डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

जब सत्ता के सलाहकार चाटुकार होने लगेंं और प्रवक्ता प्रवचन करने लगेंं तो समझ लीजिए कि 

दिन अच्छे या बुरे आने वाले नहीं, बल्कि पूरे होने वाले हैं, क्योंकि देश में अब तक किसी भी
केन्द्रीय सत्ता की उतनी फज़ीहत नहीं हुई जितनी उत्तराखण्ड प्रकरण में वर्तमान केन्द्र सरकार
की हुई है।

 

इंदिरापुरम, 12 मई 2016

 

जब सत्ता के सलाहकार चाटुकार होने लगेंं और प्रवक्ता प्रवचन करने लगेंं तो समझ लीजिए कि दिन अच्छे या बुरे आने वाले नहीं, बल्कि पूरे होने वाले हैं,क्योंकि देश में अब तक किसी भी केन्द्रीय सत्ता की उतनी फज़ीहत नहीं हुई जितनी उत्तराखण्ड प्रकरण में वर्तमान केन्द्र सरकार
की हुई है।

फ्रांस का राजा लुई 16वां भावुक था, दयालु था, दिल का नेक था, किंतु अपनी प्रजा और उसके दुखदर्द से अनजान था , अपने सलाहकारों – चाटुकारों – से घिरा हुआ था, उसके पास केवल वही बातें पहुंच पातीं, जिन्हें सलाहकार पहुंचने देना चाहते , इसलिए राजा अपने राज्य में सुलग रही समस्याओं से अनभिज्ञ था । उसकी रानी के लिए तो यह समझना भी मुश्किल था कि लोग भूख से भी मर सकते हैं , जब लोगों को रोटी के लिए हाहाकार करते हुए देखा तो उसने जानना चाहा कि वे लोग क्यों रो – चिल्ला रहे हैं ? सलाहकारों ने बताया कि उन्हें खाने को रोटी नहीं मिल रही है, रानी ने बडी मासूमियत से कहा कि रोटी नहीं मिल रही तो वे लोग केक क्यों नहीं खाते ? सलाहकारों ने यह नहीं बताया कि केक रोटी से महंगे होते हैं, जैसे दाल किसी राज्य में विपक्षी पार्टी की सत्ता से अधिक महंगी होती है। नतीजा सामने था, 1789 की राज्यक्रांति और सत्ता का अंत, नेपोलियन बोनापार्ट का उदय। यह सच है कि लोकतंत्र में क्रांति, नेपोलियन और सत्ता के अंत का स्वरूप भिन्न होता है, परंतु मूलभूत प्रश्न और उसका उत्तर तो वही रहता है।

मैंने अपने ट्वीटर  @shreelalprasad  और ब्लॉग   shreelal.in   पर सितम्बर 2015 से ही सिकरी से अलग – थलग खडे फकीर की तरह आगाह करता रहा हूं, माने न माने, अकबर की मर्जी !

दशकों से सुनता रहा हूं – 1962 के चीन युद्ध में हार का ठीकरा तत्कालीन रक्षामंत्री (स्व.) वी के कृष्णमेनन के सिर फोडा गया और उनसे इस्तीफा ले लिया गया तथा प्रधानमंत्री पर आंच तक नहीं आई;  किंतु 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर विजय और बांग्ला देश निर्माण का श्रेय तत्कालीन रक्षामंत्री (स्व) बाबू जगजीवन राम को नहीं दिया गया और प्रधानमंत्री को देवी दुर्गा की उपाधि दे दी गई। जिन लोगों की हमेशा से यह टैग लाईन रही है, उनमें भी यही रवायत दिखी, समथिंग डिफरेंट कुछ भी नहीं दिखा। 2014 के चुनाव का श्रेय शहं + शाह को मिला तो 2015 के चुनावों का ठीकरा कहां फुटना चाहिए था? लेकिन नहीं, अकबर ने बैगन को बेगुण कह दिया तो भी सही, और, सब्जियों का छत्रधारी शहंशाह कह दिया  तो भी सही; क्योंकि अकबर बदल जाता है, अकबरी नहीं बदलती।

छोडिए, अब क्या रखा है 2014 और 2015 में ? सोचिए 19 मई 2016 के बाद के लिए कौन – सा जुमला तैयार रखा जाए ? क्योंकि 18 मार्च से 12 मई 2016 तक का सत्संग तो सामने है ही और उसमें हुए शास्त्रार्थ का परिणाम भी सामने ही है ! उन संतों और शास्त्रियों का क्या करना है, यह तो शहं + शाह ही जानें। वैसे 70 वर्ष के इस लोकतंत्र ने प्रधानमंत्री की जाति भी जान ली और साधु संतों की जमात भी, क्या अभी कुछ और परीक्षाएं व परीक्षण शेष हैं?

भारतीय जनमानस भोला है किंतु बुडबक नहीं; बस, वह मन या बुद्धि की नहीं सुनता, दिल से सुनता है। सुना है कि आप के पास भी दिल है, और बहुत अच्छा दिल है, मन व बुद्धि भी है, यह सोना में सुगन्ध होने की स्थिति है, जो बिरले देखने –सुनने को मिलती है, तो फिर …?

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 12 मई 2016

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