बिहार विधानसभा चुनाव – 2015

(किसकी जीत और किसकी हार ?)

( इस चुनाव में हो सकता है कि एनडी जीते, यह भी हो सकता है कि महागठबंधन जीत जाए, संभव है कि किसी भी दल या गठबंधन को पक्की जीत न मिले, किंतु इतना तो पक्का है कि कोई न कोई बुरी तरह हारेगा। इसीलिए सवाल यह नहीं है कि जीतेगा कौन ? प्रश्न यह है कि हारेगा कौन ? और यह जानने के लिए क्या परिणाम आने तक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता  है ? )…. इसी आलेख से ..

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बिहार विधानसभा चुनाव -2015 के पांचवे यानी अंतिम चरण का प्रचार भी थम गया । पांचों चरण का चुनाव प्रचार कई मायनों में अद्भुत, विलक्षण और अभूतपूर्व रहा, न जाने कितने मानदण्ड धराशायी हुए ? कितने रिकॉर्ड बने और बिगडे ? चुनाव में मुद्दे कितने थे, कौन – कौन – से थे, क्या – क्या थे, ये सब न तो पार्टियों को याद होंगे, न उम्मीदवारों को, न ही मतदाताओं को और न मीडिया को? चुनाव आयोग को भी इस विषय में पक्के तौर पर शायद ही कुछ पता हो !

मैंने अपने ब्लॉग shreelal.in एवं फेसबुक shreelal.prasad पर गांधी जयंती और जेपी जयंती के अवसर पर किए पोस्ट में देश की महान विभूतियों का उल्लेख करते हुए बिहार चुनाव के कुछ महत्त्वपूर्ण कीरदारों की भी चर्चा की थी , उसमें न तो किसी से किसी की तुलना की गई थी और न ही किसी एक के परिप्रेक्ष्य में किसी दूसरे का मूल्यांकन किया गया था, और चूंकि मेरी ना काहू सो दोस्ती , ना काहू सो बैर है , इसीलिए केवल ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में अतीत का पुनर्विलोकन , वर्तमान का अवलोकन और भविष्य का आकलन किया गया था। यह प्रथम चरण के मतदान के भी पहले की बात है, लेकिन अब यहां उस विषय की पुनरावृत्ति करने का नहीं बल्कि दीवार पर लिखी इबारत को पढ कर सुनाने का इरादा है।

अंतिम चरण के मतदान की तिथि 05 नवम्बर से लेकर 08 नवम्बर को परिणाम घोषित होने तक विभिन्न माध्यमों के लाल बुझक्कडों द्वारा अनुमान, पूर्वानुमान एवं रूझान बताए जाते रहेंगे, परिणाम के बाद विश्लेषण, पिष्टपेषण , आत्म निरीक्षण, परीक्षण, मंथन, महिमामंडन, निंदन व अभिनन्दन का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा और फिर असल मुद्दा धरा का धरा रह जाएगा क्योंकि “क्या – क्या हुआ जो नहीं होना चाहिए था और क्या – क्या नहीं हुआ जो होना चाहिए था”, जैसे विषयों पर चर्चा के लिए किसी के पास समय न होगा, तो क्यों न हम इसी खाली समय का सदुपयोग कर लें? लेकिन उसके भी पहले कुछ रैलियों में प्रधानमंत्री के भाषण सुनने के बाद मैं ने 01 सितम्बर को अपने ट्वीटर @shreelalprasad    पर जो ट्वीट किए थे, उनमें से कुछ को देख लें  –

  1. आप (मोदी जी) एनडीए के एकमात्र वक्ता हैं, संबोधन में कुछ नयापन क्यों नहीं लाते , देश-विदेश के लोग आप को प्रधानमंत्री के रूप में याद रखना चाहते होंगे?
  2. क्या आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक गणतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हैं? यदि लगता है तो पांच साल बाद अभी वाला भाषण सुन कर अपना मूल्यांकन कीजिएगा।
  3. और यदि कहीं कोई कमी लगती है तो अभी भी वक्त है , अकेले में आत्मावलोकन कीजिएगा क्योंकि चुनाव जीतना अलग बात है, बहुमत पाना भी अलग बात है किंतु जनमत के दिलोदिमाग में बसे रहना बिलकुल ही अलग बात है ।
  4. यदि आप तात्कालिक बहुमत पाकर ही खुश हैं तो मुझे इसका दु:ख रहेगा, जेपी कब चुनाव लडे–जीते !
  5. श्रीमान जी ! एक बात स्वीकार कर लीजिए, लालू जी आप से ज्यादा लोकप्रिय नेता थे, चौकडी (चाटुकारों) में फंस कर न जाने कहां – कहां फंस गए? , वे तो उससे बाहर आने की भरसक कोशिश कर रहे हैं , आप क्यों फंस रहे हैं? आप के लिए मज़बूरी भी तो नहीं!

चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के पहले किए गए मेरे ये ट्वीट आज दीवार पर लिखी इबारत बन गए हैं।

होना यह चाहिए था कि हर गठबंधन ज्वलंत मुद्दों को लेकर मैदान में उतरता और उसके नेता प्रचार के दौरान अपने-अपने पद एवं कद की गरिमा का खयाल रखते हुए अपनी पहले की उपलब्धियां गिनाते और भावी कार्ययोजनाएं मतदाताओं को समझाते, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

यह कदापि नहीं होना चाहिए था कि बडे – बडे लोग अपनी छोटी – छोटी  बातों से  अतीत में कमाए लाख की छवि को वर्तमान में राख कर भविष्य को भी खाक़ में मिलाने का नासमझीभरा काम करें, मगर दुर्भाग्यवश वही हुआ।

इस चुनाव में हो सकता है कि एनडी जीते, यह भी हो सकता है कि महागठबंधन जीत जाए, संभव है कि किसी भी दल या गठबंधन को पक्की जीत न मिले, किंतु इतना तो पक्का है कि कोई न कोई बुरी तरह हारेगा। इसीलिए सवाल यह नहीं है कि जीतेगा कौन ? प्रश्न यह है कि हारेगा कौन ? और यह जानने के लिए क्या परिणाम आने तक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है ?

15 वर्षों के शासन के बाद कानून और जनता ने भी लालू प्रसाद यादव से बहुत कुछ छीन लिया था, इसलिए उनके पास खोने यानी हारने के लिए कुछ खास बचा नहीं था, लेकिन हां , पाने के लिए बहुत कुछ सामने पडा था, इस चुनाव में हर हालत में , चाहे उनके गठबंधन की सरकार बने या नहीं, वे बहुत कुछ पा जाएंगे जिसे पाने की उम्मीद वे खुद भी छोड चुके होंगे ।

10 वर्षों के शासन में नीतीश कुमार ने लोगों का बहुत भरोसा जीता है, तभी तो सर्वे करने वाले भी, चाहे जिसकी भी सरकार बनने का आकलन बताते रहे हों , मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लोकप्रिय नाम नीतीश को ही बताते रहे हैं। 10 वर्षों की ऐंटी इंकम्बेंसी के दंश की प्रचलित आशंका भी जुडी हुई है,  इसीलिए नीतीश की सरकार नहीं भी बनती है तो भी उन्हें सरकार खोने के सिवा और कुछ भी खोने या हारने का अन्देशा नहीं है और यदि ऐसा होता भी है तो उसे उनकी व्यक्तिगत हार नहीं, लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया ही माना जाएगा ।

रामविलास पासवान बहुत ही चर्चित नेता और योग्य मंत्री रहे हैं, इसीलिए उन्हें उतना मिलता रहा है, जितने की उम्मीद उन्हें खुद भी नहीं रहती होगी, लेकिन इस बार का बिहार चुनाव आगे – पीछे का सारा भ्रम तोड सकता है और उन्हें जनता के बीच उनके वास्तविक स्थान का एहसास निर्दयतापूर्वक करा सकता है।

जीतनराम माझी और उपेन्द्र कुशवाहा को जो मिल जाए, वही पर्याप्त होगा और उतने में ही वे खुश भी रह लेंगे, भागते भूत की लंगोटी नफा।

भाजपा में और कोई ऐसा सिक्का नहीं है जो चुनावी बाजार में चल सके, एक ही सिक्का है जिसकी  दोनों तरफ हेड ही हेड है यानी मोदी ही मोदी , बिलकुल शोले के जय की तरह , दांव पर पूरी तरह वे ही लगे हैं। इसलिए यदि जीत होती है तो वह उनकी नहीं, एनडीए की जीत होगी, और यदि हार हो जाती है तो उन्होंने क्या खोया या हारा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वे तो बिना परिणाम आए ही सब कुछ हार गए लगते हैं।

दीवार पर साफ – साफ इबारत यही दीख रही है कि मोदी जी जीत भी जाएं तो कुछ पाने वाले नहीं, किंतु हार जाएं तो बुरी तरह हारे हुए कहे जाएंगे, और इसकी जिम्मेदारी उनकी पार्टी की नहीं, केवल उन्हीं  की होगी।

ऐसा इसलिए कि 68 साल के भारतीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे में किसी भी प्रधानमंत्री ने कभी भी इस तरह की लडाई नहीं लडी और ऐसे शब्द-शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया। प्रधानमंत्री की कुर्सी दांव पर लगा देते तो किसी को कोई ऐतराज़ न होता, लेकिन यहां तो प्रधानमंत्री का पद और कद ही दांव पर लग गया , भारत के लोक को दुख इसी बात का है।

मान लीजिए कि आप जीत जाते और एनडीए की सरकार बिहार में भी बन जाती तो क्या समुद्रगुप्त की तरह दिग्विजयी कहलाने का तमगा मिल जाता, या यही मान लीजिए कि बिहार में महागठ्बंधन की सरकार बन जाती है तो क्या पहाड टूट जाता, ऐसा होना तो गणतांत्रिक लोकतंत्र में स्वाभाविक ही है, मगर आपने तो दिल्ली की हार की धूल झाड कर अपराजेय जोडी साबित करने की फिराक में खुद को कहीं का नहीं रखा और भारतीय लोकतंत्र के सबसे बडे पद व कद को भी कहीं का नहीं छोडा ।

आनेवाला साल भी आप के लिए अनेक परीक्षाएं ले कर आ रहा है, ध्यान रखिएगा, आपकी अपनी  सोच पर कोई और सोच हावी न होने पावे, वरना, लोहिया के शब्दों में, ज़िंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं!

एक बात और, आपके प्रवक्ता लच्छेदार बोलते हैं, दमदार नहीं , वस्तुत: यह कमी संघ कैडर के ज्यादातर वक्ताओं में हमेशा रही है, उन्हें विशेष ट्रेनिंग दिलाईए और विश्वसनीय तथा स्वीकार्य बनवाईए।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

मो. 09310249821

    Blog:      shreelal.in           Facebook:  shreelal.Prasad                    Facebook Page:  shreelal Prasad ‘Aman’

    Twitter:  @shreelalprasad     Email:   shreelal_prasad@rediffmail.com

27,132 thoughts on “बिहार विधानसभा चुनाव – 2015

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