डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

जो लोग यह सवाल उठाते हैं कि आज़ादी के सात दशक के बाद सरकारी कार्यालयों में हिंदी कहां पहुंची है, 

उन्हें खुद इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर वह चली कहां से थी ?

इंदिरापुरम , 04 मार्च 2016

भारत सरकार गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो द्वारा आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का आज समापन दिवस था, सीजीओ कम्पलेक्स के पर्यावरण भवन स्थित अनुवाद ब्युरो के सभाकक्ष में राजभाषा प्रबंधन विषय पर व्याख्यान देने के लिए ब्युरो ने मुझे मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया था, उसके लिए मैं निदेशक डॉ. एस एन सिंह का विशेष रूप से आभारी हूं, साथ ही, ब्युरो के संयुक्त निदेशक श्री संदलेश और प्रशिक्षक श्री सत्येन्द्र कुमार सिंह को भी धन्यवाद देना चाहूंगा।

वस्तुत: एक सप्ताह बाद मैं आज ही अपने गांव से लौटा हूं। सीटीबी (सेंट्रल ट्रांसलेशन ब्युरो) के इस कार्यक्रम में मेरा व्याख्यान पूर्वनिर्धारित था, देश के कोने – कोने से आये प्रशिक्षणार्थियों से मिल कर और राजभाषा प्रबंधन जैसे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विषय के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा कर बहुत अच्छा लगा , मन को सुकून भी मिला और आश्वस्ति भी हुई कि सीटीबी के विद्वान निदेशक डॉ. एस एन सिंह के कुशल मार्गनिर्देश में अनुवाद ब्युरो राजभाषा – कार्यान्वयन के लिए सशक्त मशीनरी और मैनपॉवर तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

इस बात में कोई शक नहीं कि राजभाषा हिंदी को केन्द्रीय कार्यालयों व उपक्रमों आदि में सही तरीके से लागू कराने में उस संस्थान के अनुवादकों और राजभाषा अधिकारियों की अहम भूमिका होती है और यही वह मशीनरी एवं मैनपॉवर है जो शासनिक – प्रशासनिक कार्यव्यवहारों को हिंदी में निष्पादित कराने के कार्यों को आसान बनाने के साथ – साथ हिंदी और हिंदीतरभाषी कर्मचारियों व अधिकारियों में हिंदी को लोकप्रिय तथा स्वीकार्य बनाने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसीलिए यह मशीनरी जितनी सशक्त एवं उपयोगी होगी, हिंदी का प्रयोग उतनाही बढेगा। और इस अहम जिम्मेदारी का निर्वहन भारत सरकार का केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो बखूबी कर रहा है, इसके लिए एक बार फिर ब्युरो के निदेशक डॉ. एस एन सिंह को बधाई और धन्यवाद भी। डॉ. सिंह निदेशक तो हैं ही, एक प्रभावशाली वक्ता और विद्वान लेखक भी हैं, अनुवाद और राजभाषा पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जो राजभाषाकर्मियों के लिए बेहद उपयोगी हैं।

भारत सरकार का राजभाषा विभाग भारत संघ की राजभाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधानों को केन्द्रीय कार्यालयों , उपक्रमों और बैंकों आदि में कार्यान्वित कराने की नीतिनियामक संस्था है। डॉ. हरेन्द्र कुमार निदेशक (कार्यान्वयन), डॉ. केवल कृष्ण वरिष्ठ तकनीक निदेशक, डॉ. एस एन सिंह निदेशक केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो तथा डॉ. जयप्रकाश कर्दम निदेशक केन्द्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान के कुशल मार्गदर्शन में राजभाषा विभाग के विभिन्न प्रकोष्ठ प्रभावी रूप में कार्य कर रहे हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत गठित संसदीय राजभाषा समिति राजभाषा

कार्यान्वयन की स्थिति का निरीक्षण करती है और वस्तुस्थिति की रिपोर्ट भारत के राष्ट्रपति को सौंपती है, तदनुसार राष्ट्रपति संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए आवश्यक आदेश – निर्देश जारी करते हैं। निस्सन्देह, भारत सरकार के राजभाषा विभाग और संसदीय राजभाषा समिति के स्तर पर की गई ठोस पहल ने हिंदी के कार्यान्वयन को सही दिशा दी है और हम अब कम्प्युटरीकरण व तकनीकी विकास के अवयवों को हिंदी के प्रयोग की राह में व्यावधान न मानकर समाधान के साधन के रूप में अपनाते हुए नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। मुझे यह मानने में कोई आपत्ति नहीं कि हिंदी का प्रयोग और भी आगे पहुंच जाना चाहिए था, किंतु साथ ही, इस बात पर गर्व करने में भी कोई संकोच नहीं कि हिंदी जहां तक पहुंची, वह भी कम उत्साहवर्द्धक नहीं है, क्योंकि जो लोग यह

सवाल उठाते हैं कि आज़ादी के सात दशक के बाद सरकारी कार्यालयों में हिंदी कहां पहुंची है,उन्हें खुद इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर वह चली कहां से थी ?

जब मैं पंजाब नैशनल बैंक प्रधान कार्यालय का राजभाषा प्रभारी मुख्य प्रबंधक और दिल्ली बैंक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति का सचिव था तो केवल पीएनबी में ही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं में भी राजभाषा हिंदी का कार्यान्वयन सुनिश्चित कराने में भारत सरकार राजभाषा विभाग के उन सभी प्रकोष्ठों का मुझे भरपूर सहयोग मिला था, और मेरी सेवानिवृत्ति के बाद भी उस कार्य से मुझे जोडे रखने में उन सब की अहम भूमिका रही है, इसके लिए मैं उन सभी निदेशकों , अन्य वरिष्ठ अधिकारियों तथा संदीय राजभाषा समिति सचिवालय का व्यक्तिगत रूप से आभारी हूं।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम, 04 मार्च 2016

9310249821

13,711 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

54 visitors online now
41 guests, 13 bots, 0 members