मेरा पोता अपूर्व अमन आज एक वर्ष का हो गया

    मेरा पौत्र अपूर्व अमन

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आज 16 दिसम्बर 2015 को पूरे एक वर्ष का हो गया।

शत – शत बधाइयां , कोटिश: आशीर्वचन ।

अपूर्व अमन का जन्म जामिया हमदर्द मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल नई दिल्ली में डॉ. अर्चना कुमारी की देखरेख में 16 दिसम्बर 2014 को प्रात: 10 बज कर 16 मिनट पर हुआ था। आज के लगभग एक वर्ष दो माह पहले 18 अक्टूबर 2014 को उसी अस्पताल में उसी डॉक्टर की देखरेख में मेरे नाती – पुत्री शिल्पा श्री और जमाता सुमीत कुमार के पुत्र – कुमार श्रेष्ठ का भी जन्म हुआ था।

मेरे एकमात्र पुत्र कुमार पुष्पक (मैनेजर, NOUS बंगलोर) और बहू आरती पुष्पक (एक्स एचआर – एग्जीक्युटिव, एचपी, बंगलोर) का यह प्रथम पुत्र अपूर्व अमन अपने दादा के, यानी मेरे उपनाम से जाना जा रहा है, विदित है कि रचनात्मक लेखन में मैं ने अपना उपनाम ‘अमन’ रखा है, तो मेरे बेटे ने अपने बेटे में अपने बाप को हमेशा देखते रहने की ख्वाहिश से अपने बेटे को अपने बाप का नाम दे दिया है क्योंकि वह अपने बाप को बहुत प्यार करता है, वैसे ही, जैसे उसके बापने अपने बाप को अपने बेटे में हमेशा देखते रहने की चाहत में अपने बेटे को अपने बाप का नाम ‘बाबू’ दे दिया था क्योंकि वे अपने बाप को बहुत प्यार करते थे और उन्हें ‘बाबू’ कहते थे।

बाबू और इया (मां) ! आपलोग स्वर्गलोक से देख–सुन रहे हैं न ? आप का परपोता एक वर्ष का हो गया है, मेरे सभी हित – मीत – शुभचिंतक ! मेरी प्रार्थना है कि आप सभी आशीर्वाद दीजिए कि मेरा पोता अपने पूर्वजों का संस्कार ले कर तो चले किंतु अपनी पहचान के लिए उनके नाम का मोहताज़ न रहे, उसकी मुकम्मल पहचान के लिए उसका अपना नाम ही काफी हो, वह सचमुच ‘अपूर्व’ हो, सही मायने में ‘अमन’ यानी शांति और संवेदनशीलता का प्रतीक हो ।

यह भी एक सुखद संयोग ही है कि आज के ठीक सात दिन पहले 9 दिसम्बर को मेरे बेटे कुमार पुष्पक का जन्मदिन था। तीन – चार माह पहले हमने प्रोग्राम बनाया था कि किसी मनोरम स्थल पर पूरे परिवार के साथ एक सप्ताह रह कर 9 दिसम्बर को बेटे का और 16 दिसम्बर को पोते का जन्मदिन धूमधाम से मनाएंगे किंतु अभी हाल में चेन्नई में वर्षा व बाढ से मची भयंकर तबाही से पीडित लोगों के प्रति संवेदना प्रकट करने की मनसा से हमने बेटे और पोते का जन्मदिन सादगीपूर्ण तरीके से मनाने का निर्णय लिया । इसीलिए 9 दिसम्बर को बेटे ने घर में ही अपना जन्मदिन मनाया और पोते का जन्मदिन भी घर में ही पूजा – पाठ कर मनाया जा रहा है। इस पूजा – पाठ में शामिल होने के लिए दो रोज पहले मैं पत्नी पुष्पा प्रसाद के साथ दिल्ली से बंगलोर आ गया, मेरी छोटी बेटी शिप्रा (सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर , कॉग्नीज़ेंट)  और दामाद अभिषेक आर्यन (सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर, आईबीएम) बंगलोर में ही हैं, बडी बेटी शिल्पा श्री और दामाद सुमीत कुमार भी मेरे नाती कुमार श्रेष्ठ के साथ बंगलोर पहुंचने वाले हैं।

मेरा पुत्र , कुमार पुष्पक कहते हैं कि उनका बेटा अपूर्व अमन देखने में जितना शांत व गंभीर लगता है, अन्दर से उतना ही नटखट है और उनका भांजा कुमार श्रेष्ठ देखने में छोटा भीम है किंतु अन्दर से शांत व गंभीर है। पुष्पक का आकलन चाहे जो हो, मेरा मूल्यांकन यह है कि मेरा नाती और पोता, दोनों भाई राम और कृष्ण के प्रतिरूप लगते हैं और जिस किसी के भी सामने आ जाते हैं , उसी के हो जाते हैं और सामने वाले भी इनके हुए बिना नहीं रह पाते। मैं पूरे यकीन के साथ नहीं कह सकता कि वास्तव में कोई राम और कृष्ण हुए थे या नहीं, किंतु फिर भी, रामायण तथा महाभारत में जो कुछ पढा है और अब जो कुछ अपने नाती व पोता में देख रहा हूं तो प्रतीत होता है कि राम और कृष्ण जरूर रहे होंगे। धार्मिक आस्था को अलग रख कर यदि दोनों ग्रंथों के आधार पर उन दोनों महानायकों का निष्पक्ष भाव से चरित्रचित्रण किया जाए तो राम मर्यादा पुरूषोत्तम तो कृष्ण लीला पुरूषोत्तम , राम मन के प्रतीक तो कृष्ण बुद्धि के प्रतीक और राम आदर्शवादी तो कृष्ण यथार्थवादी यानी व्यावहारिक लगते हैं; राम का व्यक्तित्व माधुर्य प्रधान तो कृष्ण का व्यक्तित्व चातुर्य प्रधान लगता है, दोनों समर्पण के अप्रतिम उदाहरण हैं , राम अपना राज – पाट, सुख – ऐश्वर्य सब कुछ लोक –  कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं तो कृष्ण कहते है – सब कुछ मैं ही हूं, सब कुछ मेरा ही है, इसीलिए लोक – कल्याण के लिए सब कुछ मुझे समर्पित कर दो । दोनों ने लोक – भावना को सर्वोपरि मान कर दुष्टात्माओं के अंत के लिए देश – काल – पात्र के अनुसार अपनी शक्ति का प्रयोग किया। मैं ऐसा तो नहीं कहता कि मेरे नाती व पोता वैसे ही हैं; क्योंकि हर आदमी को अपनी औलाद , और वह भी औलाद की औलाद , उतनी ही प्यारी होती है जितनी कि मुझे अपनी औलाद और औलाद की औलाद प्यारी है , हमारे यहां कहावत भी है कि मूल धन से अधिक सूद प्यारा होता है; परंतु मेरी कामना ऐसी जरूर है कि उनमें वैसे ही गुण हों।

पूरा जीवन हिंदी के प्रचार – प्रसार में लगा देने वाले दादा श्रीलाल प्रसाद ‘अमन’ का पोता अपूर्व अमन छह  महीने की उम्र से ही दूध पीने, खाने, मालिश कराने यानी हर काम करने – कराने के साथ टी वी पर अंग्रेजी नरसरी राईम्स देखना – सुनना चाहता है, उसके वगैर वह कोई भी काम न करता है और न कराने देता है। सोचता हूं, एक तरह से यह ठीक ही है कि वह कानफोडू कोई गेम या बाजा पसन्द नहीं करता, तेज संगीत या किसी भी प्रकार की तेज़ आवाज़ से वह चिढता है । बचपन में मां पुचकार कर हमें खिलाती थी, एक – एक कौर को भिन्न – भिन्न चिडिया का नाम दे कर खिलाती थी, चन्दा मामा को दिखा – दिखा कर खिलाती थी तो गैया – बछरुआ कह कर भर – भर गिलास दूध पिला देती थी और लोरी गा कर सुलाती थी, वैसे ही मेरी बहू अपने बेटे को राईम्स गा कर और टीवी पर दिखा कर खिलाती – सुलाती है, क्योंकि हमारे जमाने में सब कुछ ऑडियो था और आज के डीजिटल जमाने में सब कुछ ऑडियो – विजुअल हो गया है। उसकी दादी की तो जान ही पोते में बसती है, वह अपने पोते को वही सब कह कर वैसे ही खिलाती है जैसे मेरी मां मुझे खिलाती थी, सच, अपने पोते को देख कर मुझे प्रतीत होता है कि मैं एक बार फिर अपनी शैशवास्था में आ गया हूं ।

मुझे लगता है कि मेरा पोता मेरी तरह ही पढाकू और लिखाड होगा, क्योंकि वह टीवी पर भी कोई ऐसी – वैसी चीज देखना – सुनना नहीं चाहता, लेकिन उसकी एक बात देख मैं कुछ सतर्क भी हो रहा हूं , वह अपने बाप की तरह ‘चबी चिक ऐण्ड रोजी लिप्स’ वाला राईम्स ज्यादा पसन्द करता है ! मुझे यह भी लगता है कि वह एक शाश्वत पर्यटक होगा, क्योंकि शुरू से ही वह घर के दरवाजे की ओर देखता है, लिफ्ट के पास पहुंचने पर अंगुली लगा कर उसे खोलने की कोशिश करता है, जब फ्लोर नम्बर लिफ्ट की चौखट पर ब्लिंक करने लगता है तो मुस्कुराने लगता है और जब लिफ्ट खुल जाता है तो खिलखिला कर हंस पडता है तथा पार्क में ही देर तक रहना चाहता है। वह जब ज्यादा रोने लगे तो या तो उसे राईम्स दिखा – सुना दीजिए या बाहर घुमा दीजिए, खाना – पीना भी भूल जाएगा । शायद राहुल सांकृत्यायन की तरह वह अथतो घुमक्कड होगा।

मेरा पोता घुटनों के बल चलना न चाह कर किसी चीज को पकड कर उसके सहारे खडा हो जाना चाहता है और खडे हो कर चलना चाहता है, मेरी अंगुलियों का सहारा जब उसे मिलता है तो उसे पकड कर वह मेरे पीछे – पीछे नहीं चलता है, बल्कि सहारा मिलते ही वह आगे – आगे दौडता है और मुझे भी दौडा मारता है ; हालांकि जब वह सोफा या सेंटर टेबल या दीवार पकड कर खडा हो कर खुद चलता है तो लडखडा कर गिर पडता है, जब देखता है कि उसे कोई देख रहा है तो रोने लगता है परंतु गिर पडने पर जब वह दाएं – बाएं – पीछे मुड कर देखता है और उसे महसूस हो जाता है कि गिरते हुए उसे किसी ने भी नहीं देखा तो फिर से खडा होने की कोशिश करने लगता है, हम उसकी कारगुजारियों को देखते हुए देख कर भी नहीं देखने का बहाना कर देते हैं और उसके बार – बार गिरने व फिर उठ खडा होने की कोशिश करने का अलौकिक आनन्द लेते हुए पौत्र सुख का भोग करते हैं। अब मुझे एहसास हो रहा है कि लोग नाती – पोता को खिला कर ही मरने की मनोवांछा क्यों पालते हैं? दशरथ – कौशल्या या नन्द – यशोदा ने राम और कृष्ण को खिलाते हुए इससे ज्यादा क्या सुख – भोग किया होगा ?

आएं, हम सभी ईश्वर से प्रार्थना करें कि अपूर्व अमन सुदीर्घ स्वस्थ सुखमय स्नेहिल निर्विघ्न आनन्दमय जीवन प्राप्त करे और हर पल हर कदम पर अपार सफलता, सुनाम – सम्मान प्रात करते हुए एक संवेदनशील मनुष्य बने ।

बेटे कुमार पुष्पक और बहू आरती पुष्पक को मेरे पौत्र के सुचारू रूप से लालन – पालन के लिए बधाइयां व धन्यवाद और आशीर्वाद ।

अपूर्व बाबू को उनके जन्मदिन की पहली वर्षगांठ पर दादा – दादी, पापा – मम्मी , चाचा – चाची, नाना–नानी, मामा–मामी, फूफा–फूफी, और बडे भाई कुमार श्रेष्ठ तथा सभी बडों के ढेर सारे आशीर्वाद व हार्दिक शुभकामनाएं…!

यहां एक तस्बीर वह है जब मेरा बेटा एक वर्ष का हुआ था और उसके नीचे दूसरी तस्बीर वह है जब मेरे बेटे का बेटा एक वर्ष का हुआ है –

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‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

09310249821

बंगलोर, 16 दिसम्बर 2015

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