डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा       (पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए-3)

तो, पंजाब नैशनल बैंक के प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग नई दिल्ली में ज्वाईन करते ही मेरे सामने अनगिनत चुनौतियों के द्वार खुल गए थे। ज्वाईन करने के दिन शाम को 4 बजे स्टाफ मीटिंग के दौरान  मैंने कोहली जी से पूछा कि ‘उपस्थिति रजिस्टर के अनुसार एक अफसर लम्बी छुट्टी पर थे ’ ? उन्होंने बताया कि टीएन शर्मा स्केल वन के अधिकारी थे और चूंकि उनकी पीएल यानी विशेषाधिकार छुट्टियां लैप्स हो रही थीं, इसीलिए वे छुट्टी अवेल कर रहे थे । विदित है कि उन दिनों बैंक में मुख्य रूप से तीन प्रकार की छुट्टियां मिलती थीं – सीएल (कैजुअल लिव) यानी आकस्मिक अवकाश साल में 12 दिन मिलते थे और वह एक साथ 4 दिन से अधिक नहीं लिया जा सकता था; सिक लिव यानी बीमारी की छुट्टियां, आधे वेतन पर साल में 30 दिन या पूरे वेतन के साथ 15 दिन की छुट्टियां मिलती थीं जो नौकरी शुरू होने से 18 साल तक लगातार मिलती थीं और 6 साल का गैप दे कर फिर 3 साल तक मिलती थीं अर्थात वे छुट्टियां पूरे सेवाकाल में आधे वेतन के साथ 21 महीने या पूरे वेतन के साथ 10 माह 15 दिन ली जा सकती थीं; पीएल (विशेषाधिकार अवकाश) जिसे सरकारी कार्यालयों में ईएल यानी अर्जित अवकाश भी कहते थे, प्रति ग्यारह दिनों (साप्ताहिक, सार्वजनिक तथा आकस्मिक अवकाश सहित) की उपस्थिति पर एक दिन की छुट्टी की दर से साल में अधिकतम 33 दिनों की छुट्टियां मिलती थीं जिनमें पूरे सेवाकाल में एक साथ अधिक से अधिक 240 दिन तक ही जमा हो सकते थे यानी यदि किसी के खाते में 240 दिनों से अधिक की पीएल जमा होने वाली हो तो वह लैप्स यानी समाप्त हो जाती थी, इसीलिए जिसके खाते में ऐसा होना होता था , वह अनावश्यक रूप से छुट्टी ले लेता था ताकि जमा छुट्टियों की संख्या 240 के अन्दर ही रहे और वह सुविधा केवल उसी को स्वीकृत होती थी जिस पर बॉस मेहरबान होता था।

बैठक के दौरान ही टीएन शर्मा से फोन पर मेरी बात कराई गई, मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या वे किसी आवश्यक कार्यवश छुट्टी पर थे ? उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि नहीं, वे तो छुट्टियों को लैप्स होने देने के बदले उसका उपयोग करते हुए घर पर आराम कर रहे थे। मैंने कहा कि यदि वे छुट्टियों से वापस आ जाएं तो मुझे खुशी होगी, उन्होंने तुरंत हामी भर दी। वे बहुत ही साफदिल, नेक इंसान और अनुशासित अफसर लगे। बैठक में मुझे यह भी बताया गया कि वित्त मंत्रालय वित्तीय सेवाएं विभाग और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की राजभाषा कार्यान्वयन समिति की संयुक्त तिमाही बैठकों का आयोजन नियमित रूप से होता था जिसे कोई न कोई सदस्य बैंक प्रायोजित करता था, मंत्रालय और रिज़र्व बैंक की बैठकें एक ही स्थल पर एक ही दिन अलग – अलग होती थीं, पूर्वार्द्ध में वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव तथा उत्तरार्द्ध में भारतीय रिज़र्व बैंक के मुख्य महाप्रबंधक बैठक की अध्यक्षता करते थे , बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग के प्रभारी और वरिष्ठ कार्यपालक (महाप्रबंधक या उससे ऊपर के कार्यपालक) सदस्य होते थे,प्रायोजक बैंक के सीएमडी या ईडी बैठकों के स्वागत समारोह की अध्यक्षता करते थे।

उपर्युक्त समितियों की जनवरी – मार्च 2010 तिमाही की बैठक 15 फरवरी 2010 को लखनऊ में होनी थी और उसे हमारा बैंक प्रायोजित कर रहा था। उस बैठक के लिए वृहद पैमाने पर तैयारियां भी करनी थी। (इधर 2013 से बैठकें नहीं हो पा रहीं है क्योंकि बाद के वर्षों में उस तरह के आयोजन भी गुटबाजी और कुछ लोगों की अतृप्त आकांक्षाओं की पूर्ति के साधन मात्र रह गए थे। रिज़र्व बैंक राजभाषा पुरस्कारों हेतु की जाने वाली नमूना जांच तथा बैठकों में भारतीय रिज़र्व बैंक के एक–दो अधिकारियों के दृष्टिकोण उस मामले में ज्यादा जिम्मेदार रहे, इस विषय पर विस्तार से चर्चा किसी अगली कडी में प्रसंगानुसार)। बैठक चल ही रही थी कि फोन पर मुझे निर्देश मिला कि ईडी टांकसाले जी से मैं मिल लूं। सोचा कि बैठक के लिए जो सूचनाएं इकट्ठी हुईं थीं, ईडी से बात करने में भी वे काम आ जाएंगी। बैठक समाप्त कर मैं अपनी कार से भीखाएजी कामा प्लेस के लिए निकल पडा।

अगले दिन त्रिलोकी नाथ शर्मा ने ज्वाईन कर लिया । कार्यालय आदेश का अध्ययन कर मैं सबकी ड्युटीशीट समझ चुका था। मैंने अपने कक्ष में ही अधिकारियों की एक संक्षिप्त मॉर्निंग मीटिंग बुलाई (इस तरह की मीटिंग मैं अपने रिटायरमेंट के दिन तक करता रहा जिसमें कल किए गए कार्यों के मूल्यांकन और आज किए जाने वाले कार्यों के आवंटन पर चर्चा होती थी), टीएन शर्मा को रिटायर्ड एजीएम एके कपूर के मुकदमे से संबंधित सभी फाईलें , एसपी कोहली को नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की गत बैठक का कार्यवृत्त, आगामी बैठक का एजेण्डा पेपर तथा सदस्य बैंकों की छमाही रिपोर्टों के समेकन संबंधी स्थिति और बलदेव मल्होत्रा को लखनऊ बैठक में पॉवर प्वाईंट प्रेजेंटेशन के लिए बैंक के इतिहास, बैंकिंग व राजभाषा के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धियों, बैंक में कम्प्युटरीकरण और उसमें हिन्दी के प्रयोग की स्थिति एवं भावी कार्ययोजना आदि को शामिल करते हुए 10 मिनट की एक स्क्रीप्ट तैयार कर प्रस्तुत करने को कहा।

अगले दिन मीटिंग सुबह में न बुला कर शाम को बुलाई, तब तक कल सौंपे गए कार्यों की रूपरेखा मेरे समक्ष प्रस्तुत कर दी गई थी , मैंने अंग्रेजी का एक ही वाक्य सबको दिया और वहीं बैठे – बैठे उसका हिंदी अनुवाद करने को कहा। उसके पीछे मेरा उद्देश्य यह कदापि नहीं था कि मुझे उनकी क्षमता पर संदेह था, उनमें से अधिकंश अधिकारी केन्द्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी अनुवादक रहे थे और कुछ बैंक में ही क्लर्क से हिंदी अफसर के रूप में प्रोमोट हुए थे। उसके पीछे मेरा मकसद एक तो अनुवाद के प्रति उनका दृष्टिकोण जानना था और दूसरा उस वाक्य में निहित संदेश देना भी था। वह वाक्य था –  “ Do not bother to agree with me, I have already changed my mind”  सबने इस वाक्य का सही अनुवाद किया किंतु अधिकांश अनुवाद में शब्दार्थ तो ध्वनित हुआ किंतु निहित संदेश न आ सका । मैंने अपने साथियों से उस वाक्य में निहित अपना मंतव्य शेयर करते हुए बताया कि उसका सीधा – सा मतलब है – ‘हां में हां मिलाना छोड कर काम की बात कीजिए’ और मैंने उसी के साथ अपने काम करने – कराने की नीति व नीयत भी जाहिर कर दी। मैंने स्पष्ट कर दिया कि आप के विचारों से असहमत होने पर मैं असहमति के अपने अधिकार का उपयोग बेलाग – लपेट करूंगा और मैं आप के भी उस तरह के अधिकार का सम्मान करूंगा, मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि मेरे साथी जहां कहीं भी मुझसे असहमत हों, अपनी असहमति से मुझे अवगत अवश्य करावें और मुझसे भी केवल खुश होने या करने के लिए अकारण व अतार्किक सहमति की उम्मीद न रखें।

मेरे समक्ष प्रस्तुत नोट्स, मिनट्स, एजेण्डा पेपर, प्रोसीडिंग्स तथा स्क्रीप्ट आदि को पढने से यह प्रतीत हुआ कि अपने काम की जानकारी सभी रखते थे किंतु भाषा , वाक्य विन्यास, विराम चिह्न, लिंग निर्णय, उच्चारण आदि हर मामले में बंधी – बंधाई लीक का ही अनुसरण किया जा रहा था । मैंने अपना आकलन सबको अलग – अलग व्यक्तिगत रूप से बता दिया और यह भी कहा कि नोट्स आदि में  साहित्यिक हिंदी और भारी – भरकम शब्दावली जरूरी नहीं है , फिर भी चूंकि हम हिंदी अफसर हैं और हिंदी की डिग्री ले कर आए हैं , इसीलिए, हम तो औरों की भाषा में भाषागत कमियां नहीं गिनाएंगे किंतु हमारी भाषा में कमियां निकालने का अवसर लोगों के पास होगा, अत: भाषा पर भी ध्यान दिया जाए।

बैठक समाप्त होने पर सभी मेरे कमरे से चले गए किंतु रमेश बत्रा रूक गए, उनकी उम्र मुझसे ज्यादा थी, मैंने पूछा, “ बडे भाई, कुछ कहना चाहते हैं ”? उन्होंने कहा कि – “ सर, मेरी पत्नी बहुत दिनों से बीमार हैं, नियमित रूप से उनका हेल्थ चेकअप होता है और डॉक्टर की सलाह के अनुसार टेस्ट कराने पडते हैं, कल की डेट मिली है, मुझे दो दिनों की छुट्टी चाहिए ”। मैंने कहा कि ठीक है, आवेदन पत्र स्थापना कक्ष में दे दीजिएगा, यदि मैं किसी काम आ सकूं तो बेहिचक बताईएगा। बत्रा जी फिर भी खडे रहे, मैंने पूछा कि कोई और बात है? वे चुप रहे, मैंने उनके चेहरे की ओर देखा तो उनकी आंखों में आंसू थे। मैंने उन्हें बैठने के लिए कहा, जब वे बैठ गए तो मैंने फिर पूछा, बताईए बडे भाई, क्या बात है? वे बोले – “ सर, पहले मुझे ऐसी छुट्टियों के लिए गिडगिडाना पडता था और ऑफिस के एक – दो साथियों से पैरवी भी करानी पडती थी, हालांकि ऑफिस में उस समय काम की अधिकता या अरजेंसी भी नहीं रही होती थी । अभी काम भी बहुत है और टाईम बाउण्ड काम है जिसके लिए आपने एक अफसर को छुट्टी से वापस बुला लिया है, फिर भी आप ने मुझे दो दिनों की छुट्टी आसानी से दे दी ! इसीलिए मैं भावुक हो गया, सर ” । मैंने कहा कि–“ छुट्टियों का उद्देश्य ज्यादा महत्वपूर्ण है, बैंक का काम करने के लिए 60 हजार कर्मचारी हैं किंतु आपकी पत्नी का इलाज कराने के लिए तो केवल आप ही हैं ”। हॉल में जा कर सबको संबोधित करते हुए मैं ने कहा – “आप सभी जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी हैं, यदि आपको लगे कि आपके वगैर घर – परिवार का कोई काम नहीं हो सकता तो छुट्टी  जरूर लीजिए,  बैंक का काम तो किसी न किसी से करा ही लिया जाएगा, लेकिने हां, सामान्य परिस्थितियों में पूर्वानुमति अवश्य ले लीजिए ”।

बैठक चल ही रही थी कि उसी बीच एचआरडी से मेरे मोबाईल पर सूचना मिली कि डीजीएम साहब मुझे याद कर रहे थे, मोबाईल पर बात करते हुए मैं सभागार से बाहर आ गया और सिचुएशन बताते हुए देर शाम को या कल सुबह आने के लिए कह दिया। । बैठक अच्छी तरह सम्पन्न हो गई। कल हो कर मैं डीजीएम एचआरडी से मिलने भीखाएजी कामा प्लेस चला गया, अपराह्न में लौटा तो पता चला कि कोहली जी ने कार्यवृत्त लिख कर अध्यक्ष से अनुमोदित करा लिया था , सभी सदस्य बैंकों को भेजने के लिए प्रतियां भी तैयार करा ली गईं थीं तथा मेरी ओर से अग्रसारण पत्र भी तैयार थे जिन पर मुझे साईन करने थे। इतनी मुस्तैदी के पीछे मुझे कुछ आशंका तो हुई किंतु पक्के तौर पर कुछ समझ नहीं पाया। सोचा, जब अध्यक्ष ने अनुमोदित कर दिया है तो फिर मेरे करने के लिए कुछ रह नहीं गया था।

वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक की 15 फरवरी 2010 को लखनऊ में होने वाली बैठक की तैयारी के लिए मैंने अपने कार्यालय के साथियों की एक कमेटी बना दी और कार्यों की सूची तैयार कर सबके बीच कार्यों का बंटवारा कर दिया। लखनऊ के सर्कल हेड बीएल गुप्ता से बात कर वहां भी एक कमेटी बनवा दी, वे बहुत ही सिंसीयर और रिजल्ट ओरिएण्टेड व्यक्ति थे, उन्होंने बैठक के लिए होटल ताज़ लखनऊ बुक करा दिया। उसी बीच भारत सरकार गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग ने पूर्व एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुरस्कारों की घोषणा कर दी जिसके अनुसार मंडल कार्यालय पटना को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया जाना था , वह पुरस्कार मेरे कार्यकाल का था , इसीलिए सरकार के नियमानुसार पुरस्कार और प्रशस्तिपत्र ग्रहण करने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था, पुरस्कार वितरण समारोह 5 और 6 फरवरी को शिलॉंग में आयोजित हो रहा था जहां भारत के गृह मंत्री और मेघालय के राज्यपाल के कर कमलों से पुरस्कार प्राप्त होना था। उसके लिए जीएम ने मेरा टुअर प्रोग्राम भी स्वीकृत कर दिया। मैं बहुत ऊहापोह में था कि पुरस्कार ग्रहण करने के लिए जाऊं या नहीं? क्योंकि अगले सप्ताह बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक होनी थी, उसमें किसी भी तरह की कमी होने पर पूरी जवाबदेही तो मेरी होती ही, बैंक की कॉरपोरेट छवि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड सकता था। साथियों ने आश्वस्त किया कि वे सारी तैयारियां ठीक से कर लेंगे , उनका कहना था कि वह पुरस्कार भी अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए मुझे जाना ही चाहिए। लेकिन, चूंकि उस तरह के दर्ज़नों पुरस्कार मैं अपने कैरियर में ले चुका था और हेड ऑफिस में मेरे कार्यकाल के शुरूआती दिनों में ही वह बैठक एक चुनौती के रूप में मानी जाने लगी थी, इसीलिए मैंने जाने का प्रोग्राम ड्रॉप करने का निर्णय लिया और उसके लिए जीएम से अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया।

मेरे जीएम वीएम शर्मा ने कहा कि लखनऊ वाली बैठक बहुत ही महत्वपूर्ण थी , इसीलिए उसमें सहयोग के लिए ईश्वरचन्द्र बंसल को बुला लेना ठीक रहेगा क्योंकि उसने कई बैठकों में भाग लिया था और उसे उसका अच्छा अनुभव था। मैंने उन्हें बताया कि वे चिंता न करें, सब कुछ अच्छी तरह सम्पन्न हो जाएगा, किंतु शर्मा जी आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने लगभग रोज सुबह शाम कहना शुरू कर दिया। मुझे लगा,शायद जीएम की रुचि बैठक को सफल बनाने से ज्यादा ईश्वरचन्द्र बंसल को बुलाने में थी।

एक बार फिर, नववर्ष की मंगल कामनाएं,

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

बंगलोर, 03 जनवरी 2016

2,612 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा       (पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए-3)

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