डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(मेरी ज़िन्दगी मुश्तक़िल इक सफर है)

अहमदाबाद , 16 फरवरी 2016

बेटी को अस्पताल से घर लाने के एक सप्ताह बाद डॉक्टर से राय ली तो कुछ और दिन ऑव्जर्वेशन में रहने की सलाह डॉक्टर ने दी, तदनुसार सबका बंगलोर जाने का कार्यक्रम रद कर देना पडा । उधर बंगलोर में बहू अस्पताल से घर आ गई थी। बेटा , छोटी बेटी और  दामाद तथा मेरी साली के दो बेटे बंगलोर में ही थे और देखरेख के लिए फिलहाल बेटे के फ्लैट में ही सभी आ गए थे, उन सबके अलावा बहू के मायके वालों में से भी एक परिवार बंगलोर में ही था। बेटे ने कहा था कि हम दोनों , मैं और मेरी पत्नी, अहमदाबाद में बेटी और नाती की देखरेख करें , बंगलोर वे लोग सम्भाल लेंगे, फिर भी, न मुझे चैन आ रहा था न पत्नी को इत्मीनान हो रहा था, क्योंकि अहमदाबाद में दामाद बैंक में हैं तो बंगलोर में रहने वाले परिवार के सभी लोग एमएनसी में हैं, केवल हम दोनों ही हैं जिनके चौबीसों घंटे अपने हैं। बेटे ने और बेटियों ने भी , मेरी सेवा निवृत्ति के बाद मुझे सलाह दी थी कि अब कहीं भी जाना हो तो हम दोनों यानी उनके माता – पिता, साथ ही जाएं, पिछले एक साल से हम ऐसा ही कर रहे थे, लेकिन अब परिस्थिति ऐसी आ गई थी कि कुछ दिनों के लिए हम में से एक बेटी – दामाद और नाती के पास रहे तो दूसरा, बेटा – बहू और पोता के पास रहे, इसीलिए हमने आपस में विचार कर निर्णय ले लिया कि चूंकि बेटी का ऑपरेशन हुआ है और उसे ज्यादा सावधानी तथा आराम की जरूरत है और साथ ही, यहां और कोई अपना नहीं है तो पत्नी अहमदाबाद में बेटी के पास रहें और नाती को भी सम्भालें तथा मैं बेटा – बहू – पोता के पास चला जाऊं, हमने अपनी यह योजना किसी को भी नहीं बताई, पहले से बेटी और नाती के साथ हम दोनों के बंगलोर जाने के लिए 02 फरवरी की टिकट थी ही, सो शेष दो टिकट रद करा कर मैं बंगलोर के लिए चल पडा।

सेवानिवृत्ति के बाद मैं बेटे – बेटियों को फोन कम ही करता हूं, वे लोग ही अपनी सुविधानुसार रोज एक – दो बार फोन कर हमलोगों का समाचार पूछ लेते हैं, शायद वे समझते हैं कि उनलोगों की देखरेख करने की हमारी जिम्मेदारी पूरी हो गई है और अब हमारी देखरेख की उनलोगों की जिम्मेदारी शुरू हो गई है।  बेटा रोज ऑफिस के लिए घर से निकलते समय और घर के लिए ओफिस से निकलते समय गाडी में बैठते ही मुझे फोन करता है, बीच – बीच में हमलोग बहू को फोन कर उसका और पोते का हालचाल पूछते रहते हैं, कभी – कभी शनिवार और रविवार को सभी स्काईप पर आमने – सामने बातचीत कर एक – दूसरे को देख भी लेते हैं । बेटे को घर से ही काम करने अथवा अपनी इच्छानुसार समय निश्चित कर ऑफिस जाने और आठ घंटे की ड्युटी पूरी कर लेने की सुविधा मिली हुई है। उस दिन एक बजे दिन में ऑफिस जाते समय उसने मुझे फोन किया तो मैं अहमदाबाद में घर पर ही था, रात के दस बजे ऑफिस से निकलते हुए जब उसने फोन पर मुझसे बात कर लेने के बाद अपनी मां से बात कराने के लिए कहा तो पोल खुल गई क्योंकि तब मुझे कहना पडा कि मैं ट्रेन में हूं और बंगलोर आ रहा हूं , वरना मेरी योजना तो 36 घंटे की यात्रा पूरी कर सुबह – सुबह उसके दरवाजे की घंटी बजाने की थी, क्योंकि, चूंकि कई मामलों में और कई बार उसने भी हमें वैसी ही सरप्राईज दी थी, इसीलिए मेरी योजना भी सरप्राईज देने की ही थी, लेकिन बेटे की नियमित कॉल से सरप्राईज योजना खुल गई। वह समझ गया कि बेटा – बहू और पोते के मोह मे मैं एक्झर्शन ले रहा हूं, उसने सीधे – सीधे कहा कि ‘ पापा ! ऐसी थकान से बचिए, बंगलोर में सभी ठीक हैं ’ वह पिछले 20 महीनों की मेरी निरंतर थकान को याद करते हुए मेरे स्वास्थ्य को ले कर चिंतित हो गया; 20 माह यानी जुलाई 2014 से आज तक, मैं दौडता ही रहा हूं, कभी बेटा – पोता के पास तो कभी बेटी – नाती के पास, कभी दिल्ली- एनसीआर तो कभी मोतीहारी और कभी पुस्तैनी गांव, इन 20 महीनों में कहीं भी एक माह चैन से रहने का अवसर नहीं मिल पाया मुझे।

दरअसल, 31 अक्टूबर 2014 को मैं सेवानिवृत्त होने वाला था, बेटी और बहू , दोनों एक – दो माह के अंतराल पर मां बनने वाली थीं, इसीलिए हमने दोनों को जुलाई – अगस्त 2014 में ही अपने पास दिल्ली बुला लिया था। तब मैं बैंक द्वारा प्रदत्त लीज्ड फ्लैट में पश्चिम विहार में रहता था, वह फ्लैट पीएनबी प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग के सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक पीडी लखनपाल (यानी जिस पद और जगह से मैं सेवानिवृत्त हो रहा था, उसी पद और जगह पर कुछ साल पहले तक लखनपाल जी रहे थे और एक तरह से मेरे बॉस रहे थे) के साले का था जो लंदन में रहते थे और जिसके कर्ताधर्ता और पॉवर ऑफ एटर्नी होल्डर लखनपाल जी ही थे। 18 अक्टूबर को बेटी को बेटा हुआ, 31 अक्टूबर को मैं सेवानिवृत्त हो गया, 15 नवम्बर को भारत के राष्ट्रपति ने राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवा के लिए विज्ञान भवन नई दिल्ली में मुझे पुरस्कार प्रदान किया और 16 दिसम्बर को बहू को बेटा हुआ। बैंक नियमानुसार उस फ्लैट में 31 जनवरी 2015 तक रहने का मैं अधिकारी था, चूंकि फरवरी 2015 में छोटी बेटी की शादी होनी थी, दिल्ली एनसीआर में एक फ्लैट स्थायी आवास के लिए लेना था, एक – दो महीने के दो बच्चे घर में थे, ऐसी ही परिस्थितियों में तीन महीनों के लिए लीज पीरियड बढाने का अनुरोध मैं ने लखनपाल जी से किया था, लीज पीरियड के लिए बैंक ने मेरी ग्रेच्युईटी की पूरी राशि रोक रखी थी , लीज रेंट 15,000/- का था, लखनपाल जी की सहमति से लीज पीरियड बढाया जा सकता था, किंतु लखनपाल जी ने बैंक को लिख कर दे दिया कि उनका फ्लैट 01 फरवरी से 30,000/- मासिक किराए पर लग चुका था, हालांकि एक – दो महीने पहले तक वह फ्लैट किराए पर नहीं उठा था, शायद आज तक नहीं उठा है।

दिल्ली – एनसीआर में जनवरी की कंपकंपा देने वाली ठंढ , ऊपर से कई दिनों से लगातार हो रही बारिश, आवास का ठिकाना नहीं, ठिकाना ढूंढना (क्योंकि जो फ्लैट खरीद के लिए फाईनल हुआ , वह अप्रैल में मिलने वाला था, इसीलिए तीन महीनों के लिए कोई अस्थायी आवास ढूंढना था और दिल्ली – एनसीआर में ऐसा आवास किसी रिटायर्ड व्यक्ति को किराए पर मिलना कितना आसान है, यह सर्वविदित है) और छोटे – छोटे बच्चों के साथ तथा 38 वर्षों के सेवाकाल में अर्जित सारे सामान लेकर शिफ्ट करना; कितना मुश्किल काम था ! आज वे यादें रोमांच पैदा करती हैं किंतु वास्तव में वह कालखण्ड मेरे लिए समस्याएं गिनने और उनका समाधान ढूंढने से ज्यादा संबंधों का प्रबंधन करने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि मध्यमवर्गीय परिवारों में जब बेटी और बहू , दोनों समान परिस्थितियों में हों तो बेटी के मां – बाप के रूप में तथा बहू के सास – श्वसुर के रूप में, एक दम्पति को संबंधों का संतुलन बनाए रखने में कैसी नाजुक स्थितियों से दो – चार होना पडा होगा, इसकी कल्पना कर लेना आसान नहीं है। लेकिन चूंकि मैं ने तब तक के अपने जीवन में उससे भी अधिक विकट परिस्थितियों का सफलता पूर्वक सामना किया था, इसीलिए उन चुनौतियों के सामने मैंने खुद को मजबूर नहीं होने दिया और बडे सम्मान एवं इत्मीनान के साथ सफलता पूर्वक उनका सामना किया, इसलिए, ईश्वर है या नहीं, मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता, किंतु यदि वह है तो वह मेरे एवं मेरे पूरे परिवार के ऊपर बहुत मेहरबान है, इसके लिए उसका लाख – लाख शुक्रिया। मेरा बेटा उन्हीं परिस्थितियों को याद कर मेरे स्वास्थ्य के लिए चिंतित हो रहा था, लेकिन अब वह या मैं कर क्या सकते थे, क्योंकि मेरी ट्रेन 8 घंटे की यात्रा कर चुकी थी।

मैं ने यहां अक्टूबर 2014 से जनवरी 2015 तक की जिन घटनाओं की चर्चा की है, उनकी कुछ चर्चा पहले भी कर चुका हूं किंतु एक बार फिर उन्हें याद करने के कुछ विशेष कारण हैं। दरअसल, पीडी लखनपाल से हमेशा मेरा सद्भावपूर्ण संबंध रहा था, जब वे पीएनबी प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग के प्रभारी मुख्य प्रबंधक थे और मैं फील्ड में राजभाषा अधिकारी था तब भी, वे रिटायर्ड हो गए तब भी तथा 2009 में मुख्य प्रबंधक के रूप में प्रोन्नत हो कर मैं दिल्ली आया और उनका फ्लैट बैंक लीज पर लिया तब भी, बल्कि सच कहें तो उन पुराने संबंधों के चलते ही उन्होंने वर्षों से वीरान पडे अपने उस फ्लैट को बैंक लीज पर लेने का मुझसे अनुरोध किया था और मेरे ‘हां’ करने पर उन्होंने उसकी मरम्मत भी करा दी थी। यही नहीं, जब मैं पीएनबी प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक बन कर उनके  फ्लैट में रह रहा था तब भी और अक्टूबर 2014 में मेरे रिटायर्मेंट के दिन तक भी मेरा उनसे अच्छा संबंध रहा था और मैं अब भी वैसा ही मान रहा था, किंतु बाद में जब मैं ने देखा कि उनका वह फ्लैट, जिसके बारे में उन्होंने बैंक को लिख कर दे दिया था कि वह 30,000/- मासिक किराए पर उठ गया था और वही कारण बता कर उन्होंने मेरा लीज पीरियड नहीं बढाया था, बहुत दिनों तक किराए पर उठा ही नहीं था , तब कुछ अन्यथा भाव समझ लेने के लिए मैं विवश हो गया और उस अन्यथा भाव के पीछे के कारणों को समझने की कोशिश करने लगा ।

लखनपाल जी सेवानिवृत्ति के बाद एक प्राईवेट बीमा कम्पनी में काम करने लगे थे । प्रधान कार्यालय में मेरे पांच वर्षों के सेवा काल (उस पूरी अवधि में बैंक लीज पर लिए गए उन्हीं के फ्लैट में मैं रहा था) के दौरान वे हमेशा कार्यालय में मुझसे मिलते रहते थे और अपनी कम्पनी की बीमा पॉलिसी खरीदने के लिए कहा करते थे, शायद मेरे कार्यालय के कुछ अन्य लोग उनके पॉलिसी होल्डर थे भी, किंतु मैंने न खुद अपने लिए कोई पॉलिसी खरीदी, न अपने बच्चों के नाम खरीदी और न ही किसी स्टाफ को खरीदने के लिए कहा, तो मेरे प्रति उनकी नाखुशी का एक कारण यह हो सकता था। परंतु, ऐसी स्थिति तो 2009 से 2012 के बीच ही स्पष्ट हो चुकी थी कि मैं उस कार्य में उनका किसी भी रूप में मददगार नहीं हो सकता था , यदि केवल वही कारण रहा होता तो फिर 2012 में लीज का नवीकरण ही उन्होंने नहीं किया होता। इसलिए एक दूसरी संभावना भी नजर आती है, वह, यह कि मेरे विभाग में कार्यरत वरिष्ठ प्रबंधक एसपी कोहली उनके पुराने प्रिय पात्र थे और जब 2010 में कोहली जी को दिल्ली से बाहर भेजा गया था तो दबी जबान में लखनपाल जी ने उस विषय में मुझसे चर्चा की थी। जब कोहली जी स्केल 4 में प्रोन्नत हो गए , उस बीच भी लखनपाल जी मुझसे मिले थे और कोहली जी की पोस्टिंग की चर्चा की थी,  किंतु कोहली जी की पदस्थापना दिल्ली में ही एक शाखा में हो गई। 31 अक्टूबर 2014 को मेरी सेवानिवृत्ति के बाद मेरे उत्तराधिकारी के रूप में कोहली जी को दिल्ली की शाखा से राजभाषा विभाग में न ला कर बैंक ने प्रेमचन्द्र शर्मा को पश्चिम बंगाल की एक शाखा से बुला लिया, तब शायद उन्होंने यह समझ लिया होगा कि उस मामले में भी मैंने उनकी बात नहीं मानी, तो मुझे लगता है कि शायद लखनपाल जी की मेरे प्रति नाखुशी का यही सबसे बडा कारण रहा होगा, हालांकि मैं अपनी सीमाओं को ले कर न खुद किसी गलतफहमी में कभी रहता हूं और न किसी के लिए वैसी कोई गुंजाइश छोडता हूं क्योंकि किसी भी प्रकार की पैरवी में नहीं पडने वाले तथा किसी भी स्तर की पैरवी को दरकिनार कर बैंक के निर्धारित नियमों के अनुसार ही काम करनेवाले अफसर के रूप में हमेशा से मेरी स्पष्ट व पारदर्शी छवि रही है।

मैं अहमदाबाद – यशवंतपुर एक्सप्रेस में सफर कर रहा था, वह अच्छी ट्रेन है और उसमें यात्रियों के भोजनादि के साथ – साथ अन्य सुविधाओं – साफ – सफाई आदि की भी अच्छी व्यवस्था है। चाय वाले छोटे – से गिलास में बीस रूपये में मिलने वाला टमाटर सूप मेरे लिए विशेष आकर्षक पेय था, भोजन परोसने के पहले एक – डेढ घंटे पहले से ही सूप वाला आने लगा था और मैंने भोजन तो कुछ नहीं किया किंतु तीन – चार सूप पी गया। सूप पीते हुए मैं बहुत पुरानी यादों से निकल कर अभी हाल की कुछ यादों में विचरणविचरण करते हुए 04 फरवरी को सुबह 04 बजे बंगलोर पहुंच गया, वहां 08 – 09 दिन बेटा – बहू और पोता के साथ रहा, छोटी बेटी और दामाद भी आ गए, वहां अब सभी स्वस्थ – प्रसन्न हैं, 12 फरवरी को बंगलोर से चला। फिर ट्रेन में यादों का मेला और उस मेले में मैं अकेला भटकने – सा लगा ….  कृष्ण कुमार एक परिश्रमी और ईमानदार अधिकारी तथा नेता हैं, बैंक और अधिकारियों के हित के प्रति उनकी सोच सकारात्मक है, फिर भी उनकी सोच के ऊपर उनके ही सामने एक सवाल मैं रखना चाहता हूं, उनसे मेरा यह सवाल उनकी फेसबुक पोस्ट के अलावा मेरी आत्मकथा में पिछली कई कडियों में दी गई सच्ची घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में भी है। पहले उनकी उस विशेष पोस्ट के बारे में जान लें। उन्होंने लिखा था कि एचआर के दो दृष्टिकोण हैं, पहले के अनुसार एक बार स्थानांतरण आदेश जारी हो गया तो उसे बदला नहीं जा सकता, और दूसरे के अनुसार परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया जाना चाहिए। उन्होंने खुद दूसरे दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए औरों से विचार मांगे, जाहिर है कि बाकी सबने भी दूसरे यानी कृष्ण कुमार के दृष्टिकोण का ही समर्थन किया। मैं स्वयं भी उनके उस दृष्टिकोण का समर्थन करता हूं और मेरा सवाल उसी समर्थन के सिलसिले में है :-

  • यह कौन निर्धारित करेगा कि परिवर्तन के लिए कारण समुचित है या नहीं?
  • जिसकी पहुंच प्रबंधन तक नहीं है, उसके कारणों का औचित्य कौन सिद्ध करेगा?
  • जिसकी पहुंच संगठन के नेता तक नहीं है , उसके कारणों का औचित्य कौन साबित करेगा।
  • क्या कारणों का औचित्य ऑब्जेक्टीव न हो कर सब्जेक्टीव हो जाने की संभावना बरकरार नहीं रहेगी?
  • यदि अधिकारियों का एक संगठन औचित्य का आधार कुछ और बताए और दूसरा संगठन कुछ और तो वैसी हालत में

प्रबंधन क्या करे?

  • क्या ऐसे में पिक ऐण्ड चूज का अन्देशा नहीं रहेगा?
  • क्या ऐसी हालत में प्रबंधन, पहला संगठन और दूसरा संगठन मिला कर तीन पक्षों के अलावा एक चौथा पक्ष उस अधिकारी का नहीं हो जाएगा जो या तो किसी का सदस्य नहीं है या अपने ही संगठन के नेता का प्रियपात्र नहीं है ?
  • उस चौथे पक्ष को नैसर्गिक न्याय ( नेचुरल जस्टीस) कौन देगा या दिलाएगा ? क्या वह केवल इसलिए घाटे में रहे कि उसके पास कोई पैरवी नहीं है?
  • मुख्य धारा के अधिकारियों में बहुत कुछ खप भी जाए तो तकनीकी अधिकारियों के मामले में सबकुछ उजागर हो जाएगा क्योंकि उनकी संख्या तो कम होती ही है, पदों के लिए स्थानों की भी सीमा होती है। इसीलिए व्यावहारिक निर्णय भी सिद्धांत आधारित होना ही चाहिए ।
  • पारदर्शिता हर हालत में बरती जानी चाहिए यानी कोई निर्णय हुआ है तो क्यों हुआ है, क्या वैसी ही परिस्थितियों में वैसा निर्णय सबके लिए उपलब्ध है?
  • बदलना है तो नियम बदले और उसके अनुसार निर्णय हो, कोई खास निर्णय ही क्यों बदले और वह भी पारदर्शी आधार के वगैर।
  • कलतक जो गैर कानूनी था, उसके आज कानूनन जायज हो जाने की संभावना होती है, क्योंकि उसकी स्थिति विधायिका द्वारा बनाए/ बदले गए कानून पर निर्भर करेगी, इसलिए जोर डायनैमिक रूल्स बनाने पर हो, न कि रूल्स को तोडमरोड कर किसी खास व्यक्ति के लिए कोई खास काम करा लेने पर ।
  • संविधान में परिवर्तन हो सकता है तो ट्रांसफर – पोस्टिंग के नियमों को बदलना कौन – सी नामुमकीन बात है?
  • इतिहास पढना – पढाना और लिखना छोडिए, इतिहास रचना है तो कुछ वैसा ही कीजिए , आप कर सकते हैं, क्योंकि मेरी समझ में आपको लालच या भय नहीं है।
  • ऐसी समझ मुझमें होने का कारण यह है कि आप जिस तरह से क्षेत्र में घूम रहे हैं और अधिकारियों की दैनन्दिन समस्याओं के साथ – साथ बैंक / ब्रांच की समस्याओं को भी उजागर ही नहीं कर रहे, उनका समाधान भी ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं और बैंकिंग उद्योग की अद्यतन सूचनाओं से बैंककर्मियों को त्वरित गति से अवगत करा रहे हैं , वह नये ही नहीं, पुराने अधिकारियों के लिए भी बिल्कुल नया अनुभव है, आपकी यह सक्रियता आपको लोकप्रिय बैंक अधिकारी और नेता बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

इस संबंध में मेरा सुझाव है कि विशेष परिस्थितियों में स्थानांतरण करने या बदलने के लिए सबसे पहले संभावित समुचित कारणों की एक सूची तैयार कर ली जाए तथा उसी के आधार पर परिस्थितियों का आकलन और मूल्यांकन किया जाए, ताकि कारणों के औचित्य की व्याख्या कोई भी पक्ष अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार न कर पाए, इस तरह होने से विचलन की गुंजाइश न के बराबर रह जाएगी। ऐसी सूची ट्रांसफर – पोस्टिंग हेतु पूर्व निर्धारित मानदण्डों के परिशिष्ट के रूप में हो और गोपनीय न रहे, सबके लिए साईट पर उपलब्ध रहे ।  इसका सफल परीक्षण इसी प्रयोगशाला में किया जा चुका है। मेरी आत्मकथा के विभिन्न अंशों से, खास कर प्रधान कार्यालय में मेरे कार्यकाल के अंशों से , इसे समझा जा सकेगा। पीएनबी के शीर्ष प्रबंधन में वैसी इच्छाशक्ति है, लेकिन उसे रेखांकित करना संगठन के नेताओं का भी काम है, सिर्फ दूसरे दृष्टिकोण का समर्थन कर देने या समर्थन हासिल कर लेने या प्रबंधन को दोष देने से काम नहीं बनेगा।

ऐसी ही यादों की पालकी में हिचकोले खाते हुए मैं 14 फरवरी की सुबह अहमदाबाद पहुंच गया। आज बेटी को डॉक्टर को फिर दिखाया है, बेटी के स्वास्थ्य में प्रगति से सभी संतुष्ट हैं, फिर भी , डॉक्टर ने कुछ दिन और सावधानी बरतने और आराम करने की सलाह दी है।

हम दोनों भी, पत्नी और मैं, लम्बी दौडधूप से अब कुछ आराम चाहते हैं, हम भी चाहते हैं, और बच्चे भी चाहते हैं कि हम कुछ दिन किसी एक जगह इत्मीनान से रहें और सही मायने में सेवानिवृत्त जीवन की शुरूआत करें, इसके लिए हमने अपने दिल्ली – एनसीआर वाले आवास को ही चुना है , सो कल हम अहमदाबाद से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर रहे हैं ।

चूंकि मैं रिटायर्ड महसूस करना चाह रहा हूं, टायर्ड नहीं, इसीलिए आत्मकथा – लेखन अपनी रफ्तार से चलता रहेगा ।

“मेरी ज़िन्दग़ी मुश्तक़िल इक सफर है , जो मंजिल पे पहुंचे तो मंजिल बढा दी”

क्रमश: …

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

मो. 9310249821

अहमदाबाद , 16 फरवरी 2016

1,601 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 19/10/2017 at 5:21 pm
    Permalink

    Oh my goodness! Incredible article dude! Many thanks, However I am encountering issues with your RSS.
    I don’t know why I am unable to subscribe to it.
    Is there anyone else getting the same RSS problems?
    Anybody who knows the answer can you kindly respond?
    Thanks!!

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