डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए – 2)

बंगलोर, 28 दिसम्बर 2015
फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़ल का एक शेर –
“ कुछ क़फ़श की तीलियों से छन रहा है नूर – सा
  कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत –ए– परवाज़ की बातें करो
                  *****
पिंजडे में कैद परिंदे की बेचारगी का रोना मत रो, उसकी बेखौफ़ उडान की बात करो, खुले  आसमान की बात करो, पिंजडे का कद और अपनी हद उसे मालूम है, सलाखों से छन कर आ रहा उजास उसका हमसफर है, उसका हौसला बरकरार है। इस सच का सामना हमने पिछली कडी – 21 दिसम्बर 2015 की पोस्ट – में मेरे प्रोमोशन और पोस्टिंग के संदर्भ में विभिन्न घटनाक्रमों से गुजरते हुए किया, पिंजडे का एक तोता बोल सकता है आज़ाद बोल तो बाकी तोते क्यों नहीं? दरअसल, पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए ही असल गुनहग़ार  हैं !

तो पंजाब नैशनल बैंक प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग के मुख्य प्रबंधक ईश्वर चन्द्र बंसल ने 2009 के नवम्बर माह के मध्य में एक बार फिर फोन किया, उन्होंने बताया कि फाईनली उन्हें हटा दिया गया है, उनका ट्रांस्फर आगरा कर दिया गया है और उसका कारण उन्होंने मुझे बताया । उन्होंने यह भी कहा कि उनका जाना अब भी रूक सकता है , बशर्त्ते कि मैं जा कर ईडी से कह दूं कि मैं राजभाषा विभाग में नहीं आना चाहता। मैं ने उन्हें फिर वही बात कही कि जब मैं ने वहां आने के लिए नहीं कहा तो नहीं आने के लिए कैसे कह सकता हूं? इसके अलावा , मेरी 12 सप्ताह की ऑन जॉब ट्रेनिंग अभी पूरी भी नहीं हुई है तथा पोस्टिंग का कोई आदेश भी मुझे नहीं मिला है। बंसल जी ने बडे भारी मन से और दुखी स्वर में कहा – ‘ठीक’ है।
बंसल जी से पहली बार फोन पर मेरी बात 25 – 26 वर्ष पहले अगस्त 1983 में तब हुई थी जब मैं न्यु बैंक ऑफ इंडिया की मुज़फ्फरपुर शाखा में क्लर्क था और वे मुज़फ्फरपुर में ही पंजाब नैशनल बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय में हिंदी अफसर थे। मैंने न्यु बैंक में हिंदी अफसर के लिए आयोजित रिटेन टेस्ट में टॉप किया था और मेरा इटरव्यु भी बहुत बढिया गया था, सो अपनी ब्रांच में मैं ने कह दिया था कि मेरा सेलेक्शन हो जाएगा, मेरे साथियों ने चिढाने के अन्दाज़ में कहा था कि जब इतने आश्वस्त हैं तो मिठाई खिला ही दीजिए और मैंने 125 रूपये की मिठाई खिला दी थी। बिहार से दो कैण्डीडेट थे , एक तो मैं था और दूसरी थी सुधा वर्मा जो पटना शाखा में क्लर्क थीं। दिल्ली बैंक इम्पलाईज युनियन के नेता जे.के. साहनी की तरफ से सुधा वर्मा को सेलेक्शन का बधाई पत्र (ऐसा पत्र युनियन वाले स्वत: सबको भेजा करते थे) मिल गया था, मुझे नहीं मिला था, समझा यह गया कि डाक में देर – सबेर पत्र आ जाएगा, मैं उसी युनियन का मेम्बर तो था किंतु किसी नेता से किसी भी प्रकार की सहायता लेना अपनी तौहीन समझता था, इसीलिए मैं ने पता लगाने के लिए किसी से कुछ भी नहीं कहा। वह ज़माना मोबाईल फोन या इंटरनेट का नहीं था, एसटीडी बूथ भी नहीं होते थे, खास – खास लोगों के पास ही लैंण्डलाईन फोन में एसटीडी फैसिलिटी उपलब्ध थी, टेलीफोन एक्सचेंज था जहां से फोन लग पाना पैदल चल कर पहुंच जाने से भी अधिक मुश्किल था। जब एक सप्ताह तक कोई पत्र मुझे नहीं मिला तो साथियों ने मेरे कंफीडेंस का मज़ाक उडाना शुरू कर दिया और एक ने तो यह प्रस्ताव भी रख दिया कि मिठाई खाने वाले सभी लोग पैसे इकट्ठे कर बेचारे को पैसे वापस कर दें, मैं निराश  तो नहीं था किंतु गुस्से में जरूर आ गया था और उस सेलेक्शन पैनल को चुनौती देने के लिए बैंक के ऊपर मुकद्द्मा करने हेतु हाई कोर्ट के एक वकील से राय लेने पटना जाने का निश्चय कर लिया था।
वैसी ही परिस्थितियों में ईश्वर चन्द्र बंसल का फोन ब्रांच मैनेजर के.पी. राय के चेम्बर में आया था। बंसल जी ने अपना परिचय देते हुए मुझे बताया था – “ मेरा छोटा भाई राम कुमार बंसल ( अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, भगवान उनकी आत्मा को शांति दे, वे बहुत ही नेक इंसान थे) भी न्यु बैंक में है और हिंदी अफसर का कैण्डीडेट है तथा उसका भी चयन हो गया है, उसी ने बताया है कि मुज़फ्फरपुर शाखा में कोई लाल प्रसाद ( आज तक न्यु बैंक ऑफ इंडिया के मेरे पुराने हिंदी अफसर साथी श्रीलाल प्रसाद न कह कर ‘लाल प्रसाद’ ही कहते हैं क्योंकि रिजल्ट टाईप करने वाले ने मेरे नाम के साथ ‘श्री’ तो अलग से लगाया था किंतु ‘श्रीलाल’ वाला श्री हटा दिया था , टाइपिस्ट की छोटी – सी भूल ने मेरा नाम ही बिगाड कर रख दिया, लेकिन पीएनबी में आकर वह ठीक हो गया)   है, जिसने टॉप किया है ”। मैंने फोन रखा ही था कि चेम्बर में डाकिये ने प्रवेश किया (तब डाकिया चिट्ठियां सीधे मैनेजर चेम्बर में ही देता था), मैं चेम्बर से बाहर निकल ही रहा था कि मैनेजर राय जी ने पुकारा –“ लीजिए, आपकी चिट्ठी भी आ गई”, देखा तो उस पर न्यु बैंक ऑफ इंडिया शाखा मुज़फ्फर नगर द्वारा रिडायरेक्ट किया गया था यानी कि वह चिट्ठी मुज़फ्फरपुर के बदले मुज़फ्फर नगर चली गई थी और वहां से सही पते पर रिडायरेक्ट की गई थी।
सुधी पाठकवृन्द सेलेक्शन की सूचना नहीं मिलने और फिर मिल जाने, दोनों ही परिस्थितियों में मेरी मनोदशा का अनुमान लगा सकते हैं। उसी पुराने घटनाक्रम को याद कर मैं ईश्वर चन्द्र बंसल की अनचाही बातों को सुन कर भी खीझता नहीं था और बडे संयत स्वर में उनकी बातों का जवाब देता था। इसीलिए जब उन्होंने दुखी स्वर में कहा कि ‘ठीक है’ तो मुझे भी दुख हुआ था। हालांकि उसके पहले ही राजभाषा विभाग से बलदेव मल्होत्रा प्रबंधक ने उस डेवलपमेंट की सूचना मुझे फोन पर दे दी थी । बलदेव जी ने मुझे यह भी बताया था कि एस पी कोहली अन्दर ही अन्दर बंसल जी के जाने से खुश है किंतु ऊपर से बंसल जी के प्रति सहानुभूति खूब दिखा रहे हैं क्योंकि उन्हें आर के दुबे महाप्रबंधक की पैरवी के बल पर भरोसा था कि वे ही राजभाषा विभाग के प्रभारी रहने वाले थे।
उसके कुछ ही दिनों बाद मुझे ब्रांच के काम से दिल्ली सर्कल ऑफिस जाने का मौका मिला था तो राजभाषा विभाग में भी जा कर सबसे मिला था, उसी दिन फोन पर पहले से ही बात करने वाले बलदेव मल्होत्रा और कोहली जी से परिचय हो पाया था। दरअसल मैं जिस पंजाबीबाग शाखा में ट्रेनिंग ले रहा था, वह दिल्ली सर्कल के ही अधीन थी और दिल्ली सर्कल ऑफिस उसी राजेन्द्र भवन के चौथे तल पर था जिसके दूसरे तल पर प्रधान कार्यालय का राजभाषा विभाग और लेखा परीक्षा एवं निरीक्षण प्रभाग भी था, जिसके प्रभारी महाप्रबंधक वी एम शर्मा थे। वी एम शर्मा रांची में मेरे अंचल प्रबंधक रह चुके थे, वे राजभाषा विभाग के भी प्रभारी महाप्रबंधक थे, मैं उनसे भी मिला, शर्मा जी ने बताया था कि मेरे बारे में उनसे भी राय ली गई थी और उन्होंने मेरे पक्ष में अनुशंसा की थी। उसी फ्लोर पर बीसी निगम महाप्रबंधक भी मिल गए, चूंकि वीएम शर्मा दो माह बाद रिटायर होने वाले थे और उनके स्थान पर ही निगम जी की पोस्टिंग हुई थी, इसलिए वे वहीं दूसरे चेम्बर में बैठते थे , निगम जी पटना में सीनियर रिजनल मैनेजर तथा ज़ोनल मैनेजर, दोनों ही रूपों में तीन साल के अंतराल पर कार्य कर चुके थे और मैं उनके दोनों ही टर्म के समय पटना अंचल कार्यालय में ही पोस्टेड रहा था। उन्होंने भी बताया कि मेरे बारे में उनसे भी पूछा गया था तो उन्होंने भी मेरे पक्ष में अनुशंसा की थी।  राजेन्द्र भवन से निकल कर जब मैं पार्किंग में अपनी कार की ओर बढ ही रहा था कि डीजीएम एस के मोहला मिल गए, वे भी लेखा परीक्षा प्रभाग में ही वीएम शर्मा के अधीन डीजीएम थे, मोहला जी मेरे पूर्व परिचित थे, वे जब क्षेत्रीय कार्यालय पटना – ‘ख’ के क्षेत्रीय प्रबंधक थे तो मैं उसी फ्लोर पर अंचल कार्यालय में वरिष्ठ प्रबंधक – राजभाषा था, उन्होंने भी बताया कि हेड ऑफिस ने मेरे बारे में उनसे पूछा था तो उन्होंने मेरे पक्ष में अनुशंसा की थी।
सर्कल ऑफिस में काम पूरा कर मैं अपनी शाखा पंजाबीबाग वापस आया तो शाखा के सहायक महाप्रबंधक विवेक झा से बात हुई, उन्होंने बताया कि एचआरडी के जीएम बीपी शर्मा ने उन्हें बुलाया था, वे उन्हीं से मिलने हेड ऑफिस भीखाएजी कामा प्लेस जा रहे थे, उन्होंने मुझे भी चलने को कहा और यह भी कहा कि चलिए, अपने लिए भी बात कर लीजिएगा । झा जी रांची में जब एसएनजी रोड ब्रांच में चीफ मैनेजर थे तो मैं अंचल कार्यालय रांची में वरिष्ठ प्रबंधक – राजभाषा था, हमारे बीच मित्रवत व्यवहार था किंतु वहां वे मेरे बॉस थे, मैंने उनसे कहा था कि – “ क्या आपको लगता है कि मुझे अपने लिए जीएम से बात करनी चाहिए और मैं कभी वैसी बात कर पाऊंगा ” ? वहीं शाखा के सेकंड मैन जे के जैन चीफ मैनेजर भी बैठे थे, उन्होंने कहा कि श्रीलाल जी ठीक सोचते हैं, इन्हें बात नहीं करनी चाहिए, झा जी चले गए।
प्रतिदिन की भांति मैं 11 जनवरी 2010 को प्रात: 9.45 बजे शाखा पंजाबीबाग पहुंचा और सबसे औपचारिक दुआ सलाम के बाद अपने काम में लग गया। करीब 11 बजे शाखा के एजीएम विवेक झा ने  बताया कि मेरी ट्रेनिंग पूरी हो गई है, इसीलिए मुझे वापस दिल्ली मंडल कार्यलय भेजा जा रहा है। चूंकि रिटेल हब पश्चिम विहार से बिना किसी स्थानांतरण पत्र के ही मुझे शाखा पंजाबीबाग भेजा गया था, शायद इसीलिए वहां से भी बिना पत्र के ही मुझे मंडल कर्यालय भेज दिया गया। मंडल कार्यालय दिल्ली में चीफ मैनेजर एचआरडी नेहाल अहद से मिला तो उन्होंने पत्र थमाते हुए प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग में तत्काल ज्वाईन करने को कहा। उसी बिल्डिंग में दूसरे तल पर राजभाषा विभाग में जा कर अपराह्न 01 बजे मैंने अपनी ड्युटी ज्वाईन कर ली। बस, सारी अटकलों पर विराम चिह्न लग गया, लेकिन  … अनगिनत चुनौतियों के द्वार खुल गए !
राजभाषा विभाग में प्रवेश करते ही सबकी नज़रें कुछ पूछतीं हुईं – सी महसूस हुई, मैंने बताया कि ‘मैं ज्वाईन करने आया हूं’, यह कहते ही मुझे एस पी कोहली की आंखों में उदासी छाती हुई – सी लगी, ऐसा महसूस हुआ कि जिस तरह बंसल जी के जाने की आन्तरिक खुशी को उन्होंने अपने चेहरे पर बाह्य दुख की छाया ला कर ढकने का प्रयास किया होगा, शायद वैसे ही वे मेरे आने के आंतरिक दुख को अपने चेहरे पर बाह्य खुशी से छुपाने का प्रयास कर रहे थे; मुझे वैसा एहसास केवल इसलिए नहीं हुआ कि बलदेव जी से प्राप्त पूर्व सूचना के चलते कोई पूर्वग्रह मेरे मन में बन गया था, बल्कि इसलिए हुआ कि श्री कोहली की बॉडी लैंग्वेज से वैसा साफ जाहिर हो रहा था, विभाग में काम करते हुए कुछ ही दिनों में बलदेव जी द्वारा बंसल जी के प्रति कोहली जी के बारे में दी गई पूर्व सूचना तथा  ज्वाईन करने के दिन मेरे द्वारा महसूस की गई कोहली जी की मनस्थिति, दोनों सही साबित हो गई थी। इस तरह , मेरे आने पर कोहली जी ने अपनी मनस्थिति से ‘अवांछित के आगमन’ का – सा भाव जताया था तो बलदेव मल्होत्रा ने – “ भाई आ गया, अब अपना पॉवर बढेगा” – कह कर खुशियां जाहिर की थी। कोहली जी को देख कर और बलदेव जी को सुन कर मेरी अंतर्चेतना ने सतर्कता की घंटी बजा दी।
मैंने सबकी सीटों पर जा कर मुलाकात की, परिचय प्राप्त किया और उनके काम के बारे में जानकारी प्राप्त की। राजभाषा विभाग में एसपी कोहली सबसे सीनियर अधिकारी थे, स्केल 3 में उनका प्रोमोशन 2009 बैच में ही हो गया था किंतु पोस्टिंग बाकी थी, कोहली जी के बाद बलदेव जी थे, वे स्केल 2 में थे, स्केल 1 के 6 अधिकारी थे, स्टेनोटाईपिस्ट एवं अन्य लिपिकीय कर्मचारियों की संख्या छह थी तथा 2 अधीनस्थ कर्मचारी थे। मुझे बताया गया कि प्रधान कार्यालय के अन्य 33 प्रभागों में भी स्केल 1 से 3 तक के अधिकारी तैनात थे, वे राजभाषा विभाग के स्टाफ न हो कर संबंधित प्रभागों के प्रशासनिक नियंत्रण में थे, उनमें से कुछ अधिकारी एक से अधिक प्रभागों का भी राजभाषा संबंधी कार्य देखते थे।
 अनायास मैं एक शेर गुनगुना उठा —
“कांपता है तू अंदेशा – ए – तूफां से क्यूं ?
नाखुदा भी तू, बहर भी तू, किश्ती भी तू, साहिल भी तू ” !
आगे की बातें अगली कडियों में … ।
श्रीलाल प्रसाद
9310249821
बंगलोर, 28 दिसम्बर 2015

12,529 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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