस फ्लैट के ठीक होने तक उनके कहने पर इंतजार किया था। इसीलिए आज भी उनके ताज़ा व्यवहार के बावजूद मेरे मन में उनके प्रति कोई कटुता नहीं है क्योंकि मैं तो अपने ही पूर्व और पश्च में फंसा रहा  …..

“ मुझे तो अपनों ने परेशां किया  , गैरों में कहां दम था;

मेरी किश्ती वहां डूबी, जहां पानी बहुत कम था”

 

जनवरी के अंतिम दिनों में ठंढ का मौसम था, रोज वर्षा भी हो रही थी , ठंढ और वर्षा के कारण शीत – लहर चल रही थी, परिवार में एक तीन माह का और दूसरा एक माह का बच्चा था , फरवरी में छोटी बेटी की शादी होनी थी, उसके लिए मार्केटिंग भी करनी थी,  गाजियाबाद के इन्दिरापुरम में एक फ्लैट खरीदना तय हुआ  था, उसे लेने के लिए मोतीहारी वाला मकान बेचना भी था, ऐसे में रहने का वर्तमान ठौर – ठिकाना छूट रहा था, नया ठिकाना कब तक मिलेगा , कुछ भी निश्चित नहीं था , 38 वर्षों के सेवाकाल में अर्जित घरेलू सामान के साथ शिफ्ट करना था, इन तमाम विषम परिस्थितियों की कल्पना कोई कर सके भी तो कैसे, मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं थी कि वह मेरी इन परिस्थितियों को मानवीय दृष्टिकोण से समझे।

फिर भी, चूंकि मैं एक साथ दादा और नाना बन गया था, ससम्मान रिटायर हुआ था, भारत के राष्ट्रपति ने मुझे पुरस्कृत किया था, मेरी छोटी बेटी की शादी मनपसन्द लडके से तय हो गई थी और शादी की तिथि भी निर्धारित हो गई थी, नये फ्लैट खरीद के लिए बयाना दे दिया था, इन सब बातों ने मेरा मनोबल टूटने नहीं दिया, इन्हीं परिस्थितियों के बीच बेटी और बहू की नजरों में बराबर सिद्ध होने के लिए पत्नी एक बडे बेड पर एक तरफ बेटी और नाती को तथा दूसरी तरफ बहू और पोता को सुला कर खुद बीच में सोती, रात भर जग कर उन चारों की तीमारदारी करती, पिछले छ माह में वह न तो रात में और न दिन में ही कभी पूरी नींद ले पाई थी, मैं उसके मनोबल को प्रणाम करता हूं कि उसने स्वयं को बीमार नहीं पडने दिया, इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि ईश्वर है या नहीं, मुझे पूरा पता नहीं है, लेकिन है तो उसका लाख – लाख शुक्रिया कि उसने हर विषम परिस्थिति से हमें सकुशल और ससम्मान बाहर निकाला है । मेरी बहू के बडे भाई रविशंकर आर्य हमेशा कहा करते हैं कि सास हों तो आरती की सास जैसी हों, वे मेरी पत्नी से कहते कि “ मां, गोद ले कर ही सही, मुझे भी अपना बेटा बना लीजिए ” , पत्नी कहती कि आप मेरे बेटे ही हैं, गोद लेने की औपचारिकता निभाने की क्या जरूरत है। अब बहू और बेटी ही उन परिस्थितियों में उन्हें दी गई हमारी सेवाओं का सही मूल्यांकन कर सकती हैं ।

उसी बीच एक अत्यंत भयंकर हादसा हो गया किंतु विध्वंस टल गया। उसी हादसे के समय मुझे वह अनुभूति हुई थी जिसके कारण इस आत्मकथा के 10 मई वाले एपीसोड में मैं ने सवाल उठाया था कि “ मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे ” । मैं यहां ऊपर की अन्य घटनाओं की तरह ही उस घटना को भी ज्यों की त्यों आप के सामने रख रहा हूं, अब आप ही जवाब दीजिए कि मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे ?

जनवरी के अंत में बैंक लीजके फ्लैट को छोड कर नये फ्लैट में शिफ्टिंग की तैयारी चल रही थी, सब कुछ अस्तब्यस्त हो रहा था, शीत लहर में बच्चों को सम्भालना एक बडी चुनौती थी, मेरी बेटी शिल्पा श्री ने अपने बेटे ( उसका नाम “कुमार श्रेष्ठ” रखा जा चुका था जिसे वह“शिबू” कहती थी )  को सर्दी से बचाने के लिए कई गर्म कपडे पहना कर नर्म कम्बल में लपेट रखा था, वह मेरे लिए ही खाना निकालने जा रही थी , अपने बेटे को मेरे हाथों में थमा कर वह किचेन की ओर बढी, मैं अपने नाती को सम्भाल नहीं पाया, उसका कम्बल मेरे हाथों में रह गया और मेरा नाती धडाम से फर्श पर गिर गया , मैं अचानक जोर से चित्कार उठा  “ मां …!  ” और यह सोचते ही कि मेरी इस बेटी को पिछले ही साल मरा हुआ बेटा पैदा हुआ था और अब यह हादसा !  मैं कांप गया, मुझे काठ मार गया और मैं संज्ञा -शून्य हो गया, बच्चे को उठाना भी भूल गया , मैं जब होश में आया तो मेरी आंखों से झर – झर आंसू झर रहे थे, मेरी बेटी मेरे नाती को गोद में उठाये रोये जा रही थी और मेरे हाथों में फिर से अपने बेटे को सौंपते हुए लगातार कहे जा रही थी – “ पापा , कुछ नहीं हुआ है आपके नाती को, बिलकुल ठीक है यह , शिबू एकदम सही सलामत है पापा, लीजिए पापा, देखिए अपने नाती को, इसे कुछ नहीं हुआ, यह आपके हाथ से छूटा नहीं था, शायद मैं ही ठीक से आप को दे नहीं पायी थी ” । मैं पिछले एपीसोड में बता चुका हूं कि हम किसी पर दोषारोपण नहीं करते, बल्कि अपने हिस्से की जिम्मेदारियां अपने ही कंधों पर ढोते हैं, इसीलिए बेटी मुझे अपराध-बोध से मुक्त करने के लिए खुद को दोषी बता रही थी । अब आप ही बताइए कि मां के सिवा और कौन है जो किसी की गलती अपने सिर ले कर इतना ढाढस बंधाए ? इसीलिए इस सवाल का जवाब आप ही दीजिए कि “ मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे ” ?

वस्तुत: सोच में भावुकता, संवेदना और संवेदनशीलता ( इमोशंस , सेंटीमेंट्स ऐण्ड सेंसिटिविटी )  और कार्य – व्यवहार एवं निर्णय में वस्तुनिष्ठता ( ऑब्जेक्टीविटी)  ही मानवीय गुणों के संवाहक तत्त्व हैं , इन्हीं के चलते आदमी अपनी संस्कृति और संस्कार से अलग नहीं हो पाता है। संभव है, मेरे परिवार में ढेर सारी कमियां हों, किंतु इतना पक्का है कि उन मानवीय तत्त्वों से हम सुसम्पन्न हैं और वे ही हमारी विरासत और धरोहर हैं। चार – पांच माह पहले की एक छोटी – सी घटना है। मेरी बेटी शिल्पा अपने पति के पास गुजरात में थी, उसके बेटे की तबीयत खराब हो गई, सास – ननद ने सतईसा पूजा कराने का निर्देश दिया , बेटी ने अपनी मां को बताया , उसकी मां ने पंडित जी से पूछ कर विधि बताई, बेटी ने जवाब दिया कि ठीक है मां, वे (उसके पति सुमित जी) बैंक से आते हैं तो उन्हें बोलती हूं कि मां जी और दीदी जी से बात कर तय कर लें कि क्या और कैसे करना है । बेटी के इस जवाब से हम लोग खुश हुए कि उसमें मायका और ससुराल, दोनों परिवारों के सेंटीमेंट्स में संतुलन बनाये रखने की समझ है,वरना वह कह सकती थी कि ठीक है मां, वैसा ही कराती हूं और वैसा ही करने के लिए अपने पति और सास को कहती। हम गांव –गंवई के लोग हैं , हमारे ग्रामीण परिवेश में यह माना जाता है कि बेटा तो पितृ सत्ता और सम्मान का संवाहक व संरक्षक होता है किंतु बेटी के ऊपर  मायका और ससुराल, दोनों ही परिवारों  के सम्मान की रक्षा का दयित्व होता  है।
इस कडी के बाद फिलहाल अपने पारिवारिक घटना – क्रम को स्थगित रख कर मैं सेवा – कालीन घटना-क्रम की चर्चा 15 अगस्त से शुरू करूंगा ।

श्रीलाल प्रसाद

बंगलोर, 04 अगस्त 2015

मो. 9310249821

चित्र . शिल्पा श्री  बी ए ऑनर्स मास्कॉम ( 2006 – 09 बैच) का गोल्ड मेडल एवं प्रमाण पत्र  31.01.2011 को रांची में तथा   एमए मास्कॉम ( 2009 -11 बैच ) का गोल्ड मेडल एवं प्रमाण पत्र 04.03.2012 को पटना में ग्रहण कर रही हैं  

 

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