डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

ज्योतिष , राशियां , भविष्यवाणियां और
‘मीन–मेष निकालना’ हिन्दी मुहावरे का सच….

इंदिरापुरम, 22 अप्रैल 2016

हिंदी में एक प्रसिद्ध मुहवरा है – “मीन – मेष निकालना” , जिसका लगभग समानार्थी मुहावरा है – “बाल की खाल निकालना” यानी  “नुक्तचीनी करना” आदि। इन सबका अर्थ प्राय: एक – सा है – गलतियां निकालना या दोष ढूंढना अर्थात छिद्रांवेषण ; किंतु इनमें से “मीन – मेष निकालना” कुछ अलग मायने भी रखता है, उसमें अंतर्निहित अर्थ है – आसानी से किसी निर्णय पर न पहुंचना, आगा – पीछा करना, असमंजस की स्थिति में होना यानी दुविधा में होना , गहन चिंतन – मनन कर वस्तुस्थिति का पता लगाने का प्रयास करना। हम इस विषय की चर्चा अंत में करेंगे, पहले ज्योतिष , राशियों और भविष्यवाणियों की चर्चा कर ली जाए।

ज्योतिष ग्रहों , नक्षत्रों आदि की दूरी और गति आदि की गणना से संबंधित विद्या है। यह विद्या दो प्रकार की होती है – गणित – ज्योतिष यानी स्ट्रोनॉमी और फलित – ज्योतिष यानी स्ट्रोलॉजी, दोनों ही खगोल विद्या हैं किंतु ज्योतिषी फलित ज्योतिष के ज्ञाता यानी स्ट्रोलॉजर को ही कहते हैं और गणित ज्योतिष के ज्ञाता यानी स्ट्रोनॉमर को खगोल शास्त्री या अंतरीक्ष विज्ञानी कहते हैं। विवाद यहीं से शुरू होता है। स्ट्रोनॉमी मंत्र (फॉर्मूला अर्थात निश्चित सिद्धांत) , यंत्र (वैज्ञानिक उपकरण) और तंत्र (मंत्र एवं यंत्र विहित विधि) आधारित है यानी स्ट्रोनॉमर अपनी गणितीय गणना को, ग्रहों – नक्षत्रों की दूरी, गति, स्थिति, वहां तक पहुंचने का मार्ग, सम्पर्क साधने की विधि आदि का प्रामाणीकरण वैज्ञानिक खोजों, उपकरणों, गतिविधियों के द्वारा भौतिक रूप से करता जा रहा है , जबकि उन्हीं विषयों के संबंध में स्ट्रोलॉजर की गणितीय गणना अभी तक केवल मंत्र आधारित यानी भौतिक रूप से प्रामाणीकरण से दूर है।

स्ट्रोनॉमर चांद पर जाने, चांद से भारतीय अंतरीक्ष यात्री राकेश शर्मा द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से फोन पर बात किए जाने , मंगल ग्रह पर यान भेजने , वृहस्पति ग्रह की खोज में लगने, कल्पना चावला के अंतरीक्ष से लौटते हुए यान सहित जल कर गिर जाने तथा चन्द्रग्रहण – सूर्यग्रहण की सटीक भविष्यवाणी करने आदि को भौतिक रूप में साबित कर सकता है , परंतु स्ट्रोलॉजर अभी भी हेतु – हेतु मद भूत यानी ऐसा हो तो वैसा होगा, ऐसा हुआ होता तो वैसा हो गया होता जैसे वाक्यों में ही अटके हैं। इसीलिए इन विषयों की मूलभूत जानकारी के वगैर किसी बहस में उलझना निरर्थक वाग्विलास ही है।

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में फलित ज्योतिष की प्राधानता है जिसमें भविष्यवाणियां राशि के आधार पर की जाती हैं। राशियों का निर्धारण भी कई रीतियों से किया जाता है – जन्मतिथि , समय और स्थान के अनुसार ग्रहों – नक्षत्रों की स्थिति व चाल के आधार पर, नाम के प्रथम अक्षर के आधार पर तथा जन्म के मास एवं तारीख के आधार पर आदि – आदि । भारत सहित अन्य मुल्कों में भविष्यवाणियों की कई विधाएं और विधियां रही हैं। अंक ज्योतिष का प्रचलन भी बढ गया है, जिसमें नाम के अक्षरों के आधार पर तथा कुछ अन्य विधियों से भी, अंक और मूलांक निर्धारित होते हैं, टैरोकार्ड रीडिंग भी लोकप्रिय हो रही है, रामायण के श्लोक, रामचरित मानस की चौपाइयों, कुरानपाक़ की आयतों , बाईबल की सूक्तियों को भी भिन्न – भिन्न तरीके से भविष्यवाणियों का माध्यम बनाया जाता रहा है।

आजकल फेसबुक पर कई तरह के लिंक भेजे जाते हैं जिन्हें क्लिक करने पर विषयवार भविष्यवाणियां स्वत: सामने आ जाती हैं जो बकवास या अधिक से अधिक मनोरंजन के साधन के सिवा दूसरा कुछ नहीं है क्योंकि उनका आधार आप के द्वारा ही समय – समय पर इंटरनेट में जाने – अनजाने फीड किए गए डाटा ही हैं। कहीं – कहीं और कुछ – कुछ लोगों द्वारा भविष्यवाणियां करने के अजीबोगरीब तौरतरीके अपनाए जाते हैं। आजकल टीवी चैनलों पर भविष्य दर्शन – वाचन टीआरपी बढाने , क्योंकि दुखी और सशंकित भारतीय जनमानस के लिए भविष्यवाणियां आश्रयस्थली बन गई हैं, और उससे संबंधित विज्ञापन आमदनी बढाने का पुख्ता जरिया बन गए हैं, कृपा बांटने वाले बाबाओं की भी कमी नहीं है।

कभी – कभी कुछ खास लोगों द्वारा किसी फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की सैकडों साल पहले की भविष्यवाणियों को आज की घटनाओं से जोड कर निहायत बचकाने और हास्यास्पद तर्क देकर सही साबित करने की कोशिश की जाती है। कुछ लोग महात्मा गांधी की हत्या होने , अमेरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर टॉवर को लादेन द्वारा ध्वस्त कराए जाने और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणियां भी नास्त्रेदमस की भविषवाणियों में ढूंढ लेते हैं , और उसे प्रमाणित करने के लिए नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों में से कुछ पंक्तियां चुन कर निकालते हैं तथा उनकी मनोनुकूल व्याख्या कर देते हैं जो अनर्गल प्रलाप के सिवा और कुछ नहीं। उस तरह की  व्याख्या और दावों को केवल हास्यापद ही नहीं बल्कि अफवाह एवं जनमानस को भ्रमित करने वाला आपराधिक कृत्य समझा जाना चाहिए, क्योंकि जो तर्क वे देते हैं और जिस विधि से वे पूर्वोक्तियों की व्याख्या करते हैं, उन्हीं तर्कों तथा विधियों से विश्व इतिहास की कई घटनाओं की भविष्यवाणियां महाभारत , रामायण, उपनिषदों, वेदों एवं अन्य भारतीय ग्रंथों में ढूंढी जा सकती हैं।

इसीलिए मैं अपनी चर्चा में उन महान सभ्यताओं की भविष्यवाणियों की विधियों को शामिल नहीं करूंगा जिनमें यह विश्वास प्रचलित था कि मृत व्यक्ति के साथ उसके दैनिक उपयोग की सामग्रियों के साथ – साथ जिन्दा सुन्दर महिलाएं भी दफना दी जाएं क्योंकि उस मृत व्यक्ति को कब्र में भी औरतों की जरूरत होगी। दुनिया के कई देशों में उस तरह की प्रथा कई रूपों में प्रचलित रही हैं, हमारे यहां भी तर्पण करने के साथ – साथ श्राद्ध में बिछावन से ले कर अन्य जरूरी समान दान करने की परम्परा आज भी है, जो ढकोसला , अन्धविश्वास व एक वर्ग की धूर्तता के सिवा और कुछ नहीं,  फिर भी , जिन्दा औरतों को भी मृतक के साथ दफनाने की परम्परा शायद हमारे यहां कभी भी नहीं रही थी।

“मीन – मेष निकालना”  हिन्दी मुहावरे का विश्लेषण करने के पहले राशियों की स्थिति और उनके स्वरूप की भी चर्चा कर लें तो बेहतर होगा। राशियों की संख्या बारह मानी जाती है, हालांकि ग्रहों की संख्या पूर्वज्ञात नौ की संख्या से बढ जाने की भांति कब राशियों की भी संख्या बढ जाए, कहना मुश्किल है। फिर भी, फिलहाल राशियां बारह हैं, आकाश में निर्धारित दिशाओं में देखने पर रात में , अन्धेरी रात में ज्यादा स्पष्टता से , तारों के अलग – अलग गुच्छे नज़र आएंगे, दूरबीन से या स्वच्छ रात्रि में नंगी आंखों से भी वे गुच्छे देखे जा सकते हैं । ध्यान से देखने पर तारों के समूह किसी न किसी आकार में उभरते हुए प्रतीत होंगे, उन्हीं आकारों के आधार पर बारह राशियों का नामकरण किया गया है। चूंकि अभी तक तारों के समूह की कोई तेरहवीं आकृति स्पष्ट रूप से नहीं नज़र आई है, इसीलिए राशियों की संख्या अभी भी बारह ही मानी जाती है। किसी ज्योतिषाचार्य से यह बात कहने पर झगडा हो जाने की शतप्रतिशत संभावना है क्योंकि ग्रहों की संख्या नौ से ग्यारह हो जाने की चोट को वे अभी तक सहला रहे हैं।

हालांकि ग्रह – नक्षत्रों की स्थिति, गति एवं गतिविधियों की वैज्ञानिक गणना को एकदम से झुठलाया नहीं जा सकता , उनकी स्थिति, गति और गतिविधियों का असर पृथ्वी वासियों, उनमें मनुष्य भी हैं, पर पडने की बात को भी एकदम से झूठा कह देना तर्कपूर्ण नहीं प्रतीत होता, क्योंकि ग्रहण लगने और समुद्री तूफान आने में ग्रहों की स्थिति एवं गति आदि प्रमुख कारण हैं , परंतु उन प्रभावों को किसी पूजापाठ, तंत्र-मंत्र-यंत्र (टोटके ताबीज) से निष्प्रभावी बना देने यानी प्रतिकूल प्रभाव को अनुकूल बना देने या विद्वेष से अनुकूल से प्रतिकूल बना देने , उच्चाटन – मारण मंत्र आदि , बकवास ही नहीं , बल्कि वैसे दावों को आपराधिक कृत्य घोषित कर देना चाहिए।

तमाम वैज्ञानिक खोजों और उपकरणों के बावजूद समुद्रविज्ञानी तथा अंतरीक्ष विज्ञानी कुछ ही हद तक सटीक भविष्यवाणी करने में सफल हो पाते हैं जिसे वे भविष्यवाणी न कह कर पूर्वानुमान कहना बेहतर समझते हैं, जबकि भूगर्भ विज्ञानी अभी भी भूकम्पों के पूर्वानुमान की विधि तलाशने में लगे हैं , तो आखिर इन ज्योतिषाचार्य महाशयों को कौन – सा अल्लाउद्दीनी चिराग़ हाथ लग गया है जिसके माध्यम से वे ग्रहों की स्थिति, गति और गतिविधियों को भी परिवर्तित करा देंगे। इसीलिए आएं, उन दावों को फलित ज्योतिष के मूलभूत सिद्धांतों पर ही परखें, और वह मूलभूत सिद्धांत “मीन – मेष निकालाना” मुहावरा में ही निहित है।

पृथ्वी गोल है, फिलहाल इस पर तो कोई विवाद नहीं है, वैसे ही खगोल है यानी अंतरीक्ष भी गोल ही है , उस पर भी किसी विवाद की गुंजाईश नहीं होनी चाहिए, खास कर फलित ज्योतिषाचार्यों को तो बिलकुल कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए और यदि किसी को कोई ऐतराज़ होगा तो उसे उसी क्षण ज्योतिष को समाप्त मान लेना चाहिए। तो आईए, यह मान कर चलते हैं कि पृथ्वी की भांति ही खगोल है जिसमें ही सभी ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों का स्थान है। राशियों की गणना में मेष राशि पहली तथा मीन राशि अंतिम राशि है।

मेष राशि 66 तारों के समूह से बनती है, उन तारों का समूह इस प्रकार स्थित है कि उनसे एक आकृति उभरती हुई प्रतीत होती है जो मेष यानी भेड की तरह दीखती है। मीन का अर्थ होता है मछली , यानी तारों के समूह से बनी जो आकृति मछली की तरह दीखती है, वह मीन राशि है, जिसमें पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र तथा रेवती नक्षत्र हैं। यह तो सभी जानते हैं कि मछली पानी से बाहर निकाल देने पर मर जाती है, वह हमेशा पानी के अन्दर ही जीवन का सार – तत्व ढूंढती है और पाती है । हमारे यहां तंत्र साधना और योग साधना में मोक्ष प्राप्ति का एक मार्ग मीनमार्ग भी माना जाता है , वह मार्ग साधक के अन्दर ही गुप्त रूप में होता है जैसे पानी में मछली गुप्त जीवन जीती है। इसलिए मछली को साधना में रहस्य का प्रतीक माना गया है।

मान लीजिए कि किसी बडे-से वृताकार चाक पर आप 12 खूंटियां लगा कर चाक को किसी कील पर बैठा देते हैं किंतु खूंटियों पर कोई नम्बर नहीं टांकते , उस कील को धुरी कह सकते हैं,  ठीक वैसे ही जैसे जुआ खिलाने वाला कांटा वाला चाक नचाता है , वैसे ही 12 खूंटियों वाले चाक को भी नचा देते हैं, यह ध्यान में रखें कि केवल चाक ही नाचेगा, उसके नीचे की जमीन ज्यों की त्यों स्थिर रहेगी, तो चाक के रूक जाने पर आप से ही पूछा जाए कि पहली खूंटी कौन – सी है और आखिरी खूंटी कौन – सी है ? आप कैसे पहचान पाएंगे क्योंकि पहला मेष और अंतिम मीन , संभव है , अपने पूर्वस्थित स्थान के सामने न रूक कर आगे – पीछे रूक जाएं या बिलकुल ही जगह बदल जाए। इसीलिए उनका स्थान निर्धारण दोषपूर्ण ही नहीं, बिलकुल वाहियात है या अधिक से अधिक संयोग पर निर्भर हो सकता है । इससे भी खतरनाक किंतु विश्वसनीय तर्क दूसरा भी देख लीजिए —-

ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति व गति बदलती रहती है, वस्तुत: वह बदलाव पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के चलते होते रहता है। अब ऊपर बताए गए चाक पर लगी 12 खूंटियों पर ध्यान  दें , ये ग्रह – नक्षत्र पृथ्वी से अपनी दूरी के अनुसार अलग – अलग समय पर राशि दर राशि पहुंचते रहते हैं, ज्योतिषी उन्हीं के आधार पर विभिन्न राशिधारी मनुष्यों के भविष्य को बांचते हैं। मीन राशि पहुंचने के बाद ग्रह – नक्षत्र मेष राशि में प्रवेश करते हैं। वृत में सामान्य रूप से देखने पर तो मीन के ठीक बाद ही मेष आता है यानी दोनों राशियों के बीच कोई फासला नहीं है किंतु बारीकी से समझने पर यह स्पष्ट होगा कि दोनों राशियों के बीच ग्यारह राशियों का फासला है यानी किस क्षण, किस पल , किस निमिष ग्रह – नक्षत्रों की स्थिति मीन से आगे बढ कर मेष में दर्ज हुई, इसका निर्धारण  दुष्कर ही नहीं, असंभव जैसा है और इसमें पल भर की गलत गणना 12 गुनी गलत फल बताएगी।

राशियों के भविष्य फल पर आंख मूंद कर विश्वास करने वाले विद्वदजन और विदुषियो ! सामने के छोटे – से मैदान में क्रिकेट की छोटी – सी गेंद को फेंकने, मारने, पकडने, बाउंड्री पर या उसके इधर या उधर गिरने , लाइन पर या उसके इधर या उधर से बॉलिंग करने आदि को निर्धारित करने के लिए कितने उपकरण, व्यक्ति थर्ड अम्पायर आदि की सहायता ली जाती है , तब भी दर्शकों को बहुत – से निर्णयों में त्रुटि नज़र आ जाती है तो निस्सीम ब्रह्माण्ड में ग्रहों, नक्षत्रों के राशियों में संचरण पर कितना असमंजस होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, तो फिर उसके आधार पर भविष्यवाणी पर कैसे विश्वास किया जा सकता है। मीन – मेष मुहावरा वैसी ही परिस्थितियों का प्रतीक है। ऐसे असमंजस वाला परिणाम बताने वाली विधा यानी भविष्यवाणी पर अन्धविश्वास करने तथा उसी के अनुसार कार्य करने और अपने निश्चित कर्म व ‘धर्म’ अर्थात मानवीय संवेदनशीलता को दरकिनार करने वालों के बारे में क्या रूख अपनाया जाना चाहिए और अपनी भविष्यवाणी को सच होने का दावा करने वालों के साथ क्या स्लूक किया जाना चाहिए ? बताईएगा।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 22 अप्रैल 2016

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