डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 धरा बेच देंगे, गगन बेच देंगे ; सुमन बेच देंगे, चमन बेच देंगे

क़लम के सिपाही अगर सो गये तुम, वतन के मसीहा (?) वतन बेच देंगे

इंदिरापुरम, 06 अप्रैल 2016

मैं बहुत दिनों से चैन की नींद सोना चाहता हूं और फिर तरोताज़ा हो कर अपनी आत्मकथा के मूल विषय पर लौटना चाहता हूं, मगर देश – दुनिया में रोज कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि चैन से सोने का खयाल ही अपराधबोध से भर जाता है ,

क्योंकि कलमकार अगर चैन से सो गये तो …… ?

हमारी यादस्त कमजोर है किन्तु इतनी भी नहीं कि आंखों के सामने जो घट रहा हो, वह भी और उस वक्त ही याद न रहे। दो दिनों पहले तक भारत माता के जयकारे को कुछ लोग वैसे ही बांट रहे थे जैसे कोई श्रद्धालु तीर्थस्थान के मार्ग में अपनी पुश्तैनी सम्पति बांट कर दिवंगत पूर्वजों के लिए स्वर्ग में सीट रिज़र्व करा रहे हों। वही लोग कुछ दिनों पहले देशभक्ति का प्रमाणपत्र वैसे ही बांट रहे थे जैसे कोई बिना मान्यता वाला विश्वविद्यालय मानद उपाधियां बांट रहा हो । ठीक दो दिनों पहले एक रज्य का मुख्यमंत्री घोषणा कर रहा था कि जो जयकारा नहीं लगाएगा उसे देश में रहने का कोई अधिकार नहीं और उसी दिन कोई बाबा अपनी मज़बुरियां बता रहा था कि यदि संविधान से बंधा न होता तो जयकारा न लगाने वालों का सर कलम कर देता।

हमें इन सारे वाकयों की सप्रसंग व्याख्या करने की जरूरत नहीं है। बाबा जी तो इसलिए बौखाला गए होंगे कि आटा – सत्तू बेचने के चक्कर में उन्हें ध्यान ही न रहा कि वे इग्नोर किए जा रहे हैं और इस बीच दूसरे बाबा ने 35 लाख लोगों , छोडिए भी, 3.5 लाख लोगों का जमावडा करा कर देशदुनियां से अकूत वाहवाही बटोर ली। यह बिलकुल नाकाबिले बर्दाश्त है, लेकिन बर्दाश्त कर भी ले तो कोई ठीक से नोटीस तो ले, इसीलिए वैसे बोल बोलने पडे बाबाजी को। ऐसे में ऐसा ही होगा बाबाजी, जब आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास कीजिएगा , तो ऐसा ही होगा । फिरभी, ‘ सबसे बडा भीड बटोरू कौन ’ का सर्टीफिकेट बांटने का ठेका यदि मुझे दिला दीजिए तो , ईमान से, उसमें प्रथम स्थान मैं आप को ही दूंगा, और वह कोई पक्षपात कर के नहीं , बल्कि सही मायने में उस पर पहला हक आप का ही होगा। वह कैसे, तो मैं बताता हूं, जब हम बच्चे थे तो शुरू से ही स्कूल में फीस लगती थी , हम अपनी क्लास में बैठने के लिए घर से ही चट्टी – बोरा ले कर जाते थे, यानी कि फीस भी देते और बैठने का बिछावन भी खुद ही ले जाते ? ठीक वैसे ही, आप याद कीजिए, जब आप अनुलोम – विलोम कराते थे तो लोग आप को हजारों रूपये की फीस भी देते थे और अपने बैठने के लिए घर से चट्टी – बोरा या दरी ले कर आते थे, जबकि दूसरे वाले बाबा ने लाल कालीने बिछवा दी थी, इंट्री भी फ्री थी, फ्री क्या, दुनिया भर के बेहतरीन कलाकारों की कलाबाजियां बिना पैसे के ही देखने को मिलती थी, कहां पेट फुलाने – पचकाने और नाक बन्द करने – खोलने आदि की कला सीखने के लिए लोग आपको हजारों रूपये दे कर सुबह – सुबह , रात की नींद को हराम कर , भागे – भागे आपके पास चले आते थे, और कहां, दुनिया भर की कलाएं मुफ्त में दे कर लोग बुलाए जाते थे, आप ही बताइए, दोनों में बडा बाबा कौन, सबसे बडा भीड बटोरू कौन ? इसीलिए वैसे बोल बोलने की आपको जरूरत नहीं है।

बाबाजी, इस बात में रत्ती भर संदेह नहीं है कि आप बहुत बडे मार्केटिंग गुरु हैं । आप अपने चेलों को सिखाते थे – “ सांस अन्दर खींचो, सांस रोको , सांस बाहर छोडो” । अब कोई हमें बतलाए कि सांसों को अन्दर खींचने, रोकने और बाहर छोडने के अलावा सांसों की चौथी क्रिया क्या हो सकती है। आप न भी बतलाते तो कोई सांसों की इन तीन क्रियाओं के अलावा कर भी क्या सकता था, दूसरा तुर्रा यह कि हर कोई जन्म से ही सांस लेना और छोडना सीख लेता है, लेकिन मार्केटिंग का कमाल देखिए, आप उतनी- सी बात कहने ले लिए भी हर एक आदमी से हजारों रूपये फीस ले लेते हैं ; तो सबसे बडा बाबा कौन ? आप या वो वाले बाबा ? लेकिन हां, एक बात में तो वो वाले बाबा आप पर बीस पड गए, हमारे मोफलर वाले भैया  के साथ आप तिरंगा ले कर जंतर मंतर पर मंतर पढते रह गए और वो वाले बाबा उनको प्राकृतिक चिकित्सा करा – करा कर अपने साथ ले गए, यहां तक कि उनकी पूरी सरकार के लोग वो वाले बाबा के कार्यक्रम को अपना कार्यक्रम बता कर जी जान से लगे रहे और आप को बिलकुल बिसरा दिया; जो भी हो, आप दोनों बाबा सबसे बडे मार्केटिंग गुरु हैं, इसमें कोई संदेह नहीं; यानी पप्पू भैया ठीक ही बोलते रहे कि आप लोगों की मार्केटिंग इतनी तगडी है कि आप लोग गंजों को भी कंघे बेंच दें।

एक बात और, 70 के दशक में सुनता था कि हमारे शत्रु भाई किसी महफिल में जाते थे और कोई ठीक से उनकी नोटीस नहीं लेता था तो टेबल पर गिलास फोड कर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे, शायद बाबाजी भी वही नुस्खा अपना रहे हों, लेकिन अब कौन समझाए कि –

“ हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,

  बडी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ”

आखिर शत्रुघ्न सिन्हा जैसी हस्तियां नुडल्स और सरसों के तेल से तो नहीं निकलती।

अभी – अभी एक दूसरी खबर ने नींद उडा दी है, सुना है, भारत और वेस्टैंडीज के बीच टी ट्वेंटी के सेमी फाईनल मैच में भारत की हार पर कश्मीर में कुछ छात्रों ने जश्न मनाया और भारत के विरोध तथा पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए, कमाल है, मुकाबला इंडिया और इंडीज के बीच और मालपुआ भेजे ज रहे पाकिस्तान को ? जो भी हो , फिर बाद में भारत माता के जयकारे के साथ हाथों में तिरंगा ले कर कुछ राष्ट्रवादी देशभक्त छात्रों ने भारत के समर्थन में नारे लगाते हुए रैली निकाली, वहां की पुलिस  ने उन राष्ट्रवादी छात्रों की जम कर पिटाई कर दी, राज्य सरकार में वे भी भागीदार हैं जो केन्द्र में सरकार चला रहे हैं, तो फिर उल्टी गंगा कैसे, भारत माता के जयकारे के लिए लाठियां क्यों, कहीं कोई खीझ तो नहीं कि कुछ लोग उनके कहने पर जयकारा नहीं लगाते तो यहां कुछ लोगों ने  बिना कहे ही जयकारा लगा दिया, यानी दोनों तरफ हुकुम उदुली, ऐसी हिमाकत ! मेरे जैसा छोटा – सा कलमकार इतनी बडी सियासत को नहीं समझ पा रहा है, तो फिर , बडे – बडे लोग , जो पानी पी – पी कर किसी को कोसते हैं और घी पी – पी कर किसी की तारीफ में तेल के परनाले बहा देते हैं, वे अब क्यों खामोश हैं ? कहीं

“ कोई यूं ही बेवफा नहीं होता, कुछ तो मज़बुरियां रहीं होंगी ” वाली कोई बात तो नहीं ?

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 06 अप्रैल 2016

10,495 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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