डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                          केजरीवाल बनाम अन्ना बजरिये अन्ना बनाम पेरियार
(अरविन्द केजरीवाल – अन्ना हजारे और सीएन अन्नादुरई – ई वी रामास्वामी पेरियार)
 विशेष सन्दर्भ: तमिलनाडु में हिन्दी की राजनीति अर्थात राजनीति में हिन्दी
 
इंदिरापुरम, 16 जून 2016
 
कहते हैं, न गुजरा हुआ वक्त लौट कर आता है और न ही मरा हुआ आदमी, फिर भी, इतिहास खुद को दुहराता है। ऐसा कैसे हो सकता है? यह तो इतिहास ही बताएगा। तो आएं, इतिहास की कुछ झलकियां देखें।
 इस सिंहावलोकन अथवा पुनरावलोकन की प्रक्रिया को अरविन्द केजरीवाल को अन्ना यानी सीएन अन्नादुरई के बरख्श और अन्ना हजारे को पेरियार यानी ईवी रामास्वामी पेरियार के बरख्श देखने का आग्रह नहीं समझा जाए , फिर भी, यदि इस तरह का आग्रह मेरे इस आलेख में किसी को प्रतीत होता भी है तो क्या गुनाह है? क्योंकि ये तथ्य तो इतिहास में दर्ज हैं और शेष हिस्सा हमारे आपके सामने है।

 
पेरियार, अन्नादुरई के राजनीतिक गुरू थे, वैसे ही , अन्ना हजारे भी अरविन्द केजरीवाल के आन्दोलन गुरू थे, पेरियार की आधार भूमि राजनीति नहीं, समाज सुधार थी, वैसे ही अन्ना हजारे की आधारभूमि राजनीति नहीं, भ्रष्टाचार उन्मूलन व समाज सुधार ही थी। अन्नादुरई ने अपने गुरू पेरियार की नीति के खिलाफ उनसे अलग हो कर विधायी व संसदीय राजनीति की राह पकडी और जननेता बनने के बाद सांसद बने तथा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, वैसे ही , अरविन्द केजरीवाल ने भी अपने गुरू अन्ना हजारे की नीति के खिलाफ सक्रिय राजनीति की राह पकडी और मुख्यमंत्री बनने के बाद जननेता बनने की राह पर हैं, अन्नादुरई ने तमिलनाडु में एकक्षत्र राज करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस को 1967 में कुल 234 सीटों वाली विधान सभा में केवल 49 सीटों पर समेट दिया, वैसे ही केजरीवाल ने 70 सीटों वाली दिल्ली विधान सभा में 15 वर्षों तक राज करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस को 2015 में शून्य तक पहुंचा दिया तथा भारतीय जनता पार्टी को 3 सीटों में समेट दिया।
 
अन्नादुरई ने पेरियार से अलग हो कर 17 सितम्बर 1949 को नई पार्टी – द्रविड मुनेत्र कषगम (डीएमके) बनाई और उसमें अध्यक्ष का पद नहीं रखा, महासचिव का पद रखा, अध्यक्ष का पद उन्होंने ऐलानिया तौर पर अपने गुरू पेरियार के सम्मान में सांकेतिक रूप में खाली रखा, वैसे ही केजरीवाल ने अन्ना हजारे से अलग हो कर 2011 आम आदमी पार्टी बनाई तो उसमें अध्यक्ष का पद नहीं रखा , संयोजक का पद रखा, हालांकि केजरीवाल ने यह ऐलान नहीं किया कि अध्यक्ष पद अपने गुरू अन्ना हजारे के सम्मान में खाली छोडा है। अन्नादुरई की पार्टी को हराने के लिए उनके गुरू पेरियार ने कॉंग्रेस के दिग्गज नेता के.कामराज को समर्थन दिया, फिर भी अन्ना की पार्टी ने 1967 में अभूतपूर्व विजय प्राप्त की , यहां तक कि प्रधानमंत्री पद तक के उम्मीदवार समझे जाने वाले और तमिलनाडु के जमीन से जुडे महान जननेता के. कामराज अन्ना की पार्टी के एक गुमनाम – से छात्र नेता से अपने ही गृह निर्वाचन क्षेत्र विरुदनगर में दस हजार मतों से चुनाव हार गए, वैसे ही अन्ना द्वारा केजरीवाल को आशीर्वाद नहीं देने और उनके विरुद्ध बयान जारी करने के बावजूद केजरीवाल की पार्टी ने पहली बार 2013 के चुनाव में अप्रत्याशित रूप से 70 में से 28 सीटें प्राप्त कर लीं और तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित खुद केजरीवाल से हार गईं। चुनाव परिणाम आने के बाद अन्ना हजारे ने बयान दिया था कि अगर उन्होंने केजरीवाल का समर्थन किया होता तो केजरीवाल मुख्यमंत्री बन जाते। राजनीति का खेल देखिए, 28 सीट ले कर ही केजरीवाल कॉंग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री भी बन गए। वैसे ही, जैसे पेरियार के विरोध के बावजूद अन्नादुरई तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए थे। दो साल के भीतर ही जब दूसरी बार दिल्ली विधान सभा का चुनाव हुआ तो अन्ना हजारे ने घोषणा कर दी कि केजरीवाल द्वारा उनके नाम और फोटो तक का इस्तेमाल न किया जाए, फिर भी, केजरीवाल की पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिलीं , भाजपा केवल तीन तथा कॉंग्रेस शून्य सीट पर सिमट गई , ठीक वैसे ही, जैसे अन्नादुरई की पार्टी ने (1952 में चुनाव नहीं लडा था), 1957 में 205 सीटों वाली विधान सभा में 15 सीटें तथा लोकसभा में 2 सीटें और 1962 के चुनाव में विधान सभा में 50 सीटें और 1967 में 234 सदस्यों वाली विधान सभा में 139 सीटें जीत लीं और अन्ना मुख्यमंत्री बने।
 
इस तरह अन्ना हजारे और पेरियार तथा अरविन्द केजरीवाल और अन्नादुरई में आश्चर्यजनक समानताएं हैं, हालांकि अन्नादुरई निरंतर संघर्ष करते हुए पहले एक महान जननेता बने और पार्टी के गठन के 18 वर्षों बाद सत्तासीन हुए जबकि अरविन्द केजरीवाल सूचना का अधिकार और बिजली – पानी व भ्रष्टाचार की लडाई लडते हुए सक्रिय राजनीति में आए तथा पार्टी गठन के 2 वर्षों के भीतर ही सत्तासीन हो गए। अन्नादुरई एक प्रभावशाली वक्ता थे और अपनी बातों से लोगों को सहमत कराने के लिए उन्हें कोई अतिरिक्त परिश्रम नहीं करना पडता था; वैसे ही, केजरीवाल भी अच्छे वक्ता हैं और अपनी बातों से लोगों को सहज ही सहमत कराने में समर्थ हैं। पेरियार ने बाद में और अन्नादुरई ने शुरू से आखिर तक कॉंग्रेस विरोध की राजनीति की, दूसरी तरफ अन्ना हजारे की लडाई भ्रष्टाचर और व्यवस्था के खिलाफ थी जिसमें मुख्य रूप से कॉंग्रेस की केन्द्र सरकार ही निशाने पर रही और केजरीवाल की लडाई भी सत्ता के खिलाफ रही और मुख्य रूप से कॉंग्रेस की दिल्ली और केन्द्र सरकार निशाने पर रही, बाद में भाजपा की केन्द्र सरकार निशाने पर आई।
 
अंतर सिर्फ इतना है कि अन्नादुरई अपने विरोधी और सत्ता पक्ष के शीर्ष पुरूष भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू एवं दक्षिण भारत के महान जननायक व कॉंग्रेस के दिग्गज नेता के. कामराज तथा सी. राजगोपालाचारी अथवा अपने गुरू पेरियार से अलग हो जाने के बाद पेरियार के भी खिलाफ कभी भी एक शब्द नहीं बोला, हमेशा उन्हें उच्च आदर्शों वाले राष्ट्रनिर्माता माना तथा उनके प्रति शीष नवा कर ही अपनी बात रखी अर्थात अन्नादुरई हमेशा केवल कॉंग्रेस पार्टी और उसकी नीतियों के कट्टर विरोधी रहे , कॉग्रेसी नेताओं के प्रति कभी भी कटु नहीं हुए; जबकि केजरीवाल की राजनीति तत्कालीन सत्ता के शीर्ष पर विराजमान कॉंग्रेसी मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित और गुजरात के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री प्रत्याशी एवं बाद में पधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन नरेन्द्र भाई मोदी के खिलाफ आग उगलने से परवान चढी। सबसे बडा और ऐतिहासिक अंतर यह है कि पेरियार बाद के दिनों में और अन्नादुरई शुरू से ही हिन्दी विरोध की राजनीति के कर्णधार रहे जबकि अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल हिन्दी के समर्थक हैं; यही सोच इन्हें देश के दूसरे भागों में भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की इजाजत देती है।
 
अन्नादुरई की राजनीति का गहन अध्ययन करने पर यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि वे जल्दीबाजी में नहीं थे, हर कदम सम्भाल कर पूरे इत्मीनान से उठाते थे, उनके वचन और कर्म में भेद करना मुश्किल था, संसद में जब वे बोलते थे तो उनके विरोध – स्वर में भी सौहार्द और सौमनस्यता की अविरल धारा प्रवाहित होती – सी महसूस करता था पूरा सदन, कुछ मामलों में उन्हें अटल बिहारी बाजपेयी से भी दो कदम आगे माना जा सकता है, 1962 के हिन्द – चीन युद्ध के समय संसद में अन्ना ने प्रधानमंत्री पं. नेहरू को बिना शर्त्त समर्थन दे कर राष्ट्रीय मुद्दों पर एकता और प्रतिवद्धता का परिचय वैसे ही दिया जैसे अटल बिहारी बाजपेयी ने 1971 के हिन्द – पाक युद्ध के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दुर्गा कह कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को सर्वोच्च स्थान दिया था। अन्ना ने केवल तमिलनाडु को ही ध्यान में नहीं रखा होता, क्षेत्रीय स्वाभिमान के साथ – साथ राष्ट्रीय अस्मिता को भी ध्यान में रखा होता तथा हिन्दी विरोध की संकीर्ण राजनीति नहीं की होती तो वे पूरे भारत वर्ष में स्वीकार्य एक महान राष्ट्रीय राजनेता होते, बल्कि मैं तो यहां तक सोचता हूं कि आन्ना में विश्वनेता होने के भी सभी गुण थे, लेकिन बीमारी ने उन्हें असमय ही हमारे बीच से उठा लिया, वे मात्र दो साल ही मुख्यमंत्री रह सके।
 
केजरीवाल की राजनीति में जल्दीबाजी की झलक मिलती है, वे बोलने और कदम उठाने में सम्भाल व इत्मीनान नहीं करते, विरोधी पार्टियों और उनकी नीतियों के साथ – साथ उनके नेताओं के प्रति भी कटु होते हैं, वे सदन में बोलें या जनसभा में, हर जगह प्रहार की मुद्रा में होते हैं, उनका यह स्वभाव – सा हो गया है; हालांकि पूरी ईमानदारी से सोचा जाए तो आज उनके विरोधी, चाहे जिस भी और जितने भी बडे पद पर आसीन हों, उनसे किसी भी रूप में बेहतर नहीं हैं, इसीलिए केजरीवाल के परशुरामी स्वभाव को राम की अनुपस्थिति का परिणाम माना जा सकता है। इतना सही है कि वे खुद को जन्मजात विद्रोही और विरोधी मानना तथा जताना छोड दें, प्रहार में परिहास का पुट भी शामिल कर लें तथा प्रखर वक्तृत्व को कृतित्व से प्रमाणित करते चलें तो, आज सचमुच, देश में गिनेचुने नेता हैं जो उनसे बराबरी कर सकें,
दर असल केजरीवाल के अन्दर एक आन्नादुरई बैठा है जो उनकी स्वीकार्यता को कम नहीं होने देगा।
 
इस अंतर्संबंध को समझने के लिए दोनों महान इतिहास पुरूषों यानी स्व. सीएन अन्नादुरई और स्व. ईवी रामास्वामी पेरियार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की एक झलक देख लेना जरूरी है, तभी उनके बरख्श क्रमश: अरविन्द केजरीवाल और अन्ना हजारे का मूल्यांकन हो सकता है। इस प्रयास में किसी से किसी की तुलना करने की चेष्टा एवं किसी को कमतर करने या किसी को बेहतर करने की मंशा न देखी जाए। चूंकि किसी भी दो व्यक्तियों में शत प्रतिशत समानता कभी हो नहीं सकती, इसीलिए केजरीवाल और अन्नादुरई तथा अन्ना हजारे और पेरियार में भी कुछ असमानताओं का होना स्वाभाविक है, जाहिर है, व्यक्तित्वों की टकराहट संबंधी मुद्दों को दरकिनार कर, व्यक्तित्वों के मिलान संबंधी तत्वों के नज़रिये से इस आलेख को देखा जाना चाहिए। इसी बहाने दक्षिण भारत में हिन्दी व कॉंग्रेस विरोध की जडें भी तलाश ली जाएंगी, हालांकि केजरीवाल और अन्ना हजारे का उससे कोई संबंध नहीं है, सिवा इसके कि कॉंग्रेस और हिन्दी विरोध के प्रति अन्नादुरई और पेरियार में जो भावनात्मक संवेग था व जैसी दृढ धारणा थी, ठीक वैसे ही, केजरीवाल एवं अन्ना हजारे में केन्द्रीय सत्ता और भ्रष्टाचार विरोध के प्रति उत्कट आकांक्षा का उछ्वसित वेग व संकल्प – भावना है।
 
स्व. ईवी रामास्वामी एक घोर तार्किक और उच्च कोटि के बुद्धिवादी थे, हालांकि उनका जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ था। उन्हें कोई खास औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी। उन्होंने राजनीति की शुरूआत महान स्वधीनता सेनानी डॉ. पी वरदराजुलु नायडु और राजाजी (चक्रवर्त्ती राजगोपालाचारी) की प्रेरणा से भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस से की। वे महात्मा गांधी के परम अनुयायी हुए तथा उनके रचनात्मक कार्यों, जैसे हिन्दी प्रचार, खादी प्रचार और छुआछूत की कुप्रथा के उन्मूलन आदि कार्यक्रमों में अग्रगामी स्वयंसेवी बने तथा छुआछूत उन्मूलन संबंधी वाइकोम सत्याग्रह में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके ही प्रयासों से तमिलनाडु में हिन्दी पाठशालाओं की शुरूआत हुई, उनके कार्यों को देख कर गांधी जी ने उन्हें निष्ठावान सत्याग्रही कहा। उन्हें 1924 में तिरुवन्नामलई में आयोजित तमिलनाडु कॉंग्रेस का अध्यक्ष भी निर्वाचित किया गया। शुरुआती दिनों के निष्ठावन कॉंग्रेसी और हिन्दी प्रेमी वही ईवी रामास्वामी आगे चलकर दक्षिण भारत में कॉंग्रेस और हिन्दी विरोध के सबसे बडे झंडावरदार हो गए, इस विषय का मूल भी हम तलाशेंगे, किंतु अभी कुछ दूसरी जरूरी बातें।
 
दक्षिण भारत में तमिल, तेलुगु , कन्नड और मलयालम का एक प्रमुख भाषा – समूह था, उन भाषाओं को बोलनेवाले द्रविड कहे जाते थे। इस प्रकार दक्षिण के चारों राज्य एक तरह से द्रविडनाडु कहे जाते थे । द्रविड मूल के लोग खुद को ब्राह्मणेतर मूल के यानी अनार्य और ब्राह्मणों को आर्य मूल के मानते हैं। द्रविड कला व संस्कृति धर्म आधारित थी। प्राचीन काल से द्रविडों के शोषण में धर्म और धर्म – आधारित संस्थाओं, मंदिरों आदि का ही हाथ माना गया, और धर्म एवं उससे संबंधित संस्थाओं में ब्राह्मणों का आधिपत्य रहा , इसीलिए द्रविड राजनीति के मूल में शुरू से ही ब्राह्मणवाद का विरोध रहा। धर्म ग्रंथ या शिलालेख अधिकांश संस्कृत में थे, इसलिए द्रविड राजनीति में ब्राह्मणवाद के साथ – साथ संस्कृत भाषा का विरोध भी प्रमुखता के साथ रहा। चूंकि द्रविड लोग यह मानते थे कि हिन्दी की लिपि संस्कृत की भांति ही देवनागरी है तथा हिन्दी भाषा का मूल भी संस्कृत ही है, इसलिए वे हिन्दी को भी आर्य भाषा समूह का अंग मानते थे और उस रूप में द्रविडों के शोषकों की भाषा मानते थे। तो हिन्दी विरोध की जड यहां से निकलती है!
 
द्रविड भाषा समूह में तमिल भाषा का प्राधान्य रहा है और तमिल दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक मानी जाती है, संस्कृत से भी पुरानी। द्रविड राज्य समूह में तब का मद्रास और आज का तमिलनाडु सबसे प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। इसलिए तमिल और तमिलनाडु ही द्रविडों का प्रमुख प्रतिनिधि रहा है, अत: ब्राह्मण विरोध और हिन्दी विरोध का सबसे ऊंचा परचम तमिलनाडु एवं तमिलभाषियों के हाथों में ही लहराया। 20वीं सदी के पारंभ में तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण समुदाय में ही कुछ ऐसे विद्वान एवं नेता हुए जिहोंने गैर-ब्राह्मणों के हितों की रक्षा के लिए, सदियों से शोषित द्रविडों को न्याय दिलाने के लिए लोगों को जागरूक और सक्रिय करना शुरू किया , वैसे लोग तमिल, तेलुगु. कन्नड और मलयालमभाषियों को एक ही जातीय समूह का सदस्य मानते थे। गैर-ब्राह्मणों के उस आन्दोलन को द्रविड आन्दोलन का नाम दिया गया और 1916 में ब्राह्मणेतर नेताओं ने दक्षिण भारतीय उदारवादी संघ (साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन) नामक संगठन बनाया जो आगे चल कर जस्टिस पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पार्टी में अनेक विद्वान एवं प्रखर वक्ता थे जिन्होंने अपने प्रभावशाली भाषणों से ज्ञान व वक्तृत्व में ब्राह्मणों की सर्वोच्चता के मिथक को ध्वस्त करते हुए यह भी साबित कर दिया कि यदि ब्राह्मणों के बराबर केवल अवसर ही गैर – ब्राह्मणों को मिल जाए तो वे ब्राह्मणों के समकक्ष ही नहीं, बल्कि उनसे आगे जा सकते हैं। तो जाति के आधार पर आरक्षण की जड यहां से शुरू होती है!
 
राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले सामाजिक एवं जातीय समता को महत्व देने वाले तथा मूल रूप से जातीय उत्थान व समाज सुधार की भावना से ओतप्रोत ईवी रामास्वामी अभी तक कॉंग्रेस में ही थे। एक छोटी – सी लगने वाली घटना के कारण कॉंग्रेस से उनका मोहभंग हो गया और उन्होंने जस्टिस पार्टी को अपना लिया। हुआ यह था कि तमिलनाडु के प्रमुख कॉंग्रेसियों ने मिल कर चेरानमहादेवी में एक गुरूकुल खोला जिसका उद्देश्य बच्चों के माध्यम से जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज का निर्माण करना था। उसे चलाने का उत्तरदायित्व वी वी एस अय्यर को सौंपा गया , किंतु अय्यर ने गुरूकुल के घोषित आदर्शों का उल्लंघन करते हुए ब्राह्मण छात्रों के लिए अलग रसोई, आवास, प्रार्थना सभाकक्ष आदि बनवा दिए, महान देशभक्त और समाज सुधारक ईवी रामास्वामी ने उसे बर्दाश्त नहीं किया और कॉंग्रेस छोड कर जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए जो सामाजिक पिछडेपन को दूर कर शोषितों – दलितों को आत्मसम्मान दिलाने के घोषित उद्देश्य से ही कार्य कर रही थी। तब से ईवी रामास्वामी कॉग़्रेस को ब्राह्मणवादी मानते हुए उसका घोर विरोधी हो गए और आर्यों की भाषा संस्कृत तथा उसी से निकली माने जाने वाली हिन्दी को भी ब्राह्मणवाद का प्रतीक मानकर उसके विरोध का झंडा भी उठा लिया, आगे चल कर वे कॉंग्रेस विरोध के साथ – साथ हिन्दी विरोध का भी केन्द्र बन गए। दलितों और शोषितों के प्रति धर्म और धार्मिक संस्थाओं के दुर्व्यवहार व अन्याय को देख कर धर्म और देवी – देवताओं से उनका मोहभंग तो हो ही गया था, वे एक तरह से निरीश्वरवादी , दूसरे श्ब्दों में कहें तो नास्तिक हो गए, इसीलिए वे धर्म आधारित कला एवं संस्कृति को भी नष्ट कर देना चाहते थे।
 
मद्रास में 1938 में श्रीमती नीलाम्बिगई अम्मैयार की अध्यक्षता में आयोजित महिलाओं के एक विशाल सम्मेलन में दलितों, शोषितों और पिछडों के उत्थान की दिशा में सतत प्रयत्नशील कर्मठ समाजसेवी ई वी रामास्वामी को उनके सामाजिक कल्याण संबंधी महान कार्यों के लिए ‘पेरियार’ (महान व्यक्ति) के नाम से संबोधित करने का निर्णय लिया गया , तब से उन्हें उसी सम्मानसूचक नाम से पुकारा जाने लगा।
 
कांजीवरण नटराजन अन्नादुरई का जन्म कांचीपुरम में हुआ था जो धर्म की नगरी मानी जाती थी किंतु धार्मिक अन्धविश्वास और कर्मकाण्ड में उनका विश्वास नहीं था, वे पेरियार के ब्राह्मण विरोध, धार्मिक ढकोसलों के उन्मूलन और समाज सुधार संबंधी आदर्शों से बहुत प्रभावित थे,1935 में कोयम्बटूर के पास तिरूपुर में अयोजित युवक समेलन में वे पेरियार के व्यक्तिगत सम्पर्क में आए, उन दिनों कांजीवरण नटराजन अन्नादुरई बीए ऑनर्स की परीक्षाएं दे कर परिणाम की प्रतीक्षा में थे और जस्टिस पार्टी के आदर्शों से प्रभावित हो कर उससे जुड गए थे, पेरियार के साथ पहली ही मुलाकात में उन्होंने पेरियार को अपना राजनीतिक गुरू मान लिया और बाद के दिनों में तो वे पेरियार के राजनीतिक दत्तक पुत्र जैसे हो गए। 1936 में पेरियार जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए तो अन्नादुरई पेरियार के सबसे बडे विश्वासपात्र और उनकी नीतियों को आगे बढाने वाले नेता के रूप में उभरे। पेरियार ने 1937 में कांचीपुरम में के वी रेड्डी की अध्यक्षता में हिन्दी विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें अन्नादुरई ने महत्वपूर्न भूमिका निभाई।
 
1937 में हुए चुनावों में कॉंग्रेस को विधान सभा की कुल 215 में से 159 और परिषद की 46 में से 26 सीटें मिलीं, फिरभी , उसके नेता राजाजी ने गवर्नर को प्राप्त विवेकाधिकार शक्तियों के विरोध स्वरूप मंत्रीमंडल का गठन करने से इंकार कर दिया, तब के वी रेड्डी के नेतृत्व में एक अंतरिम मंत्रीमंडल का गठन हुआ। कुछ महीनों बाद वाइसराय के आश्वासन पर राजाजी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में पहले कॉंग्रेसी मंत्रीमंडल का गठन किया। उस वक्त तक कांजीवरण नटराजन अन्नादुरई पूरी तरह जस्टिस पार्टी में घुलमिल गए थे और उसके नीति निर्धारकों में शामिल हो गए थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रधानमंत्री के रूप में सी. राजगोपालाचारी ने 1938 में स्कूलों में अनिवार्य हिन्दी शिक्षा की घोषणा की जिसका तमिल विद्वानों और राजनेताओं ने बडे पैमाने पर विरोध किया। उनका मानना था कि हिन्दी का संस्कृत से घनिष्ठ संबंध है और संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा है ,और चूंकि राजाजी भी ब्राह्मण ही हैं, इसीलिए हिन्दी को अनिवार्य कर ब्राह्मण हितों को साधने का प्रयास हो रहा है। पेरियार सहित कई बडे नेता जेल में डाल दिए गए। जेल में रहते हुए ही पेरियार को फिर से जस्टिस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया, सरकार ने उन्हें 22 मई 1939 को जेल से रिहा कर दिया तथा अनिवार्य हिन्दी शिक्षा का आदेश भी वापस ले लिया, तब कांजीवरण नटराजन अन्नादुरई का उत्साह और भी अधिक बढ गया।
 
1940 में तंजावुर जिले के तिरुवरूर में पेरियार की अध्यक्षता में जस्टिस पार्टी का राज्य सम्मेलन हुआ जिसमें ‘तमिलनाडु तमिलोंके लिए’ प्रस्ताव पारित करने पर मंथन हुआ। कुछ नेताओं का मानना था कि यह प्रस्ताव संकीर्ण है क्योंकि दक्षिण के सभी चार राज्य – आन्ध्र, मैसूर, केरल और तमिलनाडु द्रविड मूल के हैं, इसीलिए उनको मिला कर ‘द्रविडनाडु द्रविडों के लिए’ की मांग रखी जाए, उसी के अनुसार प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पर कांजीवरण नटराजन अन्नादुरई ने जोरदार और सारगर्भित भाषण दिया, तब तक वे पेरियार के तमिल दैनिक विदुतलई के सम्पादकीय विभाग में शामिल हो चुके थे और उनके सम्पादकीय लेखों से द्रविड सोच विस्तार पाने लगी थी। उसे और अधिक विस्तार देने के खयाल से उन्होंने अपने गृह नगर कांचीपुरम से तमिल साप्ताहिक ‘द्रविदनाडु’ का प्रकाशन प्रारंभ किया और राजनीतिक टिप्पणियों से ले कर लघु कथाएं, एकांकी, नाटक, धारावाहिक कथाएं और व्यंग्य जैसी साहित्यिक विधाओं पर भी अपनी लेखनी चलाई। बाद में उन्होंने फिल्मों की पटकाथाएं भी लिखीं। उनकी लेखनी और उनके भाषणों से जस्टिस पार्टी और पेरियार के व्यक्तित्व का तमिलनाडु में व्यापक रूप में विस्तार हुआ। उन्हीं दिनों अन्नादुरई को लोग प्यार और आदर से ‘अन्ना’ यानी बडा भाई कह कर संबोधित करने लगे। 1944 में जस्टिस पार्टी का सम्मेलन सेलम में हुआ जिसमें ‘जस्टिस पार्टी’ का नाम बदल कर ‘ द्रविडार कषगम’ कर दिया गया और उसके उद्देश्यों में राजनीति में उत्तर भारत का प्रभुत्व तथा समाज में ब्राह्मणों का आधिपत्य समाप्त करने और उसके प्रतीक स्वरूप हिन्दी का विरोध करने को प्राथमिकता दी गई।
 
1946 में कॉग्रेस की सरकार ने फिर से स्कूलों में हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया, तब तमिलनाडु में शिक्षामंत्री टी एस अविनाशलिंगम चेट्टियार थे। द्रविडार कषगम ने हिन्दी विरोध का झण्डा बुलन्द कर दिया और उसका नेतृत्व अन्नादुरई को सौंपा। अब हिन्दी विरोध द्रविडार कषगम की प्राथमिकताओं में सबसे आगे हो गया, हालांकि 1950 में सरकार ने अनिवार्य हिन्दी शिक्षा संबंधी अपना आदेश एक बार फिर वापस ले लिया। 1946 में ही द्रविडार कषगम ने मदुरै में ‘काला कुर्ता’ सम्मेलन आयोजित किया जिसमें सभी स्वयंसेवकों को काला कुर्ता पहन कर जाना था, पेरियार का इस बात पर जोर था कि द्रविडार कषगम के स्वयंसेवकों के साथ – साथ सभी आम सदस्य भी काला कुर्ता पहनें, लेकिन अन्ना उनसे सहमत नहीं हुए, दोनों के बीच मतभेद का वह दूसरा अवसर था, उसके पहले उन दोनों का मतभेद तब उभर कर सामने आया था जब पेरियार ब्राह्मणवाद की जड धर्म और उससे संबंधी कला एवं संस्कृति को भी नष्ट कर देना चाहते थे किंतु अन्ना का मानना था कि कला और परम्परा हमारी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर हैं, इसीलिए उन्हें अक्षुण्ण रखा जाए। तीसरी बार और निर्णायक मतभेद भारत को आज़ादी मिलने की घटना से उजागर हुआ। पेरियार ने बयान जारी कर कहा कि द्रविडार कषगम के सभी लोग 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस के बदले शोक दिवस के रूप में मनाएं। उस बयान से अन्ना बहुत निराश – हताश और दुखी हुए, उन्होंने अपने साप्ताहिक द्रविड नाडु में सम्पादकीय लेख लिख कर द्रविडार कषगम के सभी सदस्यों का आह्वान किया कि वे स्वतंत्रता दिवस को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाएं , यहां से दोनों के रास्ते अलग होने लगे।
 
पेरियार ने 22 अक्टूबर 1948 को इरोड में एक विशेष सम्मेलन आयोजित किया और उसकी अध्यक्षता अन्ना से करा कर मतभेद को पाटने का प्रयास किया किंतु कुछ ही दिनों बाद उन्होंने फिर प्रतिकूल बयान जारी कर मामले को और बिगाड दिया। यही नहीं, उन्होंने कुमारी मणियम्मई नामक 26 वर्षीय युवती को अपनी व्यक्तिगत एवं द्रविडार कषगम की उत्तराधिकारी बनाने का फैसला ले लिया तथा आगे चल कर तो 71 वर्ष के पेरियार ने 26 वर्ष की उस युवती से शादी भी कर ली। बस, अन्ना और पेरियार के रास्ते अलग हो गए और अन्ना ने 17 सितम्बर 1949 को द्रविड मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) नामक अपनी अलग पार्टी बना ली। वही आज दो धडों में बंट गई है – डीएमके एवं एआईडीएमके और दोनों के राजनीतिक सिक्के हिन्दी विरोध से ही चमकते हैं क्योंकि 20वीं सदी के तीसरे दशक के बाद की द्रविड राजनीति की आधारभूमि हिन्दी विरोध ही है।
इतिहास ने एक प्रखर व प्रभावशाली वक्ता, ईमानदार राजनीतिज्ञ, सुलझे हुए सांसद एवं कर्मयोगी मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय मुख्य धारा के विपरीत हिन्दी विरोध का झण्डा बुलन्द करने के कारण एक क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में सिमटते हुए देखा है तो एक हठीले जननेता को जनता की नजरों से उतरते हुए भी देखा है। केन्द्र और राज्यों में सत्ता में बैठे या विपक्ष का झण्डा लहराते बडे नेताओं को यह याद रखना होगा कि जनता की नजरों में चढने में तो समय लगता है, किन्तु उसकी नजरों से उतरने में देर नहीं लगती।
 
‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद
इंदिरापुरम, 16 जून 2016
9310249821

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