डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 ईश्वर मरणशील प्राणी है ! 

 

इंदिरापुरम, 04 अप्रैल 2016

‘ईश्वर मरणशील प्राणी है !’ मैं यह सवाल पूछ रहा हूं या संशयात्मक रूप से यह विचार रख रहा हूं अथवा निश्चयात्मक रूप में अपनी सोच बता रहा हूं ? पता नहीं।  जो भी हो,  इस विषय पर आगे बढने से पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि लोगों की ईश्वर के बारे में जो भी धारणा या आस्था हो, उसे ठेस पहुंचाना या उस सोच के प्रति अविश्वास अथवा अनादर का भाव प्रदर्शित करना मेरा ध्येय नहीं है, सभी अपनी – अपनी आस्था और विश्वास को मानने के लिए स्वतंत्र हैं, मैं भी। यदि मेरी इस सोच पर कोई अपनी आस्था को ठेस पहुंचाने का प्रयास करने का आरोप लगाता है तो मेरा भी सीधा – सा जवाब है कि वह अपनी सोच से मेरी सोच और आस्था को ठेस पहुंचा रहा है। इसलिए बेहतर है कि सभी अपनी – अपनी आस्था और विश्वास के साथ खुश रहें और दूसरों के लिए भी कुछ मौलिक रूप में सोचने का अवसर और स्वतंत्र क्षण छोडें । यदि ईश निंदा और धार्मिक आस्था संबंधी कानून का कोई प्रावधान उस दृष्टिकोण को अपनाने से निषेध करता हो तो उसमें आवश्यक संशोधन होना चाहिए । मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने चार्वाक दर्शन, नीत्शे या मार्क्स जैसे नास्तिकों , निराशावादियों या धर्म को अफीम कहने वालों का कोई अध्ययन नहीं किया है, मैंने अध्ययन तो किया है सनातन हिन्दू धर्म के ग्रंथों – गीता, रामायण, महाभारत, वेद – वेदांगों – उपनिषदों, पुराणों ,स्मृतियों, जैन व बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से संबंधित ग्रंथों का तथा कुछ अन्य पुस्तकों का, आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश का, कुरान और हदीश का, बाईबल का, ज़ेंदावेस्ता के कुछ अंशों का, लेकिन हां , यह भी सच है कि मैंने शुरू तो किया था एक धार्मिक व्यक्ति की तरह उनका अध्ययन,  किंतु रास्ते में ही बन गया मात्र एक पाठक, जी हां, वैसा ही एक जिज्ञासु पाठक जो ज्ञान – विज्ञान की जानकारी के लिए अपनी पसन्द की पुस्तकें पढता है।

मैं यह भी साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा जन्म एवं लालन – पालन – पोषण और शिक्षण – प्रशिक्षण न तो किसी कट्टरवादी धार्मिक परिवार में हुआ है और न ही किसी अनास्थावादी या संशयवादी अथवा धार्मिक अन्धविश्वास उन्मूलनवादी परिवार में, बल्कि एक सामान्य सनातन हिन्दू धर्मावलम्बी सामाजिक शैक्षिक और आर्थिक रूप से प्रतिष्ठित मध्यम वर्गीय परिवार से मैं हूं। मेरे पिता स्नान ध्यान के बाद सूर्य देवता को अर्घ्य और कुल देवता को हवन – धूपदान किये वगैर भोजन नहीं करते थे, और ऐसा करते उन्हें रोज दिन के एक – दो बज जाते थे, मेरी मां उनके बाद खाती थी, वह भी सभी तीज – त्योहार करती थी और उपवास रखना तो उसका नियमित व्रत जैसा हो गया था । परिवार के वे पूरे परिवेश और रीति – रिवाज मैं भी स्वत: ग्रहण करता चला गया , सच कहूं तो कुछ मामलों में मैं पिता जी से ज्यादा ही पुजारी हो गया, वे सुबह – शाम पूजा – पाठ तो करते थे किंतु चन्दन – टीका नहीं लगाते थे और मांस – मछली भी खाते थे , मैं ने 1962 में पांचवीं क्लास में जाते ही मांस – मछली खाना छोड दिया था और बाजाब्ता चन्दन – टीका भी लगाने लगा था ,  स्कूल भी चन्दन – टीके लगाये हुए ही जाता।

सन 1962 में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं और हुईं जिनका मेरे जीवन पर व्यापक प्रभाव पडा, पहली यह कि साल के शुरुआती दिनों में एक महीने तक सूर्य के दर्शन नहीं हुए और रह – रह कर भूकम्प के हल्के झटके आते रहे जिसके चलते लोगों में दहशत फैली हुई थी। प्राकृतिक आपदा से रक्षा के लिए जगह – जगह अष्टयाम व लखरांव जैसे सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठान होने लगे थे, उसी माहौल में मैं ने मांस – मछली खाना छोडा। दूसरी यह कि उसी साल चीन ने भारत पर हमला कर दिया। स्कूल के सभी बच्चे आसपास के गांवों, हाट – बाजारों में हेड मास्टर साहब की अगुआई में रैली निकालते और ‘चाचा नेहरु जिन्दाबाद, चाउ एन लाई मुर्दाबाद, माउत्सेतुंग मुर्दाबाद ’ के नारे लगाते, जिस नारे पर ज्यादा जोर था वह था – ‘ घास की रोटी खाएंगे, देश को बचाएंगे’ । सभी बच्चों को निर्देश दिया गया था कि सप्ताह में दो रात खाना नहीं खाएं तथा अपने हिस्से के बचे हुए भोजन के बराबर यानी एक सेर चावल हर सोमवार को स्कूल में जमा कराएं, हम सभी बच्चे वैसा ही करते थे, हेड मास्टर साहब बताते थे कि उस तरह जमा चावल को बेच कर जो राशि आएगी, वह सैनिकों के लिए गरम वर्दी खरीदने के लिए सरकार को भेजी जाएगी। इस तरह राष्ट्रीय चरित्र और देशभक्ति का पहला पथ ‘हिंदी – चीनी भाई – भाई’ के नारों के बीच चीन द्वारा धोखे से भारत पर किए गए अचानक हमले से प्रशस्त  हुआ।

मुझे याद है, छठी क्लास में मेरे सहपाठियों ने बहुत चिढाया था और सभी ने बाबा कह कर मेरा मजाक उडाया था , फिर भी , मैं विचलित नहीं हुआ था और चन्दन – टीका लगाना नहीं छोडा था, हाई स्कूल में जाने पर चन्दन – टीका लगाना तो छूट गया किन्तु पूजा – पाठ वैसा ही बदस्तूर जारी रहा । आठवीं क्लास में पास करने के लिए बारह आने का प्रसाद चढाने का वादा भगवान से किया था, पास तो कर गया परंतु जब बाबू जी से पैसे मांगे और उसका उद्देश्य बताया तो उन्होंने मुझे पैसे तो दे दिए थे मगर झिडकते हुए कहा था – “आईन्दे से इस चक्कर में मत पडिए, यह सब मेरे लिए छोड दीजिए, आप केवल मन लगा कर पढाई कीजिए”। सच बताता हूं , बिना उद्देश्य बताये ही पैसे मांगे होते तो आसानी से मिल गए होते, वैसी झिडकी नहीं खानी पडी होती । बाबू जी का वह रूख देख कर इतनी ग्लानि हुई मुझे कि प्रसाद तो भगवान को चढा दिया जरूर लेकिन खुश हो कर उसे दूसरों में बांटने के बजाय, पूरा प्रसाद मैं चुपके से खुद खा गया । मैं यह भी बता दूं कि आठवीं क्लास तक मैं औसत दर्जे का छात्र था और नौवीं में औसत से ऊपर तो दसवीं में रैंक होल्डर और ग्यारहवीं की बोर्ड परीक्षा में सम्मानजनक अंकों के साथ अच्छा रैंक पाने में भी सफल हुआ, कॉलेज में टॉपर होता रहा और उसके बाद नौकरी में भी सबसे आगे ही रहा ।

मेरे पिता जी अपने शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर गांव में सबसे अधिक प्रगतिशील थे , फिर भी , उनके मन व आचरण में धार्मिक आस्था एवं विश्वास भी बहुत गहरा था, वे शिष्टाचार को भी धर्म और संस्कार का हिस्सा मानते थे। मेरे कुल पुरोहित के पुत्र श्याम बिहारी तिवारी मेरे सहपाठी थे, सातवीं क्लास तक हम साथ – साथ पढे, उसके बाद वे पुरोहिताई की पढाई करने सनातन धर्मसमाज विद्यालय मझौलिया चले गए, लगभग 10 – 12 साल बाद हम दोनों की भेंट मेरे गांव में ही मनुलाल भाई के लखरांव में हुई , मैंने चहक कर पूछा था – “ यार श्याम बिहारी, सुना है तुम बहुत बडे पंडित और शास्त्री हो गए हो” , मेरे पिता जी भी वहीं थे, बिगड गए मेरे ऊपर, बोले –  “ ये पुरोहित हैं हमारे, और आप इन्हें तुम – ताम कर रहे हैं?” मैंने भी, श्याम बिहारी तिवारी ने भी कहा कि हम दोनों मित्र हैं और बचपन से इसी तरह बात करते रहे हैं, बाबूजी फिर भी नहीं माने थे और मैं तब से अपने मित्र को एक यजमान की तरह अपना कुल पुरोहित  मान कर प्रणाम करने लगा, आखिर कृष्ण द्वारा सुदामा के पांव पखारे जाने का दृष्टांत भी तो हमारा आस्थागत संस्कार या संस्कारगत शिष्टाचार है ही। तो, मैं भी उसी भट्ठी में तैयार औंजार हूं।

मेरे पिता जी से मुख्य रूप से तीन प्रकार के आचार मुझे विरासत में मिले थे, पहला :– ईश्वर और देवी – देवताओं के अस्तित्व में आस्था व विश्वास रखने तथा सभी बडे बुजुर्गों एवं दूसरे धर्मों का भी आदर करने का भाव; दूसरा :- राष्ट्र-ध्वज तिरंगा और राष्ट्रगान को सर्वोच्च सम्मान देने का भाव तथा तीसरा :- महात्मा गांधी एवं पं. जवाहरलाल नेहरू को स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बडे नायक और राष्ट्रनिर्माता मानने का भाव। वे नेता जी सुभाषचन्द्र बोस और भगत सिंह की देशभक्ति का भी गुणगान आल्हा की तर्ज पर गा कर करते थे तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल और बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर, खान अब्दुल गफ्फार खान की चर्चा भी बडे आदर और भक्तिभाव से करते थे किंतु महात्मा जी और नेहरू जी को वे सबसे ज़ुदा मानते थे। जरूरी नहीं कि सभी उनसे सहमत हों, हालांकि मैं तो तब भी उनसे सहमत था और आज उन सबका गहरा अध्ययन करने के बाद भी सहमत हूं, और सच बताऊं ? वह सहमति पहले से अधिक बलवती होती गई है, क्योंकि इस सहमति में किसी के प्रति आदर व सम्मान अधिक या किसी के प्रति कम होने का भाव कदापि नहीं है, बल्कि इससे दृष्टि और दृष्टिकोण को समझने में सहुलियत होने का भाव है। मैं यहां सबसे पहले अंतिम दो विरासतों की चर्चा करना चाहूंगा।

दूसरी विरासत :- राष्ट्र-ध्वज तिरंगा और राष्ट्रगान को सर्वोच्च सम्मान देने का भाव । श्याम लाल पार्षद का ‘झण्डागीत’ पिता जी को पूरा याद था, सुर – ताल में वे गाते तो नहीं थे किंतु अपनी तर्ज पर वे उसे गा कर सुनाते थे। श्याम नारायण  पाण्डेय की कविता ‘हल्दीघाटी’  का भी बहुत – सा अंश पिता जी को कंठस्थ था , उसे भी वे अपनी जांघ पर ताल ठोक कर सुनाते थे ।  वे वीर रस की कविताओं के इस कदर दीवाने थे कि आल्हा और लोरिकायन गायकों को सुनने के लिए मीलों तक का सफर कर भी पहुंच जाते थे और मुझे भी साथ ले जाते थे । महोबा के आल्हा और ऊदल ऐतिहासिक वीर हैं, वैसे ही लोरिक और भोरिक की गाथाएं भी हैं। हमारे क्षेत्र के गांव – देहात में खेती से फुर्सत के दिनों में बाहर से आल्हा या लोरिकायन गायन के कलाकार बुलाये जाते थे और रात भर वीर रस की सरस काव्य – धारा प्रवाहित होती रहती थी, गवैये जब ढोलक की गत पर जोरदार थाप लगाते हुए पांव के पंजों के बल जमीन से छह इंच ऊपर उठ जाते थे तो पिता जी भी अपनी जांघ पर थाप दे कर उठ जाते थे, और शायद मैं भी।

पिता जी का मानना था कि यदि शुरू से ही भारतवर्ष का झण्डा एक रहा होता तो देश कभी गुलाम ही नहीं हुआ होता। उनका आशय छोटी – बडी सैकडों देसी रियासतों के अस्तित्व के चलते देश का कोई एकल संगठित स्वरूप न होने से था। राष्ट्रगान पिता जी की रोज की प्रार्थनाओं में तो शामिल नहीं था, फिर भी, उसे सम्मान देने का एक अलौकिक भाव था उनमें। रास्ते में चलते हुए कहीं किसी दफ्तर या स्कूल में झण्डा फहराया जा रहा होता और राष्ट्रगान गाया जा रहा तो वे वहां सडक पर ही सावधान मुद्रा में खडे हो कर मन ही मन राष्ट्रगान गाने लगते , इतनाही नहीं, वे भोजन कर रहे होते और रेडियो पर भी राष्ट्रगान की धुन सुन पडती तो भी वे थाली सामने रख कर सावधान मुद्रा में खडे हो कर राष्ट्रगान  गुनगुनाने लगते , वह संस्कार स्वाभाविक रूप से मुझमें भी आ गया और मुझसे मेरे बच्चों में। मैंने अपनी इस सोच पर पहला कदम तब उठाया जब मैं गांव से शहर कॉलेज में पढने पहुंचा । वहां देखा कि सिनेमा हॉल में फिल्म समाप्त होते ही परदे पर तिरंगा झंडा लहराने लगता और राष्ट्रगान की धुन बजने लगती और लोग हॉल से बाहर जाने लगते। मैंने जिलाधीश के सामने उस पर आपत्ति जताई और मांग की कि या तो राष्ट्रगान पूरा होने तक सभी दर्शक अपनी सीट पर बने रहें या नहीं तो राष्ट्रगान की धुन बजाना बन्द करा दिया जाय। डीएम साहब को मेरी बातें सुन कर आश्चर्यजनक खुशी हुई, उन्होंने मेरी तारीफ की । बाद में देखा गया कि फिल्म समाप्ति के बाद झंडा फहराना और राष्ट्रगान की धुन बजाना बन्द हो गया था, शायद सबको हॉल में जबरदस्ती रोके रखना उचित या संभव नहीं लगा था, मेरे जिले के सिनेमा हॉलों में आज भी उसका अनुपालन होता है ।  हमारे इस संस्कारगत स्वभाव की खिल्ली उडाने वालों की न तो तब कोई कमी थी, न अब है, फिर भी, जब हमें बचपन में चिढा कर डिगा पाने में कोई सफल न हुआ तो अब क्या खा कर होंगे। मेरी समझ में यह व्यक्तिगत आस्था या पारिवारिक संस्कार अथवा सामाजिक शिष्टाचार का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय धर्म का विषय है, इसीलिए जब ऐसे मुद्दों पर हल्की राजनीति होती है तो तकलीफ होती है, और यह तकलीफ तब और अधिक बढ जाती है जब , वैसे लोग भी ‘ भारत माता की जय ’ पर घंटों परिचर्चा करते हैं और दूसरों को उसका पाठ पढाते हैं, जो खुद अपनी मां की जय नहीं बोलते, अपनी मां के पांव नहीं छूते, अपने व्यस्त जीवन से कुछ क्षण निकाल कर अपनी मां का दुखदर्द और हाल समाचार जा कर नहीं पूछते ।

हालांकि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात ‘मां और मातृभूमि की महिमा स्वर्ग से भी बढ कर है’, का उद्घोष मूल रूप में और पहली बार कब कहां किसके द्वारा हुआ ; इसका प्रामाणिक ज्ञान तो नहीं है, किंतु वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ के युद्ध काण्ड में रावण बध के बाद विभीषण को लंका का राज सौंपते हुए राम – लक्ष्मण संवाद में इसका उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में ‘भूमिमाता पुत्रोSहम पृथिव्या’ के उद्घोष के माध्यम से मातृभूमि का गुनगान किया गया है। वस्तुत: जब वेदों और रामायण की रचना हुई, तब धार्मिक – भाषिक और लिपि संबंधी वैसी विविधता हमारे यहां नहीं थी , जैसी आज एक – दूसरे के बिल्कुल विपरीत – सी प्रतीत होने वाली नज़र आती है, तब तो सब कुछ सनातन हिन्दू धर्म , संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में ही था , इसीलिए , जब हम विविधता में एकता और लोकतंत्र में गणतंत्र की आत्मा व शरीर को एक साथ ले चलने वाले संविधान के तहत रह रहे हैं तथा शासन – प्रशासन चला रहे हैं, तब उस जयघोष में भी उस विविधता को क्यों स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए ? वैसे भी,  उसका रूढ स्वरूप वेद या रामायण में है, भारत के संविधान में नहीं, लेकिन राष्ट्रगान का रूढ स्वरूप तो संविधान में ही है, इसीलिए राष्ट्रगान के स्वरूप अथवा शब्द में परिवर्तन के लिए कोई व्यक्ति या सरकार स्वतंत्र नहीं है। राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का पाठ दूसरों को पढाने वाले यह क्यों नहीं देखते कि उनके कितने मंत्री या बडे नौकरशाह उसका किस कदर अपमान करते हैं, राष्ट्रगान के समय पैंट की जेब में हाथ डालकर टांगें हिलाते रहना या बातें करते रहना तो आम बात जैसी घटनाएं हैं ही, कुछ मामलों में तो राष्ट्रगान शुरू कर बीच में ही रोक दिया जाता है तो कुछ राज्यपाल ही राष्ट्रगान शुरू कर चल पडते हैं, उन्हें होश आता है तब , जब मुख्यमंत्री कपडा पकड कर उन्हें पीछे खींचते हैं, आखिर वैसे लोगों को राज्यपाल बनाते ही क्यों हैं आप?

तीसरी विरासत :- पिता जी से जो तीसरी विरासत मुझे मिली वह महात्मा गांधी और जवाहरला नेहरू के प्रति अतिशय सम्मान भाव रखने की थी, वह भाव वैसे – वैसे और अधिक बलवान होता गया , जैसे – जैसे मैं उन दोनों के बारे में तथा भारत के स्वाधीनता संग्राम के बारे में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करता गया।  महात्मा गांधी का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने आज़ादी की लडाई का नेतृत्व किया या अहिंसा और सत्याग्रह को लडाई का हथियार बनाया,  बल्कि गांधी की महिमा इस बात में है कि उन्होंने देश के कण – कण को , हर एक हिस्से को, हर एक वर्ग को, पूरी आवाम को अन्दर पैठ कर देखा – परखा – जाना – समझा  , उसके पोर – पोर को अपनी रग – रग में महसूस किया, उसके दुखदर्द को आत्मसात किया , पूरे देश की हवा – मिट्टी – पानी को अपनी आंखों से, अपनी नासिका से, अपने रोम – रोम से पीया – जीया और तब जा कर स्वाधीनता संग्राम के लिए समुचित अस्त्र – शस्त्र का चयन किया जो  अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और उपवास आदि के रूप में हमारे सामने आये। वह सब कुछ वैसा ही था जैसा किसी भयंकर असुर से भीषण युद्ध करने के पहले दैवी अस्त्र – शस्त्र की प्राप्ति के लिए योद्धा घोर तपस्या करते थे और दिव्य अस्त्र प्राप्त कर लेने के बाद दानवों को ललकारते थे ।  उसी प्रकार  , जवाहरलाल नेहरू की महत्ता केवल इस कारण नहीं है कि उन्होंने सहज ही उपलब्ध सब सुख – सुविधा त्याग दिया और आज़ादी की लडाई लडते हुए जेल गए; हालांकि नेहरु की आलोचना को फैशन बनाने वाले लोग देश क्या, दुनिया में भी कोई ऐसा अन्य उदाहरण नहीं बता सकते जहां कोई देश को आज़ाद कराने के लिए खुद दर्जनों बार जेल गया हो तथा जिसके माता – पिता, पत्नी, बहन – बहनोई, चचेरे भाई – बहन सबके सब जेल गए हों; बल्कि नेहरु की महत्ता इस बात में थी कि महात्मा गांधी के अनेक सिद्धांतों और नीतियों से असहमत होते हुए भी उन्होंने गांधी का रास्ता ही यह स्वीकरते हुए अपनाया कि भारत के लिए उसके अलावा दूसरा कोई कारगर रास्ता नहीं था। यह तथ्य तब पूरी तरह साफ हो जाता है जब हम महात्मा गांधी की आत्मकथा (जिसमें 1919 तक के ही घटनाक्रम हैं) और लुई फीशर द्वारा लिखी उनकी जीवनी पढते हैं और फिर जवाहरलाल जी की आत्मकथा पढते हैं। मेरा मानना है कि तब के भारत के लिए ही नहीं, आज और कल के भारत के लिए भी गांधी की परख और नेहरु की समझ ज्यादा उपयोगी थी, है और होगी। इस विषय पर विशद विचार – विमर्श आगे फिर कभी, अभी तो पिता जी से मिली पहली विरासत की चर्चा जरूरी है जिसे पीछे छोड कर हम आगे बढ गए थे।

पहली विरासत :– ईश्वर और देवी – देवताओं के अस्तित्व में आस्था व विश्वास रखने तथा सभी  बडे बुजुर्गों एवं दूसरे धर्मों का भी आदर करने का भाव।

पिछली दो विरासतों में तो कोई कमी नहीं आई कभी, किंतु इस विरासत में उतार – चढाव आते रहे और आगे भी आते रहने की संभानवनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।सभी बडे बुजुर्गों एवं दूसरे धर्मों का भी आदर करने का भाव भी दिन प्रतिदिन बढता ही गया है , उतार – चढाव आते रहे हैं तो केवल ईश्वर और देवी – देवताओं के प्रति आस्था रखने में। पिता जी हाट – बाजार, शादी – व्याह, मंदिर या कीर्तन , जहां भी जाते, अधिकांश जगहों में अपने साथ मुझे भी ले जाते। मंदिरों में तो देव – मूर्त्ति के सामने मुझे कर रोने लगते और दोनों हाथ उठा कर आशीर्वाद मांगने लगते । मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि पिता जी से प्राप्त ईश्वर और देवी – देवताओं के अस्तित्व में आस्था व विश्वास का भाव भी मुझमें बढता गया और दूसरे धर्मों के प्रति आदर का भाव भी बढता रहा, फिर भी,  मैं  साफ कर देना चाहता हूं कि पिता जी की मान्यताएं शायद इस तथ्य पर निर्भर थीं कि उनके पूर्वज भी वैसा ही मानते थे और साथ ही, धार्मिक एवं पौराणिक ग्रंथों में भी वैसा ही बताया गया था , परंतु मेरे विश्वास या संशय का आधार सुनी – सुनाई या पढी – पढाई बातें नहीं बल्कि तर्क – बुद्धि और वैज्ञानिक गत्यात्मकता थी। मेरा मानना है कि पौराणिक गाथाओं में असंभव – सी लगने वाली जिन घटनाओं या वस्तुओं की चर्चा है, वे कालांतर में संभव ही नहीं हुईं बल्कि साक्षात प्रमाणित हो गई हैं, और उन्हीं के बल पर यह स्वाभाविक रूप से विश्वास किया जा सकता है कि जो अभी तक प्रमाणित नहीं हो सकी हैं, वे भी कालांतर में हो जाएंगी। सोच में फर्क केवल यह है कि पिता जी की मान्यता के अनुसार वे सारी उपलब्धियां देवी – देवताओं की अलौकिक शक्तियों के परिणाम थीं , जबकि मेरा मानना है कि तत्कालीन ऋषि – मनीषियों में से जिसकी सोच में वैज्ञानिकता जितनी अधिक थी और जिसने जितना पहले उसे जान – समझ लिया तथा हासिल भी कर लिया , वह उतना ही बडा देवता बन बैठा, आम जनता उसके वैज्ञानिक कृत्यों को दैवी शक्तियों की देन मानने लगी। इसीलिए पौराणिक गाथाओं की असंभव लगने वाली बातें कपोल कल्पना या गल्प नहीं हैं , बल्कि अतीत में जो उपलब्धियां हासिल की जा चुकी थीं और समय के थपेडों ने जिन्हें परदे से ओझल कर दिया था, उन्हें भौतिक रूप से फिर से प्रमाणित कर पाने की क्षमता अभी तक विकसित न कर सकने की हमारी असमर्थता के चलते ही वे गल्प जैसी लगती हैं। दूसरा कारण यह भी रहा कि पौराणिक गाथाओं में इमोशनल अत्याचार की अधिकता रही थी, यदि उसके लेखकों ने तथ्यात्मकता और वस्तुपरकता का साथ लिया होता और भाव – प्रवण व भावना – प्रधान अभिव्यक्ति से अपनी कथा शैली को बचा लिया होता तो पुराणों से अधिक प्रामाणिक दूसरे किसी इतिहास की आवश्यकता नहीं होती। मैं एक बात बिलकुल साफ कर दूं कि आज के या किसी भी काल के बाबाओं की ढपोरशंखी साधना और ट्रिकबाजी मेरी इन मान्यताओं की श्रेणी में न कभी थीं, न हैं, न होंगी।

अविश्वसनीय – सी लगने वाली शक्तियों और उपलब्धियों को मान लेने के बावजूद उन्हें ईश्वर या दैवी शक्ति की देन न मानने के पीछे का मेरा तर्क क्या है ? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है। पहला कारण तो यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सनातन हिन्दु धर्म तथा  इस्लाम व इसाई  आदि विभिन्न धर्मों में प्रचलित कर्मकाण्डों तथा अंधविश्वासों पर बडा तार्किक प्रहार अपने सत्यार्थ प्रकाश में किया, शुरू के सभी अध्यायों में खण्डन पक्ष प्रबल है, अंतिम अध्याय में वे अपने मनोवांछित आर्यसमाज का मंडन करते हैं जो बहुत ही कमजोर है। सरल शब्दों में कहूं तो जिन और जैसे तर्कों के आधार पर अन्य धर्मों की वे आलोचना करते हैं, उन्हीं और वैसे ही यानी उनके ही तर्कों के आधार पर उनकी स्थापना की उनसे भी अधिक सटीक आलोचना की जा सकती है, यानी कि स्वामी जी का खंडन पक्ष जितना मजबूत और प्रभावी है, उनका मंडन पक्ष उतनाही कमजोर है। तो आखिर उनकी सोच इतनी फैली कैसे ? उसका सीधा – सा उत्तर है कि एक तो उनका सिद्धांत सरल व सहज था और दूसरे, तत्कालीन जटिल कर्मकाण्डों और जानलेवा अन्धविश्वासों से छुटकारा दिलाने वाला अपने ही धर्म समाज से जो कोई भी मिलता , उस समय वह उतनाही स्वीकार्य हो जाता जितना स्वामी जी हुए। अनेक धर्मों के प्रचलित व प्रसिद्ध ग्रंथों के अध्य्यन के बाद उस एक सत्यार्थ प्रकाश ने मेरी आस्था और विश्वास की चूल हिला कर रख दी । परिणाम यह हुआ कि जहां मैं स्थापित था, वहां से डिग गया, लेकिन जहां पुनर्स्थापित किया जा रहा था, वहां स्थापित होने का कोई तर्कपूर्ण कारण सामने नहीं आया, ऐसे ही क्षणों में यह सोच कौंधी – ‘ईश्वर मरणशील प्राणी है !’

यह बात सन 1981 की है, उन दिनों मैं एक राष्ट्रीयकृत बैंक की मुज़फ्फरपुर शाखा में क्लर्क था। तब मैं रातदिन उसी विषय पर सोचने लगा, मैं तीन महीने हिन्दू, तीन माह मुसलमान, तीन माह सिक्ख और तीन माह इसाई के रूप में रहता था तथा उसी के अनुसार पूजा- पाठ एवं दिनचर्या का पालन करता था। उन दिनों मैंने एक ‘जीवात्मा’ धर्म का सिद्धांत भी दिया था, वह शायद अकबर के दीन – ए – इलाही से प्रभावित था, मेरे कुछ अनुयायी भी हुए थे, जिनमें से मेरे सहकर्मी भी थे, आज भी हम एक दूसरे को ‘जय जीवात्मा’ कह कर ही अभिवादन करते हैं। वैसी ही परिस्थितियों में ईश्वर और देवी – देवताओं के ऊपर मौलिक रूप से गंभीरता पूर्वक मैं सोचने लगा था, तब की पाक्षिक पत्रिका ‘सरिता’ के सम्पादक और मालिक (स्व) विश्वनाथ जी से मेरा पत्राचार भी हुआ था, उन्होंने पूरे एक वर्ष के अंकों के लिए उस विषय पर मेरी पूरी रचना मांगी थी तथा मेरी सोच को अपनी सोच के अनुरूप ढालने के लिए  कुछ सुझाव भी दिए थे, लेकिन उस वक्त न तो मेरे पास उतना लिखने का समय था और न ही उनकी सलाह को मानने की लालसा थी, फलस्वरूप वह परियोजना धरी की धरी रह गई। फिर भी, उस दिशा में मेरा चिंतन बदस्तूर जारी रहा ।

अलौकिक – सी लगने वाली उपलब्धियों को ईश्वरीय या दैवी शक्ति की देन न मानने का मेरा एक बडा तर्क विकासवाद का प्रचलित सिद्धांत भी है। डार्विन ने कहा था कि बन्दर की प्रजाति ही विकास करते – करते आज मनुष्य के रूप में विद्यमान है , इस प्रक्रिया में करोडों वर्ष लगे, हालांकि आज भी बन्दर की प्रजाति हमारे सामने है, तो क्या बन्दर भी किसी अन्य प्रजाति से विकसित हो कर इस रूप में दिख रहे हैं ?  और , तो क्या जो बन्दर विकसित हो कर आदमी बन गए हैं, उनका विकास-क्रम थम गया है या समाप्त हो गया है , विकासवाद का सिद्धांत तो सतत विकास होते रहने की बात करता है , तो क्या बन्दर से विकसित आज के आदमी का आगे विकसित हो कर इससे भी अधिक चिंतनशील जीव बन जाना संभव नहीं ? भौतिक रूप से उपलब्ध प्रमाण तो पुष्टि करते हैं कि संभव है। प्राचीन काल की उपलब्धियों को हम दरकिनार भी कर दें, तो भी औद्योगिक क्रांति के बाद हमने जो आविष्कार किए हैं, जो औजार या मशीने या यान बनाये हैं, उनमें बीते दो सौ सालों में ही कितना सुधार अर्थात विकास हुआ है ! हमारे खुद के द्वारा निर्मित्त मशीनों का हमने खुद ही इतना विकसित स्वरूप प्राप्त कर लिया है तो क्या खुद हमारा विकास नहीं हो सकता ? अवश्य हो सकता है , यह अलग बात है कि उसका परिणाम बन्दर से आदमी बनने की भांति करोडों वर्षों बाद नज़र आए। तो, क्या तब का मानव आज के मानव का अतिमानव (सुपरमैन) स्वरूप नहीं होगा, उसकी सोच अति (सुपर) सोच नहीं होगी और क्या ऐसा अतिमानव और अति सोच का अस्तित्व अतीत में नहीं रहा होगा । क्रांतिकारी से योगी हुए अरबिन्द घोष ने उसे ही अतिमानस यानी सुपरामेंटल कहा है। उन्होंने सुपरमैन की नहीं, सुपरामेंटल की बात कही है, अर्थात मनुष्य का यदि शारीरिक स्वरूप आज की स्थिति के जैसा ही रहे , तब भी उसकी सोच यानी उसकी मानसिक शक्ति यानी उसकी बौद्धिक क्षमता उस हद तक पहुंच सकती है जो असीमित और अकल्पनीय लगने लगे और सामान्य जनता उसे ईश्वरीय और दैवी शक्ति मानने लगे। तो क्या ऐसी अकल्पनीय क्षमता वाले लोग पहले नहीं रहे होंगे और तो क्या वे ही देवी, देवता और ईश्वर नहीं माने गए होंगे।

ये ही सभी कारण हैं कि साधारण सोच एवं अतिमानस के बीच के हमारे जैसे मध्यमार्गी लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यह निश्चयात्मक उद्घोषणा है या संशयात्मक सिद्धांत अथवा प्रश्नात्मक विचार कि – ‘ईश्वर मरणशील प्राणी है !’

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 04 अप्रैल 2016

24,138 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 20/10/2017 at 2:34 am
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  • 19/10/2017 at 1:18 pm
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    Hey just wanted to give you a quick heads up. The words in your post seem to be running off the screen in Chrome. I’m not sure if this is a formatting issue or something to do with web browser compatibility but I figured I’d post to let you know. The design and style look great though! Hope you get the problem resolved soon. Thanks|

    Reply
  • 19/10/2017 at 10:46 am
    Permalink

    Great items from you, man. I have take into account your stuff prior to and you are just extremely great. I actually like what you’ve bought right here, certainly like what you’re saying and the way through which you say it. You make it enjoyable and you continue to take care of to keep it sensible. I cant wait to read far more from you. That is really a terrific website.|

    Reply
  • 18/10/2017 at 5:59 pm
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    I don’t even know how I ended up here, but I thought this post was good. I don’t know who you are but certainly you are going to a famous blogger if you are not already 😉 Cheers!|

    Reply
  • 18/10/2017 at 10:57 am
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    I just could not depart your website before suggesting that I actually loved the standard information an individual supply on your visitors? Is gonna be back regularly to investigate cross-check new posts|

    Reply
  • 18/10/2017 at 9:15 am
    Permalink

    Do you mind if I quote a few of your articles as long as I provide credit and sources back to your weblog? My website is in the very same niche as yours and my visitors would genuinely benefit from some of the information you provide here. Please let me know if this okay with you. Thanks a lot!|

    Reply
  • 18/10/2017 at 7:06 am
    Permalink

    I don’t even understand how I stopped up here, but I assumed this publish used to be good. I do not understand who you’re however definitely you’re going to a well-known blogger for those who aren’t already. Cheers!|

    Reply
  • 18/10/2017 at 5:09 am
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    After going over a few of the articles on your site, I honestly like your technique of blogging. I saved it to my bookmark webpage list and will be checking back soon. Please check out my website too and let me know what you think.|

    Reply
  • 18/10/2017 at 4:34 am
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    Today, while I was at work, my cousin stole my iphone and tested to see if it can survive a twenty five foot drop, just so she can be a youtube sensation. My iPad is now broken and she has 83 views. I know this is completely off topic but I had to share it with someone!|

    Reply
  • 18/10/2017 at 2:19 am
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    Hello there, I found your site by the use of Google at the same time as searching for a comparable matter, your website got here up, it looks great. I’ve bookmarked it in my google bookmarks.

    Reply
  • 17/10/2017 at 11:22 pm
    Permalink

    Good day! I could have sworn I’ve been to your blog before but after browsing through a few of the articles I realized it’s new to me. Nonetheless, I’m certainly pleased I came across it and I’ll be book-marking it and checking back often!|

    Reply
  • 17/10/2017 at 7:21 pm
    Permalink

    Hi there! I could have sworn I’ve visited this website before but after browsing through many of the articles I realized it’s new to me. Anyhow, I’m definitely happy I discovered it and I’ll be book-marking it and checking back regularly!|

    Reply
  • 16/10/2017 at 9:29 am
    Permalink

    Write more, thats all I have to say. Literally, it seems as though you relied on the video to make your point.
    You obviously know what youre talking about, why throw away
    your intelligence on just posting videos to your
    blog when you could be giving us something enlightening to read?

    Reply
  • 14/10/2017 at 8:37 am
    Permalink

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