शब्द और स्वर का ऐसा बेमिसाल दोस्ताना !

बंगलोर, 09 फरवरी 2016

“ सूरज को चोंच में लिये मुर्गा खडा रहा

खिडकी के परदे खींच दिये, रात हो गई ”

और सचमुच परदा खिंच गया, रात हो गई क्योंकि हिंदी और उर्दू की मिलीजुली जुबान हिन्दुस्तानी का अज़ीम शायर परदे के पीछे चला गया , गंगा – जमुनी तहज़ीब का आफताब चला गया , निदा फाजली नहीं रहे, अदबी उजाले में  रात का – सा स्यापा लगे है मुझे, मगर फिर भी, उनकी क़लम की नोक से बूंद – बूंद आखर – आखर झरझरा कर झरी हुई रोशनी ग़जलों, नज़्मों और दोहों की शक्ल में इस क़दर इफरात में छितराई हुई है कि अंधेरा मुंह छुपा कर भागता हुआ लागे है।  शहरी रहन – सहन  को अभिव्यक्त करने के ख्याल से लिखा निदा साहब का यह शेर उन पर ही कितना मौजूं  बैठता है!

जमीन से जुडे रहने की जैसी ललक और ठसक मैंने उर्दू शायरों और हिंदुस्तानी के लेखकों – कवियों में महसूस की है, वैसी चाहत हिंदी कवियों – लेखकों में नज़र नहीं आई, कहीं – कभी आई भी तो गिनी – चुनी । अकबर इलाहाबादी, ज़िगर मुरादाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी, नज़ीर वनारसी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, अदम गोंडवी से ले कर आज के वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी तक एक लम्बा सिलसिला है उर्दू और हिंदुस्तानी के शायरों का जिन्होंने अपनी पहचान में अपनी मिट्टी की सुगंध को बसाये रखा और अपने नाम के साथ अपना तख़ल्लुस यानी उपनाम अपने गांव – शहर के नाम पर ही रखा, फिर भी, कहीं भी, कभी भी, किसी भी रूप में क्षेत्रीयता या साम्प्रदायिक सोच की बू तक नहीं आई उनमें , वे सारे हिंदुस्तान , सारी कायनात के शायर माने गए,  वैसे ही नामों में बडे अदब और एहतराम के साथ लिया जाने वाला नाम है – निदा फाजली।

निदा फाजली साहब का जन्म दिल्ली में, लालन – पालन शिक्षा – दीक्षा ग्वालियर में और लेखन – जीवन – यापन मुम्बई में , किंतु उनका पारिवारिक मूल कश्मीर में। कश्मीर में ही फजल नामक जगह से उनके परिवार का तालुक था, इसीलिए उन्होंने अपना तखल्लुस ‘फाजली’ रखा। शायर वालिद ने तो नाम रखा था उनका  मुक्तीदा हसन , उसे हिंदी में ‘मुक्तिदा’ करें तो अर्थ ध्वनित होगा – ‘मुक्ति दाता,  मुल्क जब गुलामी से मुक्त हुआ तो बंटवारे में उनके माता – पिता तो पाकिस्तान चले गए परंतु ‘मुक्तिदा’ हसन निदा फाजली हिन्दुस्तान में ही रहे। वर्षों पहले जब एक मुशायरे में वे पाकिस्तान गए तो उनसे गुजारिश की गई कि वे पाकिस्तान की नगरिकता ग्रहण कर वहीं बस जाएं, किंतु उन्होंने उसे ठुकरा दिया। वहीं कुछ कट्टरपंथी मुल्लाओं ने उनके एक शेर पर उनका जोरदार विरोध किया था, वह शेर था –

“ घर से मस्जिद है बडी दूर, चलो ये कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ”

उन कट्टरपंथियों को लगा कि शायर ने एक बच्चे को ईश्वर के विकल्प का रूतबा दे दिया, बस क्या था ,  भडक गए सब। निदा साहब के इस शेर को मोमीन के उस शेर के बरख्स भी देखा जा सकता है –

“ मोमीनो लाखों जन्नतें कुर्बान

बस, एक बच्चे की मुस्कुराहट पर ”

साहित्य और सिनेमा जगत में समान रूप से शोहरत पाना कुछ ही रचनाकारों को नसीब हुआ है, उनमें से एक बडा नाम निदा साह्ब का भी है। उनके गीतों को, ज्यादातर, लोकप्रियता उनके अज़ीज दोस्त ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ से मिली। दोनों समकालीन थे, उम्र में दो – तीन साल बडे थे निदा साहब, निदा फाजली और जगजीत सिंह का याराना शब्द और स्वर का ऐसा बेमिसाल दोस्ताना था कि गायक जिग़री दोस्त जगजीत सिंह के 75वें जन्मदिन (08 फरवरी)  पर ही विदा हुए शायर निदा फाजली ! दोनों को सलाम!

सत्तर के दशक के शुरुआती वर्ष में पहला संग्रह प्रकाशित होने के साथ ही निदा फाजली की पहचान मुकम्मल होने लगी थी। उसी दशक में हिंदी कहानी मासिक पत्रिका ‘सारिका’ के सम्पादक कमलेश्वर और हिंदी साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के सम्पादक धर्मवीर भारती ने जिन दो शायरों को प्रकाशन का मंच उपलब्ध करा कर उनकी लोकप्रियता को बढाने में योगदान किया , वे थे ग़जलों के राजकुमार दुष्यंत कुमार और प्रगतिशील सोच के शायर निदा फाजली। उन दोनों का लेखन भाषा के समान धरातल पर हुआ , जहां दुष्यंत के लेखन में क्लिष्ट हिंदी यानी संस्कृत के तत्सम शब्दों का अभाव रहा वहीं निदा फाजली के लेखन से अरबी फारसी के दुरूह अल्फाज नदारद रहे, उसका फल यह हुआ कि दोनों को प्रबुद्ध वर्ग के साथ – साथ आम पाठकों में भी समान रूप से लोकप्रियता मिली। दुष्यंत कुमार तो ग़जल को ‘हिंदी ग़जल’ और ‘उर्दू ग़जल’ में बांटने के भी विरोधी थे।

दो दशक पहले मुज़फ्फरपुर में निदा फाजली साहब को रूबरू सुनने का मौका मिला था, उस मुशायरे में , आज की उर्दू शायरी में निदा फाजली के साथ लिया जाने वाला दूसरा सबसे बडा नाम, बशीर बद्र भी थे। तीन बजे सुबह तक चला था मुशायरा, श्रोता जमे रहे , क्योंकि सबसे अंत में सुनाने वाले थे निदा साहब, उनके ठीक पहले बशीर बद्र साहब ने सुनाया । जिस लरजती आवाज में जगजीत सिंह जी ने निदा साहब की ग़जलों और दोहों को गाया है, उससे थोडी तल्ख आवाज में पढते थे निदा फाजली, किंतु आवाज में तल्खी नहीं बल्कि वैसा ही मखमली एहसास, मासूमियत में डूबा वैसा ही मिज़ाज , बिल्कुल जगजीत सिंह वाला। मैं 15 साल की उम्र से कवि – सम्मेलनों और मुशायरों में जाने लगा था, कविता और शायरी को समझता कितना था, यह अलग विषय  है , किंतु मुझे दूसरी मजलिशों से ज्यादा अच्छी लगती थी वे मजलिशें, उसका श्रेय मैं अपने हाई स्कूल में  अंग्रेजी और समाज अध्ययन के शिक्षक (स्व.) एमामुल हक साहब को देना चाहूंगा। उन्होंने ही हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के साथ – साथ उर्दू साहित्य में भी मेरी अभिरुचि जगाई और उसे परिष्कृत भी किया। इसीलिए हिंदी कविता औरा उर्दू शायरी की मेरी समझ साथ – साथ बढी; हालांकि उर्दू लिपि न उन्हें आती थी, न मुझे, सीखी जरूर, किंतु पूरी नहीं।  सत्तर के दशक से अब तक के अधिकांश बडे कवियों और शायरों को रूबरू सुनने का अवसर मिला है मुझे, जिसे मैं अपनी उपलब्धि मानता हूं, तो उस दिन मुज़फ्फरपुर में निदा फाजली साहब को सुनना भी मेरे लिए एक अविस्मरणीय, अतुलनीय उपलब्धि बन गई।

परंतु , निदा साहब, मैं आप की उस सोच से, बडी विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा , इत्तिफाक  नहीं रखता,  जो इंसानी जिन्दगी के बारे में , इस शेर में आपने बयां की है —

” दुनिया , जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है

मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है”

क्योंकि आप मिले थे तब भी सोना थे और खो गए, चले गए, तब भी सोना हैं।

तो उन्हीं निदा फाजली साहब को  याद करते हुए, दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना, श्रद्धा के साथ शब्दांजलि।

,अमन, श्रीलाल प्रसाद

9310249821

बंगलोर , 09 फरवरी 2016

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