डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(सच बोलने की सज़ा में आज तक सलीब पर टंगा है वो)

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के शेर हैं-

“ कैसे आकाश में सूराख हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की

तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो ”

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मैंने जब से आत्मकथा लिखनी शुरू की है और उसका प्रकाशन अपने ब्लॉग एवं फेसबुक पर शुरू किया है, तब से मेरे कई अपने पराये हो गए हैं, उन्हें लगता है कि कई कडियां उनको ही टार्गेट बना कर लिखी गई है, ऐसा उनके बदले हुए व्यवहार ने मुझे समझा दिया है, हालांकि आत्मकथा मेरी है और हां, जो किरदार समय – समय पर मुझसे जिस रूप में जुडे हैं, उनका जिक्र उसी रूप में होना तो स्वाभाविक ही है, मैं उससे कैसे बच सकता हूं या उन्हें कैसे बचा सकता हूं  ? और इसके अलावा सच्चाई यह भी है कि उन्होंने जब कोई बात मुझे बताई और वे यह समझते थे कि उसे गोपनीय रखी जानी चाहिए थी तो उसके लिए मुझसे कोई वादा भी तो नहीं लिया था उन्होंने; और सबसे बडी बात यह कि मैं अपने साथ काम करने वालों या बात करने वालों को यह स्पष्ट भी करता रहता हूं कि मुझे किसी के बारे में कोई ऐसी बात न बताएं जिसे वे उस संबंधित व्यक्ति या किसी और के सामने कह नहीं सकते। अब तक 30 से अधिक कडियां मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं और दो दर्जन से अधिक देशों के हजारों प्रवासी हिंदीभाषी उसे पढ चुके हैं और बडी संख्या में विदेशी पाठक मेरे ब्लॉग के सब्सक्राईबर बन चुके हैं। मैं समझता हूं कि यह एपीसोड भी मुझसे मेरे कई अपनों को दूर कर देगा, फिर भी, मैं क्या कर सकता हूं? अपनी लेखकीय ईमानदारी की सजा तो भुगतनी ही पडेगी

मैं अपनी आत्मकथा का यह अंश लिखने के क्रम में , एक घटना का उल्लेख विशेष कर दो करणों से यहां करना चाहता हूं – पहला तो यह कि उस घटना का संबंध मेरी ट्रांसफर – पोस्टिंग से भी है और दूसरा यह कि उस घटना के प्रमुख किरदार की आत्मकथा अभी – अभी “ नथिंग बट खामोश ” नाम से प्रकाशित हुई है और इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई है, जी हां, मैं यहां महान अभिनेता और राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा जी की बात कर रहा हूं –

बात 23 – 24 अप्रैल 2005 की है, पटना के सिक्का सभागार में पीएनबीओएफ (एआईबीओए से संबद्ध ) का कंफ्रेंस हो रहा था, उसके कुछ ही दिनों पहले केडी खेरा से मतभेद होने पर बीएम सहाय एआईबीओसी छोड कर एआईबीओए में ढेर सारे सदस्यों के साथ शामिल हुए थे जिसके चलते पटना जोन में एआईबीओए मेजॉरिटी में आ गया था , शत्रुघ्न सिन्हा जी सहाय जी के बचपन के मित्र हैं, शत्रु जी उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे और कार्यक्रम का उद्घाटन पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने किया था, मंच पर और सभागार में देश के बडे – बडे ट्रेड युनियन नेता उपस्थित थे, मैं कम्पीयरिंग कर रहा था। कार्यक्रम के शुरू में सूत्रधार के रूप में बोलते हुए जब मैंने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया और उसके बाद जब शत्रु जी बोलने के लिए आए तो अपने 50 मिनट के भाषण में 15 मिनट तक वे मेरे बारे में ही बोलते रहे। उसी सिलसिले में उन्होंने अपना एक संस्मरण सुनाया –

“ पाकिस्तान के आमंत्रण पर मैं लाहौर गया था, भारत से मणिशंकर अय्यर भी गए थे , दूसरे देशों के कलाकार और राजनेता भी थे, मैं बैठे – बैठे सोच रहा था कि यहां मैं अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी में बोलूंगा, लेकिन मेरे पहले मणिशंकर जी ने इतनी बढिया हिंदी में भाषण दिया कि हिंदी बोलने का मेरा उत्साह ठंढा पड गया, फिर मैंने सोचा कि चलो, अपनी राष्ट्रभाषा नहीं, मेजबान देश पाकिस्तान की ही राष्ट्रभाषा उर्दू में बोलूंगा, लेकिन पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने जब खालिश उर्दू में तक़रीर की तो उर्दू बोलने का भी मेरा उत्साह जाता रहा , फिर सोच लिया कि अब तो अंग्रेजी में ही बोलना पडेगा , किंतु मेरे पहले बोलने वाले लंदन के प्रतिनिधि ने खांटी अंग्रेजी में बोल कर वह मौका भी मेरे हाथ से झपट लिया , तब तक अनाउंसर ने मेरा नाम पुकार दिया, मैंने निश्चय कर लिया कि चूंकि मैं मूल रूप से कलाकार हूं, इसीलिए कलाकारों वाली अपनी भाषा में ही बोलूंगा, और सच मानिए, मेरा वही भाषण उस कार्यक्रम का सर्वश्रेष्ठ भाषण माना गया । तो, मैं यहां  बैठे – बैठे श्रीलाल जी को बोलते हुए सुन रहा था और अपने पाकिस्तान वाले भाषण को याद कर रहा था, श्रीलाल जी न तो हिंदी बोल रहे हैं, न उर्दू बोल रहे हैं और न ही अंग्रेजी बोल रहे हैं; ये तो हमारी भाषा बोल रहे हैं, कलाकारों वाली भाषा बोल रहे हैं, इनका  संचालन ही आज के कार्यक्रम का मुख्य और सर्वोत्तम भाषण बन गया है, ये बैंक में क्या कर रहे हैं, छोडें बैंक और चलें मेरे साथ मुम्बई ” ।

यह सच है कि बहुत – से लोग मेरे प्रशंसक थे और मेरा आदर करते थे लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा जैसे व्यक्तित्व ने जब वैसा कहा तो सभागार में बैठे सभी लोग खडे हो कर तालियां बजाने लगे, उस घटना ने मेरे अनेक नये प्रशंशक बना दिए तो असंख्य दुश्मन भी पैदा कर दिए । उसी घटना के बाद मुझे पटना से हटाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई, और वह सुगबुगाहट विपक्षी संगठन में नहीं, मेरे ही संगठन में हुई। कुछ लोगों को और कुछ नेताओं को भी, लगने लगा कि उनके कार्यक्रमों की कम्पीयरिंग कर ही मैं लोकप्रिय हुआ था, वे यह सच्चाई भूल रहे थे कि मैं लोकप्रिय था , इसलिए मेरा उपयोग किया जाता था।

 

आर्यावर्त गौरव स्वामी विवेकानन्द जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं ।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 12 जनवरी 2016

 

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फिल्म स्टार एवं राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा और सबसे दाएं ‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

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