डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है

मुझको तो वतन  का  हर  जर्रा देवता है

 

साबरमती:अहमदाबाद, 26 जनवरी 2016

 

विश्व के विशालतम लोकतांत्रिक गणतंत्र की 66वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश – विदेश में रहने वाले समस्त भारतीयों को

हार्दिक शुभकामनाएं ! अभिनन्दन !!

आदि और अंत की साक्षी सर्वोच्च सता में आस्था और अपने कर्मों में विश्वास रखना ही आत्मसम्मान है, खुदी है, इबादत है ; वैसे बन्दे को खुदाई सौगात के लिए किसी बाबा की दुआ–अरदास की दरकार नहीं, तांत्रिक – मांत्रिक की कृपादृष्टि की जरूरत नहीं , खुदा अपने नेक बन्दे की मुरादें खुद ही पूरी कर देता है, फिर भी, आस्था और विश्वास को कर्म में उतारने का काम तो बन्दे को ही करना होता है। अल्लमा इकबाल का वह शेर या फिर यह शेर –

“ खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर के पहले

खुदा बन्दे से खुद  पूछे,  बता,  तेरी रज़ा क्या है ”

अथवा मीना कुमारी का यह शेर-

“ आग़ाज़ तो होता है, अंजाम नहीं होता

… हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता ”

 

उसी खुदाई करामात को बयां करते हैं और प्रकारांतर से “ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” की व्याख्या को आसान बनाते हैं, मगर मगरूर इंसान न तो खुदी व खुदगर्जी में फर्क कर पाता है, न आत्मसम्मान एवं अभिमान में अंतर समझक पाता है; न ही आत्मविश्वास व अहंकार की सीमा–रेखा पहचान पाता है और न आस्था व विश्वास को कर्म में उतार पाता है, बस, अपना सारा वक्त अपनी नाकामी का दोष खुदा व किस्मत को देने में जाया करता रहता है।  अपने कर्म पर विश्वास रखने वाला आदमी तो आत्मविश्वास से भरा – पूरा होता है और अपनी जरूरत व खुशी – नाखुशी को जाहिर करने में किसी माध्यम का मुखापेक्षी नहीं होता, किंतु जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है, वह कर्म से ज्यादा पूजन – अर्चन में भरोसा रखता है, अपनी चाहत व सुख – दुख बताने में भी जरिया की तलाश में लगा रहता है, वैसे व्यक्ति की सुबह शुरू होती है सिफारिश से और शाम ढलती है शिकायत के साये तले, उसके वगैर वह किसी भी काम के होने की कल्पना ही नहीं कर सकता, सारी परेशानियों की जड यही प्रवृत्ति है।

मुझे व्यक्तिगत तौर पर , सिफारिश और शिकायत, इन दोनों ही शब्दों के प्रति आसक्ति नहीं रही कभी, इसीलिए आज जब मैं आत्मकथा लिख रहा हूं और अतीत की घटनाओं में जो किरदार जब, जिस रूप में  मुझसे जुडे , उनकी सच्चाई उसी रूप में लिख रहा हूं तो सवाल उठता है कि यह सच्चाई उस वक्त क्यों नहीं बताई गई, जब वह घट रही थी ? जवाब सीधा – सा है, वह तो हर मोड पर, सीधे हर उस आदमी से ही बताई गई , जिससे वह संबंधित थी , उस वक्त किसी और से कही गई होती तो वह शिकायत होती और शिकायत में कुछ पाने की लालसा निहित होती है , जबकि शिकायत करना मेरी प्रकृति नहीं और उससे कुछ पाने की लालसा मेरी प्रवृति नहीं, तो फिर, आज क्यों ? क्योंकि आज उससे कुछ पाने की संभावना नहीं रही , कुछ खोने की आशंका ही है ; दूसरा कारण यह भी है कि यदि उस वक्त इस रूप में सच्चाई बताई होती तो संभव था कि आज जितने अनुभव ले कर मैं बांट रहा हूं, वह नहीं मिल पाया होता; इसीलिए मैं अपनी आत्मकथा हर तरह की दुर्भावना से परे जन हित में इस विश्वास के साथ रख रहा हूं कि लोग मेरे लिए नहीं , खुद के लिए मुझे पढें – सुनें, जानें – पहचानें और फिर , सही को सही और गलत को गलत कहने की आदत डालें, सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस पालें ; और यदि किसी का वर्तमान मेरे अतीत के साथ खुद को खडा पा रहा हो तो पूरे आत्मविश्वास के साथ सही और गलत की पहचान कर इस यकीन के साथ सही रास्ते पर आगे बढें कि सही को समर्थन मिलेगा ही। मेरी आत्मकथा का प्रकाशन इसलिए भी है कि मेरी कहानी पढ कर नई पीढी अपनी सेवाशर्त्तों का अनुपालन करते हुए अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी आवश्यक धैर्य व साहस रखने तथा सही आचरण करने के वैध तरीके सकझ सके। तो, मेरा यह प्रयास सच के आईने से धूल झाड कर सम्यक मूल्यांकन के लिए जन – साधारण के सामने रख देना भर है।

महात्मा गांधी जब किसी दुविधा में होते थे तो गीता पढते थे, मैं जब किसी दुविधा में होता हूं तो महात्मा गांधी की आत्मकथा पढता हूं, मुझे उसमें ही गीता का सार भी मिल जाता है। गांधी जी की जीवनी लिखी है लुई फिशर ने भी , महात्मा जी की आत्मकथा जैसी प्रामाणिकता है उसमें, पढी थी बहुत पहले बापू की आत्मकथा, हालांकि उसमें 1919 तक की ही कथा है, पूरी कहानी लुई ने लिखी , उसे पढना युग – युग की यात्रा करने जैसा लगता है , मीना कुमारी और इकबाल के वे शेर मुझे उसी यात्रा का हिस्सा लगते हैं। मैंने पिछली कडियों में लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को मैं समग्रता में अच्छा या बुरा नहीं मानता, व्यक्ति का कर्म विशेष ही प्रशंसा या निंदा का पात्र होता है। गांधी जी ने भी दोषी को समाप्त करने की नहीं, दोषी के अन्दर पैठे दोष को समाप्त करने की वकालत की। इत्तफ़ाकन, गांधी की कहानी, कब–कब, कहां – कहां और किस – किस रूप में मेरे रास्ते में दीया लेकर चलती रही, मुझे उसका पता ही नहीं, मालूम तो तब हुआ , जब सामने वाले ने मुझे रोका – टोका और बताया। ऐसा ही एक वाकया साबरमती के सान्निध्य में याद आ गया।

 

मई 2014 में मेरे डीजीएम मनोहरन जी की , जुलाई 2014 में जीएम जीएस चौहान जी की तथा अक्टूबर 2014 में खुद मेरी सेवानिवृत्ति थी, इसीलिए जीएम और डीजीएम बीच – बीच में मेरे उत्तराधिकारी की संभावनाओं के बारे में मुझसे पूछते रहते थे और मैं कह देता था कि योग्य अफसरों की कमी नहीं , और साथ ही, एक तथ्य यह भी था कि मेरी सेवानिवृत्ति की तिथि 31 अक्टूबर तक नये जीएम और डीजीएम भी आ गए रहेंगे, इसीलिए मेरा मानना था कि वह काम उन लोगों के लिए छोड दिया जाना चाहिए। 2014 बैच में एसपी कोहली का चयन स्केल 4 में हो गया , उनका नाम पैनल में बहुत ऊपर ही था, इसीलिए पहले फेज में ही यानी मई 2014 में ही पोस्टिंग हो जानी थी। उसी बीच भारतीय रिज़र्व बैंक के जीएम और उनकी टीम द्वारा मंडल कार्यालय चेन्नई तथा उसकी एक शाखा की राजभाषा संबंधी प्रत्यक्ष नमूना जांच की जानी थी और उस दौरान, रिज़र्व बैंक की अपेक्षा के अनुसार, प्रधान कार्यालय के प्रतिनिधि की भी उपस्थिति जरूरी थी, इसीलिए राजभाषा प्रभारी के रूप में मैं, विभागाध्यक्ष के रूप में डीजीएम मनोहरन जी तथा सहयोग के लिए बलदेव मल्होत्रा भी चेन्नई गए थे। निरीक्षण एवं नमूना जांच – कार्य 8.30 बजे रात तक चला था, कार्यालय के अधीनस्थ कर्मचारी से ले कर सर्कल हेड तक, सभी हमेशा मुस्तैद रहे थे, पीएनबी परिवार के किसी भी सदस्य के लिए और खास कर राजभाषा से जुडे व्यक्ति के लिए वे गरिमापूर्ण क्षण थे , यह दृश्य उस जगह का था जहां के बारे में आम धारणा रही थी कि वहां हिंदी के लिए अनुकूल वातावरण नहीं । मैं अपने बैंक की चेन्नई टीम की बैंक की छवि व राजभाषा हिंदी के प्रति निष्ठा और सहयोग – भावना को आज सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भी नमन करता हूं तथा उसके लिए उन्हें बधाई और धन्यवाद देता हूं।

31 मई 2014 को डीजीएम मनोहरन जी तथा 31 जुलाई 2014 को जीएम चौहान साहब सेवानिवृत्त हो गए , एच के राय जीएसएडी और राजभाषा विभाग के जीएम हो गए, राय साहब भी निहायत शरीफ और सीधे इंसान हैं, व्यावहारिक बैंकर हैं, उनके साथ मैंने एक ही कार्यालय में काम तो कभी नहीं किया किंतु जब वे बिहार शरीफ के रिजनल मैनेजर थे तो मैं जोनल ऑफिस पटना में वरिष्ठ प्रबंधक – राजभाषा था, उनके काम करने का तरीका मेरी नज़र में सीधा और सरल था, वे किसी काम को कम्प्लिकेट नहीं करते थे और कोई भी बात सीधे तौर पर ही कह देते थे। किस्मत जैसी यदि कोई बात होती हो तो मैं निश्चित रूप से यह कहना चाहूंगा कि मेरी किस्मत हमेशा अच्छी रही है कि मेरे पूरे कैरियर में अधिकांश बॉस नेक और साफदिल इंसान ही मिले हैं। उसी दर्म्यान कोहली जी ने मुझसे मिल कर ट्रेनिंग के बाद राजभाषा विभाग में लाने का आग्रह किया , मैंने उन्हें बताया – “यह काम मेरी क्षमता के बाहर है, मुझे लगता है कि शायद पैरवी करा कर और जल्दबाजी कर आपने इसे जटिल बना लिया है, वैसे आप स्वाभाविक कैण्डीडेट हो सकते थे । जीएम साहब बता रहे थे कि आप के अलावा प्रेम चन्द्र शर्मा भी यहां आना चाहते हैं, किंतु मुझे इस विषय में कुछ नहीं मालूम और ये सब बहुत ऊपर से होना है, इसीलिए इस मामले में मैं कुछ भी कहने या सलाह देने की स्थिति में नहीं हूं ”।

एसपी कोहली की ऑन जॉब ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद उनकी स्थाई पोस्टिंग शाखा में मुख्य प्रबंधक के रूप में हो गई, किंतु वे मेरे रिटायर्मेंट की तिथि 31 अक्टूबर तक शाखा में कार्यरत रहे और जैसे ही 01 नवम्बर को प्रेम चन्द्र शर्मा को मेरा उत्तराधिकारी बनाए जाने की खबर सामने आई, कोहली जी ने वोलंट्री रिटायर्मेंट ले लिया। क्रमश: …

अहमदाबाद में बेटी को ऑपरेशन के बाद अस्पताल से घर ले आया हूं, वह स्वस्थ है, किंतु एक सप्ताह तक डॉक्टर की निगरानी में उसे रहना है , नाती सवा साल का है, बेटी व नाती की देखरेख के लिए मेरा और मेरी पत्नी का यहां रहना जरूरी है। उधर बंगलोर में मेरी बहू भी अस्पताल में भर्ती थी, वह भी अस्पताल से घर आ गई है , वहां पोता एक साल का है, बहू और पोता की देखरेख के लिए भी मेरा और मेरी पत्नी का वहां रहना जरूरी है। ऐसी चुनौतियां मुझे तोडती नहीं, नई ऊर्जा देती हैं और समस्याओं का समाधान ढूंढने के साथ – साथ संबंधों का प्रबंधन करने का गुर भी सिखाती हैं। अहमदाबाद में बेटी – दामाद अकेले हैं, वे लोग एक माह पहले ही यहां आए हैं, किंतु बंगलोर में बेटा 10 साल से है, छोटी बेटी और दामाद भी वहीं हैं, परिवार के दो अन्य लडके भी वहीं हैं, बेटे – बेटी के स्कूल – कॉलेज के कई दोस्त भी वहीं हैं, सभी आसपास ही सपरिवार रहते हैं, इसीलिए बेटे ने कहा कि मैं अहमदाबाद देखूं और वे सब बंगलोर सम्भाल लेंगे। फिर भी, हमने डॉक्टर से सलाह ली है , यदि बेटी यात्रा के लायक हो जाए तो  जमाई बाबू से विचार कर बेटी को बंगलोर ले जाना चाहूंगा ताकि बेटी –  बहू और नाती – पोता, हम सभी एक साथ रहें तो उन सब की अच्छी तरह देखरेख हो सके।

इन्हीं परिस्थितियों में आत्मकथा लेखन भी जारी है..।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

(मो.9310249821 Email: shreelal_prasad@rediffmail.com)

1,578 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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