डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                                                                      विनोद दुआ जी से …

इंदिरापुरम, 19 अप्रैल 2016

विनोद दुआ जी , नमस्कार !

दिल को सुकून मिल रहा है कुछ दिनों से एक टीवी चैनल पर आप को देख – सुन कर। आप एक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय मीडिया शख्सियत व टीवी ऐंकर पर्सन  रहे हैं , आज भी कोई मुकाबला नहीं है। मैं फिल्मों के किसी भी सुपर स्टार का कभी भी फैन नहीं रहा , लेकिन जब दूरदर्शन के अलावा कोई और टीवी चैनल नहीं होता था और आप प्रणय राय के साथ चुनावी विश्लेषण की युगलबंदी करते थे, तब से मैं आप की ऐंकरिंग और विश्लेषण – कौशल का फैन रहा हूं। चूंकि विगत कुछ दशकों में आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा अन्य बडे संस्थानों के सैकडों महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की ऐंकरिंग करने, देश के अनेक गृहमंत्रियों, वित्तमंत्रियों, अन्य केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, रिज़र्व बैंक के गवर्नरों, बैंकों के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशकों, फिल्म स्टार एवं साहित्यकारों आदि से संबंधित कार्यक्रमों के संयोजन व संचालन का अवसर मुझे मिला है, इसलिए किसी की ऐंकरिंग, संयोजन – समन्वय की क्षमता, परिचर्चा व वादविवाद को सुव्यवस्थित रूप में संचालित करने के कौशल का आकलन व मूल्यांकन करने का शऊर मुझमें है, मैं आश्वस्त हूं कि उसके लिए मुझे किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।

इसलिए मैं अपनी बात पूरे आत्मविश्वास और प्रामाणिकता के साथ रख रहा हूं । मैं आश्वस्त नहीं हूं कि मेरी यह बात आप तक पहुंच ही जाएगी, फिर भी, मैं उसे यहां व्यक्त कर रहा हूं , क्योंकि मैं वो एकलव्य नहीं हूं जिसने द्रोण द्वारा दुत्कारे जाने के बाद उसकी मूर्ति के सामने शस्त्र अभ्यास किया था, मैं तो वो एकलव्य हूं जो द्रोण से कभी मिला ही नहीं और न मिलने की ख्वाहिश रखता है।

इधर आपको देख – सुन कर सुकून इसलिए भी मिला कि आज टीवी चैनलों की आमद बरसाती नदियों की भांति जितने जोरशोर से उफान पर है, उससे भी ज्यादा उफान वाला सैलाब टीवी ऐंकरों का आ गया है । निस्सन्देह , उनमें भी अनेक नाम सुकून देने वाले हैं, लेकिन बहुत – से ऐंकरों को देख – सुन कर तो ऐसा लगता है, मानों उनकी पत्नी ने चलते वक्त दही – गुड खिला कर रोली चन्दन लगा कर इस तरह से भेजा हो, जैसे कोई मां अपने सपूत को रणभूमि में भेजती हो कि पता नहीं, बेटा वापस आए न आए। जब वे कार्यक्रम की पृष्ठभूमि बताते हैं या पैनल के किसी एक्सपर्ट से सवाल करते हैं तभी ऐसा महसूस हो जाता है कि उनके मालिक ने क्या – क्या हिदायतें उन्हें दे रखी है और आज परिचर्चा के बाद एक जज की तरह वे क्या फैसला सुनाने वाले हैं। यह अलग बात है कि आप के बहुत बाद टीवी में नौकरी शुरू करने वाले वैसे कई ऐंकर हैं जो अब अपना साम्राज्य बना बैठे हैं और हजारों लोगों को नौकरी दे रहे हैं। व्यापार से अम्बानी , अदानी, टाटा  और  बिडला बनते तो देखा – सुना था, समाचार वाचन करते – करते और ऐंकरिंग करते – करते टीवी चैनल का मालिक बनते भी देख ही लिया , आखिर यह कोई अनहोनी तो है नहीं, क्योंकि तिरंगा उठा कर ‘सरकार’ बनते और शराब बांट कर ‘विजय’ बनते भी तो इसी धरती पर देखा है । और एक आप हैं कि ऐंकरिंग करते – करते पता नहीं, कहां खो गए थे ?

विनोद जी, आज दिन में एक चैनल पर आपका ‘विनोद दुआ लाइव’ देख रहा था तो बडा आश्चर्य हुआ ! नीतीश जी के ‘ संघमुक्त भारत ’ नारे की तुलना आपने मोदी जी के ‘ कॉंग्रेसमुक्त भारत ’ से की। चलिए वहां तक तो ठीक था, फिर आपने नीतीश जी के नारे की तारीफ की , वह भी स्वाभाविक लगा, लेकिन उसके बाद आपने कहा कि मोदी जी कॉग्रेसमुक्त भारत बना नहीं पाए क्योंकि कॉंग्रेस को 44 सदस्य तो लोकसभा में मिल ही गए; ठीक उसी तरह नीतीश भी संघमुक्त भारत बना नहीं पाएंगे । संभवत: ऐसा ही कुछ कहा था आप ने। मुझे आपत्ति केवल यहीं पर है। आप के जैसा ऐंकर , जो बाल की खाल ही नहीं निकालता, उसकी हड्डी – पसली को भी अलग कर देता है, वह शाब्दिक विश्लेषण के जाल में कैसे फंस गया? मोदी जी का भी आशय कॉग्रेस को सत्ता विहीन और प्रभावहीन बनाने से ही रहा होगा , शायद ही उनका यह आशय रहा हो कि कॉंग्रेस को कहीं भी एक भी सीट न मिलने देंगे ; कारण चाहे जो भी रहा हो, निश्चित रूप से वे सफल हुए। ठीक वैसे ही, संभवत: नीतीश जी का आशय भी सता को संघ की विचारधारा से विहीन एवं उसके प्रभाव से मुक्त करने तथा सत्ता से संघ की विचारधारा को दूर करने से रहा होगा। नीतीश जी की मंसा की दबे जुबान आप ने तारीफ की, और मैं मानता हूं कि अगले चुनाव में नीतीश जी वैसा कर पाएंगे, इस विषय पर मैं अपने ब्लॉग http://www.shreelal.in  में 10 अप्रैल की पोस्ट में विस्तार से लिख चुका हूं। मेरा मानना है कि नीतीश जी का भी आशय शायद ही यह रहा हो कि संघ की विचारधारा को वे भारत भूमि से उखाड फेकेंगे , क्योंकि वह मामला तो राजनीतिक नहीं, सामाजिक हो जाएगा, जबकि नीतीश जी की घोषणा राजनीतिक है।

मुझे लगता है कि नीतीश जी के नारे को आपने शब्दों के सांचे में ही ढाल दिया जबकि उसे व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखा जाना चाहिए और उसका विश्लेषण भी उसी परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए। यह भी हो सकता है कि आप खुद वह बात जान – समझ रहे हों और शायद , हालांकि यह कहने में 1000 बार सोच चुका हूं, आप की अंतिम टिप्पणी में चैनल की सोच को डालना जरूरी हो।कृपया आप ऐसा मत कीजिएगा, वरना 35 वर्षों का विश्वास टूट जाएगा।

धन्यवद !

महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 19 अप्रैल 2016

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