डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

अम्बेदकारवाद और गांधीवाद का समन्वित स्वरूप ही

प्रचीनता की दीवारों से घिरे अर्वाचीन भारत के उत्थान और सर्वांगीन विकास का मार्ग है

क्योंकि अम्बेदकर और गांधी एक – दूसरे के पूरक हैं

इंदिरापुरम, 14 अप्रैल 2016

आधुनिक भारत के राष्ट्रनिर्माता और भारतीय संविधान की आत्मा को लोकतंत्र के ब्रह्मसरोवर में खिलाने वाले बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर की 125वीं जयंती के अवसर पर मैं उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और अछूतों के उद्धार एवं दलितों के उत्थान के परिप्रेक्ष्य में गांधी जी तथा बाबा साहब के वैचारिक अंतर्द्वन्द्व पर ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में अपनी समझ अपने सुधी पाठकों के साथ साझा करना चाहता हूं , यह आवश्यकता मुझे इसलिए महसूस हो रही है कि कई बार कुछ मित्रों से चर्चा के दौरान ऐसा लगा कि किन्हीं कारणों से कई लोग गांधी और अम्बेदकर को एक – दूसरे का घोर विरोधी मान लेते हैं तथा अपनी उसी सोच के आधार पर कोई गांधी को तो कोई अम्बेदकर को ग़लत करार देता है।

वस्तुत: , हम प्राय: इतिहास को भी मनोरंजक उपन्यास की भांति ही पढ जाते हैं, उससे जो सबसे बडी हानि होती है, वह यह कि एकाग्रता के साथ अध्ययन – मनन की अपेक्षा रखने वाले गूढ तथ्यों को दरकिनार कर मन को अतिरंजन देने वाले अर्थों को ही हम ग्रहण कर लेते हैं यानी हम अफरातफरी में सत्य और तथ्य के साथ अन्याय कर बैठते हैं। मेरी समझ में दलितों के लिए भारत की विधायिका में सुरक्षित स्थान और पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था संबंधी तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड की नीति के संदर्भ में बाबा साहब की सहमति और महात्मा गांधी की असहमति के मामले में अध्ययन – मनन की वैसी ही त्रुटि हुई है। उसी त्रुटि के कारण पुणे के यर्वदा जेल में उस विषय को लेकर गांधी जी द्वारा किए गए आमरण अनशन और फिर पुना पैक़्ट को कुछ लोग दलितों के खिलाफ और सवर्ण हिन्दुओं के पक्ष में गांधी जी की कूटनीतिक चाल के रूप में देखते हैं जिसके चलते आज भी दलितों का एक वर्ग गांधी जी के प्रति आक्रोश व्यक्त करता है, यानी एक पक्ष अम्बेदकर जी को तो दूसरा पक्ष गांधी जी को प्रतिनायक सिद्ध करने का प्रयास करता है जबकि वास्तव में दोनों महानायक थे। दरअसल, दोनों पक्ष इसके पीछे अम्बेदकर के शुरूआती भाषणों को आधार बनाते हैं किंतु पुना पैक्ट के बाद मुम्बई में 25 सितम्बर 1932 को बाबा साहब ने जो भाषण दिया , उसे वे लोग याद नहीं करते अथवा करना नहीं चाहते । इसीलिए मैं बाबा साहब और महात्मा गांधी,  दोनों महान विभूतियों के प्रति समान श्रद्धा रखते हुए उनके परस्पर वैचारिक अंतर्संबंधों पर अपनी समझ साझा करना चाहता हूं। इस मुख्य विषय पर चर्चा करने से पहले यह जरूरी प्रतीत होता है कि दोनों विभूतियों की सामाजिक और वैचारिक पृष्ठभूमि पर एक नज़र डाल ली जाए।

महात्मा गांधी और बाबा साहब, दोनों ने देश – विदेश में ऊंच्ची शिक्षा प्राप्त की थी, दोनों मौलिक चिंतक थे, बैरिस्टर थे और, कानून, राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं समाज व्यवस्था की दोनों को गहरी परख थी, दोनों का विवाह किशोर अवस्था में ही हो गया था। गांधी जी अपने माता – पिता की छह संतानों में सबसे छोटे थे,   अम्बेदकर जी अपने मातापिता की चौदह संतानों में सबसे छोटे थे। गांधी जी के पितामह दीवान थे, उनके पिता और चाचा भी पोरबन्दर के दीवान रहे, उनके एक भाई वकील तथा दूसरे भाई पुलिस इंस्पेक्टर थे। अम्बेदकर जी के पितामह भी अवकाश प्राप्त सैनिक थे , उनके पिता भी सेना से अवकाश प्राप्त कर 50 रूपये मासिक पेंशन पाते थे और साथ ही लोकनिर्माण विभाग में स्टोरकीपर की नौकरी भी करने लगे थे, 1891 ई. में लगभग 100 रूपये की मासिक आमदनी उस समय के लिए बिलकुल नगण्य नहीं थी तो एक बहुत बडे परिवार के पालन – पोषण के लिए बहुत बडी राशि भी नहीं थी , इसीलिए बाबा साहब की विदेश में पढाई बडौदा महाराज सायाजीराव गायकवाड तथा कोल्हापुर के महाराजा साहू जी छत्रपति की आर्थिक मदद से ही संभव हो सकी। गांधी जी की आर्थिक स्थिति अम्बेदकर जी से बेहतर ही नहीं, अच्छी थी, वे बनिया जाति के थे जो गुजरात में प्रभावशाली जाति मानी जाती थी। गांधी जी की मां धर्मपरायण महिला थीं , गांधी जी के हृदय में धर्म-कर्म का बीजारोपण उनकी मां के सान्निध्य में ही हुआ था, यहां तक कि इंगलैड जाने देने के पहले उनकी मां ने उनसे मदिरा, मांस और स्त्री को नहीं छूने की सौगंध भी ले ली थी।

अम्बेदकर जी महार जाति के थे, वह जाति बहादुर और ताकतवर मानी जाती थी, महार रेजीमेंट भी सेना में थी और यह भी कहा जाता है कि महाराष्ट्र का नामकरण महार पर ही हुआ । अम्बेदकर जिस जाति से आते थे, वह थी तो हिन्दुओं का ही एक अंग, लेकिन समाज में वह पूरी तरह अछूत मानी जाती थी, धर्म – कर्म की कौन कहे, मंदिरों की चौखट तक भी उस जाति के लोगों को जाने की इजाजत नहीं थी, उस जाति के लोगों के हाथ का छुआ खाना – पीना तो दूर,  सवर्ण जाति के लोग अपना बदन भी उनसे नहीं छुआते थे, स्कूल में सबके साथ बैठने तक की मनाही थी, शिक्षक अछूत छात्रों को पढाते नहीं थे, क्लास में सवाल पूछने में भी शिक्षकों को छूत लगने का डर होता था , अछूतों को संस्कृत पढने की मनाही थी, इसीलिए आगे चल कर जब अम्बेदकर को स्कूल में दूसरी भाषा रखने का वक्त आया तो उन्होंने दूसरी भाषा के रूप में फारसी को चुना ,  कोई नाई अंबेदकर जी के बाल नहीं काटता था , उनकी बहन ही उनके बाल काटती थीं, कोई गाडीवान उन्हें अपनी गाडी में नहीं बिठाता था, सार्वजनिक प्याऊ पर पानी पीने की मनाही थी, प्यास लगने पर अछूत बच्चे मुंह ऊपर की ओर कर देते थे और कोई बहुत ऊपर से उनके मुंह में पानी डाल देता था। यानी कि हर तरह से तिरस्कृत , अपमानित और बहिष्कृत जाति थी वह और अम्बेदकर को वे सभी अमानवीय व्यवहार दुत्कार झेलने पडे थे। जब अम्बेदकर जी युरोप से पढ कर भारत वापस आए और आर्थिक पहलू पर विदेशों में उनके चिंतन की धाक जम जाने की खबर से बडौदा महाराज ने उन्हें अपना सैन्य सचिव नियुक्त कर लिया ताकि आगे चल कर वे उन्हें अपना वित्तमंत्री बना सकें, तो भी सवर्ण हिन्दुओं ने उनके साथ अमानवीय भेदभाव किया तथा उनके साथ किसी के रहने की बात तो छोड दीजिए, उन्हें रहने के लिए कोई अपना मकान किराए पर देने तक को भी तैयार नहीं हुआ, उसी से ऊब कर वे 1917 में बम्बई चले गए, जहां जातिगत भेदभाव और छूत का वैसा रोग नहीं फैला था।

बस, गांधी और अम्बेदकर में बहुत कुछ समान होने पर भी, सामाजिक स्वीकृति के स्तर पर जमीन आसमान का अंतर था। दलित समुदाय को अछूत और समाज – बहिष्कृत माने जाने की पराकाष्ठा का अन्दाजा सिर्फ इस बात से ही आसानी से लगाया जा सकता है कि जब अम्बेदकर जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त और विलायती रहन – सहन वाले व्यक्ति को केवल अपनी जाति के कारण वैसा और उतना अपमान सहना पडा था तो आखिर गरीब व दबे- कुचले दलित तबके के सामान्य अछूतों को किस तरह के और कितने अपमान, दुत्कार, बहिष्कार और भेदभाव का शिकार होना पडा होगा? इसीलिए वे उन सब से तंग आ कर कोई ऐसा धर्म तलाशने लगे थे जहां वैसी छुआछूत और ऊंचनीच का भेदभाव न हो। उसके अनुरूप उस समय अछूतों, विशेष कर महारों में भक्ति की तीन शाखाएं थीं – कबीर पंथ, रामानन्द मत और नाथ सम्प्रदाय; अम्बेदकर ने जाति प्रथा को दुत्कारा था, इसीलिए वे खुद और जाति प्रथा की यातनाएं झेलने वाले अन्य अछूत कबीर के अनुयायी बन गए। अम्बेदकर के प्रेरणास्रोत तीन महापुरूष थे – भगवान बुद्ध , संत कबीर और महात्मा ज्योतिबा फुले। कबीर से उन्हें भक्ति, फुले से ब्राह्मण विरोध व शैक्षिक – आर्थिक उत्थान का संदेश तथा बुद्ध से मानसिक एवं दार्शनिक शक्ति मिली जो अंततोगत्वा सामूहिक धर्मपरिवर्तन का माध्यम बनी।  अम्बेदकर जी हिन्दु धर्म की सभी बुराइयों तथा अछूतों की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दासता की जड मनुस्मृति को मानते थे, इसीलिए उन्होंने 25 दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति की होली जलाई थी, जबकि गांधी जी गीता को अपना पथप्रदर्शक मानते थे और अन्य धर्मग्रंथों का भी आदर करते थे, उनके प्रार्थना गीत भी हिन्दुओं के अनुसार ही थे, फिर भी, जब 1931 के गोलमेज सम्मेलन में रैम्जे मैक्डोनाल्ड ने उन्हें हिन्दू कह कर संबोधित किया तो उन्हेंने उसका यह कह कर जोरदार विरोध किया कि वे केवल व्यक्तिगत जीवन में अपने ईश्वर के समक्ष हिन्दू हैं, शेष दुनिया के लिए वे केवल भारतीय हैं और वे स्वयं को हरिजन मानते हैं ।

गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से वापस आए तो उन्होंने पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया, हर राज्य, हर क्षेत्र, हर वर्ग , हर जाति, हर धर्म – सम्प्रदाय के लोगों से मिले, उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों को देखा – परखा – समझा , उनकी समस्याएं खुद उनके मुंह से ही सुनीं, उनके दुखदर्द को हृदय की गहराई तक महसूस किया , तब सक्रिय राजनीति में उन्होंने पदार्पण किया । यही कारण था कि वे सभी समस्याओं की जड को जानते – पहचानते व समझते थे तथा व्यापक दृष्टिकोण के साथ उन समस्याओं का समूल निराकरण करना चाहते थे। अंबेदकर जी ने भी भारतीय राजनीति में कूदने के पहले लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता संबंधी सारे दांवपेंच पश्चिम से सीख लिए थे। जब वे सार्वजनिक जीवन में आए तो उनके समाज की वे सारी विकराल समस्याएं मुंह बाये सामने खडी थीं जिन्हें खुद उन्होंने भी झेला – भोगा था। यही कारण था कि उनके मन में सवर्ण हिन्दुओं के विरुद्ध कटुता भर गई थी और वे केवल अछूत समाज के हितों की ही बात करते थे । एक बार जब ए बी ठक्कर ने अम्बेदकर पर आरोप लगाया कि – “अम्बेदकर हरिजनों के लिए तो अत्यधिक रियायतें चाहते हैं पर आदिम जातियों को उनका न्यायसंगत अधिकार दिलाने से भी इंकार करते हैं” , तो अम्बेदकर जी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्होंने दुनिया भर के सताये हुए लोगों का मसीहा होने का दावा कभी भी नहीं किया , जबकि गांधी जी ने 1920 में ही घोषणा कर दी थी कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अस्पृश्यता निवारण को सर्वोच्च स्थान देना होगा , उस कलंक को धोए बिना स्वराज्य बेकार है।  गांधी जी ने  यह भी कहा कि छुआछूत हिंदू धर्म का अंग नहीं है, मैं सोचता हूं कि अगर हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता बनी रहती है तो इससे अच्छा यही है कि इस धर्म का नामोनिशान मिट जाए । उन्होंने एक कदम और आगे बढ कर यह भी कह दिया मैं अछूतों के महत्त्वपूर्ण  हितों की बलि नहीं चढने दूंगा , चाहे देश को स्वाधीनता मिले या न मिले । इस तरह गांधी जी की सोच व्यापक थी , इसीलिए उन्होंने कहा  – “ मैं अम्बेदकर की योग्यता का सम्मान करता हूं पर अपने जीवन में उन्होंने जो मुसीबतें झेली हैं, उनकी कडुवाहट में वे न्याय को भुला बैठे हैं”। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रख कर हमें गोलमेज सम्मेलन और अछूतों के लिए अपेक्षित प्रावधानों तथा यर्वदा जेल में गांधी जी के आमरण अनशन और पुना पैक्ट को देखना – समझना होगा, तभी हम विचारों के अंतर्द्वंद्व को सही व सम्यक रूप में समझ पाएंगे।

पहला गोलमेज सम्मेलन लंदन में 12 नवम्बर 1930 को हुआ, उसका उद्देश्य भारत का संविधान बनाना था, हालांकि अंतर्निहित उद्देश्य भारतीयों को संतुष्ट करना था। उसमें कुल 89 सदस्य थे, जिनमें ब्रिटिश राजनीतिक दलों के 16, भारतीय रजवाडों के 20 तथा विभिन्न हितों के पोषक 53 सदस्य थे और उनमें ही  अम्बेदकर तथा रायबहादुर श्रीनिवास दलित जातियों के प्रतिनिधि के रूप में थे, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण उसमें कॉंग्रेस का कोई प्रतिनिधि नहीं था। अम्बेदकर ने वहां कहा कि अछूतों का हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है । उन्होंने मांग की कि चुनाव की दृष्टि से दलित जातियों को अलग समुदाय माना जाए तथा उन्हें समान नागरिकता और नागरिक अधिकार भी दिया जाए एवं विधायिकाओं, सरकारी सेवाओं व मंत्रीमंडल में उनके उचित प्रतिनिधित्व के प्रावधान किए जाएं।   उन्होंने अछूतों की समस्या को लीग ऑफ नेशंस के सामने रखने का भी विचार किया। गांधी जी ने इसी परिप्रेक्ष्य में कहा था कि व्यक्तिगत रूप से झेले गए अपमान से अम्बेदकर के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी कटुता भर गई है कि वे न्याय को भुला बैठे हैं।

मार्च 1931 में गांधी – इरविन समझौते के आलोक में कॉंग्रेस ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया और अगले गोलमेज सम्मेलन में शिरकत के लिए हामी भर दी। तदनुसार लंदन में 07 सितम्बर 1931 को आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कॉग्रेस का प्रतिनिधित्व महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडु और मालवीय जी ने किया । अम्बेदकर  ने कहा कि सभी सम्प्रदायों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सत्ता में अधिकार दिए जाएं तथा दलित जातियों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए। अब प्रश्न यह था कि दलित जाति किन्हें माना जाए? 1916 में भारत के शिक्षा आयुक्त और साउथब्रो मताधिकार समिति ने दलित जातितों को आदिम जातियों या गिरिजनों अथवा पहाडी जनजातियों से जोड दिया था किंतु अम्बेदकर के प्रयास से लोथियन मताधिकार समिति ने दलित वर्ग में केवल अछूतों को ही शामिल करने का फैसला दिया। बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और गोलमेज सम्मेलन के अध्यक्ष रैम्जे मेकडोनल्ड ने अल्पसंख्यकों के लिए एक कार्यक्रम की घोषणा की जिसमें दलितों को भी अल्पसंख्यक मान लिया गया और उनके लिए विधायिकाओं में सुरक्षित स्थान व पृथक निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया गया तथा दलितों को सुरक्षित स्थान के साथ – साथ सामान्य सीटों से भी चुनाव लडने का अधिकार दिया गया , उस हिसाब से दलितों को दुहरे मतदान ( एक सुरक्षित उम्मीदवार चुनने के लिए और दूसरा सामान्य उम्मीदवार के लिए) का अवसर मिल गया, ये प्रावधान 20 वर्षों के लि किए गए थे । परंतु गांधी जी का कहना था कि इन प्रावधानों से सवर्ण हिन्दुओं और दलितों के बीच अलगाव की पक्की दीवार खडी हो जाएगी, सवर्ण हिन्दू हमेशा के लिए दलितों के लिए खतरा बन जाएंगे, अस्पृश्यता तो हिन्दू धर्म का कलंक है , जो निकट भविष्य में मिट जाएगी, लेकिन पृथक निर्वाचन हमेशा के लिए दुराव पैदा कर देगा ; जबकि अम्बेदकर सोचते थे कि पृथक निर्वाचन , वयस्क मताधिकार और संवैधानिक मूल अधिकारों से दलितों को पूरी सुरक्षा मिलेगी, उन्होंने गांधी पर आरोप लगाया कि वे हिन्दुओं और दलितों के बीच खाई चौडी कर रहे हैं।

दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बद गांधी जी 28 दिसम्बर 1931 को जब बम्बई बंदरगाह पर उतरे तो विशाल जन समूह ने उनका शानदार स्वागत किया, उनके भव्य स्वागत पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने ताना मारते हुए कहा था कि स्वागत तो ऐसा हो रहा जैसे मानो महात्मा जी स्वराज्य अपनी हथेली पर ले कर आए हों! गांधी जी ने जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि वे खाली हाथ लौटे हैं किंतु देश की अस्मिता पर बट्टा नहीं लगने दिया है। 04 जनवरी 1932 को  गांधी जी गिरफ्तार कर लिए गए और पुणे के यरवदा जेल में रखे गए ।

गांधी जी दलितों के लिए सुरक्षित सीटों के प्रावधान पर तो सहमत हो गए किंतु दलितों के पृथक निर्वाचन मंडल का उन्होंने जोरदार विरोध किया और 11 मार्च 1932 को ब्रिटिश सरकार में भारत सचिव सर सैमुअल होर को पत्र लिख कर बताया कि पृथक निर्वाचन मंडल से दलित जातियों का कोई कल्याण नहीं होगा बल्कि उससे वे हमेशा अछूत ही बने रहेंगे तथा पृथक निर्वाचन मंडल देश के टुकडे – टुकडे कर देगा, इसलिए इसे स्वीकार न किया जाए वरना वे आमरण अनशन करेंगे। ब्रिटिश प्रधनमंत्री रैम्जे मैकडोनल्ड ने 17 अगस्त 1932 को गांधी जी की अपील को खारिज करते हुए पृथक निर्वाचन मंडल के पक्ष में ब्रिटेन के निर्णय की घोषणा कर दी , साथ ही,  यह संकेत भी दे दिया कि हिन्दू और हरिजन यदि किसी अन्य एवं पारस्परिक संतोषजनक मतदान व्यवस्था पर राजी हो जाएं तो उसे सरकार स्वीकार कर लेगी। गांधी जी ने भी पत्र लिख कर 20 सितम्बर 1932 को दोपहर से आमरण अनशन करने का अपना निर्णय सुना दिया और साथ ही, उस अनशन का आशय भी स्पष्ट कर दिया कि उनका वह अनशन ब्रिटिश सरकर के विरुद्ध नहीं था क्योंकि सरकार ने तो बता दिया था कि अगर हिन्दू एवं हरिजन एक साथ मिल कर स्वत: किसी वैकल्पिक निर्णय पर पहुंच जाएं तो सरकर उससे सहमत हो जाएगी। 19 सितम्बर 1932 को बम्बई में हिन्दू नेताओं की बैठक हुई जिसमें गांधी जी के अनशन की चर्चा करते हुए यह तय पाया गया कि गांधी जी के प्राण बचाने के लिए जरूरी है कि मैकडोनल्ड के निर्णय को बदला जाए और उसके लिए जरूरी है कि अम्बेदकर उसके लिए सहमति दें। अम्बेदकर जी को वह बात बताई गई किन्तु अम्बेदकर सहमत नहीं हुए और उन्होंने गांधी जी के आमरण अनशन को राजनीतिक पाखंड कहा । फिर भी, वे यरवदा जेल में गांधी जी से मिले, नेताओं के एक पैनल में उस विषय पर चर्चा करने के लिए अम्बेदकर सहमत हो गए।

अम्बेदकर जी ने प्रांतीय एसेम्बलियों में दलितों के लिए 197 सीट सुरक्षित करने की मांग रखी, हालांकि मैकडोनल्ड ने 71 सीट ही सुरक्षित करने का प्रावधान किया था; बुनियादी चुनाव 10 साल के लिए कराने तथा आरक्षण के बारे में अगले 15 वर्षों के बाद दलित जातियों का जनमत संग्रह कराए जाने की मांग भी रखी गई । हिन्दु नेता दलितों के लिए 126 सीट सुरक्षित करने पर सहमत हुए, अम्बेदकर एक तरह से सहमत हो गए किंतु गांधी जी बुनियादी चुनाव 10 वर्षों के लिए कराए जाने तथा आरक्षण की स्थिति पर 15 वर्षों बाद दलितों का जनमत संग्रह कराए जाने पर सहमत नहीं हुए, उनका मानना था कि 5 वर्ष काफी हैं , फिर वे 10 वर्षों की शर्त को भी मान गए। लेकिन जनमत संग्रह पर सहमत नहीं हुए। राजगोपालाचारी ने गांधी जी से पूछे वगैर अम्बेदकर को इस बात पर राजी कर लिया कि प्रारंभिक चुनावों को हटाने का प्रश्न बाद में चर्चा कर तय किया जाएगा , इससे शायद जनमत लेना आवश्यक न रहे । उसके बाद सुरक्षित सीटों की संख्या भी 126 से बढा कर 148 कर दी गई, इस प्रकार अम्बेदकर जितने की मांग कर रहे थे, गांधी जी के माध्यम से उससे ज्यादा ही उन्हें मिल गया। उस आम सहमति के समझौते पर 24 सितम्बर 1932 को शाम 5 बजे सभी पक्षों के हस्ताक्षर हुए, लेकिन उसके बावजूद गांधी जी ने अनशन तोडने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि जब तक दोनों संबंधित पक्षों की सहमति पर ब्रिटिश सरकार मोहर नहीं लगा देती  और मैकडोनल्ड का पृथक निर्वाचन मंडल वाला प्रावधान रद नहीं कर दिया जाता, तब तक उनका अनशन जारी रहेगा।

गांधी जी की हालत खराब होती जा रही थी, वे मरणासन्न हो रहे थे , रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहले ही कह दिया था कि अनशन से महात्मा की जान अगर गई तो उनकी हत्या के लिए सभी हिन्दू जिम्मेवार होंगे, इसीलिए समझौते में हिन्दू नेताओं ने ज्यादा तत्परत दिखाई थी, सारे तथ्य को व्हाईस राय ने तार से लंदन भेज दिया , लेकिन वह रविवार का दिन था, सभी मंत्रीगण शहर से बाहर गए थे, मैकडोनल्ड भी एक श्राद्ध कर्म में भाग लेने के लिए लंदन से बाहर ससेक्स गए थे, गांधी जी की जान  बचाने के लिए देश-विदेश में अफरातफरी मच गई, मैक्डोनल्ड और उनके मंत्री तत्काल लंदन पहुंचे , रात में ही बैठक हुई और सुबह मैकडोनल्ड प्रस्ताव को रद करने की सूचना दिल्ली भेज दी गई, गांधी जी ने सभी निर्णयों की पुष्टि पा कर अपना आमरण अनशन तोड दिया और उनके प्राण बचे। गांधी जी की आमरण अनशन करने की घोषणा ने देश को हिला कर रख दिया था, जगह – जगह प्रार्थानाएं होने लगी थीं, दलितों के लिए मंदिरों के द्वार खोल दिए गए थे, सार्वजनिक प्याऊ पर दलितों को पानी पीने की आज़ादी दे दी गई थी, सवर्ण हिन्दू दलितों को गले लगाने लगे थे;  अहिंसा और उपवास की इस शक्ति से दुनिया अनजान थी किंतु अम्बेदकर की मांग और गांधी की जिद्द ने न केवल दुनिया को गांधी की आत्मिक शक्ति और अपार लोकप्रियता से परिचित कराया, वरन दलितों और सवर्ण हिन्दुओं के बीच एक नई स्थाई दीवार खडी होने से भी देश को बचा लिया । वास्तव में गांधी जी के आंतरिक इच्छा भी वही थी ।

अम्बेदकर जी ने भी 25 दिसम्बर 1932 को बम्बई – सम्मेलन में पुना पैक्ट पर बोलते हुए कहा – “ मैं स्वीकार करता हूं कि जब मैं उनसे मिला , तो मुझे आश्चर्य हुआ , और महान आश्चर्य हुआ कि उनके और मेरे बीच परस्पर मेल खाने वाली कितनी अधिक बातें थीं। वास्तव में जब भी कोई विवाद उनके सामने गया , तो मैं यह देख कर हैरान रह गया कि जो व्यक्ति गोलमेज सम्मेलन में मेरे विचारों से इतना अधिक मतभेद रखता था, वह तुरंत मेरी हिमायत करने लगा, दूसरे पक्ष की नहीं। मैं महात्मा जी का बडा कृतज्ञ हूं कि उन्होंने मुझे ऐसी स्थिति से बचा लिया , जो बहुत कठिन हो सकती थी” । आज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडे वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी प्रावधानों को कार्यान्वित होते देख कर इस बात पर संतोष व्यक्त किया जा सकता है कि बाबा साहब की मांग भी उचित थी तथा उनकी मांगों में गांधी जी द्वारा सुझाए गए संशोधन भी जरूरी थे , और सबसे बडा औचित्य गांधी जी के आमरण अनशन का सिद्ध हुआ है अन्यथा अंग्रेज अन्य मामलों में अपनी “ बांटो और राज करो” नीति थोपने की भांति यहां भी “ तोको ना मोको , चुल्ही में झोंको” वाली नीति अर्थात खुद तो उन्हें भारत से चले ही जाना था, उसके बाद सवर्ण और अवर्ण के नाम पर हिंदुस्तानी लोग लडते रहें यानी “ हमें राज नहीं करने दिया तो तुम भी शांति से न रह सको” की नीति थोप कर चले जाने में सफल हो जाते । संसार में कटुता और मधुरता का संबंध तो स्वाभाविक रूप में चलता ही रहता है, किंतु गांधी और अम्बेदकर की समन्वित नीति ने हजारों साल की सामाजिक कटुता को जड से मिटाने में नहीं तो उसे कम कर चाणक्य की तरह उसकी जड में मट्ठा डालने में तो सफल अवश्य हुई।

निस्सन्देह , अम्बेदकारवाद और गांधीवाद का समन्वित स्वरूप ही प्रचीनता की दीवारों से घिरे अर्वाचीन भारत के उत्थान और सर्वांगीन विकास का मार्ग है क्योंकि अम्बेदकर और गांधी एक – दूसरे के पूरक हैं। मैंने इस आलेख में अन्य विषयों को नहीं उठाया है। इस आलेख में तथ्य भारत सरकार के प्रकाशनों और इन महात्माओं की प्रामाणिक एवं अधिकृत जीवनी से लिए गए हैं, इसीलिए जिन सज्जन को किसी भी तथ्य पर आपत्ति हो, वे कृपा कर मेरे ब्लॉग पर या मुझसे व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क कर स्पष्टीकरण ले सकते हैं।

एक बार फिर, बाबा साहब को प्रणाम और महात्मा जी को नमन !

इसे मेरे ब्लॉग shreelal.in    के साथ – साथ मेरे फेसबुक   shreelal Prasad पर भी देखा जा सकता है।

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम ,14 अप्रैल 2016

28,176 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

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    ) Cheers!

    Reply
  • 21/07/2017 at 6:26 am
    Permalink

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    Reply
  • 21/07/2017 at 6:25 am
    Permalink

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    Thanks a lot!

    Reply
  • 21/07/2017 at 6:18 am
    Permalink

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    writing, it’s uncommon to look a great weblog like this one
    these days..

    Reply
  • 21/07/2017 at 6:10 am
    Permalink

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    Reply

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