डायनैमिक और डाइनामाइट

 

 

सरफरोशान–ए–वतन, रूह–ए–वतन , ज़ान –ए– वतन

तुझे  हम  फूल  चढाते  हैं   शहीदान -ए– वतन

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पठानकोट आतंकवादी घटना में शहीद जवानों को बार – बार सलाम, हज़ार बार सलाम !

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मैंने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए टिप्पणी की थी – “यह शोक मनाने का नहीं, रगों में दौडते हुए

लहू में उबाल लाने का वक्त है”।

एक ज़नाब ने कमेंट किया –“ क्या कर लोगे उबाल लाकर ? .. गोली चलाने के लिए वर्दी धारण करनी होगी श्रीमान! .. ग्रुप में उबाल लाने से कुछ नहीं होगा ”।

एक मोहतरमा ने कमेंट किया –  “मेरे मन में सवाल है, बम निरोधक पथ (शायद उनका आशय ‘दस्ता’ से रहा होगा) का व्यक्ति बम फटने से शहीद होता है। इसमें कहीं व्यवस्था में कमी तो नहीं ? … सभी नौकरी करते हैं केवल पैसे के लिए ” ।

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अपनी टिप्पणी और उपर्युक्त दोनों प्रतिक्रियाओं पर मनन करने के बाद मेरे ‘मैं’  ने मुझसे पूछा कि क्या ऐसा नाज़ुक और संवेदनशील विषय भी तर्क–वितर्क की अपेक्षा रखता है ? मेरे पास कोई जवाब न था, न है; क्योंकि केवल सवाल ही सवाल सूझ रहा – क्या व्यवस्था में कमी होने से शाहदत की महिमा कम हो जाती है ?क्या सैनिक केवल पैसे के लिए ‘नौकरी’ करते हैं??

सवालों के सैलाब में मुझे अभी भी लगता है कि मैं शायद कोमा में हूं और इतिहास मेरे अचेतन मन व खुली आंखों में सरपट दौड लगा रहा है….

एक नौजवान वकील साउथ अफ्रीका जाता है, फर्स्ट कलास की टिकट होते हुए भी एक अंग्रेज उसे धक्का मार कर बाहर कर देता है, उसके खून में उबाल आता है और इतिहास बन जाता है। फिर वही भारत वासियों को आज़ादी के लिए करो या मरो का नारा देता है, रगों में उबाल आता है और हिन्दुस्तान की सरज़मीं व आसमान में युनियन जैक के बदले तिरंगा लहरा उठता है , उसने तो कभी बन्दूक न उठाई , न उसके लिए कहा।

एक नौजवान असेम्बली में बम फोडता है और अदालत में बयान देता है कि उसने बम किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की अवाम को जगाने और बहरे हुक्मरानों को सुनाने के लिए फेंका है, जो काम हजारों गोलियां न कर सकीं थीं, उसे एक खोखले बम ने ही कर दिखाया, हिन्दुस्तान के बच्चे – बच्चे की रगों में उबाल आता है और ब्रिटिश पार्लियामेंट थर्रा उठती है।

एक 73 साल का जवान पटना के गांधी मैदान में हूंकार भरता है – ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा देता है, उसकी पीठ पर सत्ता की लाठियां बरसती हैं, देश की रगों में उबाल आता है और वह ‘लोकनायक’ बन जाता है, सबसे ताकतवर सत्ता धरासाई हो जाती है।

एक 75 साल का बुजूर्ग जंतर मंतर पर खडा हो कर हाथों में तिरंगा लहराता है और सरकार के 3 – 3 कैबिनेट मंत्री उसकी अगवानी के लिए एअरपोर्ट पहुंच कर मिन्नतें करते हैं, फिर भी, लोकपाल बन ही जाता है।

हजारों लोग इंडिया गेट पर जमा हैं, निगाहें नम हैं, लब खामोश हैं, उबलता हुआ खून मोमबती से पिघल रहा  है और जुवेनाईल कानून बदल जाता है।

दिल्ली वासियों के रक्त में उबाल आता है और जंतरमंतर पर नारे लगाते हुए नौकरी पेशा लोग दिल्ली के तख्त पे काबिज हो जाते हैं, कहीं पे, किसी ने बन्दूक नहीं थामी।

बिहार में जुबानी जंग होती है , लोग उद्वेलित होते हैं और अश्वमेध का घोडा रूक जाता है, किसी ने बन्दूक नहीं उठाई।

कलमकारों के रक्त में उबाल आता है और सारा हिन्दुस्तान खलबला उठता है , कभी सूर्यास्त न देखनेवाली ब्रितानिया हुकूमत थर्रा उठती है, लेखनी तो बस इतनी ही बोलती है  —

“ तुम – सा लहरों  में  बह  लेता तो मैं भी सत्ता  गह लेता

ईमान  बेचता  चलता  तो  मैं  भी  महलों  में  रह लेता

हर दिल पर  झुकी, चली, मगर आंसू वाली नमकीन क़लम

मेरा  धन   है स्वाधीन क़लम, मेरा धन है स्वाधीन क़लम

और सुविधाभोगी लोग बगले झांकने लगते हैं, लेखनी फिर हूंकार भरती है –

हम धरती क्या, आकाश बदलने वाले हैं

हम  कवि  हैं इतिहास  बदलने  वाले  हैं

हर क्रांति क़लम से शुरू हुई,सम्पूर्ण  हुई

चट्टान जुर्म की क़लम चली तो चूर्ण हुई

हम क़लम चला कर त्रास बदलने वाले हैं

हम  कवि  हैं,  इतिहास  बदलने वाले हैं”  ।

तो, जंग केवल बन्दूकों से ही नहीं लडी जाती, जुबान से भी लडी जाती है, ईमान से भी लडी जाती है, कलम से भी लडी जाती है, हंसिया व कुदाल और हल की फाल से भी लडी जाती है, कलाइयों में बंधी राखी और माथे में चमकते सिन्दूर से भी लडी जाती है, सच को सच और झूठ को झूठ कहना भी जंग लडना है, सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना भी जंग लडना है, बस, जंग लडने का जज़्वा होना चाहिए, जिस तरह हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती, वैसे ही बन्दूक थामने वाला हर आदमी सैनिक नहीं होता, बाप नन्हें बेटे को ऊंचा उछालता है और वह बच्चा खिलखिलाता है , क्यों, क्योंकि उसे उस आदमी पर विश्वास होता है कि वह उसे गिरने नहीं देगा, तो क्या कंपकंपा देने वाली ठंढ और हड्डियों को गला देने वाली बर्फ में , पांवों को जला देने वाली रेत और सिर को झुलसा देने वाली धूप में , जंगलों को चीरते, समन्दर को लांघते और रेगिस्तान को रौंदते सरहदों की रक्षा करने वाले सैनिकों को वही भरोसा हम सिविलियनों की ओर से नहीं दिलाया जाना चाहिए, क्या इसके एहसास मात्र से रगों में बहते रक्त में उबाल नहीं आता ? ऐसे सवाल मैं किसी और से नहीं, खुद मेरा ‘मैं’ मुझसे ही पूछ रहा है —

“ जिस पर गिर कर उदर दरि से तुमने जन्म लिया है

जिसका खा कर अन्न सुधा सम नीर समीर पीया है

वह  स्नेह  की  मूर्ति  दयामयी माता तुल्य मही है

उसके  प्रति  कर्तव्य  तुम्हारा  क्या  कुछ  शेष नहीं  है” ?

और वह कर्तव्य क्या केवल बन्दूक उठा कर ही निभाया जा सकता है ? वर्दी पहन कर ही पूरा किया जा सकता है ? ? क्या देशभक्ति का कोई गण्डा ताबीज मिलता है जिसे धूप अगरबत्ती दिखा कर रात में बाजू पर बांध लो, सुबह देशभक्ति का ज्वार हिल्लोरें मारने लगेगा ???

जय हिन्द ! जय हिन्द !! जय हिन्द !!!

 

श्रीलाल प्रसाद

मो. 9310249821

इंदिरापुरम, 06 जनवरी 2016

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