ग़ज़ल : कुछ कही – अनकही

मित्रो

बहुत दिनों से आत्मकथा लेखन में व्यस्त रह रहा हूं और बीच – बीच में समसामयिक विषयों एवं घटनाओं पर विश्लेषणात्मक टिप्पणिया भी कर लिया करता हूं। ऐसे में ऊंगलियां कलम पकडना भूलती जा रहीं हैं और लैपटॉप के की – बोर्ड पर दौड लगाने की अभ्यस्त होती जा रही हैं। जाहिर है, कविता – कहानी लिखना भी अब वैसे ही सपना – सा होता जा रहा है, जैसे बेग़म का मायके जाना।

ये तो भाई राशिद राही और माननीया नीतु राठौड जी की ग़ज़लें हैं जिन्हें देख – पढ कर कुछ लिखना – सा आ रहा है , तो मुलाहिजा फरमाइएगा –

(एक)

वक्त अग़र रेत–सा फिसला  नहीं होता

समन्दर में  सहरा  निकला नहीं होता

सूरज  तमंचों  से   आग  बरसाता है

वरना  ये  हिमालय  पिघला नहीं होता

हमने   ही  तो  दरवाज़ा खोल रखा था

हर कदम पे  ये  सिला मिला नहीं होता

जाडे की  धूप–सी मीठी  ईद  का लहजा

इस तरह गर्मी   का  कर्बला नहीं होता

पडोसन   से  मसाइल सुलझा ली होतीं

जुल्फ–सा उलझा हर मसला नहीं  होता

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

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