डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(सियासत से बहुत ऊपर होती है विरासत)

बंगलोर, 07 फरवरी 2016

मैं, भारत के एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से बडी विनम्रता और सद्भावना के साथ, देश के जनमानस और भारत सरकार के  समक्ष, उच्चस्तर पर विचार – विमर्श के लिए, राष्ट्र एवं जनहित में,  कुछ सलाह प्रस्तुत करना चाहता हूं, यह जानते – समझते हुए भी कि लोग कहेंगे ही कि संसार में सबसे सस्ती चीज सलाह है, तो भी मैं वही सबसे सस्ती चीज ही देना चाहता हूं। यह भारत के माननीय प्रधानमंत्री और उनके मंत्रीमंडल के मानव संसाधन विकास मंत्री / शिक्षा मंत्री / सूचना एवं प्रसारण मंत्री / युवा, खेल व संस्कृति मंत्री की विशेष सूचना के लिए है।परंतु, इससे पहले कि मैं अपनी सलाह प्रस्तुत करूं, जनमत में व्याप्त कुछ सच्चाइयां, कुछ सूचनाएं और अपनी समझ भी रख देना आवश्यक समझता हूं।

सबसे पहले मैं यह निवेदन कर देना चाहता हूं कि मेरी समझ में , माननीय प्रधानमंत्री और केन्द्रीय सरकार की छवि को जितनी क्षति उनके भक्तों और अति उत्साही समर्थकों ने नहीं चाहते हुए पहुंचाई है, उतनी क्षति तो उनके विरोधी चाह कर भी नहीं पहुंचा सके।

आजकल, सोसल मीडिया , विशेषकर फेसबुक की दुनिया में, सरकार के कुछ ऐसे समर्थक अचानक सक्रिय हो गए हैं जो ऐसी – ऐसी सामग्री पोस्ट और फॉर्वार्ड कर रहे हैं, जो न तो राष्ट्रहित में हैं, न ही सरकार की छवि के अनुकूल हैं; कुछ लोग तो मीडिया पर बैन लगाने तक का प्रस्ताव भी सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं, वैसे लोग अपनी मनसा भी जाहिर करते हैं कि उनकी वैसी सक्रियता माननीय प्रधानमंत्री तक पहुंचे , उनकी उस मनसा की मनसा समझना कोई बहुत मुश्किल नहीं है।

मैं बडे आदर के साथ यह स्पष्ट कर दूं कि मैं माननीय प्रधानमंत्री जी और सरकार का अंधभक्त और अंधसमर्थक नहीं हूं, बल्कि  सर्वसाधारण के हित में किए जा रहे सभी कार्यों की मैं प्रशंसा करता हूं और उसके लिए अपना भरपूर समर्थन व्यक्त करता हूं, किंतु मुझे जब भी ऐसा लगेगा कि कोई कार्य विशेष जनसाधारण के हित या सरकार की छवि के अनुरूप नहीं है, मैं उसका विरोध करूंगा। तात्पर्य यह है कि मेरा समर्थन या विरोध पूरी तरह वस्तुनिष्ठ है, व्यक्तिनिष्ठ नहीं; ऐसी नीति मैं अपने जीवन के हर क्षेत्र में अपनाता हूं, इसके कुछ उदाहरण मेरे ट्वीटर @shreelalprasad और ब्लॉग shreelal.in पर देखे जा सकते हैं।

फेसबुक पर कुछ बेहद चिंताजनक सामग्री देखने को मिली है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए अपमानजनक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग तो किया ही गया है, कुछ लोगों द्वारा तो पोस्ट की गई पूरी की पूरी सामग्री ही अत्यंत आपत्तिजनक और अपमानजनक है। साथ ही, वैसे लोग भारत की आज़ादी में बापू के योगदान को सिरे से खारिज भी कर रहे हैं। मेरी समझ में वे लोग या तो भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का ज्ञान नहीं होने या एकांगी ज्ञान होने अथवा ग़लत हाथों का हथियार हो जाने के कारण वैसा कर रहे हैं, इसीलिए उसका पूरा का पूरा दोष उन्हीं के मथे नहीं मढा जा सकता ।

मेरी समझ में सरकार और राष्ट्रहित में स्वयं को सक्रिय बताने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं का उत्तरदायित्व है कि संसार के सबसे बडे लोकतांत्रिक गणराज्य भारतवर्ष की विरासत को सही तरीके से जन साधारण तक, विशेष कर युवा पीढी तक, पहुंचाया जाए।

आज भारत की आबादी में युवाशक्ति का प्रतिशत पहले की अपेक्षा संभवत: बहुत ज्यादा है और मेरा मानना है कि माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत की वर्तमान युवा पीढी का वह समर्थन एवं विश्वास ही है जिसके बल पर अभूतपूर्व और अद्भुत बहुमत के साथ सरकार बनाने का उन्हें अवसर मिला है।

किसी भी मुल्क की विरासत उसके नौनिहालों के कंधों पर ही आगे बढती है, किंतु जब उसमें भी सियासत घुसपैठ कर जाती है तो वह राष्ट्र के लिए अनिष्टकारी साबित होती है। इसलिए जरूरी है कि उन्हें उनकी विरासत की अहमियत बताई जाए और उसके लिए पहली जरूरत यह है कि उस विरासत से उनका सही परिचय कराया जाए। इसकी प्रासंगिकता और आवश्यकता आज के भारत में और भी अधिक हो गई है क्योंकि मेक – इन – इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया लोग समझ भी लें तो उनकी वह समझ तब तक कारगर और सफल नहीं हो सकती जब तक कि वे इंडिया यानी हिंदुस्तान अर्थात भारत को अच्छी तरह न समझ लें।

मेरी सलाह उसी दिशा में है।

सलाह:

  1. भारतीय स्वाधीनता संग्राम के बीसवीं सदी के इतिहास को दो खण्डों में (किंतु एक ही संग्रह में) पुनर्प्रस्तुत किया जाए –
  • पहले खंण्ड में प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत से दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति तक यानी दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी और भारत की राजनीति में उनके प्रवेश से प्रारम्भ किया जाए और नेता जी की विमान दुर्घटना तक का इतिहास रखा जाए। यह वही अवधि है जिसमें प्रथम विश्वयुद्द , गांधी जी का चम्पारण सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, चौरीचौरा कांड, साईमन कमीशन, लाहौर कॉंग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का उद्घोष, 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाना,  नमक सत्याग्रह – दाण्डी मार्च, गोलमेज सम्मेलन , पुणे पैक्ट, राजगुरू – सुखदेव – भगत सिंह एवं  चन्द्रशेखर आज़ाद आदि की शहादत, अनेक प्रांतों में कॉंग्रेसी सरकारों का गठन, पाकिस्तान की मांग, 1939 के त्रिपुरा कॉंग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रपति ( कॉंग्रेस अध्यक्ष) पद के लिए गांधी जी द्वारा मनोनीत उम्मीदवार के विरुद्ध नेताजी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा चुनाव लड कर जीत हासिल करना, द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत और उसमें सहभागिता को ले कर गांधी जी तथा नेता जी का रूख , 1942 में गांधी जी द्वारा ‘अंग्रेजो ! भारत छोडो’ आन्दोलन और ‘करो या मरो’ का नारा , द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और नेता जी की विमान दुर्घटना एवं अन्य अनेक महत्वपूर्ण घटनाएं शामिल हैं।
  • दूसरे खंड में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर भारत, ब्रिटिश सल्तनत द्वारा भारत को आज़ाद करने की ओर कदम बढाना तथा अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत मुस्लिम लीग और कॉंग्रेस, संविधान सभा का गठन और उसमें प्रांतीय तथा देसी रियासतों के सदस्यों का चुनाव, स्वाधीनता प्राप्ति, मुल्क का बंटवारा, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान – दोनों ओर से बडी संख्या में आबादी का विस्थापन , गांधी जी की निर्मम हत्या, देसी राज्यों का विलय यानी सम्पूर्ण भारत का एकीकरण, संविधान को अंगीकार किया जाना यानी लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना , देश को विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए बनाई गई कार्य योजना, सामासिक संस्कृति और सामाजिक सद्भाव के लिए किए गए प्रयत्न तथा भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन आदि शामिल किए जाएं।
  • अर्थात 1914 से ले कर 1960 तक की राष्ट्रीय घटनाओं का प्रामाणिक इतिहास लिखा जाए, उसके पहले और उसके बाद का इतिहास यहां देना आवश्यक नहीं है क्योंकि मेरी यह सलाह तो विशेष उद्देश्यों की पूर्त्ति के लिए है , सामान्य रूप से नियमित इतिहास लेखन अपनी गति और अपने स्वरूप में होता रहे, वह मेरा विषय नहीं है।
  • पहले खंड में देश के अमर शहीदों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर विशेष बल दिया जाए, साथ ही, उसके समानान्तर गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन पर भी समान रूप से प्रकाश डाला जाए।
  • दूसरे खंड में गांधी, नेहरू, सुभाष, पटेल, अम्बेदकर, जयप्रकाश एवं अन्य महान नेताओं की स्वाधीनता आन्दोलन में भूमिकाओं पर विशेष प्रकाश डाला जाए।
  • इतिहास के उस पुनर्प्रस्तुतीकरण में महात्मा गांधी की आत्मकथा तथा लुई फिशर द्वारा लिखी गांधी जी की जीवनी, नेहरू जी की आत्मकथा – मेरी कहानी तथा उनकी जीवनी, सरदार पटेल की रावजीभाई म. पटेल द्वारा लिखी जीवनी, अम्बेदकर एवं नेताजी पर प्रामाणिक सामग्री को विशेष आधार बनाया जाए। यानी इतिहास का पुनर्लेखन न कर प्रामाणिक इतिहास पुस्तकों, आत्मकथाओं, जीवनियों , दस्तावेजों आदि में विद्यमान तथ्यों को क्रमिक रूप में एक जगह विस्तार से पुनर्प्रस्तुत किया जाए।
  • दूसरे खंण्ड में गांधी – नेहरू, गांधी – सुभाष, गांधी – पटेल, गांधी – अम्बेदकर, नेहरू – सुभाष, नेहरू – पटेल, नेहरू – अम्बेदकर के अंतर्संबंधों और वैचारिक मतमतांतरों पर प्रामाणिक जानकारी विस्तार से दी जाए क्योंकि ये ही वे मुद्दे हैं जिनको लेकर युवा पीढी में विशेष भ्रम है और अशोभनीय विवादों के कारण भी।
  • उपर्युक्त तथ्यों के पुनर्प्रस्तुतीकरण में किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह या निहित मतमतांतर का प्रभाव न हो।
  1. उपर्युक्त इतिहास को पूरे देश में समान रूप से मैट्रीक से ले कर ग्रेजुएशन तक के प्रत्येक छात्र , चाहे वह कला,    वाणिज्य , विज्ञान, ईंजीनियरिंग, मेडिकल , कृषि, डीफेंस या किसी भी विषय का हो, के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बना दिया जाए।
  • अध्ययन – अध्यापन के माध्यम की भाषा वही रखी जाए जो संबंधित स्कूल / बोर्ड और कॉलेज / युनिवर्सिटी में शिक्षा का माध्यम हो।
  • मैट्रिक यानी वर्ग 9 – 10 से ले कर ग्रेजुएशन तक उस इतिहास पाठ्यक्रम के विषय क्रम का निरधारण लॉजिकल हो।
  • किसी भी हालत में प्रकाशन टूकडे – टूकडे में न हो यानी दोनों खण्ड हमेशा एक ही साथ प्रकाशित हों । ऐसा होने से किसी पाठ्यक्रम विशेष में उस पुस्तक का कोई एक छोटा – सा हिस्सा होने पर भी पूरी पुस्तक उस छात्र के पास होगी ताकि समय और सुविधा के अनुसार वह छात्र पाठ्यक्रम से इतर अंश का भी अध्ययन कर अपना ज्ञानवर्द्धन कर सके।
  1. उस अध्ययन को एक सांस्कृतिक आन्दोलन के रूप में अनिवार्य बनाया जाए और उसे एक राष्ट्रीय कर्तव्य बना दिया  जाए क्योंकि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह आवश्यक प्रतीत होता है। इसमें न कहीं क्षेत्र का विवाद होगा, न भाषा का, न धर्म का , न राजनीतिक मतमतांतर का, न सामाजिक स्तर का,  न जाति का , न लिंग का।
  1.  उसे सामान्यज्ञान का एक अनिवार्य अतिरिक्त पत्र बनाया जा सकता है तथा उसमें उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम अंक  निरधारित किया जा सकता है।
  1. विरासत को सियासत से अलग और ऊपर रखा जाए।

उपर्युक्त सलाह और सुझावों के अलावा मैं उन महानुभावों के लिए भी कुछ पंक्तियां नीचे दे रहा हूं, जिन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन को टूकडे – टूकडे में देख- समझ कर अनपेक्षित टिप्पणियां की हैं।

*****

बैलों ने हल चलाए थे, फाल ने धरती फाडी थी

कुदाल ने कोडी थी मिट्टी,पानी ने की सिंचाई थी

खाद ने जोर लगाया था, बीज ने ली अंगडाई थी

हंसिए ने बाली काटी थी,पर,किसने फसल उगाई थी?

*****

राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह , चन्द्रशेखर आज़ाद है तू

गांधी, नेहरू, भीम, सुभाष , जय प्रकाश , सरदार है तू

मेरा देश महान है तू ,    आन – बान और शान है तू

अपना क्यों अपमान करे ,    भारत मां का मान है तू।

जय हिंद !

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

बंगलोर, 07 फरवरी 2016

13,338 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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