डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथ

(वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे )

इंदिरापुरम, 17 मार्च 2016

महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में गाई जाने वाली प्रार्थनाओं में सबसे अहम प्रार्थना थी –

“वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे ” , यह प्रार्थना उनके जीवन, व्यक्तित्व और नैतिक चरित्र का हिस्सा थी। यह प्रार्थना उनके वचनों में ही नहीं, उनके नित्य के कर्मों में भी समाहित थी। गांधी जी मेरे स्वाभाविक आदर्श हैं ।  मैं उनकी इस प्रार्थना को ही अपनी भी प्रार्थना के रूप में अपनाते हुए सोचता हूं कि यदि उसका शतांश भी स्वयं में उतार पाया तो मैं अपनेआप को सफल व सौभाग्यशाली मनुष्य समझूंगा। इस विषय को आगे बढाने के पहले मैं मेरे ब्लॉग के सुधी पाठकों की कुछ चर्चा करना और उनके प्रति आभार प्रकट करना आवश्यक समझता हूं।

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मैं अपनी आत्मकथा और अपने विचार सोशल मीडिया के तीन फॉर्मेट में – फेसबुक shreelal prasad, फेसबुक कम्युनिटी पेज shreelal prasad  ‘Aman’  और  ब्लॉग  http://www.shreelal.in (अर्थात shreelal.in ) पर  शेयर करता हूं।  फेसबुक और फेसबुक कम्युनिटी पेज पर विशेष कर भारत के ही पाठक विजिट करते हैं और उनके द्वारा उसे देखे जाने को जाहिर किया जाना या न किया जाना उन्हीं की इच्छा पर निर्भर है, जबकि ब्लॉग पर मुख्य रूप से भारत से बाहर विदेशों में रह रहे प्रवासी हिंदीभाषी विजिट करते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि एशिया, युरोप और अमेरीका आदि महादेशों के 40 से भी अधिक देशों में मेरे पाठक हैं, उनमें युएसए, युके, फ्रांस, चीन, जर्मनी, जापान,रूस, युक्रेन, बुलगारिया, हंगरी, आस्ट्रीया, स्वीडेन , आस्ट्रेलिया आदि प्रमुख हैं । मेरे ब्लॉग पर किसी – किसी दिन सैकडों तो किसी – किसी दिन हजारों हिट्स होते हैं। 12 मार्च को मैं ने राष्ट्रवाद, देशभक्ति और मानवीय संवेदना पर मात्र दो पृष्ठों में अपने विचार व्यक्त किए थे , 15 मार्च को एक दिन में मेरे ब्लॉग पर 3340 हिट्स हुए हैं और ये सभी विदेशों से हैं, भारत में मोबाईल से लॉग-इन करने वालों के विवरण अलग से हैं। मैं उन सबके प्रति हृदय से आभार प्रकट करता हूं। मैं गूगल और इंटरनेट दुनिया के अन्य तकनीकी संसाधनों का भी आभारी हूं, क्योंकि उनके माध्यम से मैं घर बैठे ही देख पाता हूं कि दुनिया के किस देश के किस शहर में कोई कहां बैठ कर मुझे पढ रहा है। जियो लोकेशन की नई तकनीक ने यह सब सम्भव बना दिया है। चूंकि मेरे ब्लॉग पर हिंदी से अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी स्वत: अनुवाद की भी सुविधा उपलब्ध है, इसीलिए प्रवासी हिंदीभाषियों के अलावा अन्य भाषाभाषी भी मेरा ब्लॉग पढ पा रहे हैं, मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से डेढ साल की इस छोटी – सी अवधि में 28000 से भी अधिक विदेशी पाठकों तक पहुंच सका हूं, जापान से मेरे ब्लॉग का उपयोग बिजनेस प्रमोट करने के लिए भी करने हेतु कुछ अनुरोध प्राप्त हुए हैं , किंतु उस मामले में मैं ने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि हिंदी में लिखे ब्लॉग को भी पढने की ललक विदेशों में है और इस माध्यम से व्यक्त विचारों व प्रकाशित सूचनाओं को विश्वव्यापी कवरेज मिल रहा है । इस नेटवर्क , विशेष कर अपने ब्लॉग , की चर्चा मैंने इसलिए भी यहां की है कि फेसबुक पर मेरे सम्पर्क में आने वाले मेरे शुभचिंतक इससे वाकिफ हो सकें और जो सूचना मैं नीचे देने जा रहा हूं, वह अधिक से अधिक  लोगों तक पहुंच सके।

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मैंने बात शुरू की थी महात्मा गांधी की प्रार्थना “ वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे ” से , तो आइए, अब उस तरफ चलें।

12 मार्च यानी शनिवार को दो पहर के बाद मैं ने राष्ट्रवाद , देशभक्ति और मानवीय संवेदना पर अपने विचार पोस्ट किए थे, 13 मार्च की  शाम को सिंगापुर से मेरे बहुत ही निकट संबंधी रवि शंकर आर्या का फोन आया। रवि शंकर आर्या मेरे बेटे के बडे साले हैं। उन्होंने जेएनयु से एमए किया है तथा एचपी ( हैवलेट पैकर्ड) में व्हाईस प्रेसिडेंट है एवं सिंगापुर में रहते हैं। रवि जी कॉरपोरेट संस्कृति में घुलमिल गए हैं । ऐसे व्यक्तियों के बारे में यह मान लिया जाता है कि वह जमीनी सोच और सामान्य मानवीय संवेदना से दूर हो जाता है। मैं वाल्तेयर के उस सिद्धांत का बहुत आदर करता हूं जिसमें वे कहते हैं – “संभव है कि मैं आपके विचारों से सहमत न होऊं, फिर भी, आपके विचार व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा के लिए मैं हर संभव प्रयास करूंगा” । वाल्तेयर का यह सिद्धांत लोकतंत्र का मूलमंत्र तो है ही, मानवीय संवेदना की आधार भूमि भी है। हम दोनों यानी रवि जी और मैं, संभव है कि राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक नीतियों पर कई बातों में एक – दूसरे से असहमत हों , फिर भी,  एक – दूसरे के विचारों को पढते – सुनते हैं और उनका आदर भी करते हैं और यदि सहमति का कोई बिन्दु आता है तो एक – दूसरे से सहमत होने में भी देर नहीं करते, उसी तरह जिस तरह असहमति के बिन्दुओं पर असहमत होने में भी देर नहीं करते । विचारों का ऐसा आदान – प्रदान पूर्वग्रह रहित होना चाहिए और मेरी समझ में यही सहिष्णुता भी है।

तो, रवि जी ने रविवार शाम यानी 13 मार्च को फोन किया – “ पापा जी, एक एनजीओ ने फेसबुक पर एक फोटो शेयर करते हुए सूचना दी है कि एक लडका दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पीटल की आईसीयु में भर्ती है, शायद धन के अभाव में उसका सही तरीके से समय पर इलाज नहीं हो पा रहा है, उस दुखी परिवार ने आर्थिक मदद की गुहार भी आम लोगों से की है, उसका नाम और मोबाईल नम्बर एसएमएस कर रहा हूं , आप उसके बारे में पता करें और यदि वास्तव में वह गंभीर रूप से बीमार है तथा उसे पैसे की शख्त जरूरत है तो आप अपना बैंक खाता बताएं, मैं उसमें रूपये ट्रांसफर कर देता हूं, आप निकाल कर उसे दे दें ” । रवि जी ने यह भी बताया कि दिए गए नम्बर पर उन्होंने फोन किया था तो उधर से किसी महिला की आवाज आई थी, वह उस लडके की मां थीं, उनकी प्रतिक्रिया से ऐसा महसूस हुआ था कि वे ऐसे फोन कौल को संदेह की नजर से देख रही थीं, शायद फोन करने वाले केवल सूचना ले कर चुपचाप बैठ जा रहे हों ?

पता नहीं, मेरे पाठक इस बात को किस तरह से लेंगे, किंतु मेरी तो आंखों में आंसू आ गए, देश से हजारों मील दूर बैठा कोई आदमी फेसबुक के माध्यम से मिली सूचनाओं पर इस कदर संवेदनशील है कि बिना किसी जान – पहचान के वह मदद को पूरी तरह तत्पर है और यहां घरों में बैठे लोग जेएनयु की घटना तथा पठानकोट के शहीदों और कार्गिल के वीरों की शहादत को केवल गप्पशप का विषय बनाकर फेसबुक पर जोक – जोक खेल रहे हैं। इसलिए मैं और किसी से यह जानना नहीं चाहता कि उसे इस संदेश में गांधी जी की प्रार्थना –

“वैष्णव जन तेणे ते कहिए, जे पीर पराई जाणे रे” का सार नजर आ रहा है या नहीं, मुझे तो वह पूरी प्रार्थना यहां सदेह खडी दिखाई पड रही है। मैंने कहा – “ बेटा, बैंक खाता को छोडिए , आप क्या और कितना उस मरीज के लिए करना चाहते हैं , मुझे वह बताइए, वह कार्य मैं खुद कर दूंगा, जब कभी आप भारत वापस आएंगे, तब इस विषय पर बाकी बातें की जाएंगी ” ।

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रवि जी ने जो राशि बताई, वह बहुत बडी नहीं थी तो बहुत छोटी भी नहीं थी। मैं ने उन्हें बताया कि अब तो रात हो गई है, कल सुबह जा कर पूरा पता भी कर लूंगा और रूपये भी दे दूंगा। मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि पिछले एक महीने में दो बार मैं खुद को एम्स में दिखा चुका हूं , डॉक्टर ने मेरे रक्त की दस तरह की जांच के लिए सलाह दी थी किंतु उसी बीच मेरे बडे बहनोई का देहांत हो गया और मैं अपने गांव चला गया , हालांकि शुभचिंतकों ने मुझे सलाह दी थी कि वैसी हालत में मुझे अपना इलाज सुचारू रूप से कराना चाहिए, किंतु मेरी तो वह बहन अपने जीवन के सबसे बडे दुख की घडी में थी जिसने मुझे गोद में खिलाया था, इसीलिए मैं अपने आप को रोक नहीं पाया, हालांकि एक सप्ताह बाद लौटा तो मेरी तबीयत और भी बिगड गई थी और इस बार डॉक्टर ने झिडकते हुए सारी जांच जल्द कराने की हिदायत दी थी और उसी के लिए 14 मार्च यानी सोमवार का दिन निर्धारित था, मेरी पत्नी के भी पूरे बदन में सूजन आ गया था, उनका थायरायड बढ गया था, उनकी भी जांच करानी थी।

14 मार्च को सुबह गंगाराम हॉस्पीटल जाने के लिए मैं तैयार हुआ, मैं खुद को असहज स्थिति में पा रहा था, मेरी अपनी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, पत्नी को देख कर मन कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गया। ऐसे में , शायद मन को संतोष देने के लिए ही या यों समझ लीजिए कि खुद को जस्टीफाई करने के लिए, हवाई जहज में एयर होस्टेस द्वारा की जाने वाली घोषणाओं “ दूसरों की सहायता करने के पहले खुद की रक्षा कीजिए ” का सहारा ले लिया और वह दिन पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमानुसार अपने तथा पत्नी के इलाज में लगाने का निर्णय किया। स्वाभाविक था, रवि जी ने शाम को पूछा कि मैं गंगाराम हॉस्पीटल गया था या नहीं, तो मैंने उन्हें वस्तुस्थिति बता दी और कल निश्चित रूप से जाने का उन्हें आश्वासन दिया।

एयर होस्टेस की उस घोषणा के अलावा मुझे अंग्रेजी की एक कहावत भी याद आ रही है – “चैरिटी बिगिंस ऐट होम” यानी अपने गांव – घर  में अथवा अपने आसपास भी ऐसे लोग हैं जिन्हें हमारी मदद की जरूरत है और हम उन्हें मदद करने की स्थिति में हैं, इसलिए ऐसी मदद की शुरुआत वहां से होनी चाहिए। मैं जिस क्षेत्र से आया हूं, वहां बहुत तरह के अभाव अभी भी हैं, आर्थिक स्थिति के कारण पढाई  में पिछड रहे बच्चों को किताब , कोपी, अन्य सामग्री से सहयोग करने का कार्य मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही  करता रहा हूं, नौकरी में आने पर भी कई लोगों को कई तरह से आर्थिक मदद करता रहा हूं और उसके लिए एक ही शर्त्त रखता रहा हूं कि वे किसी से उसकी चर्चा तक नहीं करेंगे। आज भी उनकी पहचान मैं उजागर नहीं करूंगा , फिर भी उन्हें पहचानने के लिए इतना ही काफी होगा कि जब मैं अपने गांव और आसपास के गांव में जितने लोगों से मिलूं, उनमें कुछ लोगों की असामान्य रूप से किंतु स्वाभाविकता के साथ मेरे प्रति विनम्रता देख कर उनकी कृतज्ञता के भाव से अन्दाजा लगाया जा सकता है। यह सही है कि अपनी समस्याएं भी कम नहीं और दुनिया में तो समस्याग्रस्त लोग असंख्य हैं, कितने लोगों की सहायता हम कर सकते हैं? फिर सोचता हूं कि यदि सब लोग यही सोच कर चुप बैठ जाएं तो फिर जरूरतमंदों की मदद कौन करेगा, शुरुआत तो करनी ही होगी, चाहे जहां से करें! इसीलिए रवि जी की पहल से मैं बहुत खुश हुआ था और मेरी सकारात्मक सोच को आगे बढाने तथा समाज में सौहार्दपूर्ण सकारात्मक बदलाव आने की मेरी आशा को बल मिला था।

15 मार्च की सुबह सर गंगाराम हॉस्पीटल जाने के लिए मैं सोच ही रहा था कि गांव से मेरे छोटे भाई नवल किशोर का फोन आया , उसने जो दुखद समाचार सुनाया , उसे सुन कर मैं बच्चे की तरह फुटफुट कर रो पडा। भाई ने बताया कि हमारे जिस बहनोई का देहावसान कुछ दिनों पहले हुआ था, जिसे बीते अभी एक महीना भी नहीं हुआ है, उनका 22 – 23 साल का पोता राजू रामगढवा – रक्सौल रेलवे लाईन पर अभी – अभी मृत पाया गया है, राजू के पिता हरिनारायण यानी मेरा भांजा मेरी गोद में खेल कर बडा हुआ है, उसका बेटा उभरती जवानी में चल बसा है, नवल किशोर वहीं जा रहा था, मेरी सभी बहनें और अन्य सगे – संबंधी वहीं पहुंच रहे थे , किंतु मैं नहीं पहुंच पा रह था। गांव – घर से दूर बसे होने की कसक एक बार फिर मुझे असह्य पीडा पहुंचा रही थी , मेरी यही स्थिति जीजा जी के स्वर्गवास के समय भी थी । मैं लाख चाह कर भी 25 – 30 घंटे के पहले वहां नहीं पहुंच पाता । उस वक्त मेरे सामने दो परिस्थितियां थीं, एक तो यह कि देर – सबेर केवल मातमपुर्सी के लिए मैं रामगढवा के लिए चल पडूं या तिल – तिल कर मौत के निकट जा रहे एक अन्य जवान को बचाने के कार्यों में सहयोग करने के लिए जाऊं? मैंने दूसरे कार्य को वरीयता दी।

मैंने बैंक जा कर रूपये निकाले और सर गंगाराम हॉस्पीटल पहुंच गया। उस अस्पताल के मुख्य भवन के प्रथम तल पर 1180 सी खंड में बेड संख्या 3 पर वह युवा मरीज था, बाहर उसकी बडी बहन और मां थीं, पिता अब्दुल्ला साहब रक्त का प्रबंध करने गए थे, चाचा मरीज के पास थे, आईसीयु में भी शीशे के एक विशेष कक्ष में उस मरीज को रखा गया था, मैंने बाहर से ही उसे देखा । उसकी मां को मैंने रूपये दिए और इलाज के लिए दूसरी तात्कालिक जरूरतों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उसके पिता पिछले साल दुर्घटनाग्रस्त हो कर एक हाथ गंवा चुके हैं, आमदनी का कोई स्रोत नहीं है, बेटा दो साल की उम्र से ही अर्थराईटिस से ग्रस्त है, अब वह 15 साल का हो गया है, उसका इलाज मुख्य रूप से चंदे से मिली राशि से ही चल रहा है। उन्होंने बताया कि 5 युनिट प्लेटलेट्स चढे हैं, अब ओ पॉजीटिव रक्त चढेगा, कई लोग रक्तदान के लिए आए थे, वे जरूरत पडने पर उपलब्ध हो जाएंगे , फिलहाल इलाज ठीक चल रहा है। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मेरे सिंगापुर वाले संबंधी उनकी हर तरह की मदद के लिए तत्पर हैं, उन्होंने ही ये रूपये भेजे हैं, आप जरूरत के मुताबिक बताइएगा। मैंने वहीं से प्रयास किया कि रवि जी से उन लोगों की भी बातें करा दूं किंतु सम्पर्क नहीं हो पाया । कुछ देर बाद रवि जी से सम्पर्क हो सका , तब तक मैं हॉस्पीटल छोड चुका था, रवि जी ने कहा- “ पापा जी, शायद कोई इंजेक्शन है जिसकी कीमत 30000/- रूपये है और वैसे 12 इंजेक्शन उसे लगने हैं, यानी कि केवल उस 12 इंजेक्शन पर ही 3, 60,000/- का खर्च है, कहीं ऐसा तो नहीं कि पैसे के अभाव में वे लोग उस इंजेक्शन को खरीद नहीं पा रहे हों और उसके कारण समुचित इलाज में कोई रुकावट आ रही हो” ? मैंने रवि जी से कहा कि उसकी मां ने बताया है कि फिलहाल इलाज सुचारू रूप से चल रहा है।

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कुछ ही देर पहले मेरे भतीजे संतराज ( मेरे छोटे भाई नवल किशोर के बेटे ) ने फोन कर बताया है कि चूंकि राजू एक अविवाहित नौजवान था और उसकी असमय मौत से परिवार को बहुत बडा सदमा लगा है, इसीलिए बडे बुजूर्गों की सलाह पर उसका श्राद्धकर्म सनातनी हिन्दु रीतिरिवाज से न करा कर आर्यसमाज की रीति से आजही हो रहा है । मेरे भांजे हरिनारायण ने एक माह पहले 18 फरवरी को अपना पिता खोया था और आज उसके जवान बेटे का श्राद्धकर्म हो रहा है। कैसा दुर्योग है यह! मैंने सोचा था कि परम्परा के अनुसार 12 दिनों पर श्राद्ध कर्म होने पर मुझे वहां पहुंच कर श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय मिल जाएगा किंतु अचानक लिए गए सामाजिक निर्णय के कारण मैं उसके श्राद्ध में भी नहीं पहुंच सका। भांजे के बेटे की असामयिक मौत की खबर से मैं अन्दर से बिखरा हुआ – सा महसूस कर रहा हूं, लगता है कि मैं कुछ ज्यादा ही उम्रदराज हो गया हूं और अब मन के साथ – साथ शरीर पर भी उसका असर महसूस हो रहा है, मुंह से खाने का स्वाद चला गया है और पानी भी बेस्वाद लगने लगा है ।

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अभी मैं यह लिख ही रहा हूं कि सर गंगाराम अस्पताल से सूचना मिली है कि उस मरीज को फिर से प्लेटलेट्स चढाए जाने हैं, उस मरीज लडके की बहन ने बताया है कि अस्पताल वाले प्लेटलेट्स चढाने के सिर्फ दो घंटे पहले बताते हैं, ऐसी हालत में जिन्होंने रक्तदान के लिए सहमति दी होती है, उनसे भी सम्पर्क हो पाना तथा दिल्ली जैसी जगह में उनका सही समय पर पहुंचना सुनिश्चित करा पाना असंभव हो जाता है। मैं स्वयं टूटा हुआ और अस्वस्थ महसूस कर रहा हूं, दौडधूप कर नहीं पा रहा हूं, देखता हूं कि ऐसी हालत में उसे क्या सहायता पहुंचाई जा सकती है? ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरू, प्रभु ईशु उसकी मदद करें!

यदि कोई सज्जन उसे सहायता कर सकें तो वह मानवता की सेवा होगी। उनकी पूरी पहचान तो मुझे भी मालूम नहीं , न ही मैंने  अपनी पहचान उन्हें बताई है, सिर्फ मोबाईल नम्बर से ही काम हो रहा है। मरीज का विवरण और सम्पर्क निमनानुसार है: –

जरूरत – ओ पॉजीटिव ब्लड एवं प्लेटलेट्स अथवा / और रूपये  

नाम   – प्रिंस आदिल ,  मोबाईल नम्बर:  09654258471 

गंगाराम होस्पीटल , (प्रथम तल, आईसीयु -1180सी – बेड संख्या – 3) नई दिल्ली

घर से मस्जिद है बहुत दूर, ऐसा कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ….

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 17 मार्च 2016

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