बिहारियों की आस्था का महापर्व : छठ

                      जहां ग़लत साबित होता है विश्वप्रसिद्ध मुहावरा

संभव है कि आप , वे या हम छठ की महिमा और उसके प्रभाव की प्रामाणिकता पर आस्था न रखते हों, फिर भी, यह तो जानना ही चाहेंगे कि वह कौन – सा विश्वप्रसिद्ध मुहावरा है जो छठ पर्व से ग़लत साबित हो जाता है और क्यों व कैसे ?

पुरी दुनिया में केवल बिहार में ही और देश – दुनिया में फैले बिहारियों के द्वारा ही छठ व्रत रखा जाता है, मैं व्यक्तिगत रूप से छठ को धार्मिक अनुष्ठान से अधिक सांस्कृतिक आस्था का महापर्व मानता हूं क्योंकि हमारे यहां हिंदुओं के अलावा मुस्लिम समुदाय के भी बहुत – से लोग (मुख्य रूप से महिलाएं )  छठ व्रत रखते हैं, वैसे ही, जैसे बहुत – से हिंदु भी रोज़ा रखते हैं। मुझे लगता है कि ऐसे अनुष्ठानों को धार्मिक स्वरूप प्रदान करने का सबसे बडा कारण उसके लिए विहित नियमों के अनुपालन की प्रतिवद्धता रेखांकित करना है।

आस्था का सीधा संबंध भाव और संवेदना से होता है। संवेदनशील व्यक्ति ही आस्थावान हो सकता है यानी भाव-जगत में पर – दु:ख – कातरता की अनुभूति ही संवेदना का मूल मंत्र है, इसलिए आज, जबकि हर तरफ हिंसा व आतंक का माहौल है, छठ पर्व के मूलाधार का विश्लेषण प्रासंगिक हो जाता है, साथ ही, धर्म और संस्कृति की भी स्पष्ट परिभाषा किए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।  यह कार्य मैं इस विधा  के महापंडितों के ऊपर छोडता हूं। यहां मेरा उद्देश्य केवल छठ का सांस्कृतिक विश्लेषण  है।

कार्त्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को अस्ताचलगामी सूर्य को तथा कल हो कर सप्तमी तिथि को उदीयमान सूर्य को अर्घ्यदान दिया जाता है। यही है सूर्य-षष्ठी व्रत अर्थात छठ। इसकी शुरुआत कार्त्तिक माह शुक्ल पक्ष के चौठे दिन यानी चतुर्थी को नहाय खाय से होती है और पंचमी को खरना अर्थात दिनभर उपवास के बाद रात्रि में अन्न-जल ग्रहण होता है, उस समय से ले कर सप्तमी को उगते सूरज को अर्घ्य देने तक व्रती अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं करते / करतीं हैं । लेकिन इसका सबसे महत्त्वपूर्ण शुभारंभ कार्त्तिक माह के प्रथम दिन से ही हो जाता है, उसी दिन से व्रती, चाहे वह रोज – रोज मांस – मछली खाने के अभ्यस्त ही क्यों न रहा / रही  हो, मांस – मछली क्या, लहसून – प्याज और अन्य तामसी भोज्य पदार्थ भी खाना त्याग देते / देतीं हैं और मनसा – वाचा – कर्मणा सात्विक जीवन यापन करते/ करती हैं। इसीलिए हिंसा के माहौल में यह अहिंसा पर्व और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। शायद  यह बुद्ध और महावीर की मिट्टी होने का ही प्रभाव हो ! शायद इसीलिए , लाख कमियों के बावजूद, यहां हमेशा सांस्कृतिक सद्भाव की हिमायत की ही जीत होती है !

भारतीय संस्कृति में दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति व तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है, इसके लिए  कार्त्तिक माह के पूर्व के माह यानी आश्विन माह का पहला पखवाडा ‘पितृ पक्ष’ के रूप में निर्धारित है, मुझे नहीं मालूम कि दुनिया की किसी अन्य संस्कृति में भी पूर्वजों को सम्मान देने का ऐसा कोई पुख्ता पुण्य विधि – विधान है। शायद छठ महापर्व भी हमारी उसी सांस्कृतिक विरासत का विस्तार हो !

एक बात ध्यान देने योग्य है कि इस पर्व में सूर्य को दो दिन अर्घ्य दिए जाते हैं, षष्ठी यानी छठे दिन को और सप्तमी यानी सातवें दिन को, फिर भी इसे सूर्य षष्ठी यानी छठ ही कहते हैं, सूर्य सप्तमी नहीं; इसके अलावा सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पहले दिन डूबते हुए सूर्य की आराधना की जाती अर्थात पहला अर्घ्य अस्ताचलगामी सूर्य को अर्पित किया जाता है और उसी के आधार पर इसे छठ कहा जाता है तथा  उदीयमान सूर्य को दूसरे दिन अर्घ्यदान दिया जाता है यानी उगते हुए सूर्य की आराधना बाद में की जाती है। यहीं आकर दुनिया की सारी भाषाओं व संस्कृतियों में समान रूप से व्यवहृत एक मुहावरा ग़लत साबित हो जाता है और वह है –

“ दुनिया उगते हुए सूर्य को पूजती है ”।

भारतीय और वह भी बिहार की ही सांस्कृतिक विरासत में डूबते हुए सूर्य यानी विदा हो रही पुरानी पीढी अर्थात वयोबृद्ध पूर्वजों की पूजा का संसकार है, और उसके बाद ही आगामी पीढी के आह्वान और स्वागत – सत्कार की परम्परा। बिलकुल स्पष्ट है कि वर्तमान पहले अतीत की आराधना करे और फिर उसके बाद भविष्य का आवाहन करे, हमारी ही संकृति में पूर्वजों का सम्मान और संतान का लालन – पालन धर्म के रूप में किया जाता है, उन्हीं पूर्वजों का प्रतीक डूबता हुआ सूरज तथा भावी पीढी का प्रतीक उगता हुआ सूरज है यानी हम डूबते हुए सूरज की भी पूजा करते हैं। यह अनोखी सांस्कृतिक विरासत केवल बिहार और बिहारियों में ही, और वह भी , धार्मिक प्रवृत्ति के रूप में संरक्षित व सुरक्षित है, यही हमारा विलक्षण चारित्रिक गुण है,  इसीलिए भारत की अपनी परम्परा न तो बृद्धाश्रम और न ही अनाथालय बनाने की रही है क्योंकि बृद्धों को अनाश्रित और बच्चों को अनाथ समझने की सीख तो हमने कहीं और से उधार ली है।

क्या पश्चिम के गुणगायकों तक छठ की यह महिमा पहुंच रही है ?

अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने का समय निकट है, अत: आप सबको , जो इसे मानते हैं उन्हें भी और जो इसे नहीं मानते हैं उन्हें भी, छठ महापर्व की हार्दिक मंगलकामनाएं!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

17 नवम्बर 2015

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5,085 thoughts on “बिहारियों की आस्था का महापर्व : छठ

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