डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(नाचते – नाचते मोरवा , गोडवा देख मुरछाए)

इंदिरापुरम, 06 दिसम्बर 2015

दुखवा हम  का सों कहें सैयां गयो परदेश ; पता नहीं, मेरी यह पांती पूरी हो तब तक ‘वो’ देश में होंगे या विदेश में , इसीलिए इसे डाकखाने के लेटर बॉक्स में न डाल कर अपने ब्लॉग और फेसबुक पर डाल रहा हूं। फिर भी , गारंटी नहीं है कि यह ‘उन’ तक पहुंच ही जाएगी, क्योंकि जो लोग बिहार चुनाव की जमीनी हक़ीक़त भी न पहुंचा सके, वे मेरी बात पहुंचा पाएंगे , इसका क्या भरोसा ?

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मेरे बाबू (पिता जी) एक कहावत सुनाया करते थे – “नाचते – नाचते मोरवा , गोडवा देख मुरछाए ” । एक बार उन्होंने उसका अर्थ बतलाते हुए कहा था कि सावन की काली घटा और जंगल की हरियाली देख मोर भाव – विभोर हो कर नाचता है, किंतु नाचते – नाचते जब उसकी नज़र अपने पांवों पर पडती है, तब वह हताश – निराश हो कर नाचना बंद कर देता है और अपने ही पांव देख वह मूर्छित हो जाता है। मैं ने पूछा था कि ऐसा क्यों होता है ? मोर के पांव में ऐसा क्या है जिसे देख वह मूरछित हो जाता है ? बाबू ने समझाया था कि मोर के पंख जितने खूबसूरत होते हैं, उसके पांव उतने ही बदसूरत होते हैं। वह अपने रंगविरंगे पंख देख खुश होता है, सावन की काली घटाएं और जंगल की हरियाली उसका उत्साह बढाती हैं, वह नाचने लगता है, किन्तु उसके पांवों की बदसूरती उसमें हीन भावना भर देती है। लोग तो उसका नाच देखते हैं, उसके पांवों की तरफ तो किसी की नज़र जाती ही नहीं, किंतु मोर क्या करे ? वह तो सच्चाई जानता है।

जब कभी भी मैं अपने परिवार के बहुविश्रुत उदार व शानदार अतीत और साधारण  वर्तमान  के बारे में कोई सवाल कर देता तो बाबू वह कहावत सुना देते और भावुक हो जाते।

‘वो’ जरूर जानना चाहते होंगे कि यह कहावत मैं उन्हें  क्यों सुना रहा हूं ? तो चलिए, घर – परिवार के कुछ और समाचार पहले सुना लूं, फिर वह कहावत सुनाने का कारण भी बता दूंगा।

दरअसल, अपनी मिट्टी की सुगंध जब नथुनों में भरी रहेगी और उसका प्रभाव मन – मस्तिष्क पर बना रहेगा  तो कोई आकाश में चाहे जितना ऊंचा उडता रहे, धरती जब पुकारेगी तो बिना किसी देर के दौडा चला आएगा। तभी तो मैं छह महीने – साल में कम से कम एक – दो बार अपनी मिट्टी में लौटने से खुद को रोक नहीं पाता। भले ही एक – दो दिन या आध दिन के लिए जाऊं, लेकिन जाऊंगा जरूर, और संयोग देखिए कि दोनों भाई गांव में रहते हैं और चारों बहन मेरे गांव की चारों दिशा में 15 से 35 किलोमीटर की दूरी पर व्याही गई हैं, जब भी जाता हूं, हर जगह जाता हूं और अपने गांव में भी घूम – घूम कर सभी पुराने लोगों से मिलता हूं।

जब भी वहां जाता हूं , कानों में बाबू की आवाज गूंजती हुई – सी महसूस होती है – “ ओ, सुन-अ-अ तारू, बबुआ आ गईलन”, मैं बाहर से जब भी घर जाता था तो मां को पुकार कर बाबू मेरे आने की सूचना ऐसे ही देते थे। अभी पीछले 20 – 25 दिनों से मैं अपने गांव – शहर में अपनी जड को ही सींच रहा था और नेट की दुनिया से दूर नेह की दुनिया में विचरण कर रहा था, इसीलिए अपने प्रिय पाठकों से मुखातिब होने में विलम्ब हुआ। हालांकि इस बीच सुधी पाठकों ने अपना स्नेह बनाए रखा, खास कर विदेश में बसे हिंदीभाषियों ने, जिनमें यूएसए, युके, रूस, जर्मनी, जापान, बुल्गारिया, ऐशबर्न, युक्रेन, स्वीडेन सरीखे दर्जनों देशों के सैकडों पाठक शामिल हैं, गुजरे 20 – 25 दिनों में भले ही नैं ने कोई नया पोस्ट नहीं डाला , इन सैकडों विदेशी पाठकों ने मेरे ब्लॉग shreelal.in पर सब्सक्राईब करना जारी रखा, इसके लिए मैं उन सब का आभारी हूं।

बाबू गांव में अपने समय के सबसे ज्यादा पढे – लिखे व्यक्ति माने जाते थे। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने में चम्पारण जिले के मुख्यालय मोतीहारी में रह कर पढाई की थी। मैंने उनका बोर्ड का सर्टीफिकेट और मार्क्स शीट देखा था, सचमुच वे मेधावी छात्र रहे थे । सुना था कि बिहार बैंक ( जिसका बाद में भारतीय स्टेट बैंक में विलय हो गया) के मैनेजर ने बाबू को क्लर्क की नौकरी का ऑफर दिया था जिसे दादा जी ने पसंद नहीं किया था और बाबू ने उसे अस्वीकार कर दिया था। मैं ने न चाहते हुए भी एक बार बाबू से पूछ लिया था कि उन्होंने वैसा क्यों किया था ? यदि उस समय वे बैक़ में क्लर्क भी हो गए होते तो उस वक्त तक वे जीएम के पद तक तो जरूर पहुंच गए होते , किसी बैंक के चेयरमैन भी हो सकते थे , क्योंकि कई बैंकों के चेयरमैन महज मैट्रीक्युलेट ही थे। बाबू बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे, मेरे उस सवाल पर वे कुछ ज्यादा भावुक हो गए थे, उन्होंने फिर वही कहावत सुनाई, इस बार मैंने उसका मायने उनसे पूछ दिया था तो उन्होंने उसमें निहित अर्थ को विस्तार से बताया था।

बाबू ने बताया था कि उनकी इच्छा तो अभी और आगे पढने की थी किंतु राजा काका ( उनके चचेरे बडे भाई) ने महज ढाई बीघा ( पांच एकड ) जमीन को विवादास्पद बना कर मुकद्द्मा कर दिया और जब लोअर कोर्ट में राजा काका हार गए तो हाई कोर्ट में अपील में चले गए, घर के बडे बेटे होने के चलते मुकद्दमे की पैरवी में बाबू को ही पटना दौडना पडता था, वह समय बाबू की आगे की पढाई के एडमीशन का था, तब तक द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था, महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजो ! भारत छोडो’ का नारा दे दिया था, स्वतंत्रता संग्राम उफान पर था , बस, बाकी सारी चीजें धरी की धरी रह गईं। वह मुकद्द्मा लम्बा चला था, जीत तो हुई, किंतु माली हालत पर बहुत बुरा असर पडा था, राजा काका तो आर्थिक रूप से बिलकुल तबाह हो गए। बाबू से यह चर्चा 1969 में उस समय हो रही थी, जब मेरा मैट्रीक का रिजल्ट आ चुका था और मैं कॉलेज में एडमीशन के लिए कश्मकश में था ।

बाबू जी तीन बहन और तीन भाई थे, सभी बहनें सम्पन्न और खुशहाल परिवार में व्याही गई थीं, उनमें से एक बहन बाबू जी से बडी थीं , शेष पांच भाई – बहनों में बाबू सबसे बडे थे । बाबू के तीन बेटों में मैं सबसे बडा था, एक बहन मुझसे बडी थी जिसकी शादी बहुत पहले हो चुकी थी, दोनों भाई और तीन बहनें मुझसे छोटी थीं यानी कि हम सात भाई – बहन थे, चाचा लोगों को केवल बेटे ही थे। मैं मझले चाचा को नूनू तथा छोटे चाचा को लाला कहता था। मेरी दादी का स्वर्गवास मेरे जन्म के पहले ही हो चुका था, दादा जी जीवित थे, मैं उन्हें बाबा कहता था, बाबा का देहावसान 1971 में हुआ । बाबा सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे किंतु मेरी बहनों के लिए उनके मन में स्नेह अधिक था, शायद  इसलिए कि उनके तीनों बेटों में से सिर्फ बाबू को ही बेटियां थीं और वह भी चार ! शायद इसीलिए बाबू के प्रति भी उनकी विशेष सहानुभूति थी । मझले चाचा के इकलौते बेटे (बहुत बाद में उन्हें एक बेटा और हुआ) उम्र में मुझसे एक साल बडे थे किंतु पढाई में वे मुझसे दो क्लास जूनियर थे, उन्होंने सातवीं पास कर पढाई लगभग छोड दी थी जबकि मेरा कॉलेज में एडमीशन होने वाला था, हर तरह से बाबू का परिवार बडा था और उस पर खर्च भी चाचा लोगों के परिवारों की अपेक्षा अधिक था। दोनों चाचा खेती-बारी देखते थे, बाबू आर्थिक, सामाजिक और अन्य प्रबंध देखते थे। ऐसी ही परिस्थितियों में एक दिन चाचा लोगों ने ज़ायदाद के बंटवारे के लिए दादा जी से कहा ।

आसपास के इलाके में मेरा परिवार एक बहुत ही सम्मानित और लोकप्रिय परिवार माना जाता था , हालांकि  कोई बहुत बडी ज़मीन ज़ायदाद नहीं थी, किंतु इतनी जरूर थी कि पांच सौ मन से अधिक धान की उपज होती थी , जिसमें से 100 मन से अधिक उच्च क्वालिटी का बासमती धान होता था जो पारिवारिक खर्च के काम आता था, उसके अलावा अपने खर्च के लिए दलहन , तेलहन, साग – सब्जी – तरकारी आदि की भी उपज पर्याप्त हो जाती थी, तब तक गेंहू की फसल हमारे क्षेत्र में लोकप्रिय नहीं हुई थी, हमारा इलाका धान का पीहर कहा जाता था, बाहर के लोग हमारे क्षेत्र को भतपेलवा यानी केवल चावल खाने वाला कहते थे, हमारे यहां भी भतपेलवा कहने वालों को जवाब देने के लिए दो पंक्तियों की एक कविता प्रचलित थी –

“रात अलुआ, दिन सुथनी ; पहुना अइलन त भात चिखनी”

अर्थात आलू, सकरकंद, गेंहू, बाजरे आदि खा कर ही गुजारा करने वाले लोगों को तो भात चखने का सौभाग्य तब मिलता है जब कोई अतिथि उनके घर आता है, कहने का अर्थ यह कि हमारे यहां का मुख्य भोजन था चावल, दाल, सब्जी और उसकी पर्याप्त उपज हमारे खेतों में हो जाती थी। बगीचे में आम – अमरूद – केला आदि के पेड पारिवारिक जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त थे। कोई नकदी फसल नहीं थी , जिसके चलते स्कूल की फीस देने, किताबें या कपडे खरीदने अथवा रूपये – पैसे की जरूरत के किसी भी काम के लिए धान बेचना ही एकमात्र साधन था क्योंकि खेती के अलावा कोई नौकरी या व्यवसाय नहीं था, आर्थिक असंतुलन का सबसे बडा कारण यही था । खेती के लिए तीन बैल, दूध – दही –घी के लिए दो गायें और दो भैंस थीं, उनमें से एक बिसुकती यानी दूध देना बंद करती तो दूसरी बिया जाती यानी बच्चा दे देती और दूध देना शुरू कर देती , इनमें से केवल घी अतिरिक्त होने पर बेचा जाता था, दूध – दही और साग – सब्जी आदि अतिरिक्त होने पर आस – पडोस के परिवारों को दी जाती थी जबकि हमारे परिवार से अधिक सम्पन्न परिवारों द्वारा इस तरह की सारी चीजों का दूसरे लोगों के माध्यम से परदे के पीछे व्यापार किया जाता था ।

तो, दोनों चाचा ने बंटवारे के लिए जब बाबा को कहा तो बाबा ने बाबू से बात की , बाबू बहुत मर्माहत हुए किंतु उसे अवश्यंभावी समझ कर उन्होंने एक सप्ताह तक एकाग्रता के साथ मेहनत कर सारी जमीन जायदाद व साजोसामान के तीन काग़ज़ तैयार किए, बंटवारे के लिए बैठक हुई, वह 1969 के जून का महीना था, उस बैठक में बाहर का कोई भी व्यक्ति नहीं बुलाया गया , दोनों चाचा, बाबू और बाबा बैठे , तब बाबू के मामा जी (स्व.) बंतीलाल प्रसाद जिन्दा थे और चूंकि वे तीनों भाइयों के मामा थे, इसीलिए सबकी राय से उन्हें भी बुला लिया गया। तीनों काग़ज़ मोड कर रख दिया गया , लाला यानी सबसे छोटे चाचा को सबसे पहले कागज़ उठाने के लिए कहा गया, फिर नूनू यानी मझले चाचा को और अंत में जो बच गया वह बाबू के हिस्से आया। उस बंटवारे के बाद उस पर आज तक कोई विवाद नहीं हुआ। कुछ लोग नज़रें गडाए हुए थे कि पंच के रूप में उन्हें  बुलाया जाएगा या कम से कम बंटवारे में असंतोष के कारण होने वाले तू तू – मैं मैं से उन्हें मनोरंजक दृश्य देखने का अवसर मिलेगा लेकिन बाबू द्वारा किए गए सम्यक बंटवारे और चाचा लोगों की समझदारी तथा पारिवारिक संस्कार ने ऐसा कोई भी मौका किसी को नहीं दिया, आसपास के गांवों में उस बंटवारे की खूब तारीफ हुई। बंटवारे के बाद बाबू को सबसे ज्यादा परेशानी हुई, उन्होंने कभी खुद खेती करायी नहीं थी,  अब नौकर या स्थायी मज़दूर रखना आर्थिक रूप से सहज नहीं था, जो क़र्ज़ थे, उसे ज़मीन बेच कर सधा दिया गया , खेती के लिए मज़दूर ऐसा रखा गया जिसे मज़दूरी में अनाज या नकद राशि देने के बदले कुछ खेत ही कमाने – खाने के लिए दिया जा सके, ऐसे में अपने लिए खेतों का रकबा और भी अधिक सिमट गया।

पारिवारिक बंटवारे के उसी माहौल में बाबू ने एक बार फिर उस कहावत को सुनाया था । इस बार मैं उस कहावत का निहितार्थ भलीभांति समझ पाया। उसका तात्पर्य यह था कि बाहर में परिवार का बहुत सम्मान था, बाबू भी पढे-लिखे थे, हर मोर्चे पर तारीफ मिलती थी यानी मोर के पंख रंगविरंगे और खूबसूरत थे, उसका नाच (स्वयं का प्रस्तुतीकरण ) मनमोहक और प्रशंसनीय था किंतु अन्दरखाने की माली हालत खास्ता थी , घर में आर्थिक तंगी थी यानी पांव बदसूरत थे । बाबू ने वैसी ही परिस्थितियों में दृढता के साथ कहा था कि जो कुछ हो जाए, हर हाल में मुझे अपनी पढाई जारी रखनी है और खूबसूरत पंख की तरह पावों को भी खूबसूरत बनाना है क्योंकि मोर को नाच कर पंख दिखाने के लिए आधार तो वे पांव ही देते हैं।

बाबू का स्वर्गवास 1984 में हुआ और उनके साल भर पहले 1983 में मां चल बसी थी। तब तक मेरे एक भाई और एक बहन की शादी नहीं हुई थी। मैं तो नौकरी में आ चुका था किंतु दोनों छोटे भाई ठीक से सेट्ल नहीं हो पाए थे। सबसे छोटी बहन के लिए बढिया घर – वर ढूंढ कर उसकी शादी कराई, फिर सबसे छोटे भाई की भी शादी हुई, परिवार की आर्थिक क्षमता और उपलब्ध साधनों से खेती-बारी और छोटे – मोटे कुछ अन्य कारोबार के साथ दोनों भाई सेट्ल हो गए। बाबू की भैयारी में बंटवारे के 34 साल बाद यानी 2003 में दोनों भाइयों ने बंटवारे के लिए मुझसे कहा तो मैं ने एक सप्ताह की छुट्टी लेकर सारी ज़ायदाद के दो हिस्से कर दो कागज तैयार किए और पूरा उन दोनों में ही बांट दिया , एक तीसरा कागज तैयार कर उसमें सिर्फ यह लिख दिया कि दोनों भाइयों के हिस्से में तीसरा अंश भी जिंदा रहेगा यानी सिद्धांत में या व्यवहार में मैं ने अपने लिए कोई हिस्सा अलग नहीं रखा । हम तीनों भाइयों ने खुद बैठ कर हिस्सेदारी पर आपसी मुहर लगा दी, किसी चौथे आदमी की जरूरत नहीं पडी, 12 वर्षों से अधिक का समय बीत गया है, अभी तक उस पर कोई विवाद नहीं हुआ है।

मेरी ससुराल भी मोतीहारी में ही है। मेरे श्वसुर जी को भी तीन बेटियां और तीन बेटे हैं। तीनों बेटियां अपनी – अपनी ससुराल में सुखी सम्पन्न हैं। आज के बीस साल पहले मेरे सास – श्वसुर ने तीनों बेटियों को कुछ – कुछ  जमीन देने के लिए स्टैम्प पेपर पर बख्शीशनामा तैयार करा कर रजिस्ट्री करने के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस चले गए थे। उन दिनों रजिस्ट्रार के सामने केवल उस आदमी की मौजूदगी जरूरी होती थी जो लिख रहा होता था, जिसके नाम में रजिस्ट्री होनी होती थी, उसकी उपस्थिति आवश्यक नहीं होती थी। उन दिनों मैं अपने भाई – बहनों से मिलने गांव गया था, उनसे मिल – मिलाकर जब ससुराल पहुंचा तो पता चला कि सास – श्वसुर बेटियों को जमीन लिखने कचहरी गए हैं। मैं बिना समय गंवाए रजिस्ट्रार के सामने पहुंच गया और सबके प्रति पूरा सम्मान दिखाते हुए बख्शीश में वह जमीन लेना अस्वीकार कर दिया, मेरे सास – श्वसुर ने मुझे समझाया  कि वे स्वेच्छा से सबको दे रहे हैं, इसलिए मैं भी स्वीकार कर लूं किंतु मैं ने बडे आदर व विनम्रता के साथ विरोध दर्शाते हुए उनके हाथ से कागज लेकर फाड दिया। तब मेरे तीनों साले छोटे थे। मेरे उन्हीं तीनों सालों और सास – श्वसुर ने मुझे बुलाया था ताकि सास – श्वसुर के नाम की सम्पत्ति का बंटवारा कर दिया जाए, क्योंकि सास – श्वसुर वयोबृद्ध हो गए हैं और वे नहीं चाहते कि उनके नहीं रहने पर बेटों में कोई विवाद हो। मैंने 12 दिन लगा कर पूरा शेड्युल तैयार किया और 30 नवम्बर 2015 को कचहरी में जा कर आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी कराई, उसमें न दूसरा कोई पंच था , न गवाह।

उसी बीच मैं अपने एक मित्र के बेटे की बारात बीगंज नेपाल गया। वह मोर वाली कहावत मैं ‘उनको’ इसी सिलसिले में सुनाना चाह रहा था। मेरे पैतृक गांव से मेरा जिला मुख्यालय मोतीहारी 30 किलोमीटर दक्षिण में है तो बीरगंज 30 किलोमीटर उत्तर में है। बचपन में रास्ते के खयाल से मोतीहारी जाना दुष्कर था और बीरगंज जाना आसान, क्योंकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और नेपाल के ‘महाराजाधिराज महेन्द्र वीर विक्रम शाहदेव 5 को सरकार’ के संयुक्त प्रयास से भारत – नेपाल मैत्री के प्रमाण के रूप में गंडक प्रोजेक्ट की आधारशिला वाल्मीकि नगर ( जी हां, वही वाल्मीकि आश्रम वाला स्थान जहां अयोध्या से निष्कासित महारानी सीता को वाल्मीकि जी ने शरण दे थी) में रखी गई थी , वहीं से गंडक नदी, जिसे नेपाल और बिहार के लोग नारायणी कहते हैं,  से एक बडी नहर निकाली गई जो उत्तर बिहार में सिंचाई के लिए एकमात्र बडा साधन बनी तथा उसी नहर के दोनों किनारे वाले ऊंचे बांध आज के नेशनल हाईवे की तरह वर्षों तक आवागमन का एकमात्र रास्ता भी रहे। भारत – नेपाल सीमा अर्द्ध चन्द्राकार में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से ले कर बिहार, बंगाल , सिक्कीम आदि तक यानी उत्तरी – पूर्वी भारत में फैली हुई है । नेपाल और उत्तर बिहार का संबंध तो राजनीतिक ,  आर्थिक एवं सामाजिक आदि हर मोर्चे पर भाईचारे का रहा ही है, उसके अलावा दोनों में रोजी – रोटी और बेटी – रोटी का भी गहरा संबंध रहा है, मेरे गांव के कई परिवार के कई लोग नेपाल के नागरिक हो गए हैं। काठमाण्डू में केवल मेरे जिले के हजारों व्यवसायी हैं और वहां के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक व राजनीतिक क्षेत्रों में उनकी सार्थक उपस्थिति है, वैसे ही नेपाल मूल के लोग भी भारत में हैं।

‘वो’ तो डीएनए के विशेषज्ञ हैं, ‘वे’ जानते ही है कि दक्षिण नेपाल यानी तराई क्षेत्र अर्थात मधेस आन्दोलनकारियों के क्षेत्र और उत्तर बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र का डीएनए एक समान है।

मेरी जानकरी में नेपाल ही ऐसा एक देश है जहां जाने – आने के लिए किसी भारतीय या नेपाली को किसी भी प्रकार के पासपोर्ट – वीसा की जरूरत नहीं है। वहां देश – विदेश का एहसास तभी होता है जब गाडी वगैरह ले जाने के लिए भंसार (टैक्स)  भरना पडता है किंतु वैसा तो हमारे यहां भी पुल – पुलिये या राजमार्गों की चुंगी चौकी पर टोल टैक्स भरने के लिए होता है। नेपाल का एक तबका हमेशा से चीन के प्रति नरम रहा है और भारत विरोध को हवा देता रहा है , भारत ने अपनी कुशल विदेश नीति से नेपाल को चीन की गोद में जाने से रोके रखा है । इतिहास भी दोनों देशों के बीच समन्वय बैठाता रहा है। लोकतंत्र की लडाई लडने वाले बडे नेता भारत में शरण लेते रहे हैं जिनमें कोईराला बंधु भी थे, वैसे ही अंग्रेजों के जमाने में जयप्रकाश नारायण और आपातकाल के दिनों में कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता नेपाल में छूप कर आन्दोलन का संचालन करते रहे थे । नेपाल कभी भी अंग्रेजों के अधीन नहीं रहा, उसकी सीमा बिहार में वर्तमान सीवान जिले तक थी, 1816 की सुगौली संधि के द्वारा भारत – नेपाल सीमा का पुनर्निर्धारण हुआ और भारत का रक्सौल तथा नेपाल का बीरगंज महत्त्वपूर्ण सीमांत शहर हुए । भारत – नेपाल के बीच केवल नागरिकों और व्यवसायियों में ही सद्भाव नहीं है, शासन और प्रशासन के स्तर पर भी सद्भावना रही है । स्व. राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में कुछ व्यवधान उपस्थित हुआ था, जिसे कुशलता पूर्वक सम्मानजनक तरीके से सुलझा लिया गया था।

भारत – नेपाल सीमा से संबंधित एक बहुत ही गंभीर और गोपनीय घटना का मैं साक्षी रहा हूं। बात 1982 के दिसम्बर के आखिरी दिनों की है, उन दिनों राज कुमार सिंह आईएएस पूर्वी चम्पारण के जिलाधिकारी थे, जी हां, वही आर के सिंह जो भारत के पूर्व गृह सचिव और भारतीय जनता पार्टी के आरा संसदीय क्षेत्र से वर्तमान लोक सभा सदस्य हैं। वे शुरू से ही ईमानदार निर्भीक और बेबाक रहे हैं, पूर्वी चम्पारण जिले में वे नायक की तरह माने जाते थे। तब केन्द्र और बिहार में कॉंग्रेस की सरकार थी। स्व. केदार पाण्डेय भारत के रेल मंत्री थे और रक्सौल के विधायक सगीर अहमद बिहार सरकार में जेल मंत्री (?) थे। उन्हीं के घर पर रात के दो बजे एक बैठक हुई थी जिसमें स्व. केदार पाण्डेय भी थे और पूर्वी चम्पारण के तत्कालीन जिलाधिकारी और एसपी भी थे। दरअसल भारत – नेपाल की रक्सौल – बीरगंज सीमा पर तस्करी की रोकथाम के लिए बीरगंज और पूर्वी चम्पारण के प्रशास ने दोनों जिले की वोटर लिस्ट का परस्पर आदान–प्रदान किया था ताकि तस्करों की पहचान की जा सके। पूर्वी चम्पारण जिला प्रशासन ने अपनी लिस्ट देने के लिए शायद शासन से कोई अनुमति नहीं ली  थी, जिलाधिकारी आर के सिंह के कुछ विरोधियों , जिनका निहित स्वार्थ वाधित होने की संभावना थी , ने उनके विरुद्ध माहौल बनाने की कोशिश की थी, उनमें शायद कुछ प्रभावशली राजनीतिज्ञ भी थे, जिलाधिकारी घबडाए हुए थे।

स्व. केदार पाण्डेय ने बडी दृढता के साथ राज कुमार सिंह का पक्ष लेते हुए उन्हें शांत्वना दी थी और कहा था – “ आपने देश हित में फैसला लिया है, यदि कोई तकनीकी कमी रह गई होगी तो उसे मैं पूरी करा दूंगा, डरते क्यों हैं ” ? वहां मैं भी मौजूद था, मेरा घर उसी संसदीय क्षेत्र में था जिसके सांसद पाण्डेय जी थे, जेपी आन्दोलन के दिनों में मैं ने उनके सामने ही उनके खिलाफ भाषण दिया था और चुनाव में जनता पार्टी के पक्ष में प्रचार किया था, फिर भी वे मुझे बहुत मानते थे, इसका कारण यह था कि पाण्डेय जी मेरे पिता जी के मामा (स्व.) बंतीलाल प्रसाद का बहुत सम्मान करते थे। दो दिनों पहले ही जिलाधिकारी आर के सिंह से मिल कर मैं ने जिले में अपने बैंक की शाखाएं खुलवाने के लिए जिला स्तरीय बैंकर्स समिति में प्रस्ताव पास कराने हेतु अनुरोध किया था, जिलाधिकारी ने तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डिनेटर हरिनारायण प्रसाद, जो लीड बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में डीसीओ थे, को बुला कर उस विषय को एजेंडा में एक मद के रूप में शामिल कर लेने का निर्देश भी दे दिया था, उसी काम को पुख्ता करने के लिए मैं अपने सांसद केदार पाण्डेय जी से लिखित अनुशंसा लेने गया था । तब मैं न्यु बैंक ऑफ इंडिया में मुज़फ्फरपुर शाखा में क्लर्क था और बैंक ने मुझे उस कार्य के लिए डिप्युट किया था।

तो मैं उसी बीरगंज में 26 नवम्बर को बारात गया था, लेकिन मधेश आन्दोलन के चलते बडी विकट स्थिति उत्पन्न हो गई थी, वर पक्ष वालों का कहना था कि चार दिन पहले कन्या पक्ष वालों को बता दिया गया था कि बारात बीरगंज नहीं जाएगी, सभी प्रबंध रक्सौल में ही किए जाएं और कन्या पक्ष वालों ने उसके लिए सहमति दे दी थी किंतु जब बारात रक्सौल में निर्धारित होटल में पहुंची तो पता चला कि वहां कोई प्रबंध ही नहीं था, सभी प्रबंध पूर्व की भांति बीरगंज में ही किए गए थे क्योंकि कैटेरर से ले कर सभी साजोसामान वालों ने पूर्व निर्धारित स्थल बीरगंज छोड कर रक्सौल जाने से मना कर दिया था। वर पक्ष वालों ने उसे कन्या पक्ष की तरफ से वादाखिलाफी माना और बीरगंज जाने से इंकार कर दिया। बहुत मान मनौवल के बाद बारात तो आगे बढी, किंतु तब तक रात के दस बजने  और सीमा सील होने का समय आ गया था, बस क्या था,  नेपाल के सुरक्षा प्रहरियों ने भारत – नेपाल बोर्डर के बीच नो मेंस लैंड से नेपाल सीमा में प्रवेश  करने से रोक दिया । वहीं नेपाल की सीमा में आन्दोनकारियों ने टेंट लगा कर धरना दिया था। वहां रोज गाडियां जलाई जा रहीं थीं और गोलियां चल रहीं थी, उसी दिन आन्दोलनकारी उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश बीरगंज प्रशासन ने दिया था । इसीलिए बडी मुश्किल से नेपाल सीमा में प्रवेश मिला । सुबह के पांच बजने पर बोर्डर खुलते ही सभी लोग गाडियों में भर कर बोर्डर पार कर वापस भारतीय सीमा में आ गए।

दरअसल, अपनी जड से जुडे रहने के लिए इतना रिस्क तो बनता है भाई ! इतना ही नहीं, मौजूदा हालात ने कई शादियां होने नहीं दी और कई शादियां तोड भी डाली हैं, क्योंकि नेपाल के नये संविधान ने भारतीय दुल्हनों और उससे होने वले बच्चों के कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार छीन लिये हैं। सैकडों वर्षों की साझा संस्कृति खतरे में पड गई है।

हम किसी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते किंतु भारतीयों और भारतवंशियों के हितों की रक्षा के लिए चिंता तो कर ही सकते हैं, उनकी समस्याओं के हल के लिए विदेश नीति के दायरे में रह कर पहल तो कर ही सकते हैं। ताज़ा आंकडों के अनुसार 3 करोड 50 लाख से अधिक भारतीय और भारतवंशी विदेश में रहते हैं, यह कौन बताएगा कि उनमें से कौन रोजी –  रोटी कमाने के लिए गया है, कौन निवेशक है, कौन वहां की अर्थ व्यवस्था या शासन व्यवस्था संभालने के लिए गया है, कौन पलायन कर गया है और कौन शरणार्थी है ?

‘उनके’ प्रवक्ता टेलीविजन चैनलों पर बडे जोर-शोर से कहते हैं कि बिहार के लोग ‘पढाई, कमाई और दवाई’ के लिए बाहार जाते हैं और उसके लिए बिहार सरकार को दोषी बताते हैं, तो फिर, उन साढे तीन करोड प्रवासी भारतीयों के लिए कौन दोषी है ? हम भी तो विदेशों से निवेशकों को आमंत्रित कर रहे हैं, हम बिहार वासियों के पास श्रम-पूंजी है, मेधा – पूंजी है, हम अपनी उसी पूंजी का निवेश करने बाहर जाते है, बाहर वाले यहां आ कर केवल मुद्रा – पूंजी निवेश करेंगे तो वे माननीय हो गए और हम बाहर में श्रम-पूंजी  व मेधा – पूंजी निवेश करने जाएं तो निंदनीय ?

नेपाल की समस्या से बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड आदि राज्यों की जनता प्रभावित हैं और उन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं, तो क्या उस मामले को विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं किया जा सकता ? क्या मोर अपने मनमोहक नृत्य में केवल रंगविरंगे खूबसूरत पंखों को ही देखेगा, क्या इन  बदसूरत पांवों को नहीं देखेगा ? क्या इन्हें देख लेने से मूरछित हो जाने का भय है ?

अब तो घर आ जा परदेसी !

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

09310249821

इंदिरापुरम, 06 दिसम्बर 2015

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