डायनैमिक और डाइनामाइट : दीवार पर लिखी इबारत

(दीवार पर लिखी इबारत)

इंदिरापुरम,12 नवम्बर 2015

(माफी चाहूंगा प्रधानमंत्री जी, अभी आप लंदन में बोल रहे हैं और मैं आप को सुनते हुए लिख रहा हूं, ईमानदारीपूर्वक कह रहा हूं, अमेरिका में आप जो कुछ और जैसा बोले थे , उससे बेहतर आज बोल रहे हैं आप। लेकिन यह क्या, अचानक यह नौबत क्यों आ गई कि देश में घटी घटनाओं की सफाई आप विदेश में देने लगे ?  सर, अब हमारा हेडमास्टर इंगलैण्ड नहीं रहा, और यह सफाई भी तो निवेश की गारण्टी नहीं है, फिर भी !) इसी आलेख से …

दीवार पर कुछ इबारतें यूं दिखीं..

खबर – 1 : भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर, रिटायर्ड मेजर जनरल सतबीर सिंह और रिटायर्ड कर्नल अनिल कौल के हवाले से मीडिया में आई खबरों के अनुसार केन्द्र सरकार द्वारा जारी ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन)   से संबंधित अधिसूचना के प्रावधानों के प्रति असंतोष जाहिर करते हुए बडी संख्या में पूर्व सैनिकों ने अपने पदक लौटाये हैं और यह भी खबर दी गई है कि अब तक लगभग 25000 से अधिक पूर्व सैनिक अपने पदक लौटा चुके हैं तथा रक्षामंत्री ने अपील की है कि पूर्व सैनिक अपने मेडल वापस न करें।

यह खबर इसलिए उद्धृत की जा रही है क्योंकि एमएम कलबुर्गी की हत्या तथा वैसी ही कुछ अन्य घटनाओं के विरोध में साहित्यकारों, फिल्मकारों , कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापस किए जाने के विरुद्ध कुछ बुद्धिजीवियों  ( ? ) ने बडी तल्ख और गाली – गलौज वाली तथा उकसाने वाली शैली में टिप्पणी की थी और कहा था कि जिन लोगों को चाटुकारिता के बल पर पुरस्कार मिला था, वे ही लोग पुरस्कार वापस कर रहे हैं, उन्होंने बडे तल्ख लहजे में पूछा था कि आखिर देश के सैनिक अपने मेडल वापस क्यों नहीं करते ? खुद उन लोगों ने ही अपने ही प्रश्न का जवाब भी दे दिया था – “क्योंकि सैनिक अपनी जान पर खेल कर मेडल प्राप्त करते हैं इसलिए वे अपने पदक वापस नहीं करते”।

मैं समझता हूं कि उनके सवालों का जवाब अब मिल गया होगा कि देश के बारे में उनकी जानकारी कितनी कम है ? उन्हें यह भी पता चल गया होगा कि ज़मीन से कट कर रहने और ज़मीनी हक़ीकत से अनजान बने रहने  पर बयान वैसे ही हो सकते हैं जैसा कि उन्होंने दिये थे और अब वे यह भी जान गए होंगे कि भारत जैसे गणतांत्रिक लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का वैध तरीका क्या – क्या हो सकता है ?  चूंकि उस तरह की टिप्पणियां मेरे ब्लॉग और फेसबुक पोस्ट पर भी की गई थी और तब मैं ने उन्हें सलाह दी थी कि दुनिया भर की खबरों में उलझे रहने के साथ – साथ देश की खबरों की दुनिया को भी देख – सुन और समझ लें  तो वास्तविक स्थिति से वे वाकिफ भी हो लेंगे और ऐसी शर्मनाक स्थिति से उन्हें दो – चार भी नहीं होना पडेगा, इसीलिए उस खबर को यहां उद्धृत करना लाजिमी लगा । इसकी तस्दीक के लिए मेरे फेसबुक shreelal.prasad   अथवा  Shreelal Prasad ‘Aman’ पर दिनांक 16 अक्टूबर का पोस्ट देखा जा सकता है।

खबर – 2: न्युयार्क टाईम्स, वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी लंदन जैसी विश्वप्रसिद्ध मीडिया ने भी मोदी जी की हार का सबसे बडा कारण उनके भाषण और उनकी भाषा शैली को ही बताया है ( यहां विदेशी मीडिया का उल्लेख नाम लेकर इसलिए किया गया है क्योंकि अपनी ज़मीन से कटे हुए लोग, जो बादलों के पंख लगा कर हवाओं की ओर पीठ कर के उडते रहते हैं, केवल उन संस्थाओं या उनके जैसी एजेंसियों की खबरों को ही विश्वसनीय मानते हैं) फिर भी , भाजपा उस करारी हार के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की बात कर रही है, यानी मीठा – मीठा गप, कडवा – कडवा थू; जीत होने पर सेहरा मोदी लहर यानी  ‘हर – हर मोदी , घर – घर मोदी’  को और हार होने पर नाम लेने में भी भय ! जिस किसी ने भी निर्भीक हो कर कुछ कहने की हिमाकत की , उसे बाहर का रास्ता दिखाने की खबर फ़िज़ाओं में तैरती दीखी, तो आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

पार्टीवालों को तो पार्टी या सरकार में पद मिलने का लालच या पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिए जाने का भय लगा रहता है , इसलिए घंटी नहीं बांध रहे, लेकिन संघ प्रमुख को क्या लालच या भय है कि वे बिहार में हार के लिए दोषी मानते हुए भी मोदी जी को बरी करते हुए केवल शाह जी के सिर पर ही हार का ठीकरा फोडने के पक्ष में लग रहे हैं ? मेरी समझ में उन्हें लालच भी है और भय भी है और वह भय यह है कि मोदी जी को दोषी घोषित कर देने से उन्हें परदे के पीछे भेज देना पड सकता है और लालच यह है कि मोदी जी के बाद संघ के विचारों को इतनी मज़बूती व खूबी से लागू करने वाला दूसरा कोई अन्य प्रभावी और विश्वसनीय  चेहरा उन्हें नज़र नहीं आ रहा।

राजनीतिक पार्टियां जो भी चुनावी भविष्यवाणी करें, मैं उसका कोई खास नोटीस नहीं लेता, किंतु एक स्वतंत्र व्यक्ति और मीडिया तथा वैसी अन्य स्वतंत्र एजेंसियां जो कुछ कहती हैं, उस पर मैं गहरी नज़र रखता हूं क्योंकि एक स्वतंत्र व्यक्ति स्वविवेक और ईमानदार आकलन के आधार पर अपना मंतव्य व्यक्त करता है और मीडिया को चूंकि अपनी दूकानदारी में साख कायम रखनी होती है, इसलिए वह सर्वेक्षण के मान्य सिद्धांतों के आधार पर अपना आकलन प्रस्तुत करता है। हां, चुनाव पूर्व सर्वेक्षण का मैनेज्ड होना नकारा नहीं जा सकता क्योंकि उससे चुनावी माहौल बनाया – बिगाडा जा सकता है, किंतु एग्जीट पोल का मैनेज्ड होना नहीं स्वीकारा जा सकता क्योंकि उसमें तो एग्जीट पोल बताने वाले की ही साख दांव पर लगी होती है , तभी तो एकदम उलटा एग्जीट पोल बताने वाले को माफी भी मांगनी पडती है, यह भी शायद भारत में चुनावी भविष्यवाणी के इतिहास की एक अद्वितीय घटना है।

स्वतंत्र व्यक्ति या एजेंसी द्वारा यदि कोई बिलकुल उलट चुनावी भविष्यवाणी की जाती है तो उसके केवल दो  कारण हो सकते हैं- (1). उसकी सैम्पलिंग अर्थात प्रेक्षण और आकलन – नीति ग़लत थी या (2) उसकी नीयत में खोट थी। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूं क्योंकि जब मेरे जैसा पिछडे  (?) क्षेत्र का गंवार वाशिंदा ईमानदारी से आकलन कर सही बात बता सकता है तो साधन सम्पन्न एजेंसियां क्यों नहीं? यकीन न हो तो मेरा ट्वीटर @shreelalprasad देखा जा सकता है जिस पर मोदी जी के कुछ रैलियों में भाषणों को सुनने के बाद मैं ने 01 सितम्बर 2015 को ही स्पष्ट रूप से लिखते हुए मोदी जी से कुछ सवाल भी किया था और उन्हें कुछ सुझाव भी दिया था।

उसके अलावा मेरा ब्लॉग shreelal.in  भी देखा जा सकता है जिस पर मैं ने 02 अक्टूबर, 11 अक्टूबर और 04 नवम्बर 2015 को ही अपना स्पष्ट आकलन पोस्ट करते हुए बिहार चुनाव के सभी महत्त्वपूर्ण कीरदारों के बारे में बात की थी , भाजपा की हार के कारण गिनाते हुए मीडिया और दुनिया जो सवाल आज उठा रही है, वह कारण मैंने शुरू में ही गिना दिया था तथा वे सवाल भी मोदी जी से मैंने तभी पूछ लिए थे। तो सवाल उठता है कि बडे – बडे लोग, संस्थान या दल दीवारों पर लिखी इबारत को पढने और उसे स्पष्ट रूप से बता देने या स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ क्यों बना लेते है तथा अपने अन्दर और अन्दरखाने की आवाज़ को सुनते- समझते क्यों नहीं ?

एक गंवारू लोककथा याद आ रही है :– एक व्यक्ति ने घोर तपस्या करने की ठानी , तप में लीन उस व्यक्ति के ऊपर उडती हुई चिडिया ने बिट कर दिया, तपस्वी क्रोधित हो गया और उसने आंखें तरेर कर ऊपर  देखा, उसके तप की आंच से चिडिया जल कर भस्म हो गई, तपस्वी समझ गया कि उसका तप सिद्ध हो गया है। भिक्षाटन करते हुए वह तपस्वी एक गांव में एक गृहस्थ के दरवाजे पर जा पहुंचा और खडे हो कर ‘ भिक्षाम देहि, भिक्षाम देहि’ की पुकार लगाने लगा , बहुत देर तक पुकारते रहने के बाद एक किशोर भिक्षा ले कर बाहर आया, देर से आने के लिए क्षमा मांगते हुए उसने बताया कि उसके बीमार माता – पिता सो रहे थे और वह उनकी सेवा कर रहा था, इसलिए वह तत्काल नहीं आ सका वरना उनकी अधूरी नींद खुल जाती । तपस्वी इतना सुनकर क्रोध से आगबबुला हो गया , तपस्वी को लगा कि उस किसान पुत्र ने देर से आ कर उसकी अवहेलना की है, और वह भी अपने उस तुच्छ बीमार माता – पिता के लिए उसने इस सिद्ध तपस्वी को प्रतीक्षारत रखा ! ऐसा कर उसने घोर पाप किया है, उसे इस पाप की सजा मिलनी चाहिए, वह क्रोध से कांपते हुए आंखें तरेर कर उस किसान पुत्र को देखने लगा। किसान पुत्र भयभीत होने के बदले मुस्करा उठा , उसने विनम्रतापूर्वक कहा – “ तपस्वी महराज ! कहीं आप मुझे वह असहाय चिडिया तो नहीं समझ बैठे, जो आपकी क्रोध भरी आंखों के ताप से जल कर भस्म हो गई थी? महाराज ! मैं मातृ – पितृ सेवक किसान पुत्र हूं, आप क्या, ब्रह्मा जी भी होते तब भी मैं अपने माता – पिता को उनींदी हालत में छोड कर नहीं आता”। अब तपस्वी को अपने गरूर का भान हुआ कि यहां गांव में बैठा यह किसान पुत्र जंगल की घटना को कैसे जान गया ? तब उसे समझ में आया कि एक गृहस्थ एक संन्यासी से बडा तपस्वी होता है। तो हरियाणा को जीतने के बाद मोदी जी और शाह जी बिहार के किसानपुत्रों को उसी तपस्वी की तरह आंखें तरेर कर डरा देना चाह रहे थे !

मोदी जी को तो मेरी सलाह वही है जो मैं ने अपने ट्वीट के माध्यम से दी थी, किंतु कॉंग्रेस, नीतीश जी और लालू जी को मैं कुछ विशेष सलाह देना चाहूंगा । लालू जी याद रखें अपने पुराने कुनबे के कारनामे को और उससे मिले परिणाम को तथा अपने बेटे – बेटी को प्रोजेक्ट तो खूब करें किंतु उसकी सीमाएं भी खुद अपने अनुभव के आधार पर निर्धारित कर दें क्योंकि उनकी यह बम्पर जीत नीतीश के सुशासन का प्रतिबिम्ब है। नीतीश जी याद रखें कि उनके सुशासन का जादू मतदाताओं के सिर चढ कर खूब बोला है किंतु उसे बोलने के लिए आवाज़ लालू जी के जनाधार ने दी है। कॉंग्रेस स्वीकार कर ले कि भाजपा उससे ज्यादा ताकतवर बन गई है इसलिए उसकी मूल रणनीति हर राज्य में नीतीश व लालू जैसे साथी की तलाश होनी चाहिए। बात बस इतनी है कि उन तीनों को महाभारत युद्ध के बाद पाण्डवों के गरूर जैसा अहम नहीं होना चाहिए जो यक्ष के सामने जा कर चूर –चूर हो जाए क्योंकि बिहार के मतदाताओं को नीतीश और लालू से ज्यादा और कौन जानेगा? अब तो यह दुनिया जान गई है कि बिहार का मतदाता स्वभाव में जितना ईमानदार और रहमदिल है, निर्णय सुनाने में उतना ही कठोर और निर्दयी भी है।

और मुलायम सिंह जी को क्या कहा जाए ? सबने उन्हें बडे आदर के साथ माथे पर बिठाया किंतु वे पंचतंत्र की कहानियों के उस शेर की तरह अनागत भय से आक्रांत हो कर इधर – उधर दौदने लगे जो जंगल में दूर ढकार मारते एक बैल को कोई अज्ञात विशालकाय आफत समझ बैठा था। बस, उन्हें ‘न खुदा ही मिला न विसाल –ए – सनम’ । उन्हें अब भी सियासत के मक़तब में यह सबक याद कर लेनी चाहिए कि जब लालू जैसा राजनीतिज्ञ धूल में मिलजाने के बाद भी फूल बन कर खिल सकता है तो उनके जैसा सियासतदां भी अर्श पर चढ कर फर्श पर गिर सकता है, आने वाले दिन तो कुछ वैसे ही नज़र आ रहे हैं।

माफी चाहूंगा प्रधानमंत्री जी, अभी आप लंदन में बोल रहे हैं और मैं आप को सुनते हुए लिख रहा हूं, ईमानदारीपूर्वक कह रहा हूं, अमेरिका में आप जो कुछ और जैसा बोले थे , उससे बेहतर आज बोल रहे हैं आप। लेकिन यह क्या, अचानक यह नौबत क्यों आ गई कि देश में घटी घटनाओं की सफाई आप विदेश में देने   लगे? सर, अब हमारा हेडमास्टर इंगलैण्ड नहीं रहा, और यह सफाई भी तो निवेश की गारण्टी नहीं है,फिर भी!

एक सलाह सभी दलों और सरकारों के लिए भी है, वे वाल्तेयर के शब्दों – “ मैं आप के विचारों से सहमत नहीं किंतु फिर भी, आप की विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा मैं अपनी जान दे कर भी करूंगा” को आत्मसात करलें तो वैसा दिन किसी को भी नहीं देखना पडेगा जैसा अभी बिहार में राजनीतिक दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी को और सरकार के रूप में नरेद्र मोदी सरकार को देखना पडा। खास कर यदि मोदी जी और उनके सिपहसलारों की मनस्थिति ज्यों की त्यों बनी रही तो लोहिया के शब्दों को मैं दुहराना  चाहूंगा – ‘ज़िंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं’ ।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

Mob. 9310249821

12 नवम्बर 2015

 

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