डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 

( बेहद बेरहम होता है वक्त , और , बेहतर मरहम भी होता है वक्त)

इंदिरापुरम , 27 फरवरी 2016

बेहद बेरहम होता है वक्त , और , बेहतर मरहम भी होता है वक्त ! लोग कहते हैं कि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता, मैं कहता हूं कि जो वक्त का इंतजार करता है वह रेगिस्तान को भी गुलिस्तान बना देने का हुनर व हौसला हासिल कर लेता है । वक्त को इन दोनों ही रूपों में देखा – पढा , सुना – समझा और भोगा है मैं ने। संभवत: हरएक व्यक्ति के जीवन में वक्त अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, दर्ज ही नहीं कराता, बल्कि महसूस भी कराता है, यह अलग बात है कि उसका एहसास हमें उस तरह से हो न हो।

बहुत दिनों तक कर्नाटक और गुजरात में प्रवास के बाद 18 फरवरी को जब मैं सुबह 08 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर स्वर्णजयंती राजधानी एक्सप्रेस से उतरा तो मन में यह आश्वस्ति ले कर उतरा कि अब कुछ दिनों तक मैं दिल्ली में पडे रह कर आराम करूंगा और अपना लेखन कार्य जारी रखूंगा। शायद जलवायु का असर हो, दिन के दो बजे के बाद बदन दर्द और बुखार महसूस होने लगा, देखा तो 100 डिग्री से ऊपर था बुखार, पत्नी की भी स्थिति वैसी ही थी ।

रात के 08 बजे फोन आया, उधर से मेरी बडी बहन का पोता बोल रहा था, उसके आसपास रोने की आवाज आ रही थी, जीजा जी रक्सौल डंकन हॉस्पीटल में भर्ती थे, थोडी देर पहले चल बसे , सभी रिश्तेदारों के आने के बाद कल सुबह 11 बजे अंतिम संस्कार होगा। उस वक्त मैं बुखार से तप रहा था, बदन दर्द भी जोरों का था, पत्नी की भी तबीयत भी वैसी ही थी। अगले 12 घंटों में दिल्ली से 1000 किलोमीटर से भी अधिक दूर रामगढवा (मोतीहारी और रक्सौल के बीच में) पहुंच पाने के लिए कोई भी सवारी नहीं थी, तीनों छोटी बहनों और बहनोइयों तथा दोनों भाइयों से फोन पर सम्पर्क किया , मझला भाई घर पर था, वह अपने बेटे के साथ निकल रहा था, सबसे छोटा भाई, काठमाण्डू में था, उससे सम्पर्क नहीं हो पाया, बहनें और बहनोई भी जाने की तैयारी में थे , केवल मैं नहीं पहुंच पा रहा था, यदि दो – चार घंटे की देर भी अंतिम संस्कार में करा दी जाती , तब भी मेरे पहुंच पाने की कोई संभावना नहीं थी। एक सुपर फास्ट ट्रेन है जो 18 घंटे में पहुंच जाती है , वह दिन के तीन बजे ही जा चुकी थी, दूसरी ट्रेनें 24 से 36 घंटे लेती हैं, वे भी शाम के छह बजे जा चुकी थीं, हवाई यात्रा पटना तक ही है जहां से रामगढवा सडक मार्ग से 8 घंटे में पहुंचा जा सकता था, लेकिन हवाई साधन भी उपलब्ध नहीं था, अपनों से दूर रहना बेहद कचोटभरा एहसास था, वक्त ने वाकई बेवश कर दिया। भाई ने बताया कि जो अभी आ जाएंगे , वे तो कल अंतिम संस्कार के बाद चले जाएंगे और फिर श्राद्ध कर्म में आएंगे, किंतु जो कल आएंगे उन्हें पूरे 12 दिन यानी श्राद्धकर्म पूरा होने के बाद ही जाना होगा, और ऐसा उनके गोतिया के लोगों को ही करना चाहिए, और हम अपनी बहन के गोतिया यानी परिवार के सदस्य नहीं माने जाएंगे।

विडम्बना देखिए कि जिस बहन ने मुझे गोद में खिलाया, अब हम उसी के परिवार के सदस्य नहीं माने जाएंगे और न वह हमारे परिवार की सदस्य मानी जाएगी, यानी श्राद्धकर्म में जो विधियां होती हैं, वे सब उसके पटीदारों पर ही लागू होंगी।हमारी जरूरत 12वें दिन होगी।

हम जन्मजात सनातनी हिंदु हैं, परम्परा के अनुसार किसी की मृत्यु होने पर उसका दाहसंस्कार किया जाता है, उसके दूसरे दिन दूध क्रिया होती है और उसी दिन से छुतका लग जाता है, उस अवधि में उनके परिवार के लोगों का किसी के यहां आना – जाना या उनके यहां किसी का आना – जाना नहीं होता, सातवें दिन सतधन नहान होता है, उसी के बाद अपने खून के रिश्ते में के हित – कुटुम्ब श्राद्धकर्म में शामिल होने के लिए आना शुरू करते हैं, 10वें दिन दशकातर यानी सिर के बाल मुडाने की क्रिया होती है, 11वें दिन महापात्र दान होता है, यह गांव से बाहर जा कर करना होता है, 12वें दिन श्राद्धकर्म और ब्रह्मभोज होता है, मृतक के ज्येष्ठ पुत्र या जिसने क्रिया ली होती है,

उसके माथे पर सभी लोग पगडी बांधते हैं, वह क्रिया इस बात को रेखांकित करती है कि अब से वही उत्तराधिकारी हैं , अब वे ही परिवार के मुखिया हैं ,  उन्हीं के ऊपर परिवार का भार है, वह पगडी पारिवारिक सम्मान और उत्तरदायित्व का प्रतीक है,  और उनके माथे पगडी बांधने वाले उनके सभी लोग उनके सुख – दुख में उनके साथ हैं।  ऐसा माना जाता है कि 12वें दिन श्राद्धकर्म हो जाने के बाद दिवंगत आत्मा को चिर शांति मिल जाती है, 13वें दिन सार्वजनिक भोज होता है। उसके बाद ही उस परिवार से लोगों का पहले की तरह सामान्य आचार – व्यवहार शुरू हो पाता है।

हम सात भाई – बहन हैं, उन सब में यही बहन बडी है, इसका नाम लक्ष्मी है, उसके पहले मेरी मां के 5 बच्चे जन्मते ही कालकवलित हो गए थे, जब लक्ष्मी बहन पैदा हुई तो किसी ज्योतिषी की सलाह पर उसे जौ से तौला गया , इसीलिए उसे जोखनी भी कहने लगे लोग। उसके बाद मैं हूं और फिर एक भाई, उसके बाद दो बहनें , फिर एक भाई, और अंत में फिर एक और बहन । लक्ष्मी बहन मुझसे 4 – 5 साल बडी है, उसकी शादी 1960 में हुई थी, उसकी हल्की-सी याद मुझे है, गांव के बाहर बहुत बडा शामियाना लगा था, दर्जनों टेंट लगे थे और गांव में पहली बार किसी बारात में नर्तकियां आईं थी , नाच देखने के लिए कई गांव के लोग आए थे, उसके साल भर बाद उसका दोंगा हुआ था, वह तो पूरी तरह याद है। शादी के बाद दुल्हन यदि ससुराल नहीं जाती है और उसके ढाई या पांच या सात साल बाद ससुराल जाती है तो उसे गवना कहते थे, यह प्रथा उस समय ज्यादा प्रचलन में थी जब बाल विवाह होता था। शादी के बाद यदि विदा हो कर दुल्हन ससुराल जाती है, और फिर मायके आती है और फिर लडके वाले एक छोटी – सी बारात ले कर आते हैं और दुल्हन को विदा करा कर ले जाते हैं तो उसे दोंगा कहते हैं, यह प्रथा आज भी प्रचलन में है। अब नये जमाने में लडके ससुराल जाने में पहले की भांति अभिभावक के मुखापेक्षी नहीं होते, इसीलिए अब शादी के कल हो कर जब दुल्हन विदा होती है, तो उसे उसी समय गांव के बाहर किसी मंदिर में या शहर है तो जनवासे में ले जा कर उसका खोंईछा ( विदाई के सगुन स्वरूप आंचल में अच्छत- दूब – द्रव्य आदि रख कर)   बदलवा कर फिर मायके ले आया जाता है और तब दुल्हन की फिर से विदाई होती है, ऐसा कर देने से दुल्हा कल से ही कभी  भी अपनी ससुराल आ जा सकेगा, यदि यह नेग न निभाया जाए तो दुल्हन को ससुराल से मायके आने में या दुल्हा को अपनी ससुराल जाने में सुदिन, सुघडी, मुहूर्त्त आदि के अनुसार चलना पडता है, इसीलिए आजकल विदाई के दिन ही दुल्हन का खोंईछा बदलवा दिया जाता है यानी चूंकि उस दिन विदाई का मुहूर्त्त पहले से ही निर्धारित होता ही है, सो उसी दिन  विदाई – आगमन – पुनरागमन और पुन: विदाई की विधि पूरी कर ली जाती है ताकि दुल्हा – दुल्हन के ससुराल और मायका आने – जाने के लिए मुहूर्त न देखना पडे।तो मेरी बहन का दोंगा हुआ था, आजकल 99% मामलों में यही होता है।

मेरे बडे जीजा जी गंगासागर प्रसाद भाई में अकेले थे, उनके कोई बेटी नहीं है, चार बेटे हैं, सभी बालिग हैं और अपना कारोबार करते हैं।

मां – बाप के स्वर्गवास के बाद लक्ष्मी बहन से ही हम लोग किसी भी काम में सलाह लेते हैं, मैं गांव  – घर से बहुत दूर रहता हूं, फिर भी साल में एक – दो बार जा कर सबसे जरूर मिल आता हूं। अभी पिछले नवम्बर में सभी भाई – बहनों से मिल कर आया था, जीजा जी की तबीयत पहले से ठीक हो गई थी। इस बीच कई बार फोन पर बात भी हुई थी, स्वस्थ थे, बीच – बीच में रूटीन चेकअप डंकन अस्पताल में कराते रहते थे, डंकन अस्पताल अमेरीकन ट्रस्ट द्वारा परिचालित हमारे क्षेत्र का सबसे पुराना, विश्वसनीय और एकमात्र अस्पताल है। वैसी सुविधाओं वाला अस्पताल या तो पटना में है या फिर दिल्ली में, उसका प्रबंधन अभी भी अमेरीकन ट्रस्ट के हाथ में ही है और मुख्य डॉक्टर भी वहीं के होते हैं, वह अस्पताल बिलकुल भारत – नेपाल सीमा पर है , वहीं दोनों देशों की एम्बेसी भी हैं । जीजा जी उसी अस्पताल में भर्त्ती थे , उनके स्वर्गवास की खबर ने मुझे 1984 में पिता जी की हुई मृत्यु की खबर से भी ज्यादा झकझोरा क्योंकि

जीजाजी के रूप में मेरी पीढी का पहला स्तम्भ गिरा था। स्व. जीजा जी का 01 मार्च को श्राधकर्म है, उसी में भाग लेने के लिए मैं

आज जा रहा हूं। तबीयत अभी भी ठीक नहीं है, फिरभी जाना तो हर हाल में है- क्योंकि

 

“वक्त –ए– ग़म में आंसू बहाते हम नहीं, वो और हैं

हम तो शब –ए- ग़म में दीये जलाते हैं” ।

 

चरैवेति चरैवेति …

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम, 27 फरवरी 2016

9310249821

28,972 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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