डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

देवी-देवताओं का आर्थिक उदारीकरण और बाबाओं का वैश्वीकरण

इंदिरापुरम, 02 जून 2016

देवी देवताओं का आर्थिक उदारीकरण और बाबाओं का वैश्वीकरण 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही शुरू हो गया था, हालांकि बाबा पीवी नरसिंहराव की सरकार ने तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण व वैश्वीकरण की शुरूआत बहुत बाद में 1991 में की और , वह भी, रूस के मिखाइल गोर्वाचोव द्वारा शीत युद्ध की समाप्ति की ओर कदम बढाते हुए ग्लास्नोत एवं  प्रेस्त्रोइका का नारा दिए जाने के बाद; गोर्वाचोव को उसके लिए नोबेल पुरस्कार मिला तो मनमोहन सिंह को मौनमोहन सिंह का खिताब; परंतु बाबाओं का वैश्वीकरण रजनीश , धीरेन्द्र ब्रह्मचारी , चन्द्रस्वामी से होते हुए जीवन – कला बाबा और अनुलोम विलोम बाबा तक आ गया । उनके अलावा भी बहुत – से बापू और बाबा हुए और हैं। खैर, यहां मेरा विषय यह नहीं है।

बहुत दिनों तक अपने गांव में रहने के बाद मैं कल ही यानी 01 जून 2016 को दिल्ली लौटा था। गांव में टीवी तो था किंतु बेटी – बहुओं के बीच धारावाहिकों को वाधित कर समाचार सुनने – देखने की धृष्ठता मैं नहीं कर सकता था क्योंकि अपने घर-परिवार में अब सबसे बुजूर्ग मैं ही हूं, इसीलिए आंगन में भी खांस– खखार कर जाना पडता है। उसके अलावा मैं गांव–परिवार संबंधी कार्यों में रात-दिन इतना मशगुल रहा कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम भी तीन दिनों बाद फोन कर पता किया। तो, मैं कल गांव से दिल्ली लौटा और लौटते ही समाचर की भूख मिटाने के लिए किसी भुक्खड की तरह मैं टीवी चैनलों पर टूट पडा।

कल, सभी छोटे – बडे टीवी चैनल प्रमुखता से एक खबर दिखा – सुना रहे थे कि एक वकील ने आरटीआई के अंतर्गत वैष्णव देवी तीर्थस्थान प्रबंधन से कुछ सूचनाएं मांगी थी तो उन्हें वैष्णो देवी (दरअसल यह मेरी कमअकली है कि मैं अभी तक नहीं जान पाया हूं कि उनका नाम ‘वैष्णो देवी’ है या ‘वैष्णव देवी’, जो भी हो) की वीआईपी, वीवीआईपी और स्पेशल पूजा आदि की रेट लिस्ट थमा दी गई जिसमें 200/- से 75,000/- रूपयों तक के विधिविधान थे, यानी जो जितना ज्यादा खर्च करेगा, उसे मातारानी का उतना ही ज्यादा सुविधाजनक दर्शन प्राप्त होगा , अर्थात मातारानी के दरबार का टिकट न हुआ, पोप द्वारा स्वर्ग-प्रवेश के लिए बांटा जाने वाला अधिकारपत्र हो गया। स्पष्ट है कि माता के दरबार का वर्गीकरण और आरक्षण आर्थिक आधार पर किया गया है, बहुत खुश होंगे आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के हिमायती लोग यह जान कर , वे तो अब सामाजिक आधार को धता बताते हुए आर्थिक आधार को मातारानी का अनुमोदनप्राप्त बताएंगे? प्रेम से बोलो जय माता दी, दिल से बोलो जय माता दी, सब कोई बोलो .. नहीं, सबकोई लाईन में लग कर बोलेंगे, केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण प्राप्त लोग अलग से हाथ उठा कर बोलेंगे और टीवी वाले उन्हें ही दिखाएंगे !

कटरा से वैष्णो देवी मंदिर के बीच लगभग आधे रास्ते पर एक गुफा है, उसे कोई आदि कुंआरी तो कोई अर्द्ध कुंआरी तो कोई आध कुंआरी कहता है, वह इतनी संकरी है कि बडी मुशकिल से उसमें एक बार में कोई एक व्यक्ति प्रवेश कर पाता है। मैं भी वर्षों पहले उस गुफा में गया हूं, तब मेरा पेट इतना नहीं निकला था, मैं भी जन्मजात हिन्दू हूं और देवी देवताओं में आस्था रखता हूं , किंतु जिन विषयों के बारे में पक्की जानकारी मुझे नहीं है, उनके बारे में कभी – कभी कुछ सवाल विद्वद्जनों से पूछ लेता हूं, मेरी खता बस, इतनी ही है, आखिर मैं भी तो एक आम आदमी हूं, मुझे भी जानने का हक है और जानकार लोगों का बताने का कर्तव्य भी है।

आदि कुंआरी में मौजूद एक गाईड या श्रद्धालु बता रहे थे कि वैष्णो देवी को जब भैरोनाथ ने खदेडा तो भागते – भागते वे इसी गुफे में आ कर छुप गईं और यहां वे छह माह तक छुपी रहीं, फिर भाग कर ऊंचे पहाड पर चढ गईं, वहीं उन्होंने भैरो नाथ को मारा। एक स्वाभाविक सवाल मैंने पूछ दिया था कि भैरोनाथ वैष्णो देवी को खदेड क्यों रहा था? आखिर वह उनसे चाहता क्या था? और जब वैष्णो देवी तीनों लोकों का कल्याण कर देती हैं तो उस भैरोनाथ में ऐसा क्या था कि वे उससे भागी – भागी फिर रही थीं? यदि यह सच है तो भक्त उस मातारानी पर कैसे यकीन करें कि वे दुष्टों से उनकी रक्षा कर पाने में सक्षम हैं?  उस ज्ञानी पुरूष का रौद्र रूप देख कर उससे जवाब सुनने के लिए वहां रूके रहना मुनासीब न समझ कर वहां से चुपचाप खिसक लेने में ही मैं ने भलाई समझी। मैं आज तक भी नहीं समझ पाया कि उस दिन मैं ने क्या गलत सवाल पूछ दिया था। खैर छोडिए उस प्रसंग को , वह पुराना पड गया।

वैसा ही ज्ञान मैंने एक शिव भक्त से प्राप्त करना चाहा था। बस, क्या था, त्रिशूल चला कर उन्होंने मेरा सिर विच्छेद नहीं किया, बाकी के शब्दशर से तो मेरे सात पुश्तों की आरती उतार ही ली। मैंने उनसे महज एक साधारण जानकारी चाही थी कि भस्मासुर को शंकर जी ने आशीर्वाद दे दिया कि जिसके सिर पर वह हाथ रख देगा, वह जल कर भस्म हो जाएगा। वैसा वरदान पा कर भस्मासुर की नीयत बदल गई, उसने शंकर जी के ही सिर पर हाथ रख कर उन्हें भस्म कर देने के बाद उनकी पत्नी पार्वती से विवाह करने की ठान ली , अब वह अपना हाथ आगे बढाए हुए शिव जी को खदेडता रहा और शिव जी अपना सिर छुपाए भागते रहे। शिव जी का वरदान न हुआ बलेस्टिक मिसाईल या परमाणु बम अथवा नापाम बम हो गया? तो क्या सर्वज्ञ शिव को मालूम नहीं था कि वरदान पा कर भस्मासुर की नीयत बदल जाएगी? अपने त्रिनेत्र से सबकुछ स्वाहा कर देने वाले शिव को भस्मासुर को स्वाहा करने से किसी ने रोक रखा था? खैर,  इसको भी छोड दीजिए, यह भी बहुत पुराना प्रसंग है।

तो, टीवी वाले बता रहे थे कि मातारानी का आर्थिक आधार पर आरक्षण तो 2008 से हुआ है, सिद्धिविनायक मंदिर, साईं मंदिर, तिरुपति बालाजी मंदिर जैसे देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों में तो इस तरह का आरक्षण बहुत पहले से ही लागू है। अब समझ में आया कि आर्थिक आधार पर आरक्षण मांगने वालों को प्रेरणा इन्हीं मंदिरों से मिली होगी। लेकिन अभी भी मुझे यह समझ में नहीं आया कि इन बडे मंदिरों में बडे – बडे दान गुप्त रूप में ही क्यों दिए जाते हैं जबकि खुलेआम दान करने पर सरकारी नियमों के अनुसार टैक्स में छूट का भी शायद कुछ प्रावधान है। कभी कोई साईं बाबा को सोने का मुकुट चुपके से पहना जाता है तो कभी कोई दो किलो सोना बालाजी की झोली में डाल जता है तो कभी कोई गणेश जी के चरणों में हीरे जवाहरात अर्पित कर जाता। मुम्बई में गेटवे ऑफ इंडिया पर कबूतरों के लिए दाना बेचने वाले एक महाज्ञानी ने उस गूढ रहस्य का उद्घाटन किया कि “जो लोग खुल कर लूटते हैं वे गुप्तदान करते हैं और जो गुप्त रूप से लूटते हैं वे खुल कर दान करते हैं” ; वैसे ही, कटरा में ड्राई फ्रुट्स के एक महाज्ञानी दूकानदार ने रहस्योद्घाटन किया कि भला हो जम्मू व कश्मीर के तत्कालीन उपराज्यपाल जगमोहन का, जिसने वैष्णो देवी जाने का रास्ता सहज बना कर राज्य की अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व उछाल ला दिया!

“और वैष्णो देवी का चमत्कार” ? मैंने पूछा तो रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसने कहा कि यह चमत्कार नहीं है क्या कि आप जैसे लाखों लोग हाजारों खर्च कर यहां आते हैं और बैठे बिठाए हमारे सामान खरीद कर ले जाते हैं , वरना हमारे पूर्वज तो वही काबूली वाले थे जो आप के गांव घर जा – जा कर दर – दर भटक कर अपने फल , शॉल आदि बेचा करते थे। सचमुच, कश्मीरी भाई – बहन वैष्णो देवी से ज्यादा एहसानमंद तो जगमोहन के हैं। आखिर, मातारानी जगतारिणी हैं तो जगमोहन भैया भी तो जगत को मोहने वाले निकले, उन्होंने देश – विदेश के श्रद्धालुओं का ऐसा मोहन किया कि दोहन का परमानेंट प्रबंध हो गया। अगर मैं वैष्णो देवी के दर्शन को नहीं गया होता तो इस ब्रह्मज्ञान से वंचित ही रह जाता। अब इससे कोई सहमत हो या न हो, मुझे फर्क नहीं पडता क्योंकि मैंने भी कब कहा कि इससे सहमत हूं या नहीं हूं?

एक निवेदन है, बात – बात में बिहार में जंगल राज का दर्शन करने वाले लोग ( कृपा कर इस आलेख को राजनीतिक टिप्पणियों से मुक्त रहने दें) कभी बिहार की राजधानी पटना के रेलवे जंक्शन के निकट स्थित महावीर मंदिर में जाएं, वहां बाला जी के बराबर तो नहीं, लेकिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते ही हैं, मंदिर में देव दर्शन के लिए न कोई दान – दक्षिणा है, न कोई रेटलिस्ट है, न भक्तों के प्रसाद से एक भी दाना निकालने की छूट है, फिर भी, बडे व्यवस्थित ढंग से श्रद्धालु दर्शन करते हैं और तिरुपति के कारिगरों द्वार तैयार लड्डू, अपनी इच्छानुसार , प्रसाद स्वरूप खरीद कर ले जाते हैं। यह जांचने का विषय हो सकता है, लड्डू की क्वालिटी तिरुपति बालाजी मंदिर के लड्डू से बीस हो सकती है, उन्नीस नहीं। शायद लोगों को यह मालूम ही हो कि दशकों पहले देश के सबसे जांबाज और प्रसिद्ध वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों में से एक किशोर कुणाल ने नौकरी छोड कर महावीर मंदिर की देख – रेख शुरू की थी, बाद में बिहार सरकार ने उन्हें बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड का अध्यक्ष भी बना दिया था, जी हां, यह सब उसी समय हुआ था जिस काल को आप जंगल राज कहते हैं। तो, क्या , पटना महावीर मंदिर जैसा प्रबंधन और प्रबंध वैष्णो देवी, तिरुपति , सिद्धिविनायक, साईं मंदिर या वैसे अन्य मंदिरों में नहीं हो सकता?

बचपन में किसी उपदेश पुस्तिका में पढा था कि सूई के छिद्र से हाथी का निकल जाना भले ही संभव हो जाए किंतु दौलतमंदों का स्वर्ग में प्रवेश कदापि संभव नहीं। लेकिन यहां तो “धनवान के ही भगवान” का नियम लागू है। इसकी सच्चाई तो आर्थिक आधार पर देवस्थानों में सीट रिज़र्व कराने वाले ही बता पाएंगे, मैंने तमाम प्रमुख धर्म-ग्रंथों और इतिहास की पुस्तकों के अध्ययन से तो यही जाना है कि सामाजिक आधार पर बहुत बडा तबका कई मामलों में अछूत रहा है, वंचित रहा है, दलित रहा है। कोई मर्यादा पुरोषोत्तम किसी शम्बुक को इसलिए मार देता है कि एक अछूत होते हुए वह तपस्या करने की धृष्ठता करता है, कोई धनुर्धराचार्य किसी एकलव्य को इसलिए धनुर्विद्या नहीं सिखाता कि वह राजवंश से नहीं है, महायोद्धा होते हुए भी कोई कर्ण इसलिए किसी स्वयंवर में हिस्सा नहीं ले सकता कि वह सूतपुत्र है, बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भी कोई भीम इसलिए संस्कृत नहीं पढ सकता कि वह अछूत के घर पैदा हुआ है और बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कोई जगजीवन देश का उपप्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी यदि किसी मूर्ति पर माल्यार्पण करता है तो अगडे कहे जाने वाले लोग गंगाजल से उस मूर्ति को इसलिए पवित्र करते हैं क्योंकि वह उपप्रधानमंत्री दलित के घर में पैदा हुआ है।

मैं तो एक भक्त आदमी हूं , आस्थावान हूं ,  मातारानी और तमाम देवी – देवता सबका कष्ट हर लेते हैं, कोढियों को निर्मल काया देते हैं, रोगियों के रोग दूर कर देते हैं, दुखियों के दुख दूर कर देते हैं, कंगालों को खुशहाल बना देते हैं, नि:संतानों को संतान दे देते हैं, बेरोजगारों को रोजगार दे देते हैं, परीक्षाओं में पास करा देते हैं , तो , मेरी प्रार्थना  है कि उन तमाम देवस्थानों में प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले कुष्ठ रोगियों, फिर कैंसर रोगियों, फिर बडे – बडे नामों वाले रोगों से ग्रस्त रोगियों के लिए स्थान आरक्षित करा दिया जाना चाहिए, बचे तो दुखियों व कंगालों को, नि:संतानों को , बेरोजगारों और परीक्षार्थियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, उसके बाद अछूतों , दलितों को जगह दी जानी चाहिए और फिर भी स्थान रिक्त रह जाए तो अंत में शेष अन्य लोगों में बराबर – बराबर बांट दिया जाना चाहिए क्योंकि वे अन्य लोग तो पूर्व जन्म के पुण्यप्रताप से इस जन्म में सुख भोग ही रहे हैं, अब क्या उन सभी अन्य लोगों को मुकेश अम्बानी का 27 मंजिला टॉवर देने का विचार है जो उनके लिए आर्थिक आधार पर दर्शन का प्रावधान किया जाए? अब चूंकि मैं अन्य लोगों में हूं, इसीलिए अपने लिए उसमें कोई सीट नहीं चाहता। फिर भी , सोचता हूं कि देवी – देवताओं द्वारा किए – कराए गए कल्याण कार्यों की पुख्ता जानकारी के लिए मैं भी एक आवेदन आरटीआई में लगा ही दूं , मगर मेरे साथ दिक्कत यह है कि मैं तो कोई वकील हूं नहीं कि मुझे पता हो कि आवेदन भेजा कहां जाए ?

एक प्रार्थना और, पिछली केन्द्र सरकारों ने तो योजना आयोग में इन देवी – देवताओं को कोई स्थान नहीं दिया, वर्तमान सरकार को नीति आयोग में अवश्य यथोचित स्थान दे देना चाहिए या कम से कम संबंधित मंत्रालयों में तो उनके लिए एक – एक कुर्सी अवश्य आरक्षित कर देनी चाहिए , जैसे लक्ष्मी जी के लिए वित्त मंत्रालय में, सरस्वती जी के लिए शिक्षा मंत्रालय में, वरुण जी के लिए सिंचाई मंत्रालय में,  विश्वकर्मा जी के लिए शहरी एवं आवास विकास मंत्रालय में, गणेश जी के लिए विधि मंत्रालय में और   ऐसे ही सभी देवी – देवताओं के लिए यथायोग्य आसन्न आरक्षित कर देना चाहिए , ताकि वे अमूर्त रूप में ही सही, अपनी आरक्षित सीट पर विराजमान रहें और सशरीर विराजमान मंत्री का दिमाग व ईमान दुरूस्त रखें।

मुझे उम्मीद है कि सक्षम प्राधिकारी मेरे आवेदन पर अवश्य विचार करेंगे।

भवदीय

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम, 02 जून 2016

मो. 9310249821

3,963 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 09/12/2017 at 7:00 am
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    そして、彼は、連邦準備制度理事会(FRB)が、再び、ドル札を刷り続けて、アメリカをハイパー・インフレの地獄に誘おうとしていることに目をつぶってしまうのでしょうか。   アディダスのウエアーに身を包み  最近旅のため人入手した サングラスをかけて 大きな帽子を被って~  恰好は いいですよ。 [url=http://jan.hise.org/mizuno/jpx900_1/index.html]ミズノ ゴルフ ウッド[/url]
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    [url=http://www.agrolmue.com/cb/718_1/index.html]タイトリスト 718[/url]

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  • 08/12/2017 at 9:54 am
    Permalink

    まぁ~これって違法行為なので、あとで問題視されることになるんですけど~この『結婚契約』』(MBC 2016年3~4月放送 全16話)も、もろ韓ドラ定番の設定なのですが…そんなこと全く気にならないくらい惹き込まれ、見入ってしまいました。 愛に関する様々な感情を深く描き出すだけでなく、誰もが持っている心の傷を癒す過程を介して、暖かい感動とときめきをお茶の間にプレゼントする予定だ。 [url=http://blog.livedoor.jp/sbaihui/]山口百恵 夏ひらく青春[/url]
    課題曲はカルテットとして演奏活動するためには最低限必要な演奏・合奏技術と、古典から現代に至る時代様式、地域文化固有の作曲形態に対する解釈、表現能力等を総合的に審査できるように設定されているように思います。 そこにギリシャを背景に、いわゆる「ウンボク調」と称されるイ・ウンボクディレクターの芸術が作品をアップグレードさせました。
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    」を見たからという説について考えると、まだあきらめてなかったのか、と、納得(笑)。 イメージ崩壊を恐れないイケメンスターたちの勇気ある挑戦をチェックしてみた。
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    [url=http://blog.livedoor.jp/ernude/]サマーヌード 窪田正孝[/url]

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  • 07/12/2017 at 11:33 pm
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  • 05/12/2017 at 3:45 am
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