डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(आपका यह आदेश अवैध है और अवैध आदेश मानने को मैं वाध्य नहीं हूं)

इंदिरापुरम, 10 जनवरी 2016

“ तुम्हारे  पांव के   नीचे  कोई ज़मीन नहीं

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं

तुझे क़सम है खुदी को बहुत हलाक़ न कर

तू इस मशीन का  पुर्जा है, तू मशीन नहीं ”

कुछ कारिंदे ऐसे होते हैं जो खुद को कारोबार समझ लेते हैं, कुछ मुसाफिर ऐसे होते हैं जो खुद को मुल्क समझ लेते हैं, कुछ ऐसे सेवक होते हैं जो खुद को सरकार समझ लेते हैं तो कुछ खादिम ऐसे होते हैं जो खुद को खुदा समझ लेते हैं और कुछ ऐसे गुलाम होते हैं जो खुद को बादशाह समझ लेते हैं; वैसे लोग कोई समस्या पैदा नहीं करते, खुद एक समस्या होते हैं, मैं ऐसे लोगों से दो – चार होता रहा हूं , तो आईए, देखते हैं कि पिंजडे की किस्में कौन – कौन – सी हैं और तोते के डीएनए में क्या – क्या है ?

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तो पंजाब नैशनल बैंक प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग में ज्वाईन करने के बाद ईडी के सामने जो तीन प्रारंभिक प्राथमिकताएं मैंने निर्धारित की थीं , उनमें से दो – रिटायर्ड एजीएम एके कपूर के मुकदमे में कुछ बिन्दुओं पर बैंक के विरुद्ध लोअर कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर कराना और लखनऊ में वित्त मंत्रालय एवं भारतीय रिज़र्व बैंक की बैठक आयोजित कराना – पूरी हो गई थीं, अब तीसरी प्राथमिकता –  राजभाषा अधिकारियों की ट्रान्सफर – पोस्टिंग कराना – पूरी करनी थी। विभाग के लिए यह सबसे टेढा काम माना जा रहा था, यह बात मेरी समझ से परे थी कि प्रतिवर्ष सैकडों – हजारों अधिकारियों की ट्रांसफर – पोस्टिंग करने वाले एचआरडी के लिए हिंदी अधिकारियों की ट्रांसफर – पोस्टिंग का काम इतना जटिल क्यों माना जा रहा था।

28 फरवरी 2010 को जीएम वीएम शर्मा सेवानिवृत्त हो गए थे और उनकी जगह पर बीसी निगम जीएम आ गए थे, डीजीएम ओपी गोयल भी 28 फरवरी को ही सेवानिवृत्त हो गए थे । मैंने बलदेव मल्होत्रा को कहा कि बैंक में कार्यरत सभी राजभाषा अधिकारियों की एक सूची दो दिनों में मुझे उपलब्ध कराई जाए जिसमें बैंक में उनकी नियुक्ति, वर्तमान कार्यालय में पोस्टिंग तथा प्रोन्नति आदि की तिथियों के साथ – साथ तब तक के सेवाकाल में हुए उनके सभी तैनाती स्थलों और नेटिव प्लेस आदि का भी विवरण हो। साथ ही , उस सूची में प्रस्तावित पोस्टिंग और अभ्युक्ति के लिए कॉलम बना कर उसे खाली रखा जाए। उन दो दिनों में मैंने बैंक की ट्रांसफर पॉलिसी, प्लेसमेंट गाईडलाइंस और उसमें स्पेशलिस्ट अफसरों के लिए किए गए प्रावधानों आदि का बारीकी से अध्ययन – मनन किया और फिर विभाग द्वारा तैयार की गई सूचनाओं के साथ एचआरडी के डीजीएम जीएस दुबे से मिला।

दुबे जी ने ट्रांसफर – पोस्टिंग की बहुत-सी बारीकियां मुझे समझाते हुए उसकी जटिलता और महत्ता भी बताई , उन्होंने यह भी कहा कि थोडी – सी गफलत और विसंगति होने पर एसोशिएशन वाले उसे मुद्दा बना सकते हैं, इसीलिए बहुत ही सावधानीपूर्वक वह काम करना होगा। उन्होंने एचआरडी के संबंधित अधिकारियों को बुला कर उन्हें निर्देश दिया कि सभी हिंदी अधिकारियों की प्रोफाईल / डोजियर/ हिस्ट्री शीट आदि मुझे उपलब्ध करा दी जाए। बैंक की ट्रांसफर पॉलिसी, भारत सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों तथा उपल्ब्ध सूचनाओं का अध्ययन – मनन करने के बाद मैंने अपने जीएम बीसी निगम से विचार विमर्श किया। उन्होंने कहा कि हिंदी अधिकारियों में कुछ खतरनाक किस्म की पैरवी वाले लोग हैं, सोच समझ कर प्लेसमेंट सूची तैयार करना। विभिन्न कोणों से मिल रहे संकेतों से मेरी समझ में यह बात आने लगी थी कि हिंदी अधिकारियों की ट्रांसफर – पोस्टिंग को उतना जटिल क्यों माना जा रहा था, फिर भी, जटिलताओं से संबंधित वे सारी बातें मुझे सामान्य रूटीन – सी ही लग रही थीं क्योंकि उस रूटीन को जटिलता में परिणत करने वाले कारण मुझे अब स्पष्ट नज़र आने लगे थे।

 

दरअसल, मेरा मानना है कि कोई भी व्यक्ति समग्र रूप में न गलत होता है और न सही ; उसका कार्यविशेष गलत या सही हो सकता है, इसलिए यदि मैं किसी व्यक्ति से किसी विषय पर सहमत नहीं हूं तो इसका मतलब यह कदापि नहीं कि मैं उस व्यक्ति से हर विषय पर असहमत ही हूं , मैं उसमें निहित अच्छाइयों की प्रशंसा भी कर सकता हूं यानी आलोचना या प्रशंसा सब्जेक्टिव न हो कर ऑब्जेक्टिव होनी चाहिए।

मैं पहले बता चुका हूं कि दिल्ली बैंक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) का संयोजक पंजाब नैशनल बैंक प्रधान कार्यालय था , तदनुसार बैंक का राजभाषा प्रभारी होने के नाते मैं नराकास का पदेन सदस्य सचिव था और दिल्ली जोन के महाप्रबंधक आरके दुबे उसके अध्यक्ष थे। दुबे जी एक प्रभावशाली बैंकर और उच्च कार्यदक्षता वाले महाप्रबंधक माने जाते थे, उन दिनों पीएनबी का कुल कारोबार लगभग साढे तीन लाख करोड रूपये का था जिसमें केवल दुबे जी के जोन का योगदान लगभग 22 प्रतिशत था, इसी से बैंक में उनकी हैसियत का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। दुबे जी केवल कार्यनिष्पादन में ही प्रभावशाली और रिजल्ट ओरिएंटेड नहीं थे, बल्कि सम्पर्क बनाने और उसे निभाने में भी निपुण थे , वे जब पीएनबी से प्रोमोट हो कर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में ईडी हो कर चले गए या फिर वहां से प्रोमोट हो कर सीएमडी के रूप में कैनरा बैंक चले गए , तब भी उन्होंने सम्पर्क बनाये रखा और दीपावली एवं नववर्ष आदि पर उनके मोबाईल से मेरे मोबाईल पर शुभकामना संदेश आता रहा, यहां तक कि 14 सितम्बर 2014 को ( उसी महीने वे सेवानिवृत्त हो रहे थे और मैं अगले महीने यानी अक्टूबर में)  राष्ट्रपति भवन में उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने बडी गर्मजोशी के साथ मेरी खैरियत पूछी, उसके लिए मैं उनका आभारी रहूंगा। लेकिन मैं उनके जिस दूसरे पक्ष का समर्थन नहीं करता, उसके बारे में भी चर्चा करना जरूरी समझता हूं ।

 

 

 

 

विश्व हिंदी दिवस की मंगलकामनाओं के साथ,

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

मो. 9310249821

इंदिरापुरम, 10 जनवरी 2016

2,851 thoughts on “    डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 22/05/2018 at 5:52 am
    Permalink

    Today, I went to the beachfront with my kids. I found a
    sea shell and gave it to my 4 year old daughter and said “You can hear the ocean if you put this to your ear.” She put the
    shell to her ear and screamed. There was a hermit crab inside and
    it pinched her ear. She never wants to go back! LoL I know this is entirely off topic but I had to tell someone!

    Reply

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