डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(कुछ ऐसे वैसे तो कुछ जैसे तैसे और न जाने कैसे कैसे)

इंदिरापुरम, 12 मार्च 2016

कुछ ऐसे वैसे देशभक्त हैं तो कुछ जैसे तैसे ईमानदार हैं और न जाने कैसे – कैसे लाचार हैं? हैरान और परेशान हो जाता हूं मैं उन सब को देख – सुन कर और उनकी सोच के बारे में सोच – सोच कर सोच में पड जाता हूं कि यदि टेलीविजन चैनल न होते तो इन वयानवीरों के बरताव से अनजान ही रह जाते और सोशल मीडिया न होता तो उन करतबबाजों की कारगुजारियों  का लुत्फ उठाने के सौभाग्य से वंचित ही रह जाते हम सब और उनकी उलजलुल हरकतों पर कहकहे लगाने वालों के हाथों से कई हसीन मौके फिसल जाते। तुर्रा यह भी है कि यह सब कुछ देशभक्ति और ईमानदारी तथा ‘क्या करें ऊपर का दबाव था’ जैसी रीढविहीन सोच के नाम पर हो रहा है।

मैं यह किसी विशेष व्यक्ति या तबका या समाज या संस्था या राजनीतिक दल को लक्ष्य कर नहीं कह रहा, बल्कि केवल उन लोगों को लक्ष्य कर कह रहा हूं जो आचार में भ्रष्ट हैं, व्यवहार में दुष्ट हैं, व्यापार में बेईमान हैं, चरित्र में नैतिकता से हीन और व्यक्तित्व में रीढविहीन हैं। इसके दायरे में वे लोग भी आएंगे जिनके वचन में दुर्भावनापूर्ण आक्रमकता है, कर्म में कामचोरी है और सोच में नकारात्मकता है तथा जो लोग अपनी असफलता, कमजोरी एवं गलती को स्वीकार कर उससे कोई सीख लेने के बदले उसे दूसरों के मत्थे मढने में ही निपुण हैं तथा अपनी  जिम्मेदारियों के बोझ को दूसरों के कंधों पर फेंक देने को ही चतुराई समझते हैं। वे लोग भी उसी दायरे में आएंगे जो मानवीय संवेदना पर लम्बी बहस में लम्बे – लम्बे और लच्छेदार वाक्य बोलते हैं किन्तु रास्ते पर मदद के लिए  छटपटा रहे असहाय को बेसहारा छोडकर कन्नी काट कर निकल जाते हैं, राष्ट्रवाद पर तकरीर करते हैं किंतु सार्वजनिक एवं संस्थागत हितों को दरकिनार कर निजी हितों को साधने के लिए अपनी सारी सत्ता व सामर्थ्य लगा देते हैं, दफ्तरों में फांकी मारते हैं और उन सरकारी सुविधाओं का भी उपभोग धडले से करते हैं जिनके लिए उन्हें न तो कानूनी अधिकार है, न ही नैतिक शक्ति।

जापानियों की अप्रतिम राष्ट्रभक्ति का किस्सा स्वामी विवेकानन्द के एक प्रसंग में भी कहीं पढा था, विश्वयुद्ध के दौरान जापान की जासूस माताहारी के बारे में भी कुछ – कुछ सुना है, विश्वपटल पर शीत युद्ध के दौरान सीआईए, केजीबी, एमआई – 5, मोसाद जैसी जासूसी संस्थाओं और उनके हैरतअंगेज कारनामों के बारे में भी थोडा – बहुत सुना है, लेकिन जो मैं अच्छी तरह जानता – समझता हूं और जिस बात को बडे गर्व के साथ और जोर – शोर से कहना चाहता हूं वह, यह है कि आज़ाद भारत के इन सात दशकों में हमारा लोकतांत्रिक गणराज्य, लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भ , संवैधानिक निकाय , सरकारी एजेंसियां, आईबी, सीबीआई, रॉ, एनएसजी , पुलिस, आईएएस, आईपीएस जैसी जांच एजेंसियां, सुरक्षा एजेंसियां, नौकरशाह और सबसे ऊपर सेना के तीनों अंगों के जवान और  किसान, मजदूर,  वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, समाजसेवी, राजनीतिज्ञ , शिक्षक, छात्र, व्यापारी, खिलाडी तथा जीवन के अन्य क्षेत्रों के लोग भी जो कुछ कर गए हैं, उनके चलते अगले कई सौ साल तक हम गर्व से सिर ऊंचा रख सकते हैं किंतु उन्हीं लोगों में से कुछ ऐसे भी हुए हैं जिनके चलते हमारा सिर शर्म से झुक भी जाता है।

जब भी कोई महत्त्वपूर्ण घटना हो जाती है या कुछ गंभीर खुलासे होते हैं, तो अतीत में कुछ अहम पदों या हैसियतों में रहने वाले लोग कुछ इस तरह के बायन जारी करते हैं और टेलीविजन चैनलों पर कुछ इस तरह बहस करते हैं कि मानो दुनिया के सबसे बडे ईमानदार व कर्तव्यपरायण तथा भारत के सबसे बडे देशभक्त वे ही हों और उनके ऊपर या उनके नीचे वाले अधिकारी सबसे भ्रष्ट एवं देशद्रोही व्यक्ति रहे हों। वे बिना किसी शर्म और संकोच के यह कह देते हैं कि अमुक मामले में वे सच्चाई सामने लाना चाहते थे किंतु ‘ऊपर’ के दबाव के चलते वे वैसा नहीं कर पाए। तो इसका मायने यह लगाया जाए कि दबाव में ही सही, देशद्रोह और भ्रष्टाचार में वे खुद भी लिप्त रहे थे ? यदि उन्होंने फाईलों पर सही और सच्ची सोच को अंकित कर दिया हो तब तो उन्हें इन आरोपों से बरी किया जा सकता है लेकिन यदि उन्होंने न तो गलत बातों का प्रभावी रूप में कभी विरोध किया और न ही फाईलों पर उसका कोई सबूत छोडा, बल्कि मूकदर्शक बन कर सब कुछ नियम –  विरुद्ध होते देखते रहे और मलाई उडाते रहे किंतु आज बहादुरी के साथ अपनी उस नाकामी , काहिली और रीढविहीन व्यक्तित्व का बखान कर रहे हैं तो एक सीधा – सा सवाल उनसे किया ही जा सकता है कि आखिर वे अपने बारे में किस तरह की सोच विकसित कराना चाह रहे हैं? यदि वे यह कहते हैं कि उस वक्त रोजीरोटी उनकी प्राथमिकता थी और यदि खुल कर विरोध करते तो उनकी नौकरी जाने का खतरा था, तो वे किस मुंह से भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, सुभाषचन्द्र बोस, कारगिल और पठानकोट के शहीदों पर चर्चा में भाग लेते हैं और खुद को उन्हीं की परम्परा में देखे जाने का आग्रह भी करते हैं , साथ ही, ऐसा अभिनय भी करते हैं कि यदि उन्हें मौका मिला होता तो वे भी उन शहीदों के रास्ते ही गए होते।

 

वैसे लोगों की वैसी कारगुजारियों का सीधा – सा मतलब है कि वे राष्ट्रभक्त होने का ढोंग कर रहे हैं। क्या ये लोग मानते हैं कि उन शहीदों के सामने परिवार के पालन की जिम्मेदारी नहीं थी, क्या ये समझते हैं कि वे शहीद अपने परिवार के लिए चिंतित नहीं थे, इन्हें नहीं लगता कि उन शहीदों के लिए देश ही परिवार था और वे पूरे राष्ट्र – परिवार के लिए कुर्बान हुए ? जो लोग अपनी नौकरी के दौरान महज मनोनुकूल ट्रांस्फर – पोस्टिंग और पदोन्नति के लिए सारे नियम कानून को ताक पर रख कर पैरवी व पांव-पूजन  – प्रक्रिया अपनाने तथा केंचुए जैसा लिजलिजा व्यक्तित्व होने को ही अपनी नियति बना चुके हों , वे भी फेसबुक पर, ह्वाट्सएप पर देशभक्ति की कहानियां कट – पेस्ट करते हैं, लेखन में कोई रचनात्मकता तो है नहीं , इसीलिए निरर्थक पोस्ट करते रहते हैं। यही नहीं, बल्कि जो विषय संविधान – सम्मत है और जिसको लेकर विवाद होने पर देश के सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट निर्णय दे दिया है, उन विषयों के खिलाफ भी उधार में ली गई कोई पोस्ट  बिना जाने – समझे फॉर्वार्ड करने से भी बाज नहीं आते, वैसे लोग किसी पोस्ट को फॉर्वार्ड करने के पहले उसकी विश्वसनीयता को, किसी अन्य माध्यम से तो छोडिए,  खुद के स्तर पर भी जांचने – परखने की जहमत नहीं उठाते और अपनी स्थिति को हास्यस्पद बना लेते हैं। जो लोग एक छोटी-सी बात में थोडी-सी तकलीफ उठा कर खुद के ईमानदार और खुद्दार होने का प्रमाण नहीं दे सकते , जो छोटे – छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने ज़मीर को गिरवी रख चुके हों, वे लोग भी यदि देश भक्ति, ईमानदारी, खुद्दारी और शाहदत पर उपदेश दें, तो उसे बेशर्मी की हद न कहा जाए तो और क्या कहा जाए? वैसे लोगों के बारे में, आने वाली पीढियों को तो छोडिए, वर्तमान पीढी ही  क्या सोचती है, इसका आकलन वे स्वयं अकेले में अपने गिरेबां में झांकते हुए कर लें तो बेहतर हो, मैं तो कहूंगा कि वैसे लोग अपने शब्दों के आईने में ही खुद को पहचानने की जहमत उठा लें।

जो लोग कुछ सकारात्मक सोच नहीं सकते और कुछ रचनात्मक लिख नहीं सकते, वे हल्के – फुल्के मनोरंजन की कुछ बातें कहीं से ले कर पोस्ट करते रहते हैं , यह बात तो समझ में आती है, किंतु जो वैसा भी नहीं कर सकते,  वे खामखाह अपने अन्दर की दुष्ट सोच को बाहर ला कर दुर्भावना फैलाने का कार्य क्यों कर रहे हैं? जो भी हो, मैं तो व्यक्तिगत तौर पर सोशल मीडिया का एहसानमंद हूं कि उसने चुप रह कर गंभीरता का लबादा ओढने वालों के भी मुंह में अंगुली डाल कर कुछ बोलने पर विवश कर दिया, फिर होना क्या था ? मूक मुखर हो गए, चुप्पी – साधना में लीन साधकों के मुंह से भी दो बोल फुटे और जब दो बोल फुटे तो लोगों के लिए कौवे और कोयल में अंतर करना आसान हो गया।

कई बडे अधिकारियों ने कई मौकों पर खुलासा करने का ढोंग करते हुए कहा है कि तब की अमुक बडी हस्ती ने उनसे अमुक अनपेक्षित कार्य दबाव डाल कर करा लिया।  मेरी समझ में आज वे अपने पुराने आका के खिलाफ कोई खुलासा करने के बहाने नये आका की तलाश कर रहे हैं, पुराने आका की पोल खोलने के बहाने नये आका के लिए ढोल पीट रहे हैं। वस्तुत: लालच के चलते ही भय होता है और लालच तथा भय , जब दोनों ही किसी व्यक्ति के ऊपर हावी हो जाए तो उससे कोई भी कुछ भी करा सकता है, और यदि इन दोनों अवगुणों से वह मुक्त है तो उससे कोई भी कुछ भी वैसा नहीं करा सकता जो किया नहीं जाना चाहिए या जिसे वह करना न चाहे।

कुछ लोगों के लिए चार दशक पहले देश में लगे आपातकाल की आलोचना करने के उद्देश्य से समन्दर का पानी भी स्याही के रूप में कम पड जाए, और ये , वे लोग होते हैं जो अपनी छोटी-सी रियासत में अपने मातहतों पर किसी से बात करने पर भी पाबंदी लगाते हैं, सोशल मीडिया में किसका लिखा कोई पढे, किसका लिखा न पढे,  वे तय करते हैं,  क्या पसन्द करे क्या न करे और किसके लेख पर कमेंट करे, किसके लेख पर न करे, कमेंट करे तो कैसा करे, क्या करे , वे तय करते हैं, यानी सेवाशर्त्तों की धौंस व्यक्तिगत जीवन की गतिविधियों पर भी चलाते हैं, और वैसे लोग देश और राजनीति की स्वच्छता व सहिष्णुता के मानदण्ड तय करते हैं ! लोकतंत्र और समष्टि- हित की बात करते हैं ! सहिष्णुता पर प्रवचन करते हैं ! देशभक्ति और देशद्रोह का सर्टीफिकेट बांटते हैं ! क्या मजाक है ! कमाल है, भई वाह , कमाल ही है !

मेरे विचार में जिन लोगों ने अपने सेवाकाल में किसी गलत बात या काम का विरोध नहीं किया और देशहित के खिलाफ काम होने में सहयोग किया या मौन रह कर गलत काम हो जाने दिया और आज उसका खुलासा कर रहे हैं तो वैसे लोगों पर आज सेवाशर्त्तों के उल्लंघन और कर्तव्य की अवहेलना तथा देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चहिए। ऐसे खुलासों का हीरो तो केवल उन्हें बनाया जाना चाहिए जिन्होंने सेवा में रहते हुए, सेवाशर्त्तों का पालन करते हुए, गलत को गलत कहने का साहस किया और कोई भी गलत बात या गलत काम न किया , न अपने माध्यम से होने दिया।

जिस  व्यक्ति में सच को सच कहने का साहस और गलत को गलत कहने की हिम्मत हो , उसे हास्यस्पद समझने का साहस और कायर कहने की हिम्मत किसी में भी नहीं होगी , इसीलिए दुष्यंत कुमार के शब्द याद रखे जाएं :-

“ कैसी मशाल ले के चले तिरगी में आप ?  जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही ;

कुछ  दोस्तों से वैसे मरासिम   नहीं रहे,  कुछ दुश्मनों से  वैसी अदावत नहीं रही ;

हमने  तमाम   उम्र अकेले  सफर किया,  हम पे किसी खुदा की ईनायत नहीं रही ;

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग, रो–रो के बात कहने की आदत नहीं रही”।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम, 12 मार्च 2016

9310249821

9,423 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 26/07/2017 at 9:55 am
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  • 26/07/2017 at 8:22 am
    Permalink

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