डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)

इंदिरापुरम, 08 मार्च 2016

महज संयोग ही है यह कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक दो दिन पहले यानी 06 मार्च को मेरी शादी की 37वीं वर्षगांठ थी। मैंने अपनी शादी की रात में  भावी पत्नी की सहेलियों के मनुहार पर उन्हीं दिनों लिखी अपनी एक कविता सुनाई थी, वस्तुत: मैंने वह कविता मेरी भावी पत्नी और विश्व की सभी महिलाओं के सम्मान में उन्हीं दिनों लिखी थी। वह कविता और पत्नी के साथ एक ताज़ा ली गई तस्बीर मैंने 06 मार्च को अपने फेसबुक shreelal prasad और फेसबुक कम्युनिटी पेज shreelal Prasad aman तथा ब्लॉग shreelal.in पर पोस्ट की थी। कुल मिला कर 936 से भी अधिक शुभचिंतकों ने उसे पसन्द किया और शुभकामनाएं देते हुए अपने उद्गार व्यक्त किए, मैं और मेरी पत्नी पुष्पा प्रसाद उन सबके प्रति आभार प्रकट करते हैं ।

मैं 1972 में एमएस कॉलेज मोतीहारी में बीए (हिंदी) ऑनर्स का अंतिम वर्ष का छात्र था, मेरी कहानियों का एक संकलन छप कर प्रकाशन के लिए तैयार था, किंतु प्रकाशक से कुछ बातों पर विवाद हो जाने के कारण वह प्रकाशित न हो सका। उन्हीं दिनों मैंने ‘नारी’ पर केन्द्रित   पांच खण्ड काव्य लिखे थे, उनका एक संकलन प्रकाशन के लिए तैयार था, श्री कृष्ण महिला महाविद्यालय मोतीहारी की तत्कालीन प्रधानाचार्या और हिंदी भाषा व साहित्य की विदुषी सुश्री एलमा सैमुएल ने उसकी भूमिका लिखी थी, आज भी वे सब कुछ मेरे पास ज्यों की त्यों सुरक्षित हैं और प्रकाशन के लिए मेरे फुर्शत के क्षणों की प्रतीक्षा में हैं। तब तक यूएनओ ने न तो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की घोषणा की थी और न महिला ‘सशक्तीकरण’ साहित्य या राजनीति में विमर्श का कोई घोषित विषय ही बन पाया था, मेरे युवा होते मन ने अपने संस्कारों के अनुरूप ‘नारी’ के प्रति स्वाभाविक सम्मान को व्यक्त करने के लिए वे खण्डकाव्य लिखे थे, आज ‘ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के उपलक्ष्य में उसी संकलन से एक छोटी-सी कविता , जिसको एलमा सैमुएल जी ने पुस्तक के कवर फ्लैप पर देने के लिए रेखांकित किया था, यहां दे रहा हूं:-

“ यहां नहीं, नहीं वहां

नारी है वहीं,  जहां

थके – हारे सूरज को

ममता की गोद में

नीरव निशा

देती विश्राम है;

 

फिर

प्रणय – पायल बजा

पवन  – आंचल डुला

उषा जगाती और

स्वर्ण से भरा हुआ

लाती विहान है ।

*******

एक कहानी संकलन कोलकाता से 1986 में प्रकाशिता हुआ था, वह भी ‘नारी केन्द्रित’ था; 1972 के अप्रकाशित कहानी – संकलन और खण्डकाव्य – संकलन के अलावा प्रकाशन की बाट जोहती सौ से अधिक कहानियां और फुटकर कविताएं, एक नाटक, जिसके दर्जनों मंचन  आपात्काल के दौरान ही हो चुके थे, तीन उपन्यास , ललित निबंधों के संकलन, एक आलोचना पुस्तक, अध्यात्म – दर्शन और ईश्वर की सत्ता पर मेरे चिंतन- परक विचार  तथा छिटफुट अन्य अनेक रचनाएं हैं, वे सभी आधी – अधूरी पडी हुई हैं, सोचा था कि जीवन की आपाधापी से समय निकाल कर उनका प्रकाशन करूंगा, इसी बीच मेरी आत्मकथा की डिमाण्ड मेरे सामने आ गई, मैं सबसे पहले उसे ही पूरा करना चाहता हूं, उसे मैं अपने फेसबुक, फेसबुक कम्युनिटी पेज और ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूं किंतु मेरे प्रकाशक ने कहा है कि महत्त्वपूर्ण बातें सोसल मीडिया में प्रकाशित करा कर मैं पुस्तक रूप में प्रकाश्य आत्मकथा के आकर्षण को कम कर दे रहा हूं, इसके बावजूद मैं कुछ और कडियां सोसल मीडिया पर देना चाहूंगा, मेरी आत्मकथा में भी ‘नारी’ विमर्श और कुछ ऐसे विषय स्वाभाविक रूप में होंगे जिनसे देश और समाज के कुछ अनछुए पहलु उजागर होंगे । तो आईए, उसके पुस्तक रूप में प्रकाशन की प्रतीक्षा करते हुए ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर विश्व की महिलाओं को अपनी शुभकामनाएं दें और स्वाभाविक सम्मान प्रदर्शित करते हुए अपने संस्कार का परिचय दें।

एक बार फिर, मेरी शादी की 37वीं वर्षगांठ पर शुभकामनाएं देने वालों के प्रति आभार तथा महिलाओं के सम्मान व सशक्तीकरण के लिए मंगल कामनाएं!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

मो. 9310249821

इंदिरापुरम, 08 मार्च 2016

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