डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

भाजपा को 282 + क्यों, कैसे और कब तक

भारतीय जनता पार्टी के पास लोक सभा में 282 + का आंकडा है जो 543 सदस्यों वाली लोकसभा में सहजता के साथ बहुमत सिद्ध करने के लिए काफी है। 1980 में लोक सभा में दो सदस्यों के साथ सफर शुरू करने वाले दल को 10वीं चुनावी दौड यानी 34 साल बाद यह उपलब्धि हासिल होना कोई आसान – सी मंजिल नहीं , तो कोई बहुत बडा चमत्कार भी नहीं है। इसीलिए इस आंकडे की मीमांसा करना और उस पार्टी के भूत एवं वर्तमान की चर्चा करते हुए भविष्य का आकलन करना जरूरी लग रहा है क्योंकि इस आंकडे से एक तबके में लोकतंत्र की मजबूती के प्रति आश्वस्ति बलवती हुई है तो दूसरे तबके में ग़लतफहमियां और तीसरे तबके में खुशफहमियां पलने का अवसर मिल गया है।

दरअसल देश में आज , सही मायने में, तकनीकी परिभाषा को दरकिनार कर दिया जाए तो, राष्ट्रीय राजनीतिक दल दो ही हैं, कॉंग्रेस और भारतीय जनता पार्टी। कुछ अन्य पर्टियां भी खुद को संतुष्ट करने के लिए मुगालता पाल सकती हैं। जेपी आन्दोलन के परिणाम स्वरूप जब 1977 में जनता पार्टी बनी तो तत्कालीन दक्षिणपंथी राजनीतिक दल जनसंघ ने भी उसमें शामिल हो कर मुख्यधारा राजनीति से जुडने का काम किया। दक्षिणपंथ और मुख्यधारा यानी आरएसएस और जनता पार्टी, दोनों में एक साथ, दोहरी सदस्यता रखने का विवाद छिडने पर जनसंघ वालों ने भारतीय जनता पार्टी बना ली और शेष दल भी एक – एक कर अपने पुराने रास्ते पर नये नाम के साथ चल निकले। लोक सभा के 1980 के चुनाव में भाजपा को केवल दो सदस्य मिले और फिर वही इंदिरा जी पुन: सत्तासीन हो गईं जिनके खिलाफ सबने मिल कर मुख्य राष्ट्रीय धारा का निर्माण किया था। बाद के वर्षों में तो शेष दल पूरे देश में अकेले दम पर उम्मीदवार खडा करने के लायक भी नहीं रह पाए।

जून 1984 में स्वर्ण मंदिर अमृतसर में सैनिक कार्रवाई किए जाने की पृष्ठभूमि में 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या उनके ही सुरक्षाकर्मियों द्वारा उनके आवास पर ही कर दिए जाने के बाद सहानुभूति लहर में राजीव गांधी को अभूतपूर्व बहुमत मिला। प्रधानमंत्री के रूप में राजीव जी की सबसे बडी देन नई तकनीक को अपनाते हुए ग्लोबल नेटवर्क में भारत को लाना मानी जाएगी और उस काम में उनके मुख्य सलाहकार रहे सैम पेत्रोदा की तारीफ भी की जानी चाहिए, साथ ही, पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद और श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के खात्मे के लिए किए गए समझौते को भी राजीव गांधी की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए है । राजीव जी की सबसे बडी गलती शाहबानो मामले को ले कर संविधान में संशोधन कराना तथा राम मंदिर का ताला खुलवाना मानी जाएगी। वस्तुत: राजीव जी की नीयत ठीक थी किंतु उनके राजनीतिक सलाहकारों ने उनकी नीति को अलोकप्रिय बनवा दिया। फलस्वरूप वीपी सिंह के नेतृत्व में कॉंग्रेस के विरुद्ध एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ। प्रधानमंत्री के रूप में वीपी सिंह ने मंडल कमीशन को लागू कर अन्य पिछडे वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण देने की नीति के माध्यम से देश की राजनीति को नई दिशा दे दी। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में सोमनाथ से अयोध्या तक निकली रामजन्मभूमि रथयात्रा को वीपी सिंह की सह पर बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने समस्तीपुर में रोक दिया और आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया तो भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले कर इस बार फिर ध्रुवीकरण को बिखेरने का ठीकडा अपने सिर फोड लिया । यहीं से देश में मंडल यानी पिछडावाद अर्थात धर्मनिरपेक्ष बनाम कमंडल यानी रामजन्मभूमि के नाम पर अगडावाद अर्थात हिन्दुवाद की राजनीति शुरू हुई, दोनों ही धडों के कुछ – कुछ वादी उधर के इधर तथा इधर के उधर भी आते – जाते रहे। इंदिरा जी की 1984 में हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में राजीव जी को मिली अपार सफलता के बाद अगले 30 वर्षों तक केन्द्र में सरकारें तो बनती – बिगडती रहीं किंतु किसी भी एक दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला ।

1991 में लोकसभा चुनाव का एक चरण समाप्त हो जाने के बाद तमिल उग्रवादियों के मानव बम ने पेरुम्बुदुर में एक चुनावी सभा में राजीव गांधी की हत्या कर दी, तब केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार ने इस्तीफा दे दिया था और कॉंग्रेस के समर्थन से चल रही चन्द्रशेखर की सरकार द्वारा राजीव गांधी के आवास की दो पुलिस कर्मियों से जासूसी कराए जाने के आरोप के आधार पर कॉंग्रेस की समर्थन वापसी की आशंका में चन्द्रशेखर ने लोकसभा भंग कराकर नया चुनाव कराने का निर्णय ले लिया था, उसी के फलस्वरूप चुनावी प्रक्रिया जारी थी। इंदिरा जी की हत्या का कारण स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई था तो तमिल उग्रवाद की समस्या के समाधान की प्रक्रिया राजीव गांधी की हत्या का कारण बनी, 1986 में जब वे श्रीलंका में एक सैनिक सलामी परेड का निरीक्षण कर रहे थे तब एक तमिल सैनिक ने परेड के दौरान ही बन्दूक के कुन्दे से उन पर हमला किया था, शायद चन्द्रशेखर की केयरटेकर सरकार से उस घटना को ध्यान में रख कर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की समुचित सुरक्षा व्यवस्था कराने में कहीं चुक हो गई। उस चुनाव के बाद अनेक दलों के समर्थन से पीवी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में सरकार बनी , उस दौरान सरकार बचाने के लिए सांसद रिश्वत कांड की गूंज भी रही, लेकिन राव सरकार की सबसे बडी और दूरगामी देन डॉ. मनमोहन सिंह के वित्तमंत्रीत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण और वैश्वीकरण रही।

1996 में आम चुनाव के बाद अटलबिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए की सरकार 13 दिन ही चल सकी, उसके बाद एकबार फिर आंशिक रूप से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ, इस बार प्रधानमंत्री बनाने के लिए वीपी सिंह की तलाश होती रही, लेकिन वे अंतरध्यान हो गए, सीपीएम के नेता और लगातार कई वर्षों से पश्चिम बंगाल के सफल एवं लोकप्रिय मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाए जाने पर सहमति बनी किंतु उनकी पार्टी ने उन्हें उसके लिए अनुमति नहीं दी (जिसे वामपंथी अपनी ऐतिहासिक भूल मानते हैं), तो एचडी देवगौडा और फिर आईके गुजराल प्रधानमंत्री बने। सरकार को नहीं चलना था, सो, नहीं चली। 1998 में बाजपेयी जी के नेतृत्व में एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की पुन: सरकार बनी जो मात्र 13 महीनों तक ही चली और 1999 में महज एक मत से गिर गई, तीन वर्षों के भीतर लोकसभा का तीसरी बार चुनाव 1999 में हुआ। दर्जन भर पार्टियों के इस गठबंधन एनडीए को बहुमत मिला किंतु शाईनिंग इंडिया के व्यामोह में निर्धारित अवधि के पहले ही लोकसभा भंग कराकर एनडीए ने 2004 में ताज़ा चुनाव कराए, यहां उसका आकलन ग़लत साबित हुआ और एनडीए की करारी हार हुई, डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में युपीए ( संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की सरकार बनी जिसने पांच साल बाद 2009 के आम चुनाव में भी अपनी जीत दुहराई। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद से 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवाने तक के बीच सोनिया गांधी की सबसे उल्लेखनीय भूमिका स्वयं को सक्रिय राजनीति से दूर रख कर खुद का और राहुल गांधी का राजनीतिक प्रशिक्षण कराना रही। उस दौरान रहे उनके राजनीतिक सलाहकार उसी प्रकार प्रशंसा के हकदार हैं जिस प्रकार वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी के राजनीतिक सलाहकार आलोचना के पात्र हैं।

वर्ष 2014 के आम चुनाव में अकेले भाजपा को 282 सीटें मिली और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए को भारी बहुमत मिला। उसके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ और राजस्थान में भाजपानीत सरकारें वहां के स्थानीय राजनीतिक कारणों से बनीं, उनमें मोदी जी का करिश्मा कहीं नज़र नहीं आया, किंतु दिल्ली और फिर बिहार विधान सभा चुनावों में मोदी जी की व्यक्तिगत रूप से करारी हार हुई। पूर्वोत्तर के एक राज्य, झारखण्ड और जम्मू कश्मीर में गठबंधन की सरकारें बनना किसी करिश्मे का परिणाम नहीं हैं, बल्कि जम्मू कश्मीर की सरकार तो उनके गले की हड्डी ही बन गई है। आसन्न पांच राज्यों ( असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी) के चुनावों में असम को छोड कर शेष राज्यों में भाजपा की हार तो सुनिश्चित लग रही है, शायद इसीलिए ये चुनाव, दिल्ली और बिहार से मिली सबक के बाद, मोदी जी नहीं, बल्कि भाजपा लड रही है, ताकि चेहरा बचाया जा सके और अगले साल उत्तरप्रदेश में होने वाली अग्नी परीक्षा में पूरा कलेवर बचाया जा सके, और पंजाब को तो हाथ से गया ही समझें ।

इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रश्न उठता है कि भाजपा को 2014 में 282 सीटें क्यों और कैसे मिलीं तथा लोकसभा के अगले आम चुनाव में उसका क्या हश्र संभावित है? 1980 में दो सीटों के साथ आग़ाज़ करने वाली भाजपा का ग्राफ अगर निरंतर बढता ही नहीं रहा, तो भी, निराशाजनक कभी भी नहीं रहा, यानी  1980 में 2 और 1984 में (-) के बाद चुनावों में क्रमश: 85, 120, 161, 182, 182, 138, 116 और अंत में 282 सीटें मिली, इसलिए यह निरंतर बढते गए जनाधार तथा सामने खाली पडे मैदान का परिणाम है। भाजपा के उत्थान के लिए एकमात्र टर्निंग प्वाइंट आडवाणी जी की सोमनाथ – अयोध्या रामरथ-यात्रा रही और विश्वसनीयता का आधार अटलबिहारी बाजपेयी का नेतृत्व रहा, इसके लिए कोई अन्य नेता या घटना टर्निंग प्वाइंट होने का दावा न करें तो भाजपा के ईमानदार कार्यकर्ता या नेता कहलाएंगे। वह बाजपेयी जी का नेतृत्व ही था कि बेमेल-सी लगने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियों ने एनडीए में स्वयं को समायोजित कर लिया था, वैसी जरूरत यदि आज की तारीख में भाजपा को आन पडे तो साथी ढूंढने से नहीं मिलेंगे क्योंकि जो आज उनके साथ हैं, वे भाजपा की मर्जी से हैं, उनके नहीं होने से भी सरकार के बहुमत पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव पडने की कोई भी संभावना नहीं , यदि वही लोग भाजपा की जरूरत के चलते साथ आए होते तो अब तक इन दो वर्षों में ही आंटा – दाल का भाव सभी पक्षों को मालूम हो गया होता।

तो, पहला प्रश्न यही है कि भाजपा को 282 मिला क्यों और कैसे ? सीधा-सा उत्तर है कि 30 वर्षों की उठा-पटक, जोडतोड और छिछालेदर से लोग उब चुके थे, कंग्रेस को छोड कर राष्ट्रीय पटल पर केवल भाजपा ही नज़र आ रही थी, युवा मतदाताओं की संख्या में बढोत्तरी हुई थी, नई तकनीक और सोसल मीडिया के प्रेमी युवा वर्ग को कॉंग्रेस की पिछली सरकारों को नाकाबिल बताने का रास्ता खुला हुआ था, क्योंकि जिस कॉंग्रेस ने देश को नई तकनीक और दूरसंचार के संसाधनों से परिचित कराया था , वही कॉंग्रेस विदेश नीति, अर्थनीति और सामाजिक समरसता से संबंधित अपनी उपलब्धियों को जनता और खास कर युवा वर्ग तक पहुंचाने में नई तकनीक का उपयोग करने में पिछड गई थी । इस प्रकार  देश में राजनीति की खाली जमीन पडी थी जिसे आडवानी और अटल जी के नेतृत्व ने खाद-पानी दे कर न केवल उर्वर बना दिया था बल्कि पुष्ट बीज भी बो दिये थे , वर्तमान नेतृत्व ने उसकी फसल काटी है। इसलिए बडी बात यह नहीं है कि मोदी जी के नेतृत्व में 282 सीटें मिली बल्कि यदि ऐसी अनुकूल परिस्थितियों भी इतनी सीटें वर्तमान नेतृत्व न ला पाया होता तो बडी बात वह होती, इस आकलन का प्रमाण वर्तमान नेतृत्व द्वारा प्राप्त उपलब्धियों को राज्यों में प्रतिफलित न करा पाना भी है।

परिचर्चाओं में चाहे जितने जोर और तरकीब से भाजपा के प्रवक्ता अपनी बात रखते हों किंतु नीतियों में विद्यमान मूलभूत विरोधाभासों के चलते उनके सारे तर्क अरण्यरोदन जैसे लगते हैं, भले ही विपक्ष उनके उन विरोधाभासों को उजागर करने में सक्षम न हो पा रहा हो। जनता को अपनी बात का विश्वास दिलाने के लिए प्रभावी वक्ता और फैशनेबल प्रवक्ता होने से ज्यादा तथ्यपरकता का होना जरूरी है, सत्ता का बल, गले का जोर और भाषा की प्रांजलता ही भाजपा प्रवक्ताओं की पूंजी है, विपक्ष के कुछ नेता भी खुद को राजनीति का घाघ समझ कर फुले रहते हैं।

शीत युद्ध के दौर में इंदिरा जी को रूसपरस्त, वामपंथियों को चीन परस्त और दक्षिणपंथियों को अमेरिका परस्त कहा जाता था। इंदिरा जी की विदेशनीति का कमाल देखिए कि वे रूस के खेमे में भी थीं और निर्गुट सम्मेकन की अध्यक्ष भी थीं, तभी तो दुनिया के नक्शे पर एक नये देश का उदय हुआ और भारत की विदेशनीति का दुनिया भर में डंका बजा, आज की तरह नहीं कि पाकिस्तान सरकार के नुमाइंदों को कौन कहे, आईएसआई के एजेंटों को भी हमारे सैन्य बेस तक आमंत्रित कर लिया जाता है। नेहरू जी द्वारा कश्मीर मसले को युएनओ में देने को गलत बताने वाले लोग, उससे कोई सीख न ले कर , अपने घर का मुआयना करवा रहे हैं, मानो अपराधी यहीं कहीं छुपे हों !

इंदिरा जी के गरीबी हटाओ नारे और राष्ट्रीयकरण की नीति को समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के दबाओं का परिणाम बताने वालों द्वारा जो अर्थनीति सुझाई जाती थी उसे अमेरिका परस्त माना जाता था, किंतु जब डॉ.मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री के रूप में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण का रास्ता खोला और प्रधानमंत्री के रूप में उस मार्ग को और अधिक प्रशस्त करते हुए विकास के घोडे सरपट दौडाने की नीति अपनाई तो आज की सरकार बताए कि अब वह किसकी आर्थिक नीति की आलोचना करती है – इंदिरा जी की कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की या मनमोहन सिंह की विकासवादी अर्थव्यवस्था की ? यदि वह दोनों की आलोचना करती है तो बताए कि तीसरी अर्थव्यवस्था कौन-सी है और वह इन दो वर्षों से कहां आराम फरमा रही है? अब तक जनता से रूबरू क्यों नहीं हुई ? अगर , वह इंदिरा जी की नीति की आलोचना करती है तो उसका सीधा-सा मतलब है कि मनमोहन सिंह की नीति का समर्थन करती है और यदि मनमोहन सिंह की आलोचना करती है तो कहना न होगा कि वह अंततोगत्वा इंदिरा जी की नीति का समर्थन करती है, यानी आज की सरकार की स्थिति दोनों तरफ से कॉंग्रेसी सोच के बीच सैंडविच हो जाने वाली पोजिशन में है, अर्थात इनकी कोई स्वतंत्र नीति है ही नहीं, हो भी नहीं सकती। ध्यान रखना होगा, अगले आम चुनाव में मतदाता यह सवाल उठाएंगे , और सही, सटीक व विश्वसनीय जवाब न मिलने पर ( होगा भी वही) वही मतदाता फिर अगला सवाल पूछेंगे कि जब कम दाम में यही सफेदी पहले से ही मिल रही थी तो कोई ये क्यों ले, वही क्यों न ले?

इन तमाम विश्लेषणों से तो लगता है कि भाजपा बमुश्किल अपना कार्यकाल पूरा कर भी ले तो भी उसे अगला चांस मिलने की कोई संभावना प्रतीत नहीं होती, क्योंकि अब ज्यादा स्वीकार्य और बेहतर रिजल्ट देने वाला नेता सामने आ गया है, और निस्सन्देह, वह हैं – नीतीश कुमार और साथ में होंगे अरविंद केजरीवाल व बाकी लोग।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 10 अप्रैल 2016

 

129,259 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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