डायनैमिक और डाइनामाइट (शब्द-शस्त्र )

(आवाज बन कर तुम, आवाज दो )

बंगलोर, 29 अगस्त 2015

स्वाधीनता दिवस – 15 अगस्त 2015 को अपराह्न में मेरा यह ब्लॉग  shreelal.in  शुरू हुआ और मैं ने अपने मूल विषय ‘डायनैमिक और डाइनामाइट’ के अंतर्गत ‘आवाज़ दो’ शीर्षक से उस पर पहला पोस्ट किया। मुझे यह देख कर अप्रत्याशित प्रसन्नता हुई कि हजारों लोगों ने उसे देखा – पढा, भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों से जो सैकडों रेस्पॉंन्स मिले , उनमें UK, US, Newyork, Russian Federation, Chicago, Frankfurt, Jakarta, Seattle, Singapore, Amsterdam आदि उल्लेखनीय हैं। इस पोस्ट के लिखे जाने तक मेरे उस ब्लॉग पर कुल हिट संख्या  3016 है जिनमें से 200 से अधिक  विदेशी सब्सक्राइबर हैं । निश्चित रूप से 15 दिनों में प्राप्त यह रेस्पॉंस मेरे जैसे साधारण व्यक्ति के लिए बडी उपलब्धि है । मैं देश – विदेश के अपने उन सभी पाठकों को हार्दिक धन्यवाद देता हूं और वादा करता हूं कि  सच से सामना कराता हुआ अपना चिंतन आप से शेयर करता रहूंगा, आशा है, आप सबका स्नेह मुझे हमेशा मिलता रहेगा ।

अक्षर ब्रह्म है, शब्द ब्रह्म है, नाद ब्रह्म है आदि – आदि; मैं ऐसे भारी भरकम मीमांसा-वाक्यों में आप को उलझाना नहीं चाहता, मैं तो सीधी – सादी बात बोलना चाहता हूं कि शब्दों का उपयोग आप शस्त्र  के रूप में कर सकते हैं , शर्त केवल इतनी है कि आप के शब्द स्वार्थ सिद्धि के साधन मात्र न हों, आप के शब्द आप की आत्मा की आवाज़ हों, आप अपने शब्दों में समा कर बाहर निकलें , शब्द आप में आत्मसात हो कर निकले, आप के शब्द आप के आचरण के संवाहक हों अर्थात अपने शब्दों के प्रति आप ईमानदार हों – निष्ठावान हों , समर्पित हों यानी आप शब्द परायण हों, आप अपने शब्दों को जीएं , फिर देखिए, वे शब्द किस तरह ब्रह्मास्त्र का काम करते हैं । इस सच से आप का सामना मैं अपनी अत्मकथा के एक अंश से कराना चाहता हूं।

मेरी सबसे छोटी बेटी शिप्रा का एडमिशन साम्भरम इंस्टीच्युट ऑफ टेक्नोलॉजी बंगलोर में बी–टेक बैच 2006 – 10 के फर्स्ट इयर में हुआ , उन दिनों मैं पंजाब नैशनल बैंक , अंचल कार्यालय रांची में वरिष्ठ प्रबंधक – राजभाषा के रूप में पदस्थापित था और मेरा बेटा कुमार पुष्पक इंफोसिस छोड कर बंगलोर में ही एचपी ( Hewlett Packard ) में आ गया था, बेटी शिप्रा कॉलेज हॉस्टल में ही रह कर पढाई करने लगी, बेटा पुष्पक ही उसका लोकल गार्जियन था । चार साल के कोर्स में आठ सेमेस्टर होने थे, प्रत्येक सेमेस्टर का युनिवर्सिटी एग्जाम होना था, एग्जाम में ऐपीयर होने के लिए 75% उपस्थिति जरूरी थी। पहले ही सेमेस्टर में शिप्रा की उपस्थिति थोडी कम हो गई, उसकी उपस्थिति मात्र 74.25% थी, फलस्वरूप उसे परीक्षा के फर्म भरने से रोक दिया गया । हॉस्टल में रहने वाली उसके बैच की केवल एक लडकी की उपस्थिति पूरी थी, शेष सबकी कम थी, कॉलेज में उस बैच के  विभिन्न फेकल्टी के कुल 137 लडके – लडकियों को उपस्थिति में कमी के चलते परीक्षा फर्म भरने से रोक दिया गया।

हॉस्टल की लडकियां वार्डन से मिलीं, उन्होंने सकारात्मक रूख अपनाते हुए फेकल्टी के हेड से उन्हें मिलवाया , हेड ने भी कहा कि पिछले वर्ष भी इस तरह की समस्या आई थी, पहले सेमेस्टर में सबको वार्निंग दे कर परीक्षा देने की अनुमति दे दी गई थी, इसीलिए उन्होंने आश्वासन दिया कि वे प्रिंसिपल से बात कर अनुमति दिला देंगे। बाद में हेड ने लडकियों को बताया कि प्रिंसिपल तैयार नहीं हो रहे हैं। हेड ने सलाह दी कि लडकियां खुद प्रिंसिपल से मिल कर रिक्वेस्ट करें। लडकियों ने वैसा ही किया, फिर भी , प्रिंसिपल टस से मस नहीं हुए। अब लडकियों के सामने एक साल बर्बाद होने का खतरा उत्पन्न हो गया, वे निराश हो कर घबडा गईं और रोने लगी। उनमें से किसी भी लडकी का कोई अपना सगा लोकल गार्जियन नहीं था, केवल मेरी बेटी का अपना बडा भाई लोकल गार्जियन था, हार – थक कर उसने रात में भाई को फोन किया। बेटे ने भी नई नौकरी कुछ ही महीने पहले ज्वाइन की थी, फलस्वरूप उसके पास कोई छुट्टी क्रेडिट नहीं थी, वह पीजी में रहता था , कम्पनी में नाईट शिफ्ट वालों को आवागमन हेतु कैब तथा रात के भोजन की सुविधा थी , इसीलिए उसने नाईट शिफ्ट की ड्युटी ली थी, फोन पर बहन का रोना सुन कर वह चिंतित हो गया, उसने उसे आश्वस्त किया कि सुबह होते ही वह कॉलेज आएगा।

बेटे पुष्पक का ऑफिस बंगलोर के दक्षिणी छोर पर तो बेटी का कॉलेज उत्तरी छोर पर था, दोनों के बीच की दूरी लगभग 45 किलोमीटर थी। बेटे के पास अपना कोई वाहन नहीं था, रात भर का जगा सुबह दो घंटे सरकारी बस में सफर कर वह 9 बजे शिप्रा के हॉस्टल पहुंचा, शिप्रा और उसकी सहेलियों से बात की, हॉस्टल वार्डन और फेकल्टी हेड से बात कर उपस्थिति कम होने की स्थिति में कॉलेज द्वार पहले लिए गए निर्णयों की विस्तार से जानकारी ली और फिर प्रिंसिपल से मुलाकात की। पुष्पक ने जितने भी अनुरोध किए, जितने भी तर्क दिए, बच्चों का एक साल बर्बाद होने से बचाने लिए जितनी भी मिन्नतें कीं , प्रिंसिपल ने सबको अनसुना कर दिया, सुबह 10 बजे से वह प्रिंसिपल के चेम्बर में खडा था, उसे कई बार बाहर जाने को कहा गया, किंतु उसने बार – बार नये तर्क दे कर बात में निरंतरता बनाए रखी, इसी बीच लंच का समय हो गया, प्रिन्सिपल लंच के लिए चले गए, दरबान ने पुष्पक को कमरे से बाहर कर कमरा बंद कर दिया।

एक घंटा बाद प्रिंसिपल लंच से लौटे तो पुष्पक उनके चेम्बर के बाहर खडा मिला, प्रिंसिपल ने उसे कमरे में बुलाया और सहानुभूति पूर्वक कहा  – “ देखिए, परीक्षा में नहीं बैठने पर एक साल का समय भी जाएगा और एक साल की फीस भी जाएगी, आप एक साल की फीस जमा करा दीजिए, आपकी बहन और अन्य सभी छात्र – छात्राओं को परीक्षा में बैठने दिया जाएगा, इससे उन सबका एक साल का समय बच जाएगा।” पुष्पक ने कहा – “ सर, हम सामान्य आर्थिक स्थिति वाले लोग हैं, बैंक से शिक्षा ऋण लेकर अपने बच्चों को ऐसी उच्च शिक्षा दिला पाने का साहस करते हैं, एक साल की अतिरिक्त फीस देना इनमें से किसी के भी बुते की बात नहीं है ।” प्रिंसिपल ने धमकी भरे शब्दों में कहा –    “ इसका मतलब कि आप एक साल की फीस और एक साल का समय दोनों भुगतना चाहते हैं ” , इतना कह कर प्रिंसिपल ने एक तरह से बात बंद करने का संकेत दे दिया और कमरे से बाहर जाने का आदेश सुना दिया, शाम हो गई थी, प्रिंसिपल अपने आवास चले गए, दरबान ने चेम्बर बंद कर दिया, हताश, निराश, उदास पुष्पक जब बाहर आया तो सैकडों लडके – लडकियों ने उसे घेर लिया , उनमें उक्त निर्णय से प्रभावित 137 छात्र – छात्राओं के अलावा कॉलेज के अन्य फेक्ल्टी और सत्रों  के छात्र भी थे जिनमें नेता किस्म के कुछ स्थानीय छात्र भी थे। पुष्पक ने जब प्रिंसिपल का अंतिम निर्णय सुनाया तो छात्र भडक गए, पुष्पक ने उन्हें शांत कराया और एक दौर की बात कल फिर करने का आश्वासन देकर ऑफिस चला गया , क्योंकि उसकी ड्युटी नाइट शिफ्ट में थी।

रात में शिप्रा और पुष्पक ने फोन पर मुझे पूरी बात बताई । मैंने शिप्रा को ढाढस रखने और पुष्पक को संयम से काम लेने को कहा, यह भी एहसास दिलाया कि पुष्पक छात्र नहीं, गार्जियन हैं, भले ही उस वक्त उनकी उम्र महज 23 साल थी लेकिन थे तो गार्जियन ही, इसीलिए उनका व्यवहार गार्जियन की तरह ही होना चाहिए, मैंने यह भी कहा कि कुछ हद तक प्रिंसिपल की बात कॉलेज के निर्धारित नियमों के अनुकूल है। पुष्पक ने बहस करते हुए कहा कि जो नियम पैसे लेकर तोडा जा सकता है, वह बिना पैसे के भी तो तोडा जा सकता है , क्योंकि वह नियम छात्रों की भलाई और पढाई में सुधार के लिए नहीं, बल्कि कॉलेज फंड में अधिक से अधिक रकम जमा कराने के लिए बनाया गया प्रतीत होता है। मैं ने भी सोचा कि साउथ अफ्रीका में ट्रेन के फर्स्ट क्लास में केवल अंग्रेजों द्वारा यात्रा करने का नियम हो या गुजरात में समुद्री पानी से आम पब्लिक द्वारा नमक नहीं बनाए जाने का नियम हो, गांधी जी ने उन्हें अमानवीय कह कर उनका विरोध किया और वह विरोध सफल भी हुआ, इसीलिए कोई नियम हो या कानून , अगर वह जन साधारण के कल्याण के लिए नहीं है और उसका उपयोग सत्ता- तंत्र मनमाने ढंग से करे तो वह नियम या कानून सही नहीं हो सकता।  फिर भी वैसे नियमों का विरोध करने के लिए वैसी ही दृढता और संयम भी होना चाहिए, जैसा गांधी जी ने दिखलाया था। पुष्पक अपनी हद में रह कर ही बात को आगे बढाने का आश्वासन दे कर अपने काम में लग गया ।

रात भर काम करने के बाद पुष्पक सुबह 9 बजे फिर कॉलेज पहुंचा और प्रिंसिपल के चेम्बर के  दरवाजे के सामने में खडा हो गया, तब तक सैकडों छात्र – छात्राएं भी जमा हो गई थीं, प्रिंसिपल उसे देखते ही विफर पडे। पुष्पक ने प्रिंसिपल से कहा – “ प्राप्त सूचना के अनुसार पिछले वर्ष आपने पैसे  ले कर छात्रों की उपस्थिति बना दी थी, जो पैसे नहीं दे पाए, उनका कॉलेज हमेशा के लिए छुट गया, इस साल भी आप ऐसा ही करना चाहते हैं, इस पूरे प्रॉसेस का छात्रों के कल्याण और पढाई के स्तर में सुधार से कोई सरोकार नहीं है ? इसका सीधा मायने है कि आपका यह नियम केवल अतिरिक्त पैसे की उगाही के लिए है जो ग़लत है, दूसरी बात यह कि जिन 137 छात्रों का यह मामला है , यदि वे सभी पैसे न दें और मजबूरी में उन्हें कॉलेज छोडना पडे तो आप के कॉलेज को फंड क्या मिलेगा और कॉलेज के रेपुटेशन का क्या होगा, साथ ही, मैनेजमेंट को आप क्या जवाब देंगे ” ? इसी बीच बाहर छात्रों में यह बात फैल गई कि प्रिंसिपल ने पुष्पक भैया को अपमानित किया है, बस क्या था, छात्र उग्र होने लगे ।

पुष्पक के तर्कों और छात्रों के उग्र होने की खबर से प्रिंसिपल पर कुछ असर हुआ, उसने कहा कि आप की बहन को अनुमति दे दी जाती है, आप कॉलेज से बाहर चले जाइए। पुष्पक ने अब और सीधी बात करनी शुरू कर दी, उसने कहा – “ आपका नियम पैसे के लिए छात्रों को ब्लैकमेल करने वाला है और अब आप का यह प्रस्ताव खरीद फरोख्त करने वाला है,यह अस्वीकार ही नहीं, निंदनीय भी है ”।

प्रिंसिपल ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह इस मामले में कुछ नहीं कर सकते, पुष्पक ने भी दृढता के साथ कहा – “ यदि आप कुछ नहीं कर सकते, तो कुर्सी छोड दीजिए, इस कुर्सी पर तो उस व्यक्ति को बैठना चाहिए जो कुछ कर सकने की क्षमता रखता हो। और यदि यह आप के अधिकार क्षेत्र के बिलकुल बाहर है तो उसे बुलाइए जो कुछ कर सकने की स्थिति में हो ”। दो दिनों से प्रिंसिपल ने पुष्पक को बैठने के लिए कभी नहीं कहा , वह खडे रह कर ही बात कर रहा था , अब प्रिंसिपल ने  पहली बार उसे बैठने के लिए कहा , फिर भी वह बैठा नहीं, वह लगातार 48 घंटों से जगा हुआ था, रात में ऑफिस में काम करते हुए और दिन भर प्रिंसिपल के चेम्बर में खडे रहते हुए। इस बीच वार्ता असफल होने की खबर बाहर पहुंच गई, छात्र उग्र हो गए, कॉलेज की कुर्सियां और मेजें तोडी जाने लगीं , प्रैक्टीकल कर रहे छात्रों में हडबडी मच गई, कुछ केमिकल के बिखर जाने से आग लग गई, प्रिंसिपल घबडा गए।

प्रिंसिपल ने छात्रों को शांत कराने के लिए पुष्पक से आग्रह किया। पुष्पक ने स्पष्ट रूप से कहा कि व छात्रों का नेता नहीं है, वह एक बहन का भाई मात्र है, वह गार्जियन है, वह केवल अपनी बहन के लिए ही उत्तरदायी  है। प्रिंसिपल ने पुलिस को फोन कर दिया , दो बसों में भर कर दर्जनों पुलिस के जवान कैम्पस में आ गए , उनका अधिकारी प्रिंसिपल के चेम्बर में आ कर जम गया, उसके कहने पर पुष्पक पहली बार कुर्सी पर बैठा। उधर कैम्पस में पुलिस देख कर छात्र और अधिक उग्र हो गए। प्रिंसिपल ने कॉलेज के चेयरमैन को भी फोन कर दिया, चेयरमैन ने कॉलेज बोर्ड की आकस्मिक बैठक बुला दी, देढ –दो घंटे के भीतर सभी कॉलेज में पहुंच गए, इस बीच पुलिस और छात्रों में मोर्चेबंदी जारी रही, हालांकि कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। चेयरमैन ने जानना चाहा कि छात्रों का नेता कौन है, प्रिंसिपल ने पुष्पक की ओर इशारा कर दिया, पुष्पक ने उसका विरोध करते हुए कहा कि वह किसी भी छात्र या छात्रा को जानता तक नहीं, वह उनका नेता कैसे हो सकता है, वह गार्जियन है , उसकी छोटी बहन इस कॉलेज की छात्रा है जिसका करियर कॉलेज के गलत नियमों से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। प्रिंसिपल साहब के पास न कोई विजन है और न ही कोई सम्मान जनक फॉर्मुला, उनके पास या तो ब्लैकमेलिंग फॉर्मुला है या फिर पर्चेजिंग फॉर्मुला, ऐसे व्यक्ति को इतने प्रतिष्ठित कॉलेज का प्रिंसिपल रख कर बोर्ड क्या हासिल करना चाहता है ?

चेयरमैन ने कहा – “ आप की बहन को तो परीक्षा में बैठने की अनुमति दे ही दी जा रही है तो फिर आप को क्या आपत्ति है, आप छात्रों का नेता क्यों बन रहे हैं ” ? पुष्पक ने उनकी उस सोच का विरोध करते हुए उन्हीं से सवाल कर दिया कि यदि कोई पूछे कि पुष्पक की बहन को किस आधार पर अनुमति दी गई तो कॉलेज का जवाब क्या होगा? उसने यह भी कहा कि वह यह सवाल छात्रों के नेता के रूप में  नहीं बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में छात्र – छात्राओं का एकमात्र उपलब्ध गार्जियन होने के नाते पूछ रहा है। एक सदस्य ने पूछा कि ऐसे में क्या किया जाए? पुष्पक ने कहा कि पहले एक फॉर्मुला तय कर लें, उसमें जितने लोग कवर हों, सबको अनुमति दे दी जाए। इस सुझाव पर  एक डायरेक्टर ने कहा कि शिप्रा की उपस्थिति 74.25% है, इसलिए जिन छात्र – छात्राओं की उपस्थिति 74.25%  तक है , उन सब को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी जाए । पुष्पक ने कहा कि ऐसे में तो केवल चार – पांच छात्र ही लाभान्वित हो पाएंगे और वह फैसला पक्षपातपूर्ण भी माना जाएगा , उसने चेयरमैन से मुखातीब होते हुए कहा कि यदि बोर्ड कहे तो वह सम्मान-जनक फॉर्मुला सुझा सकता है। अब तक चेयरमैन पुष्पक की बातचीत से प्रभावित हो गए थे, उन्होंने हामी भर दी।

पुष्पक ने कहा कि 50% अंक लाने वाले छात्रों को इंजीनियरिंग की डिग्री मिल जाती है, इसीलिए जिन छात्र – छात्राओं की उपस्थिति 50% है, इस बार उन सब को अनुमति दे दी जाए और भविष्य के लिए एक सुविचारित स्पष्ट नीति निर्धारित कर दी जाए जिसका कोई भी अथॉरिटी मनमाना उपयोग न कर सके । बोर्ड ने राय मशवरा कर 60% की सीमा पर सहमति जताई, उस फॉर्मुला पर 137 में से 131 छात्र – छात्राएं कवर हो जा ही थीं, केवल छह  छात्र ही छंट रहे थे, पुष्पक चेम्बर से बाहर आया और छात्र – छात्राओं के समूह को संबोधित करते हुए बोर्ड का निर्णय सुनाया, सबसे पहले उन्हीं छात्रों ने सहमति जता दी जो इस फॉर्मुले से बाहर हो जा रहे थे । इस प्रकार उस मसले का सर्वमान्य हल निकला , पुष्पक कॉलेज के छात्र – छात्राओं के साथ – साथ मैनेजिंग कमेटी का भी हीरो बन गया, छात्र – छात्राओं ने पुष्पक के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया, वे सुनने वालों को अतिशयोक्तिपूर्ण लगेंगे लेकिन सच्चाई यही है कि विद्यार्थियों ने उसे कंधों पर उठा लिया और ‘पुष्पक भैया देवता हैं, पुष्पक भैया फरीस्ता हैं’ के नारे लगाने लगे। शिप्रा ब्रेवो गर्ल कही जाने लगी।  इसका एक रूप हमें भी तब देखने को मिला जब मैं अपनी पत्नी और बेटे पुष्पक के साथ बेटी शिप्रा से मिलने उस घटना के 15 दिनों बाद कॉलेज हॉस्टल गया। यह खबर लगते ही कि शिप्रा के भैया पुष्पक और पैरेंट्स आए हैं, दर्जनों लडके– लडकियां आ गईं, सबने हमें बहुत आदर – सम्मान दिया। कुछ दिनों बाद पता चला कि प्रिंसिपल साहब ने इस्तीफा दे दिया और कॉलेज छोडने के पहले उन्होंने पुष्पक तथा शिप्रा को मोबाईल पर मेसेज कर शुभकामनाएं भी दीं।

इसीलिए मैं कहता हूं कि आवाज़ बन कर आवाज़ दो, बेआवाज़ों की आवाज़ बन कर आवाज़ दो,  बेज़ुबानों की ज़ुबान बन कर आवाज़ दो , अपने ज़मीर की आवाज़ बन कर आवाज़ दो, अपने लिए आवाज़ दो, अपनों के लिए आवाज़ दो, वतन के लिए आवाज़ दो, जिस हाल में हो, जिस जगह पर हो, सही की हिफाज़त और ग़लत की खिलाफत के लिए आवाज़ दो,  मगर ध्यान रहे – आवज़ केवल  आवाज़ के लिए न हो , फिर देख, तुम्हारी आवाज़ कैसे तीर और तलवार बनती है।

मेरे फेसबुक अकाउंट   shreelal_prasad@rediffmail.com   (Shreelalprasad )  पर नया पेज Shreelalprasad ‘Aman’ नाम से शुरू हो गया है, इसीलिए मेरे पोस्ट  ब्लॉग shreelal.in   के साथ – साथ इस पेज पर भी देखे जा सकेंगे । साथ ही, फेसबुक पर 03 नवम्बर 2014 से अब तक जो भी मेरे पोस्ट थे , वे सब मेरे ब्लॉग shreelal.in पर भी उपलब्ध करा दिए गए हैं। यदि email  पर मुझसे कोई सम्पर्क करना चाहें तो मेरा email  पता है –

shreelal_prasad@rediffmail.com  दूसरा  email पता shreelalprasad1954@gmail.com है।

इसके अलावा मैं अपने Twitter  अकाउंट @shreelalprasad पर भी उपलब्ध रहूंगा।

सावन पूर्णिमा और रक्षा बंधन की शुभकामनाओं के साथ,

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद
बंगलोर, 29 अगस्त 2015
मो. 09310249821

1,706 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट (शब्द-शस्त्र )

  • 20/10/2017 at 6:00 am
    Permalink

    Hmm it appears like your website ate my first comment (it was extremely long) so I guess I’ll just sum it up what I wrote and say, I’m thoroughly enjoying your blog. I as well am an aspiring blog blogger but I’m still new to the whole thing. Do you have any suggestions for inexperienced blog writers? I’d certainly appreciate it.|

    Reply
  • 20/10/2017 at 5:32 am
    Permalink

    In August of 2010, Paris Hilton awoke to an intruder armed with
    two knives who was trying to break into her home. This is where you can find clips from all of your favorite E.
    Talking about the creator of style statement who
    would dare to beat the debonair Hollywood heartthrob Brad Pitt.

    Reply
  • 20/10/2017 at 2:09 am
    Permalink

    A person necessarily lend a hand to make severely posts I would state. This is the first time I frequented your web page and thus far? I surprised with the research you made to create this actual publish extraordinary. Excellent activity!|

    Reply
  • 19/10/2017 at 7:51 pm
    Permalink

    obviously like your web site however you need to check the spelling on several of your posts. Several of them are rife with spelling problems and I in finding it very bothersome to inform the reality then again I will definitely come again again.|

    Reply
  • 19/10/2017 at 5:41 pm
    Permalink

    Nice weblog here! Additionally your web site rather a lot up very fast! What host are you using? Can I am getting your associate hyperlink for your host? I wish my web site loaded up as fast as yours lol|

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

49 visitors online now
32 guests, 17 bots, 0 members