डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                                      बैंकों का विलय व एकीकरण  : किसको नफा , किसका नुकसान ?

(प्रधानमंत्री जी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय और एकीकरण शीघ्र सम्पन्न कराइए क्योंकि अगला विश्वयुद्ध बम, बन्दूकों व मिसाइलों से नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनों से लडा जाएगा और उसके लिए सुदृढ वित्तीय ढांचा का होना जरूरी है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जर्मन राज्यों के एकीकरण के लिए बिस्मार्क तथा आधुनिक इटली के निर्माण एवं सुदृढीकरण के लिए मैज़िनी, गैरीबाल्डी व कैवूर इतिहास पुरूष हो गए; भारत में भी , देसी रियासतों के विलय के लिए सरदार पटेल, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए इंदिरा गांधी तथा आर्थिक उदारीकरण व वैश्वीकरण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह इतिहास में अमर हो गए हैं; हालांकि 1991-92 में बैंकों के एकीकरण की नीति बना लेने के बावजूद वित्तमंत्री के रूप में 5 साल और प्रधानमंत्री के रूप में 10 साल के कीमती समय में भी वे अपनी उस नीति को अमली जामा नहीं पहना सके, शायद उसके पीछे न्यु बैंक ऑफ इंडिया का 1993 में पंजाब नैशनल बैंक में बिलकुल हडबडी में विलय करा देने से जो पेंचीदगियां पैदा हुईं,  वही मुख्य वजह रहीं हो; फिर भी, देश में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का एकीकरण उन्हीं के कार्यकाल में 2006 से 2008 के बीच हुआ जिनकी संख्या 196 से घट कर 56 रह गई है, उन्हें एक बार फिर एकीकृत किया जाना चाहिए और प्रत्येक राज्य में एक ही ग्रामीण बैंक रखा जाना चाहिए। इतिहास अब आपके द्वार आ गया है, वही इतिहास जिसने मैजिनी को इटली का ‘दिल’, कैवूर को ‘दिमाग’ और गैरीबाल्डी को ‘ताक़त’ कहा था, आप तो ‘मनकी बात’ करते हैं, आप देश का दिल , वित्तमंत्री अरुणजेटली दिमाग और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ताक़त बनें। सभी पूर्ववर्तियों से आगे निकल जाने के लिए आपका मार्ग प्रशस्त है, आप ढेर सारे बडे – बडे काम करा रहे हैं, राष्ट्रीयकृत बैंकों सहित ग्रामीण बैंकों का भी एकीकरण इसी वित्तीय वर्ष में करा लीजिए, और हां, विलय एवं एकीकरण से उत्पन्न होने वाली संभावित समस्याओं के समाधान के उपाय पहले ही ढूंढ लीजिए, इतिहास अपने पन्नों में नहीं, सिर–माथे रखेगा आप को। यह भी ध्यान रहे कि सिर पर कामयाबी का सेहरा बंधने या नाकामी का ठीकरा फुटने की पृष्ठभूमि आदमी खुद तैयार करता है।)

इंदिरापुरम, 24 जून 2016

केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने भारतीय स्टेट बैंक में उसके 5 सहायक (एसोशिएट) बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय की मंजूरी 15 जून 2016 की बैठक में दे दी। उस विलय के विरोध में संबंधित बैंकों में कर्मचारी – यूनियनों और अधिकारी – संगठनों के एक – एक संघ ने 12 जुलाई को एवं सार्वजनिक क्षेत्र के शेष 20 बैंकों का एकीकरण कर केवल 5 बैंक रखे जाने के संभावित निर्णय के विरोध में सभी बैंकों में 13 जुलाई को हडताल करने की घोषणा की है यानी तत्काल विलय किए जाने वाले छह बैंकों में दो दिनों की हडताल होगी । प्रश्न उठता है कि इस अवश्यंभावी विलय और संभावित एकीकरण से किसको नफा तथा किसका नुकसान होगा, देश की जनता को इसे जानने का पूरा हक है क्योंकि प्रत्येक पक्ष जो कुछ भी करता है, उसी जनता की भलाई के नाम पर करने का दावा करता है। उस संभावित नफा – नुकसान का खुलासा करने के लिए जरूरी है कि विलय और एकीकरण में, मन से या बेमन से, शामिल होने वाले सभी पक्षकारों को जान लें तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की पृष्ठभूमि की भी तलाश कर लें।

देश का सम्मान, देश की अर्थव्यवस्था, देश की वित्तीय व्यवस्था , देश की जनता, देश के बैंक, बैंकों के ग्राहक, बैंकों के कर्मचारी व अधिकारी तथा उनका संगठन और उनके नेता, इस विलय और संभावित एकीकरण के पक्षकार होंगे ; इन पक्षकारों में कर्मचारी – अधिकारी संगठनों के नेता सबसे अहम हैं क्योंकि प्रचलित नियमों के अनुसार प्रत्येक बैंक के कर्मचारियों एवं अधिकारियों के बहुमत वाले संठनों के एक – एक नेता बैंक के निदेशक मंडल अर्थात बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में डायरेक्टर होते हैं यानी हर बैंक में कर्मचारियों की ओर से एक तथा अधिकारियों की ओर से एक डायरेक्टर होता है, बैंक के आकार, व्यवसाय की मात्रा अथवा कर्मचारियों – अधिकारियों की संख्या का उस पर कोई असर नहीं पडता। मुझे लगता है कि बिना खुलासा किए ही पाठकों को संभावित नुकसान से आशंकित और आतंकित पार्टी का ब्रह्मज्ञान अब तक प्राप्त हो गया होगा!

इस विषय पर आधिकारिक तौर पर मैं बोल सकता हूं क्योंकि केन्द्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण संबंधी जो सुविचारित नीति 1991-92 में तैयार की थी, उसे लागू करने का प्रथम प्रयास जल्दबाजी में और बहुत ही अव्यवस्थित तरीके से 1993 में किया गया जिसके परिणामस्वरूप आए जलजले को मैंने देखा है, उसमें जलते – उबलते और डूबते – उतराते लोगों को भी देखा है और खुद भी उसकी दहशत को महसूस किया है। जी हां, मैं उसी राष्ट्रीयकृत न्यु बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी था जिसका विलय 04 सितम्बर 1993 को एक दूसरे राष्ट्रीयकृत बैंक पंजाब नैशनल बैंक में कर दिया गया था, विलय से प्रभावित होने वाले पक्षों के सामने आने वाली संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक रीति – नीति की पूर्व तौयारी किए वगैर ही उस विलय को अंजाम देने का नतीजा बडा भायावह रहा था, तीन वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमे चलते रहे, कर्मचारियों – अधिकारियों की भर्ती और प्रोन्नति रूकी रही, सैकडों लोग विस्थापन का दंश झेलते रहे, रोजीरोटी चलाने के लिए सिनेमा हॉल के पोस्टर सडकों पर लगा कर या दूकानों में मजदूरी कर दो पैसे कमाते रहे, और सबसे बडी बात यह कि बात – बात में कदम – कदम पर अपमान झेलते रहे , कुछ लोग अपमान झेलते हुए ही स्वर्ग सिधार गए तो कुछ लोग अपने घाव सहलाते दिन काटते रहे, दशकों गुजर जाने के बाद आज भी उनके घाव हरे हैं।

न्यु बैंक का पीएनबी में वह विलय गुनाहों का देवता बन कर रह गया। देवता इसलिए कि न्यु बैंक का आकार छोटा होने के कारण कर्मचारियों – अधिकारियों को प्रोन्नति के अवसर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे , मुझे ही दस वर्षों तक स्केल – 1 का अधिकारी रहते प्रोन्नति के लिए किसी भी प्रतियोगिता में शामिल होने तक का अवसर नहीं मिला था, जबकि पीएनबी में हर साल प्रतियोगी परीक्षाएं होती थीं। गुनाह इसलिए कि न्यु बैंक से आने वाले लोगों की सीनियरिटी वर्तमान वेतनमान में उनके कुल कार्यकाल के आधी कर दी गई, फलस्वरूप मुझसे पांच साल बाद पीएनबी में अफसर हो कर आने वाले लोग भी मेरे सीनियर बन गए। यही नहीं, न्यु बैंक वालों को ‘लखपति’ जैसे शब्द का बदनाम तोहफा भी मिला, चौंक गए न, तो सुनिए जनाब; पीएनबी में कर्मचारियों – अधिकारियों की संख्या 5 अंकों में थी, इसीलिए जब न्यु बैंक वाले आ गए तो उन्हें पीएफ संख्या (इम्पलाईज नम्बर) 6 अंकों में दी गई, और लाख की गिनती तो 6 अंकों से ही होती है हुजूर ! जब 2010 में मैं पीएनबी प्रधान कार्यालय में एक विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक था तो एक डीजीएम ने मेरे लिए ही , हिकारत की नजरों से मुझे देखते हुए, ‘लखपति’ शब्द का प्रयोग किया था। वे मुझे कई वर्षों से जानते थे, लेकिन यह नहीं जानते थे कि मैं न्यु बैंक ऑफ इंडिया से आया था, वे मेरे बहुत बडे प्रशंक थे और दूसरे अधिकारियों को मुझसे प्रेरणा लेने की सीख देते थे क्योंकि मेरा कार्यनिष्पादन हमेशा उत्कृष्ट रहा था। एक दिन उन्होंने एक अधिकारी के पक्ष में अनुशंसा करने का संकेत किया तो मैंने यह कह कर स्पष्ट रूप से मना कर दिया था कि – “ नियम से हट कर मैं कोई अनुशंसा नहीं करूंगा, और इस अधिकारी के मामले में तो किसी भी सूरत में नहीं करूंगा क्योंकि वह भी न्यु बैंक से है और मेरा बैचमेट रहा है, इसीलिए मेरे ऊपर पक्षपात का आरोप लगाया जा सकता है” । इतना सुनते ही वे भौंचक्का रह गए थे, उनके मुंह से अचानक निकल गया था– “ वो .. ओ..ओ..ओ , तो वह भी और आप भी लखपति हैं !” उसके बाद मेरे प्रति उनके व्यवहार में अप्रत्याशित बदलाव आ गया था।

तो, नेक नीयत से बनाई गई किसी अच्छी नीति को हडबडी में लागू करने से उभरा उतना बदसूरत चेहरा देखा है हमने , अब फिर से वैसा किसी और को देखने को न मिले, इसके लिए सरकार को पूरी सावधानी बरतनी होगी तथा आवश्यक रीति – नीति पहले ही तैयार कर लेनी होगी। न्यु बैंक के विलय में कोई सावधानी या एकरूपता नहीं बरती गई थी और न कोई सुविचारित रीति – नीति अपनाई गई थी , क्योंकि 1986 में निजी क्षेत्र के एक छोटे-से बैंक ‘हिन्दुस्तान कमर्शियल बैंक’ का उसी पीएनबी में विलय हुआ था तो उसके कर्मचारियों – अधिकारियों की सीनियरिटी को 1.5 : 1 किया गया था , जबकि न्यु बैंक उससे कई गुना बडा और स्वयं एक राष्ट्रीयकृत बैंक था तो उसके कर्मचारियों – अधिकारियों की सीनियरिटी को 2 : 1 किया गया, कोर्ट का फैसला जो भी रहा हो, इतिहास इस विसंगति से अपना मुंह नहीं छुपा सकता।

इस विषय में पूरे अधिकार के साथ मैं इसलिए भी बोल सकता हूं क्योंकि 4 दशकों की बैंकिंग सेवाओं के दौरान मैं ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में, निजी क्षेत्र के कमर्शियल बैंक में, छोटे आकार के राष्ट्रीयकृत बैंक में और देश के सबसे बडे राष्ट्रीयकृत बैंक में भी कार्य किया है। साथ ही, बैंकों के सीएमडी , ईडी, जीएम, जेडएम आदि के अलावा युनियन व एसोशिएशन के नेताओं का भी टेलीविजन पर इंटरव्यु लिया है, उनके लिए प्रेस रिलीज तैयार की है, प्रेस कन्फरेम्स कराया है और इस प्रकार उन सब से अच्छी तरह वाकिफ होने का अवसर मुझे मिला है । इसीलिए विलय व एकीकरण के सभी पक्षकारों को तथा उन्हें होने वाले नफा – नुकसान को मैं अच्छी तरह जानता – समझता हूं और समझा भी सकता हूं। तो आइए, उसके लिए एक नज़र इतिहास पर डालें।

भारतीय स्टेट बैंक देश का सबसे बडा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक है। स्टेट बैंक को राष्ट्रीयकृत बैंकों की श्रेणी में नहीं समझा जाता, किंतु सार्वजनिक का क्षेत्र बैंक माना जाता है। इस तकनीकी पहलू को समझने के लिए उसकी उत्पत्ति का मूल तलाशना होगा।

अंग्रेजों के जमाने में 3 प्रेसीडेंसी बैंक थे –

  • ‘बैंक ऑफ कलकत्ता’ – 02 जून 1806 को कलकत्ता में स्थापित हुआ जिसका बाद में नाम बदल कर ‘बैंक ऑफ बंगाल’ कर दिया गया;
  • ‘बैंक ऑफ बम्बे’ – 15 अप्रैल 1840 को बम्बे में स्थापित हुआ और तीसरा
  • ‘बैंक ऑफ मद्रास’ – 01 जुलाई 1843 को मद्रास में स्थापित हुआ।

उक्त तीनों ‘प्रेसीडेंसी बैंकों’ को 27 जनवरी 1921 को एकीकृत कर दिया गया और उसे नाम दिया गया-‘इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया’। भारत की संसद ने ‘भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम 1955’ पारित किया और तदनुसार 01 जुलाई 1955 से इम्पीरियल बैंक का नियंत्रण भारत सरकार ने अपने हाथों में ले लिया और उसका नाम रखा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया। उसके पहले भारतीय रिज़र्व बैंक, जो देश का केन्द्रीय बैंक है, ने इम्पीरियल बैंक का 60% शेयर खरीद लिया था ताकि नियमानुसार वह बैंक भारत सरकार के नियंत्रण में आ जाए। भारत सरकार ने अपनी सम्प्रभुता और भारतीय रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता के अंतर्द्वन्द्व को दूर करने के लिए रिज़र्व बैंक से वही शेयर 2008 में अपने नाम करा लिया। हालांकि, उसके बाद सम्प्रभुता बनाम स्वायत्तता का अंतर्द्वंद्व अन्दर ही अन्दर शायद पहले से भी अधिक तीखा हो गया (इस विषय की चर्चा बाद में कभी विस्तार से की जाएगी)।

अंग्रेजों के जमाने में कमर्शियल बैंकों का स्वामित्व या तो राजवाडों यानी देसी रियासतों (प्रिंसली स्टेट) , जिनका स्वतंत्र भारत संघ में विलय करते हुए ‘प्रीवी पर्स’ का प्रावधान किया गया था) के पास था या उद्योगपतियों के पास अथवा अंग्रेज व्यापारियों के पास; फलस्वरूप भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पहुंच नगण्य थी। उस विषय पर भारत की प्रथम पंच वर्षीय योजना ने विचार किया था, जिसके आलोक में ऑल इंडिया रुरल क्रेडिट कमेटी ने 1954 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण कर उसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया नाम देने के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारण वह रिपोर्ट भी थी। जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक हो गया तो ग्रामीण और कृषि विकास के लिए ऋण मुहैय्या कराने के उद्देश्य से उसका दायरा बढाने, और उसके लिए कुछ बैंकों को सहायक बैंक के रूप में उसके साथ जोडने का निर्णय लिया गया। उसी के फलस्वरूप देसी रियासतों के निजी क्षेत्र के कमर्शियल बैंकों का अधिग्रहण कर उन्हें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी भारतीय स्टेट बैंक का एसोशिएट बैंक बनाया गया, उसके लिए 1959 में संसद ने ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (सब्सिडियरी बैंक्स) अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार 8 देसी रियासतों के बैंकों को सितम्बर 1959 से अक्टूबर 1960 के बीच स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधीन लाया गया, वे थे-

(1) मैसूर बैंक लिमिटेड -1913 में स्थापित,   (2) पटियाला बैंक लिमिटेड -1917 में स्थापित,

(3) हैदराबाद बैंक लिमिटेड- 1941 में स्थापित, (4) जयपुर बैंक लिमिटेड-1943 में स्थापित,

(5) बीकानेर बैंक लिमिटेड-1944 में स्थापित,   (6) ट्रावणकोर बैंक लिमिटेड-1945 में स्थापित

(7) सौराष्ट्र बैंक लिमिटेड और (8) इंदौर बैंक लिमिटेड।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सब्सिडियरी बैंकों के नाम के प्रारम्भ में ‘स्टेट बैंक ऑफ’ जोड दिया गया और अंत में लगे ‘लिमिटेड’ शब्द को हटा दिया गया। उनमें से जयपुर और बीकानेर बैंक को 1963 में एक साथ मिला कर नाम दिया गया – स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर ऐण्ड जयपुर। 13 अगस्त 2008 को स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र का तथा 19 जून 2009 ( 26 अगस्त 2010 से प्रभावी) को स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय कर दिया गया। ताज़ा प्रस्ताव स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर ऐण्ड जयपुर तथा स्टेट बैंक ऑफ ट्रावणकोर और साथ ही, भारतीय महिला बैंक (2013 में स्थापित) के विलय का है।

1967 में देश के कई राज्यों में संविद सरकारें बनी जिससे समाजवादियों का प्रभाव बढ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकिंग व्यवस्था का लाभ देश की गरीब जनता तक पहुंचाने तथा समाजवादियों के प्रभाव को कम करने के खयाल से बैंकों के ऊपर सामाजिक दायित्व सौंपा, किंतु उसका फायदा ग्रामीण और कृषि क्षेत्र को ‘ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन’ सदृश्य ही मिला और बैंकों तक गरीबों की पहुंच पहले की ही तरह दुरूह बनी रही। 17 जुलाई 1969 को केन्द्रीय मंत्रीमंडल की एक अहम बैठक हुई जिसमें कुछ ठोस और कडे कदम उठाने के निर्णय लिए गए, उसी परिप्रेक्ष्य में 19 जुलाई 1969 को आधी रात में बैंकिंग कम्पनीज (एक्विजिशन ऐण्ड ट्रांस्फर ऑफ अण्डरटेकिंग्स) ऑर्डिनेंस ( बाद में संसद ने उसे अधिनियमित कर दिया ) जारी कर देश के तब के 14 बडे कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया। राष्ट्रीयकरण के लिए बडे बैंक के दायरे में केवल उन्हीं बैंकों को रखा गया जिनकी जमा राशि 50 करोड रूपये से अधिक थी। स्पष्ट है कि राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था को पूंजीपतियों के हाथों से मुक्त करा कर उसका आधारभूत ढांचा बढाना तथा ग्रामीण उद्यमों एवं कृषि क्षेत्र को फायदा पहुंचाना था। तो, मैं समझता हूं कि भारतीय स्टेट बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक मानने किंतु राष्ट्रीयकृत बैंक न कहने के पीछे का कारण अब स्पष्ट हो गया होगा क्योंकि दोनों के सरकारीकरण संबंधी अधिनियम ही मूल वजह हैं।

उन्हीं दिनों भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी एडीबी (कृषि विकास शाखाएं) भी खोलीं। उसके पहले औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (आईडीबीआई) की स्थापना की जा चुकी थी जिसका प्रतिफलन तो दीखने लगा था किंतु भारतीय स्टेट बैंक को 7 सहायक बैंक देने और 14 बडे कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के बावजूद प्रधानमंत्री के ‘गरीबी हटाओ’ नारे का प्रतिफलन अपेक्षानुसार होता नहीं दीख रहा था। फलस्वरूप बैंकिंग कमीशन 1972 की रिपोर्ट पर 02 अक्टूबर 1975 (आपात्काल के दौरान) को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) की स्थापना करने की घोषणा की गई और प्रारम्भिक तौर पर 5 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक स्थापित किए गए, उनका उद्देश्य ग्रामीण जनता को कम लागत पर बैंकिंग सुविधाएं और ऋण उपलब्ध कराना था (मुझे गर्व है कि उस प्रथम क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के प्रथम नियमित कर्मचारी के रूप में ही मैं ने अपना बैंकिंग करियर शुरू किया था, इसीलिए 4 दशकों तक अनेक बैंकों में विभिन्न पदों पर कार्य करने के बाद भी अपने प्रोफाईल में लिपिक के रूप में अपनी उस प्रथम नियुक्ति का उल्लेख करना मैं नहीं छोडता)। जिला स्तरीय क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना का दायित्व संबंधित जिले के अग्रणी बैंक के रूप में कार्यरत राष्ट्रीयकृत बैंकों तथा भारतीय स्टेट बैंक और उसके सहायक बैंकों को सौंपा गया, पूंजी में हिस्सेदारी केन्द्र सरकार की 50%, संबंधित राज्य सरकार की 15% और प्रवर्त्तक बैंक की 35% निर्धारित की गई।

आपात्काल के बाद 1977 में जनता पार्टी की लहर में कॉग्रेस तो हारी ही, इंदिरा जी खुद भी हार गईं। तीन साल के भीतर ही जनता पार्टी की सरकार गिर गई और उसके बाद हुए चुनाव में 1980 में कॉंग्रेस पुन: सत्ता में आ गई। सत्ता में आने के तीन महीनों के भीतर ही इंदिरा गांधी ने 6 अन्य निजी क्षेत्र के बडे कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण 15 अप्रैल 1980 को कर दिया, इस दफे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का आधार 200 करोड रूपये की जमा राशि था। उन्हीं 6 बैंकों में से ही एक- ‘न्यु बैंक ऑफ इंडिया’ को 04 सितम्बर 1993 को पंजाब नैशनल बैंक में मिला दिया गया। किसी एक राष्ट्रीयकृत बैंक को किसी दूसरे राष्ट्रीयकृत बैंक में मिलाने का देश में वह पहला उदाहरण था। मुझे इस बात का भी गर्व है कि उस न्यु बैंक ऑफ इंडिया में उस वक्त मैंने नौकरी ज्वाइन की थी जब वह निजी क्षेत्र में था, उसके छह माह बाद वह राष्ट्रीयकृत हो गया तथा 14वें साल में भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के सुदृढीकरण संबंधी एक महत्ती योजना के तहत पंजाब नैशनल बैंक में मिला दिया गया था।

जो लोग न्यु बैंक से आए लोगों पर व्यंग्यवाण छोडते थे कि “एक को डुबा कर दूसरे को डुबाने आए हैं” उनकी आंखें अब तो खुल जानी चाहिए कि न्यु बैंक का विलय घाटे के चलते नहीं, बल्कि ‘बैंकों के एकीकरण की नीति’ के तहत ट्रायल ऐण्ड एरर बेसिस पर आजमाने के लिए’ किया गया था। उस विषय पर बहस के दौरान उन्हीं दिनों जब मैंने कहा था कि न्यु बैंक को जितना घाटा  हुआ था, उससे कई गुना अचल सम्पत्ति बैंक के पास थी, सरकार चाहती तो फंडिंग कर के अथवा उसकी अचल सम्पत्ति को बेच कर उस घाटे को पूरा करा सकती थी , आखिर उसके पहले भारत सरकार अपनी साख बचाने के लिए सोना तो गिरवी रख ही चुकी थी, तो मेरे मैनेजर , जो आजकल कहीं मुख्य प्रबंधक या एजीएम होंगे,  ने बडी ही कुटिल मुस्कान के साथ कहा था  – “हां , दुल्हन खाली हाथ नहीं आई थी , अपने साथ दहेज भरपूर लाई थी” ; मैंने उनकी दुर्भावनापूर्ण एवं अपमानजनक टिप्पणी का सभ्य तरीके से जोरदर विरोध किया था और वैसा करते हुए  मैंने उस भय को भी दरकिनार कर दिया था कि मैनेजर के रूप में मेरे कार्यनिष्पादन रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणियां भी वे कर सकते थे।

1990 का दशक विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। रूसी राष्ट्रपति मिखाईल गोर्वाचोव ने प्रेस्त्रोइका और ग्लास्नोस्त की नीति की घोषणा करते हुए अमेरिका के साथ शीतयुद्ध एक तरह से समाप्त कर विश्व राजनीति को एक ध्रुवीय बनाने की ओर पहल कर दिया था। उसी दौर में पीवी नरसिम्हाराव की सरकार में वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, जो भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर भी रह चुके थे, भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण और वैश्वीकरण की ओर मोड रहे थे। वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तब तक का सबसे बडा ,कडा और अप्रत्याशित किंतु आवश्यक कदम था। उन्हीं दिनों भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता में बैंकिंग एवं वित्तीय व्यवस्था में सुधार संबंधी कमेटी की रिपोर्ट आई, जिसके माध्यम से क्रांतिकारी सुझाव दिए गए थे, सरकार ने लगभग सभी महत्वपूर्ण सुझावों पर सहमति व्यक्त कर दी। हालांकि उन सुझावों के तहत ही अनर्जक आस्तियां (एनपीए) की अवधारणा सामने आई, जिसके फलस्वरूप वित्तीय वर्ष 1991 – 92 में 20 में से 13 राष्ट्रीयकृत बैंक घाटे में चले गए; फिर भी, उन्हीं सुझावों पर अमल करने का सुपरिणाम रहा कि 2008 में विश्व – अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व मंदी आने और विदेशों में अनेक बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं के डूब जाने पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था उस मंदी के दुष्प्रभाव से बची रही और सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय बैंकों ने विश्व स्तर पर अपनी सुव्यवस्था का डंका बजा दिया।

भारत के स्वाधीन होने के तुरंत बाद से ही, ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए चतुर्दिक प्रयास होने लगे थे, निजी क्षेत्र के इम्पीरियल बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र का भारतीय स्टेट बैंक बनाना, देसी रियासतों के 7 (मूल रूप से 8) बैंकों को स्टेट बैंक का सहायक बैंक बनाना, 1967 में बैंकों को सामाजिक दायित्वों से जोडना, 1969 में 14 एवं 1980 में 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना, 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना करना तथा महिला सशक्तीकरण के लिए 2013 में सार्वजनिक क्षेत्र में भारतीय महिला बैंक की स्थापना करना आदि उसी दिशा में उठाए गए महत्वाकांक्षी कदम थे और उसी दिशा में पूरी मजबूती के साथ उठाया जाने वाला एक सुविचारित कदम बैंकों का एकीकरण भी है, इसके अंतर्गत देश के प्रमुख बडे बैंकों को रखने और उनमें ही अन्य बैंकों का विलय कर देने की योजना है, उसी योजना का प्रथम प्रयास भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहायक बैंकों व भारतीय महिला बैंक का विलय करना है, ताकि अपने मजबूत आधारभूत ढांचे का उपयोग करते हुए वे बैंक दूरदराज के गांवों में बसे लोगों को भी बैंकिंग व्यवस्था का लाभ पहुंचा सकें, साथ ही विश्व के बडे बैंकों की सूची में अपना सम्मानजनक स्थान बना सकें क्योंकि अभी तो फोर्ब्स की विश्वस्तरीय बैंकों की सूची में भारत का कोई भी बैंक प्रथम 50 में भी कहीं नहीं है, सहायक बैंकों के विलय से भारतीय स्टेट बैंक उक्त सूची में शीर्ष 50 में जगह पा सकता है।

इस प्रक्रिया से देश का सम्मान बढेगा, वित्तीय ढांचा मजबूत एवं व्यापक होगा जिसका लाभ आम जनता को होगा, फलस्वरूप अर्थव्यवस्था सुदृढ  होगी।  इसके अलावा, बैंकों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुदृढ एवं व्यापक होगा , बैंकों के ग्राहक आधार एवं संसाधनों में बृद्धि होगी, ग्राहक – सेवा सहज, सुलभ व सस्ती होगी, बैंक कर्मचारियों – अधिकारियों को प्रोन्नति के अवसर अधिक मिलेंगे तथा उनकी ट्रांसफर – पोस्टिंग सुविधाजनक होगी; यानी बैंको के विलय व एकीकरण के 8 में से 7 पक्षकारों को नफा होगा और एक पक्षकार अर्थात बैंक कर्मचारियों – अधिकारियों के संगठन के नेताओं का नुकसान होगा। उन्हें क्या, कैसा और कितना नुकसान होगा, यह जानने के लिए आइए, उनकी जडों की ओर चलें:-

भारत में बैंकिंग क्षेत्र में ट्रेड युनियन की शुरूआत 1946 में एआईबीईए की स्थापना से हुई, वही अधिकरियों की भी समस्याएं सुलझाता था। अधिकारियों का स्वतंत्र संगठन 1972 में एआईसीओबीओओ बना जो 06 अक्टूबर 1985 को परिवर्तित हो कर एआईबीओसी हो गया लेकिन एआईबीईए से संबद्ध अफसरों के मामले एआईबीईए ही देखता रहा। केन्द्र सरकार के अधिकारियों और बैंक अधिकारियों के वेतन ढांचे में समानता लाने के उद्देश्य से आईएएस अफसर जीके पिल्लई की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट, जो पिल्लई कमेटी रिपोर्ट (पीसीआर) के नाम से मशहूर है, बैंकों में 01 जुलाई 1979 को लागू हुई जिसके अनुसार बैंकों के स्केल वन अधिकारियों के कार्य सरकार के ग्रेड ‘ए’ के अधिकारियों के समान बताए गए तथा दोनों के समान वेतनमान निर्धारित किए गए थे। साथ ही, अधिकारियों के कार्यों की प्रकृति पर भी रोशनी डाली गई थी ; फलस्वरूप कामगार और अधिकारियों का संगठन पूरी तरह अलग कर लेने की अनिवार्यता महसूस की गई। उसके बाद एआईबीईए की विचारधारा के अधिकारियों ने 1981 में एआईबीओए बनाया , ये दोनों भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध हैं। बाद के दिनों में सीपीएम, कॉंग्रेस , बीजेपी आदि राजनीतिक पार्टियों से संबद्ध अनेक बैंक युनियन बन गए।

जब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना हुई तो उसकी मूलभूत नीतियों में कृषि एवं ग्रामीण उद्यमों को कम लागत पर और एक सीमित  मात्रा में ऋण देना, आधा प्रतिशत अधिक व्याज पर जमा राशि लेना, कर्मचारियों – अधिकारियों का वेतनमान संबंधित राज्य सरकार के कर्मचारियों – अधिकारियों  के समान करना तथा किसी भी प्रकार का युनियन बनाने की अनुमति न होना आदि शामिल था। फिर भी, देश के सभी ग्रामीण बैंकों में पहला युनियन मैंने और मेरे एक साथी ने मिल कर एआईजीबीईए चम्पारण में बनाना शुरू किया था और विगत 30 वर्षों तक उस युनियन का हेड क्वार्टर मोतीहारी में ही रहा, पता नहीं, अब क्या स्थिति है? । बाद में तो ग्रामीण बैंकों में भी सब कुछ कमर्शियल बैंकों की तरह ही हो गया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने युनियनों को ज्यादा ताक़तवर बना दिया। वेतन समझौते और नीति निर्धारण में युनियनों का दखल प्रभावकारी हो गया किंतु आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौरान नरसिम्हम कमेटी की रिपोर्ट लागू होने के बाद युनियन कुछ कमजोर पडने लगे और आज स्थिति यह है कि अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए तरह – तरह की गतिविधियों पर उतारू हो रहे हैं, प्रस्तावित हडताल उसी दिशा में है। अब बैंककर्मियों को सोचना होगा कि जब विलय और एकीकरण के  8 पक्षों में से 7 को उससे निश्चित रूप से फायदा होने वाला है तथा केवल एक यानी नेताओं को नुकसान होने की संभावना है तो ऐसी हालत में क्या करना उचित है। अब ज्यादा पढे – लिखे लोग बैंकों में आ रहे हैं, उनमें अपना भला – बुरा सोचने की क्षमता है, वे खुद निर्णय लें। बैंकों में नेताओं की दूरदर्शिता का आलम तो यह है कि जब दो दशक पहले द्विपक्षीय (कहा जाता है द्विपक्षीय, हालांकि होता है वह त्रिपक्षीय समझौता) के अनुसार सरकार ने बैंककर्मियों को पेंशन का विकल्प दिया और मैंने तुरंत उसे स्वीकार कर लिया तो बडे – बडे नेता आ कर कहने लगे – “ सर, आप के जैसा प्रबुद्ध अफसर पेंशन के लिए सहमति दे रहा है ! तुरंत वापस लीजिए” । मैंने उन्हें एक फिल्मी डायलग सुना दिया था – “ बेटे ! तुम जिस स्कूल में पढ रहे हो, मैं उसका हेडमास्टर रह चुका हूं, कोई दूसरा मुल्ला ढूंढो ” । बाद के वर्षों में वे ही नेता पेंशन का एक और विकल्प देने के लिए सरकार के सामने गिडगिडरा रहे थे , कई साल तक कई बार वेतन कटा कर हडताल करने के बाद, सरकार ने दुबारा वह विकल्प तो दिया किंतु वेतन समझौते से मिले ऐरियर का एक बडा हिस्सा पेंशन फंड में जमा कराने के बाद।

बैंककर्मियों के नेताओं को संबंधित बैंकों के निदेशकमंडलों में कर्मचारियों – अधिकारियों के हितों की रक्षा के साथ – साथ बैंक हित की रक्षा के लिए भी वाच डॉग (रखवाला) की भूमिका निभाने के उद्देश्य से शामिल किया गया था। आज बडे – बडे ऋण जब एनपीए हो गए हैं और वे नेतागण बैंक के शीर्ष कार्यपालकों पर गलत तरीके से ऋण देने का आरोप लगा रहे हैं तो उन नेताओं से भी पूछा जाना चाहिए कि गलत ऋण जब दिए जा रहे थे तो उन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई? क्यों न वैसे मामलों में उन पर भी कार्रवाई हो, क्योंकि बडे- बडे ऋण तो किसी भी एक व्यक्ति को स्वीकृत करने की शक्ति किसी भी बैंक में नहीं है, वैसे ऋण बोर्ड द्वारा ही स्वीकृत होते हैं तो उन नेताओं का कौन – सा हित सध रहा था कि वे चुप बैठ गए थे ? जब बैंक का वित्तीय स्वास्थ्य खराब हो रहा हो तो कम से कम नई पीढी के सदस्य अपने नेता से यह सवाल जरूर पूछें। बैंकों के विलय और एकीरण से वैसे ही नेताओं को नुकसान होने की संभावना है। छोटा – सा बैंक था, थोडे – से मेम्बर थे, फिर भी, वहां बहुमत था, इसीलिए बोर्ड में डायरेक्टर हो गए। एकीकरण के बाद तो वैसे कई छोटे बैंक एक बडे बैंक में मिलेंगे, जहां पहले से ही उस बडे बैंक के सबसे बडे संगठन का सबसे बडा नेता बोर्ड में डायरेक्टर बना बैठा है, वह कब और क्यों अपनी कुर्सी कम समर्थकों वालों को तस्तरी में सजा कर दे देगा ? असली दर्द यहां होता है, सबसे अंतिम पक्षकार को नुकसान होने की संभावना से अस्तित्व खतरे में नजर यों ही नहीं आ रहा है। यह मसला न्यु बैंक के विलय में भी था।

प्रधानमंत्री जी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय और एकीकरण शीघ्र सम्पन्न कराइए क्योंकि अगला विश्वयुद्ध बम, बन्दूकों व मिसाइलों से नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनों से लडा जाएगा और उसके लिए सुदृढ वित्तीय ढांचा का होना जरूरी है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जर्मन राज्यों के एकीकरण के लिए बिस्मार्क तथा आधुनिक इटली के निर्माण एवं सुदृढीकरण के लिए मैज़िनी, गैरीबाल्डी व कैवूर इतिहास पुरूष हो गए; भारत में भी , देसी रियासतों के विलय के लिए सरदार पटेल, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए इंदिरा गांधी तथा आर्थिक उदारीकरण व वैश्वीकरण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह इतिहास में अमर हो गए हैं; हालांकि 1991-92 में बैंकों के एकीकरण की नीति बना लेने के बावजूद वित्तमंत्री के रूप में 5 साल और प्रधानमंत्री के रूप में 10 साल के कीमती समय में भी वे अपनी उस नीति को अमली जामा नहीं पहना सके, शायद उसके पीछे न्यु बैंक ऑफ इंडिया का 1993 में पंजाब नैशनल बैंक में बिलकुल हडबडी में विलय करा देने से जो पेंचीदगियां पैदा हुईं,  वही मुख्य वजह रहीं हो; फिर भी, देश में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का एकीकरण उन्हीं के कार्यकाल में 2006 से 2008 के बीच हुआ जिनकी संख्या 196 से घट कर 56 रह गई है, उन्हें एक बार फिर एकीकृत किया जाना चाहिए और प्रत्येक राज्य में एक ही ग्रामीण बैंक रखा जाना चाहिए। इतिहास अब आपके द्वार आ गया है, वही इतिहास जिसने मैजिनी को इटली का ‘दिल’, कैवूर को ‘दिमाग’ और गैरीबाल्डी को ‘ताक़त’ कहा था, आप तो ‘मनकी बात’ करते हैं, आप देश का दिल , वित्तमंत्री अरुणजेटली दिमाग और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ताक़त बनें। सभी पूर्ववर्तियों से आगे निकल जाने के लिए आपका मार्ग प्रशस्त है, आप ढेर सारे बडे – बडे काम करा रहे हैं, राष्ट्रीयकृत बैंकों सहित ग्रामीण बैंकों का भी एकीकरण इसी वित्तीय वर्ष में करा लीजिए, और हां, विलय एवं एकीकरण से उत्पन्न होने वाली संभावित समस्याओं के समाधान के उपाय पहले ही ढूंढ लीजिए, इतिहास अपने पन्नों में नहीं, सिर–माथे रखेगा आप को। यह भी ध्यान रहे कि सिर पर कामयाबी का सेहरा बंधने या नाकामी का ठीकरा फुटने की पृष्ठभूमि आदमी खुद तैयार करता है।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

24 जून 2016

मो. 9310249821

22,844 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

  • 25/05/2017 at 8:00 am
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    My problem with it isn’t an overuse of intelligent words…it’s an over use of poor grammar. Punctuation was lacking greatly and multiple times I had to actually guess the words they meant to write. Other than that, it was pretty good. I enjoyed it.VA:F [1.9.21_1169](from 2 votes)

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  • 25/05/2017 at 7:31 am
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  • 25/05/2017 at 7:14 am
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    Market forces WILL take care of this phenomenon, but only if word gets out (as it has here) that the best seats are being withheld from the fans. Market forces work better the more informed the players are.

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  • 25/05/2017 at 6:52 am
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    I really want to apply with the Police Force, but I have smoked marijuana recently, but I am going to give it up to join the force. I know that drug screen you and I am going to wait till I am clean to apply, but they also polygraph test you and ask about drug use. I am afraid the won’t take me. Does anyone know what they will say about hiring if I used to smoke?

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  • 25/05/2017 at 6:43 am
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    please DON'T launch the full release, it would be a very bad idea. the only extremely inconvenient part of it for me, though, is the inbox. i don't get why u guys think the new inbox is so much "easier" to manage. well, its not. DON'T go through with it!

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  • 25/05/2017 at 6:25 am
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    Hiya, I am truly pleased I’ve found this info. Today bloggers distribute just about gossips and obtain and this is especially frustrating. A clear site with exciting pleased, this is what I necessary. Thankfulness for keeping this situate, I’ll ensue visiting it. Do you achieve newsletters? Can not attain it.

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  • 25/05/2017 at 6:12 am
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    the police now exist solely to protect the elite from the growing rage within the ordinary citisens.other than TV "reality" cop shows, they have no further use.all this at the behest of the most corrupt company in europe; the ACPO, who use the police and DVLA as a sourse of income.

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  • 25/05/2017 at 5:57 am
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  • 25/05/2017 at 5:44 am
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    Ik loop hier weer helemaal achter, ga meteen eens piepen bij die hemden. Zo in zilver zijn ze heel feestlijk, die beesten.Waar heb je ze gevonden? Kringloop?

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  • 25/05/2017 at 4:51 am
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    WJ – that is indeed the definitive point. The expulsion of the Palestinians is obscured in part by the fog of war, but nothing is more clear than the fact that Israel refused to repatriate them.

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