डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की विरासत और  गुमनामी बाबा का सच

बनाम

पश्चिम बंगाल का विधान सभा चुनाव

इंदिरापुरम, 05 मई 2016

क्या किसी महान व्यक्ति की विरासत का मतलब केवल उसके वंशज होते हैं ? क्या उस विरासत की रक्षा करना, उसे आगे बढाना , उसके सपनों को पूरा करना केवल उसके वंशजों की ही जिम्मेदारी होती है ? क्या उसके वंशजों की शरण में गए वगैर उस महान व्यक्ति का नामोनिशान नहीं बच पाएगा ? क्या ईसा मसीह, महावीर, बुद्ध, महात्मा गांधी के वंशजों ने ही उनके विचारों को सारी दुनिया में फैलाया ? इसका उत्तर यदि ‘हां’ है तो बतलाया जाए कि किस महान व्यक्ति के किस वंशज ने क्या किया और यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो फिर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के वंशज को मोहरा क्यों बनाया गया ?

प्राय: किसी खास व्यक्ति या व्यक्तियों अथवा परिवार या परिवारों पर खास – खास लोगों या दलों द्वारा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि राजनीति का क, ख, ग भी नहीं जानने वाले को सीधे संसद में हवाई लैंडिंग केवल इस बल पर करा दी गई कि वह परिवार विशेष में पैदा हुआ शख्स है। तो फिर यह बताया जाए कि नेताजी के उस वंशज विशेष ने राजनीति के मैदान में कौन – सा अनुभव प्राप्त कर रखा था कि सीधे विधान सभा में पहुंचाने के लिए सबसे ताकतवर रानीतिक हस्ती के खिलाफ खडा करा दिया गया ? क्या यह हवाई लैंडिंग का प्रयास नहीं है ? क्या उसकी सबसे बडी क्वालिटी और सबसे बडा अनुभव यही नहीं है कि वह नेताजी का वंशज है ? क्या यह परिवारवाद नहीं है ? क्या यह नेताजी जैसे महान व्यक्तित्व का दोहन नहीं ? यदि ऐसा ही है तो फिर किसी दूसरे व्यक्ति या परिवार की आलोचना कोई क्या खा कर करेगा?

लोकतंत्र में विहित शर्तों का पालन करते हुए कोई भी किसी भी पार्टी से या स्वतंत्र रूप से भी चुनाव लड सकता है, इसमें न किसी को आपत्ति है, न हो सकती है और न होनी चाहिए। परंतु जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अद्वितीय योद्धा और महान देश भक्त नेताजी जैसे व्यक्तित्व को राजनीतिक ढाल बनाया जाने लगे तो नीयत पर संदेह होने की गुंजाईश बढ जाती है। जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था और 1945 में ताईवान में नेताजी के विमान के दुर्घटनाग्रस्त  हो जाने की खबर फैली, तब से ले कर अब तक उस दुर्घटना में नेताजी के मारे जाने अथवा उससे बच निकल कर गुमनामी का जीवन जीने को ले कर न जाने कितने आयोग बने, कितनी जांच समितियां बनीं और अपनी रिपोर्टें प्रस्तुत कीं! उनमें से कुछ रिपोर्टें स्वीकार ली गईं, कुछ नकार दी गईं और कुछ संदेह के दायरे में रख दी गईं ।

नेताजी की गुमनामी से संबंधित वह विषय हमेशा रहस्य – रोमांच व कुतुहल पैदा करता रहा है और समय – समय पर कभी सत्ता को घेरने के लिए तो कभी सत्ता को उबारने के लिए औजार के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। नेताजी एक विचार हैं, स्वाधीनता, समानता , स्वाभिमान और स्वराष्ट्रप्रेम का साकार स्वरूप हैं, उन्हें राजनीतिक स्वार्थ – सिद्धि का साधन बनाए जाने और उनके वंशजों का खुद को उसका एक हिस्सा बना लिए जाने देने की प्रवृत्ति नेताजी की कीर्ति – पताका को कितना ऊंचा ले जाएगी, यह वक्त नहीं बताएगा, बल्कि वक्त उसका हिसाब मांगेगा।

मेरी समझ में वैसी किसी हस्ती को वंशजों के सहारे की जरूरत नहीं होती, और, यदि जरूरत होती है तो फिर दूसरों पर भाई – भतीजावाद या परिवारवाद करने का आरोप लगाने का क्या तुक है? क्योंकि महान व्यक्तियों के वंशज उनके नाम का सहारा ले कर एक मौका तो हासिल कर सकते हैं, टीके रहने के लिए तो काबिलियत ही काम आएगी। इसके सैकडों उदाहरण अपने आसपास और आगे – पीछे बिखरे पडे हैं, नज़र घुमाने भर की देर है, नजर आने में देर नहीं लगेगी। इसीलिए मेरा मानना है कि दुनिया में जहां कहीं भी स्वतंत्रता , समानता, सम्मान व देशाभिमान के लिए एक कदम उठेगा, वहां उसके साथ कदमताल करते हुए आज़ाद हिंद फौज़ के प्रयाण गीत –

“ कदम – कदम  बढाए  जा, खुशी के गीत गाए जा;

ये  जिन्दगी  है कौम की,  कौम पे    लुटाए जा”

के अन्दाज़ में नेता जी की विरासत ही बोलेगी , इसलिए उस विरासत को सम्भालने के लिए न किसी वंश की जरूरत है, न वंशज की ।

फैज़ाबाद के एक मंदिर में किसी गुमनामी बाबा के रहने और 1985 में उनके दिवंगत होने का समाचार वर्षों से सुर्खियों में रहा है। यह भी अनुमान लगाया जाता रहा है कि वही गुमनामी बाबा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस थे । उनसे मिलने देश के बडे – बडे लोगों के जाने और बडे – बडे अवसरों पर किसी न किसी रूप में गुमनामी बाबा की उपस्थिति की बात भी कही जाती रही है। इधर जब से नेताजी से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से गुमनामी बाबा की चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है, यह भी कहा जा रहा है कि गुमनामी बाबा के मरने के बाद उनके कमरे से मिले सैकडों सामान, जिनमें नेताजी से जुडी तस्वीरें व पत्र आदि भी होने की बात कही जाती है, फैज़ाबाद जिले के सरकारी मालखाने में जमा हैं और उनको सूचीबद्ध किए जाने की बात भी कही जाती है। इस विषय की चर्चा बाद में , पहले उस कहानी को मैं अपने सुधी पाठकों से शेयर करना चाहता हूं, जिसका हिस्सा 45 साल पहले मैं भी रहा था और शायद उसके मुख्य पात्र गुमनामी बाबा ही थे!

बात 1971 की है, तब मैं बीए पार्ट वन में एमएस कॉलेज मोतीहारी में पढता था। मैं छुट्टियों में अपने गांव आया हुआ था। बिहार राज्य के पूर्वी चम्पारण जिले के नरकटिया विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत मेरा गांव सिसवनिया है, वहां से कुछ ही दूरी पर भारत – नेपाल बोर्डर के सीमांत शहर रक्सौल और बीरगंज हैं। नरकटिया मेरे गांव से तीन किलोमीटर उत्तर में है, वहां एक हाई स्कूल है, मैं ने उसी स्कूल से मैट्रिक किया था (और बीए ऑनर्स कर लेने के बाद उसमें शिक्षक भी नियुक्त हुआ था)। तब ग्यारहवीं में मैट्रिक होता था। ग्यारहवीं में आते – आते मैं स्कूल के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिना जाने लगा था। ग्यारहवीं में पढते हुए ही जब हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत या समाज अध्ययन के शिक्षक अवकाश पर होते थे तो उनकी जगह 8वीं से 10वीं तक की क्लास लेने के लिए मुझे कह दिया जाता था और जब मैं कॉलेज में चला गया तो छुट्टी में गांव आने पर मुझे प्राय: क्लासें लेने के लिए बुला लिया जाता और ग्यारहवीं क्लास के छात्रों को भी पढाने के लिए लगा दिया जाता। उसी सिलसिले में मैं पैदल चल कर अपने गांव से नरकटिया हाई स्कूल जाता था।

मेरे गांव और नरकटिया हाई स्कूल के बीच में केवल चार – पांच घरों का एक गांव था जिसका नाम लौकहां है। लौकहा गांव तो बिलकुल छोटा था ( हालांकि अब वह बडा स्थायी मार्केट हो गया है और वहां बहुत – से मकान – दूकान बन गए हैं), किंतु वहां एक महंथ थे जो प्रति वर्ष एक विशाल पशु मेला का आयोजन कराते थे, वह मेला एक माह तक चलता था। पहले वहां अस्थायी तौर पर कुछ झोपडियां खडी कर दूकान व दफ्तर बना लिए जाते थे, 1971 तक आते – आते महंथ जी ने अपने दफ्तर और कुछ दूकानों के लिए पक्के कमरे बनवा लिए थे।

महंथ जी के पास हमेशा साधु – संत आते रहते थे, उन दिनों मेला का समय नहीं था, मेले के दफ्तर वाले कमरों में कुछ दिनों पहले एक संन्यासी बाबा आ कर रहने लगे थे, उनके पास ढेर सारे सामान थे जो बाकी कमरों में पडे थे, उनमें ताले संन्यासी बाबा के ही लगे थे। हर आदमी के लिए संन्यासी बाबा से मिलना आसान नहीं था, वे रात – दिन हवन और पूजा – पाठ में लीन रहते थे, कुछ ही समय के लिए कुछ खास लोगों से ही मिलते थे। सामान वाले कमरों की तरफ किसी को भी जाने की इजाजत नहीं थी। पूरे इलाके में दबी जुबान यह बात फैल रही थी कि वह संन्यासी बाबा कोई और नहीं, बल्कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस थे, उनके बारे में और भी तरह – तरह की बातें होती थीं । उनके पास कभी – कभी पुलिस और प्रशासन के लोग भी आते थे। मेरे पिता जी बाबा से मिल आए थे , जब छुट्टियों में मैं घर आया और स्कूल जाने लगा तो उन्होंने मुझे भी कहा कि स्कूल से लौटते हुए संन्यासी बाबा से मैं मिलता आऊं, उन्होंने अपना अनुमान  भी मुझे बता दिया और यह भी हिदायत दे दी कि यदि बाबा मिलने को तैयार न हों तो महंथ जी से कहलवा दूं।

मैं ने हाई स्कूल में शिक्षकों से संन्यासी बाबा के बारे में चर्चा की , उन लोगों ने बताया कि मिलने की उत्सुकता तो थी किंतु पता नहीं कि वे मिलेंगे भी या नहीं और मिलेंगे भी तो कब , इसीलिए वे लोग तब तक जा नहीं पाए थे। मॉर्निंग स्कूल था, मैं लौटते समय बाबा से मिलने जा पहुंचा, कमरा बन्द था, मैंने विनम्रता पूर्वक आवाज़ दी और अपना परिचय दिया, बाबा ने दरवाजा खोल दिया । मैं ने उन्हें देखा तो देखता रह गया, विराट व्यक्तित्व, गोरा रंग, सोने जैसा दप – दप करता चेहरा , प्रशस्त ललाट , लम्बी – लम्बी दाढी और मूंछें ! किशोर वय का अभिभूत हो जाने वाला मन – मिजाज था मेरा, मैं अवाक रह गया, झुक कर उनके चरण स्पर्श किए , अनायास मेरी आंखों से आंसू बह निकले । एक मन सोचता था कि आज नेताजी होते तो उनकी उम्र 74 – 75 साल की हो गई होती, क्या उतनी उम्र में कोई इतना तेजस्वी और तन्दुरूस्त हो सकता है? दूसरा मन सोचता कि नेताजी भी तो एक तपस्वी ही थे और तपस्वियों के बारे में तो कुछ भी सोचा जा सकता है।

आज मैं महसूस करता हूं कि मेरे उस तरह अभिभूत हो जाने के पीछे इलाके में फैल रही बातें और मेरे पिता जी द्वारा जाहिर की गई आशंका तथा अवचेतन मन में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के प्रति अतिशय सम्मान ही सबसे बडा कारण रहा होगा। बाबा ने बडे दुलार से मुझे चौकी पर बिठाया, एक लड्डू दिया, मेरी पढाई के बारे में पूछा और उनसे मिलने का मेरा उद्देश्य भी पूछा । मैंने बडे भोलेपन से बता दिया कि

  • गांवों के लोग मानते हैं कि आप नेताजी सुभाषचन्द्र बोस हैं !’

बाबा न हंसे, न मुस्कुराए, सपाट शब्दों में बोले –  ‘नेताजी जैसे व्यक्ति के बारे में इस तरह नहीं बोलते’ ।

उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया कि खूब पढो और आगे बढो, आशय मैं समझ गया कि मुझे जाने का आदेश हो चुका था। मैंने घर आ कर पिता जी को अपना अनुभव सुना दिया । कुछ दिनों बाद मैं मोतीहारी वापस चला गया, सुना कि संन्यासी बाबा वहां से चले गए, कहां? पता नहीं। आज सोचता हूं कि क्या वे गुमनामी बाबा ही थे?

प्रश्न उठता है कि फैज़ाबाद के एक मन्दिर में कुछ वर्ष रहने के बाद जब गुमनामी 1985  में चल बसे और उनके सारे सामान जिला मालखाने में रखवा दिए गए, जिनकी सूची बनी हुई है , तो प्रशासन ने या आम श्रद्धालुओं ने इतनी – सी बात का पता क्यों नहीं लगाया कि वे आए कहां से थे? उतने सामान के साथ कोई यूं ही हाथ डुलाते तो नहीं आ – जा सकता ? उनके अंतिम प्रवास स्थल – फैज़बाद के मन्दिर – से पीछे की ओर लौटा जाता तो असलियत सामने आ जाती। मान लीजिए कि उस वक्त का प्रशासन किसी दबाव में वैसा नहीं कर सका, तो वह काम अब भी तो किया जा सकता है? इसके अलावा कुछ – कुछ इस तरह की बात भी सुनने – पढने में आती है कि एक तस्वीर में ताश्कंध समझौते के समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पीछे खडा एक शख्स गुमनामी बाबा जैसा ही दिखता है, कहीं वह नेताजी तो नहीं! तो, क्या नेताजी के होने का सच शास्त्री जी को भी मालूम था ? यदि हां, तो उन्हें वहीं ताश्कंध में ही मालूम हुआ या पहले से मालूम था? चाहे जिस कारण से भी, उन तस्वीरों का, फाइलों का , घटनाओं का सच पहले सामने न आ पाया , न सही,  अब तो एक झटके में सामने आ जाना चाहिए ।

दूसरी सबसे अहम बात , गुमनामी बाबा के सामान से पता चलता है कि उनमें बहुत – से ऐसे सामान हैं जो इंगित करते हैं कि वे नेता जी के हैं या उनसे जुडे हैं, कई फोटो में गुमनामी बाबा को नेताजी के परिजनों के साथ देखे जाने की बात की जा रही है, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वे गुमनामी बाबा सचमुच नेताजी से जुडे हों, उनके पास के सामान सचमुच नेताजी के हों, किंतु गुमनामी बाबा स्वयं नेताजी न हो कर उनके कोई अति विश्वसनीय व्यक्ति रहे हों, जिन्होंने आजीवन नेताजी के स्मृति – चिह्नों को सहेज कर रखा और नेताजी की इच्छा के अनुसार उस मामले में मौन साधे रखा ! ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? जब आईंस्टाईन का ड्राइवर हमेशा उनके साथ रहते – रहते उनके व्यक्तित्व और वक्तृत्व को आत्मसात कर सकता था तथा आईंस्टाईन की जगह बडी – बडी सभाओं में सापेक्षता के सिद्धांत पर भाषण कर सकता था और लोग यह समझते रह सकते थे कि खुद आईंस्टाईन ही बोल रहे थे, तो फिर नेताजी का कोई हमराज वैसा क्यों नहीं हो सकता था? अगर वर्तमान सरकार वाकई सच्चाई को सामने लाना चाहती है तो यकीन मानिए, वह नामुमकिन तो है ही नहीं, मुश्किल भी नहीं है। अनावश्यक रूप से रहस्य – रोमांच बनाए रख कर कुछ और साधना हो तो फिर बात ही अलग है !

साल भर पहले जब नेताजी से संबंधित सरकारी फाईलों को सार्वजनिक करने का फैसला लिया गया तो आस बंधी कि रहस्य – रोमांच से परदा उठेगा , अब तक जो और जितनी फाइलें सार्वजनिक हुई हैं , उनमें से वैसा कौन – सा तथ्य सामने आया है, जो पहले से जनता को मालूम नहीं था, यह बताया जाना चाहिए, क्योंकि पिछले 70 वर्षों से भारतीय जनमानस में उसके लिए असीम उत्सुकता रही है। यदि वैसी कोई नई बात सामने नहीं आई है और आगे आने वाली फाइलों में नये खुलासे होने की संभावना है तो, सरकार के पास फाइलें पढने और कम्प्युटर पर अपलोड करने वालों की कमी तो है नहीं, पहले चुन कर वैसी ही फाइलें क्यों नहीं सार्वजनिक की गईं? इतना रहस्य – रोमांच बना कर क्यों रखा जा रहा है? कहीं यह विधान सभाओं के चुनावी गलियारों से होते हुए 2019 के आम चुनाव तक की पंचवर्षीय योजना तो नहीं ! यदि ऐसा नहीं है तो सबसे पहले वही काम कराया जाए एवं रहस्य – रोमांच से भरी फाइलें ही चुन – चुन कर सार्वजनिक की जाएं , और यदि ऐसा ही है तो मुझे एकबार फिर व्यक्तिगत तौर पर अफसोस होगा कि बिहार चुनाव से कोई सीख नहीं ली गई, और ली भी गई तो केवल इतनी कि उसके बाद से राज्यों में विधान सभा के चुनाव प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष नहीं, बल्कि पार्टी ही लडेगी।  बस, बिहार और बंगाल के चुनाव में इतना ही अंतर है , पता नहीं, परिणाम में उतना अंतर भी हो, न हो !

यह सही है कि देश का प्रधानमंत्री भी किसी राजनीतिक दल का नेता ही होता है, फिर भी जब देश का प्रधानमंत्री बोलता है तो वह प्रधानमंत्री ही हो, राजनीतिक दल का नेता वहां बोलेगा तो प्रधानमंत्री गौण हो जाएगा, जो गणतांत्रिक लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। ऐसा क्यों होता है कि प्रधानमंत्री के भाषण में 10% ही प्रधानमंत्री तथा शेष 90% पार्टी विशेष का नेता बोलता है ?

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 05 मई 2016

18,506 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 25/05/2017 at 7:59 am
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    I don’t have any particular books which come out in the winter and I don’t think I’ve read any on your booklist either. I’d love to read the Pagan Christmas book – I’ve only recently discovered Odin as Santa Claus myself. Sending you many, many Yule blessings, Wendy!!LynxLyn recently posted..

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  • 25/05/2017 at 7:53 am
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    House is my hero!Ja nao sei viver sem esta serie, sem duvida a mlhoer serie de todos os tempos.Muitos parabens ao site por reconhecerem a grande serie que house e9, sao sempre os primeiros a postar os episodios.Obrigado por existirem, amo-vos!

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  • 25/05/2017 at 7:50 am
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    "Barack, you may be a lot of things; but, for certainty, you are no Christian."Hmmmmmm.Can you name ANY actual Christians, other than the guy who founded the sect?

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  • 25/05/2017 at 7:11 am
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    Very interesting. And I think it is important that these stories of real career paths get told. We ask teenagers to choose careers and make educational and other choices to get there without giving them any real understanding of how complicated most of our career paths are. Yes, they can be difficult and financially precarious at times. But also rewarding. That comes through strongly in your story. Thanks for sharing it.

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  • 25/05/2017 at 6:50 am
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    I would like to thnkx for the efforts you have put in writing this site. I’m hoping the same high-grade site post from you in the upcoming also. In fact your creative writing skills has encouraged me to get my own site now. Really the blogging is spreading its wings quickly. Your write up is a good example of it.

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  • 25/05/2017 at 6:24 am
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    90% av allt negativt är skrivet av Mazdak. Lätt att se sÃ¥nt när just MMAnyss hyllas sÃ¥ hÃ¥rt.”Hej jag rÃ¥kade gÃ¥ in pÃ¥ er sida efter att ha hÃ¥llet mig undan i ett Ã¥r!”Haha Det lÃ¥ter ju troligt!Ni som klagar nu är oxÃ¥ exakt samma personer som tycket att Jones skulle bära hela skulden till UFC 151! Kanske dags för er att vakna upp…

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  • 25/05/2017 at 6:08 am
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  • 25/05/2017 at 6:06 am
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    Interesting about Stirling. When Mike Shepherd tried his female heroine — Kris Longknife — somewhere between Weber's Honor Harrington, and David Drake's Lt. Leary, he did pretty well. But he is fixated on the boobie bombs he came up with in the second book.

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  • 25/05/2017 at 5:43 am
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    "No, I had you figured as an Earth Shoe type hippie. Do you still have your Cheech and Chong 33rpms?" elrondTrade you for your vintage Billy Graham.

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  • 25/05/2017 at 5:36 am
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    What a beautiful family and exquisite pictures. The poses are so unique, love the fact that Matt and Kerry are in the pics with Kate even though you may not see their faces. Well done – the photographer definitely has a great eye for detail. I am sure you will cherish these photos for years to come, such a pleasure to view.

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  • 25/05/2017 at 5:15 am
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    Det var enda et godt tips… Jeg sitter her og kikker pÃ¥ bloggen din, for første gang tror jeg. Ser at du har en liten en, som jeg – og at din veslesnuppa har vært ute pÃ¥ vinterføret. Merket meg med interesse skotøyet hennes. Det var riktig smart, takk for tipset!

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  • 25/05/2017 at 4:37 am
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    I think the most I have done in one day and removed in one day is five manicures. Some days things just seem like a good idea and do not turn out to be. By the end of that session I just painted my nails black.

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  • 25/05/2017 at 3:48 am
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    I haven’t used Tiny Tush yet but would love to try them! I’m pregnant with my 4th child and would like to do cloth more. I would love to try the 2.0s also the regular covers.

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  • 25/05/2017 at 3:27 am
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    I love the cute photos you’ve posted on your blog, and the catchy title. It is true that kids just need to be involved, no matter how old they are, a 4 month old is as capable of interacting with a pet as a 4 year old, just on a differeny level, as I saw myself with my son when he started interacting with my parents dog, who is now his best friend (he is 2 now). We are about to collect our own puppy, and our son is very prepared for this big change in his life, as well as very excited.

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  • 25/05/2017 at 3:25 am
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    Outros tempos…Me lembro que tinha uns 15, 16 anos e viajava de ônibus para Londrina ou Maringá para ver Titãs, Paralamas, Irã, etc. Imagina se hoje daria para fazer o mesmo.

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  • 25/05/2017 at 2:06 am
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    I think Taylor Lautner is the hottest man on the planet! I can’t believe that he is only number 5 and Robert Pattinson is number 2. That makes no sense. If I could, Robert wouldn’t even be on herean Taylor would be number 1.

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