डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

.. और चुनौतियों का सिलसिला जारी रहा ..

मैं नहीं चाहता था कि चारों तरफ से चुनौतियां एक साथ ही आ खडी हो जाएं और

मैं चुनौतियों के चक्रव्युह में अभिमन्यु की तरह घिर जाऊं। मैं अर्जुन की तरह

चुनौतियों का सामना करना चाहता था, सामने कृपाचार्य या द्रोणाचार्य अथवा भीष्म ही क्यों न हों।

*****

कांपता   है   क्यूं

अन्देशा–ए–तूफां से तू

नाखुदा भी तू , बहर भी तू

किश्ती भी तू, साहिल भी तू

*******

इंदिरापुरम, 15 मई 2016

 

… और चुनौतियों का सिलसिला जारी रहा ..! पंजाब नैशनल बैंक प्रधान कार्यलय राजभाषा विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक बनाए जाने के बाद एक ही साथ दो बडे और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आयोजन मेरे सामने थे – बैंक का वार्षिक राजभाषा समारोह और संसदीय राजभाषा समिति की तीसरी उपसमिति द्वारा प्रधान कार्यालय का निरीक्षण । संसदीय राजभाषा समिति को मिनी संसद भी कहा जाता है, इसीलिए प्रोटोकॉल में सतर्कता बरतना भी एक अहम उत्तरदायित्व होता है। समिति में तीस सदस्य होते हैं जिनमें 20 लोकसभा के तथा 10 राज्यसभा के सांसद होते हैं , केन्द्रीय गृहमंत्री समिति के स्थायी अध्यक्ष होते हैं, एक वरिष्ठ सांसद उपाध्यक्ष होते हैं, समिति तीन उपसमितियों में विभाजित होती है , तीनों उपसमितियों के अलग – अलग संयोजक होते हैं , अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में संयोजक ही अपनी उपसमिति की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं। बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं आदि का राजभाषा निरीक्षण तीसरी उपसमिति द्वारा किया जाता है।तीनों उपसमितियों के संयोजकों और कुछ वरिष्ठ सदस्यों को मिला कर एक चौथी समिति भी बनती है जिसे आलेख और साक्ष्य समिति कहा जाता है , उसकी अध्यक्षता प्राय: समिति के उपाध्यक्ष करते हैं।

तो, तीसरी उपसमिति  द्वारा उसी दिन एक ही स्थल पर दो अन्य संस्थाओं का भी राजभाषा निरीक्षण किया जाना था। समिति सचिवालय ने उस दौरा कार्यक्रम के समन्वय का उत्तरदायित्व पंजाब नैशनल बैंक को सौंपा था यानी कि सबकी ओर से सबके लिए समस्त प्रबंध हमें ही करने थे। इस तरह राजभाषा समारोह के माध्यम से बैंक के सीएमडी, ईडी, अन्य शीर्ष कार्यपालकों और पीएनबी परिवार के विशिष्ट सदस्यों के समक्ष मेरी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति थी तो संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे के माध्यम से देश में राजभाषा से संबंधित सर्वोच्च समिति के समक्ष बैंक की छवि को प्रस्तुत करना था।

स्पष्ट था कि उन कार्यक्रमों के माध्यम से भाषा और साहित्य से संबंधित मेरी योग्यता एवं दक्षता की परख तो होनी ही थी , वाक्पटुता, व्यवहार कुशलता, प्रबंध – कौशल, नेतृत्व-निपुणता और अनुशासनप्रियता, समयबद्धता , टीम भावना एवं समन्वय – क्षमता की परीक्षा भी होनी थी। तात्पर्य यह कि राजभाषा प्रभारी होने के नाते मुझे हर प्रकार की कसौटी से गुजरना था। इसीलिए अन्देशा होना तो स्वाभाविक था किंतु, चूंकि क्षेत्रीय और अंचल कार्यालयों में सेवा के दौरान राजभाषा समारोह का आयोजन मैं व्यापक पैमाने पर कराता रहा था और सिर्फ राजभाषा ही नहीं, अन्य विषयों से संबंधित संसदीय समितियों के निरीक्षण दौरा कार्यक्रमों का भी समन्वय करने का मुझे अवसर मिला था, इसीलिए अपनेआप पर मुझे पूरा विश्वास था। ऐसे में ही मुझे उपर्युक्त शेर याद आया।

राजभाषा विभाग में केवल एक स्केल – 2 के अफसर बलदेव मल्होत्रा थे, वे कम्प्युटर का अच्छी तरह उपयोग करना जानते थे। शेष अफसर स्केल – 1 के थे और कम्प्युटर के उपयोग में उतने निपुण नहीं थे। प्रधान कार्यालय के अन्य प्रभागों में कार्यरत अधिकारियों में से अधिकांश सेवानिवृत्ति के करीब थे, उनमें से कुछ को कम्प्युटर का अच्छा ज्ञान था किंतु उन्हें वहां से हटाने पर संबंधित प्रभागों के कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड सकता था , इसीलिए मैंने दिल्ली में पदस्थापित सभी अधिकारियों की एक समन्वय समिति बनाई और जो जिसके लायक समझा गया, उसे वही जिम्मेदारी दे दी गई, राजभाषा समारोह तथा संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे की तैयारियां एक ही साथ जोरशोर से शुरू कर दी गईं।

मेरे विभाग में बलदेव मल्होत्रा ही मेरे बाद सबसे सीनियर अफसर थे जो सेकण्डमैन का काम देख रहे थे। बलदेव जी परिश्रमी और लगनशील अधिकारी थे, भाषा पर तो उनकी पकड अच्छी नहीं थी, किंतु कम्प्युटर के अच्छे जानकार थे और जो काम नहीं जानते थे, उसे सीखने की ललक उनमें थी, यह उनके व्यक्तित्व का सकारात्मक पक्ष था । वे कभी – कभी मुझसे कहते थे – “ सर, आप के पहले मुझे किसी ने कोई इतना महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपा और न इतना सम्मान दिया , आप चाहते तो प्रधान कार्यलय के दूसरे प्रभागों के उपयुक्त अफसर को विभाग में बुला सकते थे, किंतु आपने मेरे ऊपर विश्वास कर सबसे महत्वपूर्ण कार्य मुझे सौंपा है, आप एक – दो अफसर और भी विभाग से हटा दीजिए क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वे यहां के लिए उपयोगी नहीं हैं, जहां तक काम की अधिकता का प्रश्न है, मैं अकेले तीन अधिकारियों के बराबर काम कर लूंगा और विभाग के शेष साथियों के साथ मिल कर सभी कार्य समय पर पूरा करा दूंगा, जरूरत पडी तो मैं घर से भी काम कर के ला दूंगा ” ।

बलदेव जी की उन बातों से मेरा उत्साह बढा , मैंने उनकी प्रशंसा की, किंतु उनकी कुछ बातों से मैं सहमत नहीं हुआ। मैंने उन्हें बताया कि उनके अनुसार जो अफसर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमारे विभाग के लिए उपयोगी नहीं है, वे दूसरे प्रभाग के लिए भी बेहतर विकल्प नहीं होंगे, साथ ही, वे सेवानिवृत्ति के मोड पर भी हैं , इसीलिए बेहतर यही होगा कि हम उन्हें अपने पास ही रखें, उन्हें पूरा सम्मान दें और जो काम वे कर सकें, उसी तरह के काम उनसे लें। दूसरी महत्वपूर्ण असहमति उनके द्वारा अकेले तीन अधिकारियों के बराबर काम कर लिए जाने पर थी। मैंने उनसे कहा कि वे काम तो एक ही अधिकारी के बराबर करें लेकिन अन्य तीन अधिकारियों को अपने अनुभव का लाभ पहुंचाएं ताकि वे भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकें।

मैं छोटे – बडे सैकडों कवि – सम्मेलनों व मुशायरों को देख – सुन चुका था तथा उनमें से बहुत – से आयोजनों में काव्यपाठ कर चुका था और दर्जनों का सफल एवं प्रभावशाली संयोजन – संचालन भी कर चुका था, इसलिए पेशेवर कवियों – संयोजकों की फितरत से मैं वाकिफ था, परंतु वह पीए साहब तो हमारे अपने पीएनबी परिवार के सदस्य थे और वह कार्यक्रम पीएनबी का ही था , इसीलिए उनका वह रवैया मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने महसूस किया कि उनके अन्दर से एक कवि कम और जीएम का पीए ज्यादा बोल रहा था। चूंकि मेरे सामने संसदीय समिति का निरीक्षण दौरा भी था, अत: मैं नहीं चाहता था कि चारों तरफ से चुनौतियां एक साथ ही आ खडी हो जाएं और मैं चुनौतियों के चक्रव्युह में अभिमन्यु की तरह घिर जाऊं। मैं अर्जुन की तरह चुनौतियों का सामना करना चाहता था, सामने कृपाचार्य या द्रोणाचार्य अथवा भीष्म ही क्यों न हों। इसीलिए कवि – सम्मेलन का भार पीए साहब को सौंप कर मैंने दो नियम मन ही मन निर्धारित कर लिए, पहला यह कि किसी भी कवि को पांच वर्षों तक दुबारा नहीं बुलाया जाएगा और दूसरा यह कि प्रत्येक वर्ष पीएनबी परिवार के एक नये व अच्छे कवि को आमंत्रित किया जाएगा, चाहे वह जहां कहीं भी पदस्थापित हो। उस नियम का सक्षम प्राधिकारी की सहमति मैंने अपने कार्यकाल में अंत तक पालन किया।

उधर संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे की भी पूरी तैयारी चल रही थी। तैयारी में विभाग के साथियों के सहयोग के साथ – साथ हमारे डीजीएम ब्रिगेडियर वी मनोहरन तथा जीएम बीसी निगम का मार्गदर्शन भी मिला। मैं बैंक के सीएमडी श्री केआर कामत और ईडी श्री एमवी टांकसाले को सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी देता रहा था, उन दोनों से प्राप्त प्रोत्साहन के दो शब्द ही मेरे लिए सबसे बडा संबल थे। 25 अक्टूबर 2010 को प्रात: 10 बजे से बैठकें शुरू होनी थीं। सीएमडी , ईडी और मैं होटल के स्वागत कक्ष के सामने माननीय सदस्यों का स्वागत करने के लिए खडे हो गए। माननीय सांसदों के साथ हमारे एस्कॉर्ट अफसर थे, हमारे डीजीएम ब्रिगेडियर साहब पूरी मूवमेंट की मॉनीटरिंग कर रहे थे, जबकि जीएम निगम साहब बैठक स्थल की मॉनीटरिंग कर रहे थे। उसी होटल में महान क्रिकेटर सचिन तेन्दुलकर ठहरे हुए थे, हम लोग बात करते हुए माननीय सांसदों की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि तेन्दुलकर सीढियों से उतरते हुए दिखे, ईडी टांकसाले साहब ने मुझे अपना मोबाईल थमाते हुए कहा कि मैं तेन्दुलकर के साथ उनका फोटो उनके मोबाईल में खींच लूं, मैंने झिझकते हुए कहा कि इतना महंगा मोबाईल पहली बार मैं हाथ में ले रहा हूं, मुझे इसको ऑपरेट करना नहीं आता, तब तक तेन्दुलकर करीब आ गए, टांकसाले साहब ने मराठी में उनसे कुछ कहा और उनके साथ खुद ही अपने मोबाईल में अपना फोटो खींच लिया यानी सेल्फी ले ली। हालांकि तब तक सेल्फी शब्द प्रचलन में नहीं आया था। जो लोग भारत में सेल्फी के जनक माननीय मोदी जी को मानते हैं, उनके लिए यह एक विशेष खबर है कि हमारे बैंक के ईडी टांकसाले जी, जो आजकल आईबीए के सीईओ हैं, ने 2010 में ही सेल्फी की शुरुआत कर दी थी।

पूर्वाह्न 10 बजे से बैठकें शुरू हो गईं। पहले अन्य दो संस्थाओं के साथ समिति की एक – एक घंटे की बैठक थी, समन्वयक होने के कारण हमारी बैठक अंत में थी। चूंकि बैठकें बहुत ही उच्चाधिकार प्राप्त समिति के साथ थीं और निरीक्षण बैठकों की कार्यवाही गोपनीय प्रकृति की होती है, इसीलिए मैं यहां केवल उन्हीं बातों की चर्चा करूंगा जो सामान्य स्वागत – सत्कार एवं शिष्टाचार से संबंधित थीं। तो, जब तक दो अन्य संस्थानों की एक – एक घंटे की बैठकें होनी थीं, तब तक दो घंटे का समय हमारे पास था। सीएमडी और ईडी ने एक कमरे में बैठ कर निरीक्षण प्रश्नावली पर विस्तार के साथ मुझसे चर्चा की। मुझे यह जान – समझ कर अत्यंत प्रसन्नता और गौरव की अनुभूति हो रही थी कि बैंक के शीर्षस्थ दोनों अधिकारी राजभाषा हिंदी को ले कर शुरू से ही बहुत ही गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ मेरा मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन कर रहे थे और अब निरीक्षण प्रश्नावली के एक – एक बिन्दु पर बडी तन्मयता के साथ मुझसे विचार – विमर्श भी कर रहे थे। मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ और आधिकारिक रूप से प्रश्नावली के हर एक बिन्दु को उनके सामने स्पष्ट किया। सीएमडी और ईडी का रूख देख कर मुझे महसूस हुआ कि वे दोनों यह जान – समझ कर बहुत प्रसन्न हो रहे थे कि मैंने हर पहलु को बडी स्पष्टता और निर्भीकता के साथ उनके समक्ष रखा ।

 

चूंकि समिति की कार्यवाही की शुरुआत माननीय संयोजक के निर्देश पर समिति के सचिव या वहां उपस्थित सचिवालय के अन्य वरिष्ठतम अधिकारी ही करते हैं, अत: बैठक की कार्यवाही की विधिवत शुरुआत की घोषणा हो जाने के बाद समिति के संयोजक से अनुमति ले कर मैंने परंपरागत स्वागत – सत्कार व शिष्टाचार की कार्यवाही प्रारंभ की; तत्पश्चात बैंक के इतिहास , उपलब्धियों और राजभाषा संबंधी गतिविधियों की पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन शुरू की। प्रस्तुति देते समय अपने स्वर में आरोह एवं अवरोह यानी व्वाइस मॉडुलेशन पर मैंने विशेष ध्यान दिया, उसके चलते प्रस्तुति अत्यंत प्रभावशाली बन पाई, जिसकी समिति के सदस्यों और सचिवालय के अधिकारियों ने खुल कर प्रशंसा की। यह सब देख कर सीएमडी और ईडी का चेहरा भी प्रसन्नता से खिल गया, बैठक का श्रीगणेश बहुत ही अच्छा रहा, पूरी बैठक भी सद्भाव एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई, समिति के संयोजक एवं सदस्यों ने राजभाषा के क्षेत्र में बैंक द्वारा किए गए कार्यों तथा चलाई जा रही गतिविधियों की प्रशंसा की। बैठक के बाद सीएमडी साहब ने आशीर्वादस्वरूप मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे बधाई और शाबाशी दी। ईडी टांकसाले साहब भी विशेष रूप से प्रसन्न नज़र आ रहे थे । मेरे लिए वे अत्यंत गरिमापूर्ण क्षण थे, राजभाषा विभाग के सभी साथियों के लिए भी वे प्रशंसापूर्ण पल थे। इस तरह प्रधान कार्यलय राजभाषा विभाग के प्रभारी मुख्य प्रबंधक के रूप में मैंने अपनी पहली और सबसे बडी परीक्षा सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली थी। अब चार दिनों बाद यानी 29 अक्टूबर 2010 को दूसरी बडी परीक्षा, बैंक का राजभाषा समारोह, होने वाली  थी।

राजभाषा समारोह की तैयारी मुस्तैदी के साथ की गई थी, मैंने समारोह की तैयारी और उसके मंच – संचालन का कार्य भी बलदेव जी को दिया था। हालांकि वे उद्घोषणा तो कर लेते थे किंतु मंच – संचालन की कला उनमें नहीं थी । उनमें जोश था, जज्बा था , सीखने की ललक थी, और साथ ही, मैं यह भी चाहता था कि हर क्षेत्र में दूसरी , तीसरी पंक्ति तैयार हो, इसलिए भी उन्हें वह कार्य मैंने सौंपा था। प्रधान कार्यलय में पदस्थापना के बाद पहली बार मैंने बैंक के उच्चस्तरीय सार्वजनिक समारोह में औपचारिक रूप से भाषण दिया, जिसकी सीएमडी और ईडी के साथ–साथ सभागार में उपस्थित प्रबुद्ध श्रोता – दर्शकों , जिनकी संख्या दर्जनों महाप्रबंधक, उपमहाप्रबंधक एवं अन्य वरिष्ठ कार्यपालकों सहित सैकडों में थी, ने भरपूर प्रशंसा की। राजभाषा समारोह तो प्रभावशाली रहा किंतु कवि सम्मेलन, प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवियों के होते हुए भी , संचालन में कमी के कारण अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड सका। कुल मिला कर कार्यक्रम सफल रहा और पीएनबी परिवार के विशिष्ट सदस्यों के समक्ष मेरी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति यादगार बन गई तथा मुझे विशिष्ट पहचान दिलाने में कामयाब रही। मैंने अपने भाषण में भी और बाद में उच्चाधिकारियों के सामने भी, समस्त सफलताओं का श्रेय शीर्ष कार्यपालकों के कुशल मार्गदर्शन तथा अपने विभाग के सभी साथियों को दिया, अपने सहकर्मियों को मैंने प्रशंसापत्र भी दिलवाए ।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुर , 15 मई 21

5,040 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 12/12/2017 at 6:18 am
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    Reply
  • 06/11/2017 at 6:55 am
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  • 29/10/2017 at 2:58 am
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    Reply

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